इस बच्चे की हिम्मत देख Indian Army भी रो पड़ी! रोंगटे खड़े कर देगा.
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यह कहानी एक ऐसे बच्चे की है जिसने अपनी छोटी सी उम्र में असाधारण साहस और बुद्धिमत्ता का परिचय दिया। कश्मीर के घने जंगलों में, जहां बर्फ से ढके पहाड़ आसमान को छूते हैं, और जहां के लोग अपनी ज़िंदगी बेहद सादगी से जीते हैं, एक बच्चा देश की रक्षा में अपनी जान की बाजी लगाने के लिए तैयार था। यह कहानी उस बच्चे की है जिसका नाम था राजू, और उसने अपनी गुलैल और छोटे से हौसले से देश के सबसे बड़े दुश्मन को हराया।
राजू का साहस
राजू कश्मीर के एक छोटे से गाँव में अपनी बूढ़ी दादी के साथ रहता था। उसके माता-पिता बचपन में ही गुजर गए थे। गांव वाले कहते थे कि राजू के पिता भारतीय सेना में थे और उन्होंने अपनी जान देश की रक्षा करते हुए दी थी। शायद यही कारण था कि राजू जब भी भारतीय वायुसेना के विमानों को आसमान में उड़ते देखता, उसकी आंखों में एक चमक आ जाती थी। वह अपनी दादी के साथ बहुत ही साधारण जीवन जीता था। उसका काम था जंगल से लकड़ियां इकट्ठा करना और उन्हें बाजार में बेचकर अपनी दादी के लिए दवाई और खाना लाना।
गांव में बुजुर्गों से हमेशा यही चेतावनी मिलती थी कि काली घाटी की तरफ मत जाना, जहां सूरज की रोशनी भी ठीक से नहीं पहुँच पाती थी। यह इलाका जंगली जानवरों से भरा हुआ था, और कभी-कभी दुश्मन सैनिक भी यहाँ घुसपैठ करते थे। लेकिन एक दिन, राजू खेलते-खेलते काली घाटी के इलाके में दाखिल हो गया। उसे इस बात का अहसास नहीं हुआ कि वह उस खतरनाक इलाके में जा चुका है, और यही वह दिन था जब राजू की जिंदगी पूरी तरह बदलने वाली थी।

विक्रम सिंह की तलाश
राजू जंगल में लकड़ियां इकट्ठा करते हुए एक अजीब चीज़ पर ठोकर खा गया। वह डरते-डरते उस चीज़ के पास गया और देखा कि एक लोहे का पिंजरा रखा हुआ था, जिसमें भारतीय सेना की वर्दी पहने एक घायल जनरल कैद था। जनरल विक्रम सिंह, भारतीय सेना के एक बड़े अफसर, जिनका शरीर एक बोरी की तरह लटका हुआ था, और वर्दी जगह-जगह से फटी हुई थी। वह पूरी तरह बेहोश थे। राजू को लगा कि यह कोई सामान्य घटना नहीं है। वह जानता था कि अगर वह इस जनरल को किसी भी हालत में बचाने में सफल हो गया तो यह पूरे देश के लिए बहुत गर्व की बात होगी।
राजू ने अपनी गुलैल निकाली और उसने जनरल के पास जाकर धीरे से एक छोटा सा पत्थर फेंका। जब जनरल विक्रम सिंह की आंखें खुलीं, तो उन्होंने एक छोटा सा इशारा किया और राजू को अपने पास बुलाया। राजू ने जनरल साहब से वादा किया कि वह उन्हें यहाँ से बचाएगा। उसने पूरी योजना बनाई और सबसे पहले उस पिंजरे को खोलने की कोशिश की।
आखिरी मौका
जनरल विक्रम सिंह की हालत बेहद खराब थी। राजू जानता था कि उसके पास केवल कुछ ही घंटे हैं। वह दुश्मन सैनिकों से बचने के लिए जंगल की ओर भागा और बहुत दूर एक पुरानी झोपड़ी से कुछ औजार लेकर वापस आया। उसका मकसद था कि वह ताले को खोलने के लिए किसी तरह से ताकत जुटाए। राजू ने कुछ छोटे से औजारों से उस ताले को खोला, और जनरल साहब को पिंजरे से बाहर निकाला।
लेकिन मुश्किलें अभी खत्म नहीं हुई थीं। दुश्मन सैनिक वापस आ गए थे और अब उनकी नज़रें पिंजरे के आसपास थीं। वे जानना चाहते थे कि जनरल को कौन छुपा कर ले गया था। राजू और जनरल विक्रम सिंह को जंगल की घनी झाड़ियों में छिपना पड़ा। जनरल विक्रम सिंह, जो पहले ही बुरी तरह घायल थे, अब राजू के कंधे का सहारा लेकर जंगल में भागने लगे। वे जानते थे कि अगर वे दुश्मन से बचकर निकल गए तो ही उनका मिशन सफल होगा।
साहस और संघर्ष का अंत
राजू और जनरल विक्रम सिंह दोनों एक साथ जंगल में छिपते हुए एक छोटे से रास्ते से निकले और वहां से एक नदी के पास पहुंचे। दुश्मन अभी भी उनका पीछा कर रहे थे। जनरल साहब ने राजू से कहा कि अब वे साथ नहीं चल सकते। राजू ने उन्हें समझाया और कहा कि वह साथ नहीं छोड़ेंगे। जनरल विक्रम सिंह ने राजू से कहा कि वह उनका साथ कभी नहीं छोड़ सकते।
यह वही पल था जब राजू ने अपने साहस को साबित किया। उन्होंने जनरल साहब को बचाने के लिए अपनी जान की बाजी लगा दी। राजू का विश्वास और साहस भारतीय सेना के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया।
कहानी का प्रभाव
राजू की साहसिकता और बहादुरी को देखते हुए भारतीय सेना ने उसकी पूरी जिंदगी की जिम्मेदारी ली। जनरल विक्रम सिंह ने राजू को भारतीय सेना का हिस्सा बनाया और उसकी शिक्षा की पूरी जिम्मेदारी ली। यही राजू का असली सम्मान था। भारतीय सेना ने उसे न सिर्फ एक सैनिक के रूप में स्वीकार किया, बल्कि उसे एक परिवार का हिस्सा बना लिया।
यह कहानी हमें सिखाती है कि देशभक्ति और साहस किसी उम्र, दौलत या ताकत के मोहताज नहीं होते। जब तक हमारे देश में राजू जैसे युवा मौजूद रहेंगे, भारत माता का सिर हमेशा ऊंचा रहेगा।
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