दिल्ली की कांस्टेबल काजल की हत्या: जब पति ही जल्लाद बन गया और दहेज की भूख ने एक ज़िंदगी निगल ली

दिल्ली की सड़कों पर रोज़ कानून की रखवाली करने वाली एक महिला,
वर्दी पहनकर अपराध से लड़ने वाली एक कांस्टेबल,
अपने ही घर में सबसे असुरक्षित साबित हुई।

उसका नाम था काजल

दिल्ली पुलिस में तैनात काजल की हत्या किसी अपराधी ने नहीं,
किसी बदमाश ने नहीं,
बल्कि उसके अपने पति ने की—
डंबल से पीट-पीटकर।

यह सिर्फ़ एक हत्या नहीं है।
यह दहेज, घरेलू हिंसा, सिस्टम की चुप्पी और एक माँ-बाप के टूटे हुए सपनों की कहानी है।

“22 तारीख को पता चला… तब तक मेरी बेटी खत्म हो चुकी थी”

काजल के पिता की आवाज़ काँप रही थी।
आँखों में आँसू नहीं थे—शायद आँसू भी थक चुके थे।

“22 तारीख को हमें खबर मिली,” वे बताते हैं।
“जब हम अस्पताल पहुँचे, तब तक वो बोलने की हालत में नहीं थी।
डॉक्टर कह रहे थे ब्रेन डेड जैसी स्थिति है… लेकिन उम्मीद थी…
सोचा शायद बच जाए।”

पर उम्मीद ज़िंदगी से हार गई।

काजल को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल ले जाया गया।
दो दिन… तीन दिन…
लेकिन होश नहीं आया।

27 तारीख को काजल ने दम तोड़ दिया।

“मैंने इसे मार दिया है… अगर बचा सकता है तो बचा ले”

हत्या से पहले का वह फोन कॉल रोंगटे खड़े कर देता है।

काजल के पति ने अपने साले को फोन किया और कहा—
“मैंने इसे मार दिया है।
अगर बचा सकता है तो आकर बचा ले।”

यह कोई ग़ुस्से में दिया गया बयान नहीं था।
यह एक चुनौती थी—
कानून को, पुलिस को, समाज को।

शादी को हुए थे सिर्फ़ डेढ़ साल

काजल की शादी 23 नवंबर 2023 को हुई थी।

एक पढ़ी-लिखी लड़की,
सरकारी नौकरी,
सम्मानित परिवार।

पर शादी के कुछ महीनों बाद ही हालात बदलने लगे।

पति बेरोज़गार था।
नौकरी लगने में सात–आठ महीने लगे।
इसी दौरान काजल से पैसों की मांग शुरू हुई।

“शादी से पहले 5 लाख का लोन निकलवाया”

काजल की माँ मीना देवी बताती हैं—

“मेरी बेटी ने बताया कि शादी से पहले इसने उससे 5 लाख का लोन निकलवाया।
उसी पैसों से शादी की।
फिर शादी के बाद गाड़ी की मांग शुरू हो गई।”

पहले बुलेट बाइक।
फिर चार पहिया गाड़ी।

“हमने लोन पर बाइक दिलवाई,” माँ कहती हैं।
“लेकिन फिर भी संतोष नहीं हुआ।”

ताने, अपमान और रंगभेद

काजल को सिर्फ़ मारा नहीं गया।
उसे रोज़-रोज़ तोड़ा गया।

ससुर कहता था—
“तू काली है।”
“तू सुंदर नहीं है।”
“तेरी दूसरी शादी करवाएंगे।”

यह सिर्फ़ घरेलू हिंसा नहीं थी।
यह मानसिक यातना थी।

“अब इसे मारना ही बेहतर है…”

माँ की आवाज़ भर आती है—

“उस दिन लड़ाई हुई।
मेरे बेटे ने फोन पर मेरी बेटी की चीख सुनी…
एक ही चीख…
फिर सब शांत।”

कुछ देर बाद वही आदमी फोन करता है—
“मर गई है।
एम्बुलेंस बुला लो।”

फिर खुलेआम कहता है—
“मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
पुलिस भी नहीं।”

छह दिन… तिल-तिल कर मौत

काजल की मौत एक झटके में नहीं हुई।

छह दिन तक वह अस्पताल में ज़िंदगी और मौत से लड़ती रही।
पर कोई ससुराल वाला देखने नहीं आया।

“ना देखने आए,
ना अंतिम संस्कार में,” माँ कहती हैं।

“शायद मेरी बेटी की सांसें अटकी थीं…
इसलिए पाँचवें दिन जबरदस्ती बुलाया…
छठे दिन उसकी सांसें चली गईं।”

डेढ़ साल का बेटा: एक और शिकार

काजल का डेढ़ साल का बेटा अब अनाथ है।

माँ कहती हैं—
“हम उसे पालेंगे।
मेरी बेटी के सपने पूरे करेंगे।”

पर सवाल यह है—
उस बच्चे की माँ कौन लौटाएगा?

क्या शिकायत पहले नहीं की गई?

यह सवाल अक्सर उठता है।

माँ बताती हैं—
“मेरी बेटी पिघल जाती थी।
वो कसम खाता था, माफी मांगता था।”

यह हर हिंसा झेलने वाली महिला की कहानी है—
“सब ठीक हो जाएगा” की झूठी उम्मीद।

दिल्ली पुलिस की कार्रवाई

दिल्ली पुलिस ने आरोपी पति को गिरफ्तार कर लिया है।
एफआईआर दर्ज है।
जांच जारी है।

लेकिन परिवार का आरोप है—
ससुराल वालों की भूमिका भी है।
दहेज का दबाव पूरे परिवार की तरफ से था।

अब सवाल यह है—
क्या सिर्फ़ पति सज़ा पाएगा?
या पूरा सिस्टम जवाब देगा?

एक कड़वा सच

काजल दिल्ली पुलिस में थी।
अगर वह सुरक्षित नहीं थी—
तो आम औरत कितनी सुरक्षित है?

अगर एक कांस्टेबल की शिकायतें अनसुनी रहीं—
तो घरेलू हिंसा झेल रही आम महिला का क्या?

यह सिर्फ़ काजल की कहानी नहीं है

यह कहानी है—

दहेज की
घरेलू हिंसा की
पितृसत्ता की
और कानून की सीमाओं की

हर साल सैकड़ों काजल मारी जाती हैं।
कुछ खबर बनती हैं।
ज़्यादातर नहीं।

एक माँ की आख़िरी मांग

“मेरी बेटी को जैसा मारा गया,
वैसी ही सज़ा चाहिए।”

यह बदले की मांग नहीं है।
यह न्याय की पुकार है।

आख़िर में सवाल आपसे

जब तक दहेज रहेगा,
जब तक बेटियों को बोझ समझा जाएगा,
जब तक शिकायत करने पर “समझौता” सिखाया जाएगा—

तब तक काजल मरती रहेंगी।

और हम हर बार कहेंगे—
“बहुत दुखद घटना है।”

पर दुख से इंसाफ नहीं मिलता।

अगर आप चाहें, मैं इस लेख को:

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में भी बदल सकता हूँ।

बस बताइए।