सड़क पर तड़पती महिला को एक अजनबी लड़के ने बचाया… लेकिन फिर जो हुआ…

अनजान रिश्ते की पहचान

कभी-कभी जिंदगी हमें ऐसे मोड़ पर ले आती है जहां मदद करना इंसानियत नहीं, बल्कि एक इम्तिहान बन जाता है। मुंबई की भीगी सड़कों पर एक लड़का, अशोक कुमार, बैठा था। वह बिल्कुल चुप और टूट चुका था। वह अपने गांव से कुछ सपने लेकर आया था, लेकिन आज उन सपनों का जनाजा उसी फुटपाथ पर पड़ा था। उसके हाथ में एक प्लास्टिक की थैली थी, जिसमें बस एक जोड़ी कपड़े, एक पुरानी डायरी और कुछ पैसे थे। अभी-अभी उसे एक जूते की दुकान से बाहर निकाला गया था। कहा गया था, “तू कस्टमर से बात करना नहीं जानता। कल से मत आना।” उसकी आंखें नम थीं, लेकिन कोई आंसू नहीं थे क्योंकि वह इतना टूट चुका था कि अब रोने की भी हिम्मत नहीं बची थी।

तभी उस वीरान सड़क पर एक तेज चीख गूंजी, “बचाओ! कोई है क्या? मुझे अस्पताल ले चलो! मुझे खून बहुत बह रहा है!” अशोक की आंखें खुल गईं। उसके कानों में आवाज फिर गूंजी और उसके शरीर में बिजली सी दौड़ गई। वह उठा और भागा। जहां से आवाज आ रही थी, वहां एक भीड़ खड़ी थी, जो मोबाइल निकालकर वीडियो बना रही थी। कुछ लोग कह रहे थे, “पुलिस को बुलाओ! एंबुलेंस आने दो! हम क्यों हाथ लगे?” लेकिन वहां एक महिला थी, करीब 30 साल की, खून से सनी कुर्ती पहने हुए। उसके माथे पर गहरा घाव था और आंखों में मौत का डर। वह कांपती हुई आवाज में बस कह रही थी, “कृपया कोई मेरी जान बचा लो।”

अशोक की रगों में इंसानियत दौड़ पड़ी। उसे भी नहीं पता चला कि उसने क्या किया। वह घुटनों के बल उस महिला के पास पहुंचा, रुमाल निकालकर उसके घाव पर बांधा, कंधे पर उठाया और एक ऑटो रुकवाया। ऑटो वाले ने पूछा, “भाई साहब, यह तो पुलिस केस लग रहा है। मैं नहीं चलाऊंगा।” अशोक ने आंखों में आंसू लिए कहा, “भाई, अगर तेरी बहन होती तो भी मना करता क्या?” और फिर बिना सोचे-समझे, वह महिला को गोद में उठाकर ऑटो में बैठा लिया।

ऑटो भाग रहा था। रास्ते भर महिला की आंखें बार-बार बंद हो रही थीं। अशोक हर बार कहता, “आंखें बंद मत करना, मैडम। तुम ठीक हो जाओगी। हिम्मत रखो, बस 2 मिनट।” जब वह अस्पताल पहुंचा, तब तक उसकी शर्ट खून से सनी हो चुकी थी। डॉक्टरों को चिल्लाकर बुलाया, “इमरजेंसी है! खून बहुत बह गया है! जल्दी कीजिए!” डॉक्टर दौड़े, स्ट्रेचर आया, और उसे इमरजेंसी वार्ड में ले जाया गया। अशोक वहीं बेंच पर बैठा भीगा हुआ, डर के मारे कांपता हुआ। लेकिन संतुष्ट था कि आज उसने किसी की जिंदगी को बचाने की कोशिश की है।

डॉक्टर बाहर आया और कहा, “अगर एक मिनट भी देर होती, तो शायद जान नहीं बचती। सिर में गहरा घाव है, 11 टांके लगेंगे और एक पैर भी टूट चुका है।” अशोक के चेहरे पर हल्की राहत थी। लेकिन जब दवाइयों की लिस्ट दी गई, तो उसने जेब से 1000 और 200 निकाले और सब कुछ उसी पर खर्च कर दिया। उस रात अस्पताल की वेटिंग चेयर पर बैठा वह लड़का, जिसके पास खुद रहने की जगह नहीं थी, किसी अजनबी की देखभाल कर रहा था।

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तीन घंटे बीते। रात के 2:30 बजे महिला को सामान्य वार्ड में शिफ्ट किया गया। जब उसकी आंखें खुली, तो सामने वही चेहरा था जो उसे गोद में लेकर दौड़ता हुआ आया था। “तुम कौन हो?” उसकी आवाज बेहद धीमी थी। अशोक हिचकिचाया। “मैं कुछ नहीं, मैडम। बस एक राहगीर जो वक्त पर आपके पास पहुंच गया।” महिला की आंखों से एक आंसू बह गया। “तुमने मेरी जान बचाई है।” अशोक सिर झुका कर बोला, “जान बचाना मेरा फर्ज था। अब देखभाल करना भी। आप अकेली तो नहीं ना?”

वह चुप हो गई। फिर बोली, “मेरा कोई नहीं है इस शहर में। पति लंदन में है। उनसे भी संपर्क नहीं हो पा रहा। अगर तुम सुबह तक रुक जाओ तो…” अशोक कुछ कह नहीं पाया। बस सिर हिला दिया। उसी रात जब वह महिला आंखें मूंद कर सोई, तो शायद पहली बार किसी अजनबी के सामने एक अनदेखा रिश्ता चुपचाप जन्म ले चुका था।

सुबह की पहली किरण खिड़की से झांक रही थी। लेकिन अस्पताल के उस छोटे से कमरे में जो रोशनी थी, वह एक इंसान की मौजूदगी की थी। वह इंसान अशोक, जो रात भर एक अजनबी के पास बैठा रहा, उसके हर सांस की धड़कन को जैसे अपनी धड़कन बना लिया था। संगीता की आंखें खुली। उसने खुद को सर से पैर तक पट्टियों में जकड़ा पाया। लेकिन जब उसने देखा कि कोई उसके पास बैठा है, आंखों में जागा हुआ पर थका नहीं, तो वह फिर फुसफुसाई, “तुमने मुझे क्यों बचाया?”

अशोक ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा, “आपकी चीख सुनकर कुछ सोचने का मौका ही नहीं मिला। बस इतना लगा कि अगर उस वक्त मैं ना पहुंचता, तो खुद को जिंदगी भर माफ नहीं कर पाता।” संगीता चुपचाप उसे देखती रही। कई सवाल थे उसकी आंखों में। “कौन हो तुम? क्यों इतने अपने हो? क्यों किसी अपने से ज्यादा अपना लगते हो?”

कुछ देर बाद जब नर्स आई, तो उसने कहा, “अब मरीज को घर जैसे कपड़े पहनाने होंगे। गाउन बदलना होगा।” अशोक जम गया। “मैडम, अगर आप कहें तो मैं बाहर से कुछ ले आता हूं।” संगीता ने थकी मुस्कान के साथ सिर हिलाया। वह बाहर गया। बाजार से एक सादा सी मैक्सी खरीदकर लाया। अपनी जेब के बचे आखिरी पैसों से।

नर्स ने पूछा, “आप क्या लगते हैं इनके?” वह चुप रहा। कुछ सेकंड। फिर कहा, “जाने वाला हूं।” क्योंकि अगर वह कहता, “मैं तो बस एक अजनबी हूं,” तो शायद डॉक्टर भी शक करते, अस्पताल वाले भी सवाल करते और वह सारी मदद जो अब तक की थी, शायद वही मिट जाती।

नर्स ने कहा, “तो कपड़े चेंज करवा दीजिए। पर्दा डाल दीजिए।” अशोक ने पर्दा खींचा, आंखें झुका ली और वहीं खड़ा रहा। तभी संगीता ने धीमे से कहा, “अगर तुम थोड़ा मदद कर दो तो मैं बदल लूंगी। हाथ हिल नहीं रहे। ग्लूकोज लगा है।” अशोक कांपता हुआ उसके पास गया। धीरे से उसका हाथ थामा और जितनी इज्जत, जितनी मर्यादा उसके पास थी, वह सब उसे एक क्षण में उसने संजो दी।

कपड़े बदलने के बाद संगीता ने पहली बार अशोक की ओर कुछ और गहराई से देखा। वह कोई नायक नहीं था। कोई अमीर नहीं था। लेकिन उस दिन उसके जैसा इंसान शायद इस धरती पर कोई नहीं था। धीरे-धीरे दो दिन बीत गए। अशोक अब अस्पताल के हर कोने से परिचित था। कभी दवा लाने दौड़ता, कभी रिपोर्ट लेने जाता। संगीता की सेवा में वह खुद को भूल चुका था और संगीता अब उसे देखने लगी थी उस नजर से जिससे कोई किसी करीबी को देखता है।

कभी सोचती, “जिस इंसान ने मेरी जान बचाई, वह मुझसे कुछ भी नहीं मांग रहा। क्या सच में अब भी ऐसे लोग बचे हैं दुनिया में?” तीसरे दिन डॉक्टर ने कहा, “अब आप मरीज को डिस्चार्ज कर सकते हैं। घर में देखभाल जरूरी है, लेकिन अस्पताल की जरूरत नहीं।” अशोक ने डॉक्टर को धन्यवाद दिया और एक बार फिर उसी तरह संगीता को व्हीलचेयर में बिठाया।

“घर चले?” संगीता ने पहली बार बिना कुछ कहे सिर्फ सिर हिलाया और उसकी आंखों से एक आंसू चुपचाप उसकी गोदी में गिर पड़ा। ऑटो रुका। बिल्डिंग बहुत ऊंची थी। सातवीं मंजिल पर उनका फ्लैट। जब अशोक ने दरवाजा खोला, तो उसकी आंखें खुली की खुली रह गईं। तीन कमरे, बड़ा हॉल, चमचमाता फर्नीचर। उसने कभी इतना खूबसूरत घर सिर्फ फिल्मों में देखा था। “मैडम, यह आपका घर है?” संगीता ने धीमे से कहा, “हां। पर अब इसमें कोई नहीं रहता। सिर्फ मैं।”

अशोक उसे धीरे से बेड पर लेटा है। चादर उठाता है और एक तकिया उसके सर के नीचे रखता है। तभी फोन बजता है। नया नंबर, संगीता। कांपते हाथों से उठाती है। “हैलो।” दूसरी तरफ से आवाज आती है, “रूपा। मैं विनय।” उसकी आंखों से फिर आंसू गिरते हैं। “विनय, तुम कहां थे? तुम्हें नहीं पता मैं कैसे बची हूं। अगर एक लड़का नहीं होता तो मैं आज नहीं होती।” फोन के दूसरी तरफ से आवाज आती है, “मैं आ रहा हूं रूपा। दो दिन में तुम्हारे पास पहुंचूंगा। बस तुम ठीक रहो।” फोन कट जाता है। कमरे में एक सन्नाटा और उस सन्नाटे को तोड़ता है संगीता की धीमी आवाज, “अशोक, क्या तुम दो दिन और मेरे साथ रह सकते हो?”

संगीता की वह एक पंक्ति अशोक के भीतर कुछ तोड़ भी गई और कुछ छोड़ भी गई। उसने सर नीचे झुकाकर कहा, “मैडम, जब तक आपके अपने लोग नहीं आते तब तक मैं आपके साथ हूं क्योंकि अब इस जिम्मेदारी से पीछे हटना मेरे जमीर के खिलाफ होगा।” संगीता ने कुछ नहीं कहा। बस एक लंबी सांस ली और आंखें बंद कर ली। लेकिन उसकी पलकों से बहता वह एक आंसू शायद उस तन्हाई को बहा कर ले जा रहा था, जो अब तक उसकी जिंदगी में जमा थी।

अगले दो दिन अशोक ने उस घर को सिर्फ घर नहीं, एक गिरते हुए इंसान के लिए सहारा बना दिया था। सुबह की चाय से लेकर रात की दवाइयां तक, बाथरूम ले जाना, बालों में कंघी करना, खाने में स्वाद पूछना, वह हर छोटी बात पर मुस्कुराता जैसे कह रहा हो, “आप फिक्र ना करें। जब तक मैं हूं, आप अकेली नहीं हैं।” और संगीता अब वह सिर्फ एक घायल महिला नहीं रही थी। अब वह धीरे-धीरे एक औरत की तरह अशोक को महसूस करने लगी थी।

कभी वह खिड़की के पास बैठी रहती और दूर से किचन में काम करता। अशोक उसे देखता तो सोचती, “एक अजनबी होकर इतना सच्चा कैसे हो सकता है और जिसे मैंने अपना माना वह आज तक नजर तक नहीं आया।” रात को वह डायरी लिखती थी जिसमें एक पंक्ति रोज जुड़ती थी, “आज भी अशोक ने मेरे लिए वही किया जो शायद मेरा अपना कभी ना करता।”

तीसरे दिन दोपहर दरवाजे की घंटी बजी। अशोक ने दरवाजा खोला। सामने एक लंबा चौड़ा आदमी खड़ा था। सूट बूट में। हाथ में ट्रॉली बैग। चेहरे पर हल्की थकान और आवाज में बनावटी चिंता। “हैलो। मैं विनय। रूपा का पति।” अशोक ने एक पल को उसे ऊपर नीचे देखा। फिर मुस्कुरा कर दरवाजा खोला। “आइए, वो अंदर है।” जैसे ही संगीता ने उसे देखा, वह बिखर गई। फूट-फूट कर रो पड़ी। “विनय, तुम कहां थे? तुम्हें नहीं पता मैं कैसे बची हूं। किस हालत में थी मैं?” और फिर उसने उसे पूरी घटना की कहानी सुनाई।

कैसे वह सड़क पर पड़ी थी। कैसे सब लोग मूकदर्शक थे। कैसे अशोक ने उसकी जान बचाई। पैसे खर्च किए। अस्पताल ले गया और तीन दिन तक सेवा की। विनय एकदम शांत रहा। फिर धीरे से अशोक की ओर मुड़ा। “थैंक यू अशोक। अगर तुम नहीं होते तो शायद मेरी बीवी आज इस दुनिया में नहीं होती। मैं कभी तुम्हारा एहसान नहीं भूलूंगा।” अशोक सर झुका कर मुस्कुराया। “मैंने कोई एहसान नहीं किया सर। बस जो इंसानियत कहती है, वो किया।”

उस दिन घर में सब कुछ सामान्य लग रहा था। लेकिन अशोक के भीतर कुछ उथल-पुथल थी। वह चुपचाप बालकनी में बैठा रहा और जैसे ही रात हुई, वह खुद को रोक नहीं पाया। धीरे से संगीता के पास आया। कुर्सी खींच कर बैठ गया और कहा, “मैडम, अगर आप बुरा ना माने तो मैं एक बात कहना चाहता हूं। जिस दिन आपका एक्सीडेंट हुआ था, उसी दिन मैंने विनय सर को देखा था। उसी जगह पर जहां आप पड़ी थीं।”

संगीता जैसे जम गई। उसके चेहरे का रंग उड़ गया। “क्या-क्या कह रहे हो तुम?” अशोक की आंखें अब नम थीं लेकिन आवाज में सच्चाई थी। “मैं झूठ क्यों बोलूंगा, मैडम? मैं तो आपको जानता तक नहीं था। उस दिन मैं वहीं बैठा था जब आपकी चीख सुनी और भाग कर गया। और तभी उस भीड़ में दूर एक चेहरा देखा। वही चेहरा जो आज दरवाजे पर खड़ा था।”

संगीता की सांसे भारी हो गईं। उसका दिल धड़कने लगा और दिमाग सुन्न पड़ गया। “अशोक, यह जो तुम कह रहे हो, अगर यह सच है तो फिर मेरा सबसे अपना ही मुझे मरते हुए देख रहा था।” अशोक कुछ नहीं बोला। बस अपनी नजरें झुका ली। कमरे में सन्नाटा था। बहुत भारी। बहुत चुभता हुआ। संगीता की आंखें डब डबा गईं। “तुम जाओ, अशोक। मुझे अकेला छोड़ दो। अभी कुछ समझने की हालत में नहीं हूं।”

अशोक ने एक लंबी सांस ली। फिर कहा, “ठीक है, मैडम। पर याद रखिएगा। सच को वक्त भले ही लग जाए, पर वह सामने जरूर आता है। और अगर मेरा देखा झूठ साबित हो, तो मैं हमेशा के लिए आपकी जिंदगी से चला जाऊंगा। लेकिन अगर वह सच हो, तो बस एक बार अपने दिल से पूछ लेना कि सबसे अपना कौन निकला।”

लेकिन संगीता वहीं बैठी रह गई। हैरान, टूटी हुई और अब पहली बार उसे अपने पति पर भरोसा नहीं था। सवाल उठने लगे थे। संगीता उसी कुर्सी पर बैठी थी जहां अभी कुछ पल पहले अशोक उसके सामने था। वह कुर्सी अब खाली थी लेकिन सवालों से भरी हुई। “क्या वाकई जो अशोक कह रहा था, वह सच था? क्या उसका पति, वह इंसान जिससे उसने शादी की, जिसके साथ जिंदगी बिताने का सपना देखा, वही उसकी मौत का गवाह था?”

संगीता की आंखों से आंसू चुपचाप गिरते रहे लेकिन दिमाग अब जाग चुका था। उसी रात उसने अपनी पुरानी फाइलें निकालीं। डॉक्यूमेंट्स, फ्लैट की रजिस्ट्री, अपने पिताजी के भेजे हुए पैसे की रसीदें, हर चीज को एक बार फिर देखने लगी। और तभी उसे वह दिन याद आया जब विनय ने पहली बार शादी के बाद कहा था, “रूपा, यह फ्लैट बेच दो। लंदन चलो, सब कुछ नए सिरे से शुरू करेंगे।” तब उसने मना कर दिया था। “यह घर मेरे मम्मी-पापा की आखिरी निशानी है। इसे मैं नहीं बेच सकती।”

और उसके बाद विनय का व्यवहार धीरे-धीरे बदलने लगा था। बहाने, दूरी और अंत में विदेश जाना। अब वह सारे टुकड़े एक तस्वीर बनकर उभरने लगे थे। सुबह हुई। संगीता ने जैसे तैसे खुद को समेटा और सबसे पहले अस्पताल फोन किया। “वो डॉक्टर से मिली जिसने मेरा इलाज किया था। डॉक्टर साहब, क्या उस दिन जब मुझे लाया गया था, तो कोई और आया था मेरे साथ?”

डॉक्टर ने बिना एक सेकंड की देरी के कहा, “अशोक नाम का लड़का था। अकेला था। पूरे केस की जिम्मेदारी उसी ने ली थी। खून से सना हुआ था। लेकिन अपनी परवाह किए बिना बस आपकी जान बचाने में लगा था।” अब संगीता को यकीन होने लगा था। वह सीधा थाने गई। सीसीटीवी फुटेज निकलवाने के लिए आवेदन डाला। उसने कहा, “मेरे एक्सीडेंट वाले दिन उस गली के कैमरे की फुटेज चाहिए।”

काफी कोशिशों के बाद दो फुटेज सामने आए। पहले में सड़क पर तेज रफ्तार से आती कार और एक महिला यानी वह खुद पैदल जाती हुई। फिर अचानक टक्कर और महिला सड़क पर गिरती है। दूसरे फुटेज में भीड़ इकट्ठा हो रही है और थोड़ी दूरी पर एक आदमी सूट में फोन पर बात करते हुए भगता दिखता है। संगीता के हाथ कांप गए। उसने वीडियो पोस्ट किया, ज़ूम इन किया और चेहरा देखा। वह चेहरा विनय का था। अब शक नहीं रहा। अब वह एक सच बन चुका था।

संगीता की सांसें थमने लगीं। “मेरा पति मेरी जान लेने आया था। जिसे मैंने सबसे ज्यादा चाहा, उसे मेरी मौत से कोई फर्क नहीं पड़ा।” उसी शाम उसने अशोक को फोन किया। कहा, “अशोक, क्या तुम मेरे घर आ सकते हो?” एक बार अशोक कुछ पल चुप रहा। फिर बोला, “हां, मैडम, मैं आता हूं।”

जब वह आया तो संगीता दरवाजे पर खड़ी थी। उसकी आंखें सूजी हुई थीं। लेकिन अब उनमें आंसू नहीं, आग थी। अशोक की आवाज बहुत धीमी लेकिन बहुत मजबूत थी। “तुम जो कह रहे थे, वह सब सच था।” अशोक कुछ नहीं बोला। उसने बस आंखें झुका ली। संगीता ने धीरे से उसकी ओर देखा। “जिस इंसान को मैंने अपना सब कुछ समझा, वही मेरी मौत का तमाशा देख रहा था और जो कभी मेरा कुछ नहीं था। उसने मुझे दोबारा जीना सिखाया।”

फिर उसने धीमे से कहा, “मैं पुलिस में केस दर्ज कर रही हूं। मुझे न्याय चाहिए और उस इंसान की सच्चाई सबके सामने लानी है। लेकिन उस लड़ाई में मुझे तुम्हारा साथ चाहिए। अशोक, क्या तुम मेरे साथ चलोगे?”

अशोक की आंखें भर आईं। उसने कोई वादा नहीं किया। बस आगे बढ़कर उसके कांपते हाथों को थाम लिया और उसे हाथों की पकड़ में संगीता को वह ताकत मिली जो उसने अपने पति के साथ भी कभी महसूस नहीं की थी। अगले कुछ दिन पुलिस की जांच, विनय की कॉल डिटेल्स, ड्राइवर अतुल की गिरफ्तारी, सारे राज एक-एक करके सामने आते गए। विनय ने पुलिस के सामने कबूल किया, “हां, मैंने ही उस दिन उसे रास्ते से हटाने की कोशिश की थी क्योंकि मैं वह फ्लैट और उसकी संपत्ति पाना चाहता था।”

कोर्ट ने विनय और ड्राइवर दोनों को हिरासत में ले लिया और वह दिन भी आया जब संगीता कोर्ट के बाहर खड़ी थी। सिर ऊंचा था। कंधे पर अशोक का हाथ था और उसके दिल में एक आवाज थी, “अब मैं टूटी नहीं। अब मैं बनी हूं। सिर्फ इसलिए क्योंकि एक इंसान ने बिना किसी लालच के मेरा हाथ थामा था।”

वो शाम शहर की सबसे शांत शाम में से थी। कोर्ट का फैसला हो चुका था। विनय और उसका साथी अतुल अब सलाखों के पीछे थे और संगीता अब भी कांपती थी। पर डर से नहीं, बीते हुए दर्द की परछाई से। उस दिन कोर्ट के बाहर जब उसने अशोक की ओर देखा, तो बस एक ही बात कह पाई, “तुमने मुझे टूटने से नहीं बचाया, अशोक, बल्कि मुझे फिर से जीना सिखाया।”

अशोक की आंखों में भी नमी थी। “मैंने बस अपना फर्ज निभाया, मैडम, और शायद खुद को थोड़ा सच्चा इंसान बना पाया।” कुछ दिन बीते, संगीता अब ठीक हो चुकी थी। जख्म भर रहे थे, बाहर भी और अंदर भी। वह अब धीरे-धीरे अपने पुराने फ्लैट में फिर से जीने लगी थी। लेकिन इस बार अकेले नहीं। अशोक अब उसके लिए वह परछाई बन चुका था जो हर वक्त उसके साथ चलती थी। जिसे शब्दों में बांधना मुश्किल था।

एक दिन संगीता ने उसे डाइनिंग टेबल पर बैठाया। खुद हाथ से चाय बनाई। उसके कप में डाली और सामने बैठाते हुए कहा, “अशोक, तुम अब चले क्यों नहीं जाते?” अशोक चौंका। “क्या मतलब, मैडम?”

“मतलब यह कि अब तुम्हारा काम खत्म हो चुका है। तुमने मुझे बचाया, संभाला। अब तुम्हारा कोई फर्ज नहीं बचता मेरे लिए।” अशोक चुप हो गया। उसने बस इतना कहा, “सच कहूं, मैडम? मैंने कभी किसी उम्मीद से आपके लिए कुछ नहीं किया। बस उस दिन जब आपकी चीख कानों में पड़ी थी, मुझे लगा अगर आज इसे ना बचाया तो खुद से नजरें नहीं मिला पाऊंगा।”

संगीता की आंखें भर आईं और बोली, “अशोक, अगर तुम अब चले गए ना, तो मैं दोबारा किसी पर भरोसा नहीं कर पाऊंगी। फिर से अकेली पड़ जाऊंगी। फिर से टूट जाऊंगी। अंदर से तुमने मेरी जान बचाई। मेरा सहारा बने। क्या अब तुम मेरी जिंदगी में सिर्फ एक मदद करने वाले नहीं, बल्कि हमेशा के लिए मेरे जीवन साथी बन सकते हो?”

अशोक स्तब्ध था। उसकी आंखों में आंसू थे। हाथ कांप रहे थे। “मैडम, मैं बहुत गरीब हूं। मेरे पास ना शोहरत है, ना पैसे। मैं किसी अमीर के लायक नहीं हूं।”

संगीता मुस्कुराई। “जो इंसान दिल से अमीर होता है, उसके पास दुनिया की सबसे बड़ी दौलत होती है। भरोसा और सच्चाई, जो तुमने मुझे दी।”

उस दिन अशोक ने पहली बार उस हाथ को थामा जिसे उसने हमेशा आदर से देखा था। अब प्यार से थाम लिया। अगले दिन दोनों ने शादी कर ली। शादी कोई शोरगुल वाली नहीं थी। सिर्फ कोर्ट में एक हस्ताक्षर और एक वादा। “अब चाहे जो हो जाए, हम एक दूसरे का हाथ कभी नहीं छोड़ेंगे।”

आज उसी फ्लैट में वह दोनों रहते हैं। संगीता अब एक एनजीओ चलाती है जिसका नाम है “दोबारा जिंदगी।” जहां जख्मी महिलाओं को मदद मिलती है, सहारा मिलता है और अशोक। वो अब किसी दुकान में काम नहीं करता। वो उसे एनजीओ का सह-संस्थापक है और हर दिन किसी को उठाते हुए उसे खुद में वही दिन याद आता है जब उसने संगीता को गोद में उठाया था।

दोस्तों, कभी-कभी एक अनजान मुसाफिर जिंदगी का सबसे सच्चा हमसफर बन जाता है और जिन्हें हम अपना समझते हैं, वही सबसे बड़ा धोखा बन जाते हैं। इस कहानी में इंसानियत जीत गई और खुदगरजी हार गई।