8 कत्ल, मौत की सज़ा तय थी…फिर जमानत कैसे? दिल दहला देने वाला सच

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आठ कत्ल, मौत की सज़ा…फिर जमानत कैसे?

यह कोई फिल्मी कहानी नहीं, बल्कि भारत की न्याय व्यवस्था की एक सच्ची और डरावनी तस्वीर है। एक ऐसा मामला जिसने पूरे देश को हिला दिया, और आज भी जब उसका जिक्र होता है, लोग पूछते हैं—आखिर इंसाफ क्या है?

रेलू राम पुनिया: संघर्ष से सफलता तक

हरियाणा के एक छोटे गांव में जन्मा रेलू राम पुनिया बचपन में दूसरों की भैंसें चराया करता था। गरीबी, संघर्ष और मेहनत से उसकी जिंदगी आगे बढ़ी। रोजगार की तलाश में दिल्ली आया, ट्रक धोने और चलाने का काम किया। बाद में केरोसिन के कारोबार में कदम रखा और धीरे-धीरे आर्थिक रूप से मजबूत हो गया। उसके पास 170 एकड़ जमीन, कई कारखाने और शानदार हवेली थी। 1996 में बरवाला से निर्दलीय विधायक बना।

परिवार और प्यार की जटिलता

रेलू राम की दो पत्नी थीं—पहली पत्नी से बेटा सुनील, दूसरी पत्नी कृष्णा देवी से प्रियंका और सोनिया। हवेली में उनका परिवार—रेलू राम, कृष्णा देवी, सुनील, प्रियंका, सोनिया, सुनील की पत्नी शकुंतला और उनके तीन छोटे बच्चे—लोकेश (4 साल), शिवानी (2.5 साल), प्रीति (45 दिन)—रहता था।

सोनिया, रेलू राम की सबसे लाडली बेटी थी। उसे जोड़ो कराटे का शौक था और पिता ने हर ख्वाहिश पूरी की। जोड़ो की प्रैक्टिस के दौरान सोनिया की मुलाकात संजीव से हुई, जो खुद भी खिलाड़ी था। दोस्ती प्यार में बदली, लेकिन संजीव मिडिल क्लास परिवार से था। सोनिया को भरोसा था कि उसके पिता उसकी शादी के लिए मान जाएंगे। आखिरकार, रेलू राम बेटी के प्यार के आगे झुक गए और सोनिया की शादी संजीव से हो गई।

शादी के बाद बदली जिंदगी

शादी के बाद सोनिया और संजीव बाहर रहने लगे। शुरुआत में सब ठीक था, लेकिन संजीव का काम ठप पड़ गया। आर्थिक हालत बिगड़ने लगी। रेलू राम ने दामाद की मदद की, लेकिन सोनिया संतुष्ट नहीं थी। वह चाहती थी कि संजीव बड़ा कारोबार करे, आलीशान जिंदगी जिए। इसके लिए उसे पैसों की जरूरत थी।

सोनिया ने पिता से जमीन में हिस्सा मांगा। रेलू राम बेटी के प्यार में तैयार हो गए, लेकिन बेटे सुनील ने विरोध किया। सुनील ने पिता को समझाया और सोनिया से भी बात की। बहस इतनी बढ़ गई कि सोनिया ने गुस्से में संजीव की रिवॉल्वर उठाकर सुनील पर तान दी। मामला वहीं शांत हो गया, लेकिन सोनिया के मन में खौफनाक फैसला जन्म ले चुका था—अगर पूरे परिवार को खत्म कर दिया जाए, तो सारी संपत्ति उसकी हो जाएगी।

खौफनाक रात: 23 अगस्त 2001

प्रियंका का जन्मदिन था। सोनिया ने पिता से कहा कि पार्टी 23 अगस्त को ही मनाई जाए और सिर्फ परिवार के लोग शामिल हों। बाहरी लोगों के लिए 24 अगस्त को अलग पार्टी रखी जाएगी। रेलू राम ने बेटी की बात मान ली। सोनिया और संजीव हवेली पहुंचे, तैयारियां कीं। शाम को नौकरों और ड्राइवरों को छुट्टी दे दी गई। अब सिर्फ 10 सदस्य हवेली में थे।

रात को सोनिया सबके लिए दूध लेकर गई। उसमें नशीला पदार्थ मिला था। सभी सदस्य गहरी नींद में चले गए। 45 दिन की बच्ची को भी दूध पिलाया गया ताकि वह रात में रोए नहीं। सोनिया ने सुनील के दूध में सबसे ज्यादा नशा मिलाया, क्योंकि वह तगड़ा और मजबूत था।

अब हवेली में सिर्फ सोनिया और संजीव जाग रहे थे। संजीव ने स्पीकर की आवाज और तेज कर दी ताकि बाहर किसी को हलचल का अंदाजा न लगे। दोनों सबसे पहले रेलू राम के कमरे में गए। संजीव ने लोहे की रॉड से रेलू राम के सिर पर कई वार किए, जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई। सोनिया ने नब्ज़ चेक की, थम्स अप दिखाया—”काम हो गया।”

इसके बाद सोनिया की मां और पोती शिवानी के कमरे में गए। संजीव ने रॉड से वार किया, लेकिन घबराहट में ठीक से वार नहीं कर पाया। सोनिया ने तकिए से अपनी मां का दम घोट दिया। फिर संजीव ने दोबारा रॉड से वार किया। दोनों की मौत हो गई।

प्रियंका के कमरे में गए, बेरहमी से मार दिया। सुनील के बेटे को भी नहीं छोड़ा। आखिर में सुनील के कमरे में पहुंचे—सुनील, शकुंतला और 45 दिन की बच्ची प्रीति को भी मार डाला।

कत्लेआम के बाद साजिश

कत्लेआम के बाद सोनिया ने खुद को भी हल्की चोट पहुंचाने की योजना बनाई ताकि वह भी शिकार लगे। संजीव ने रॉड से सोनिया के सिर पर वार किया, लेकिन वार इतना जोरदार था कि सोनिया बेहोश हो गई। संजीव डर के मारे भाग गया।

सुबह का मातम और जांच

अगली सुबह कर्मचारी ने हवेली में खून देखा, चीखने लगा। लोग इकट्ठा हुए, पुलिस आई। नौ लाशें मिलीं, लेकिन सोनिया जिंदा थी। उसे अस्पताल भेजा गया। सोनिया ने दावा किया कि रात में कुछ लोग घर में घुसे थे और हमला किया। पुलिस ने शुरू में सोनिया को पीड़ित माना, ज्यादा दबाव नहीं डाला।

फॉरेंसिक टीम ने जांच की। घर में डायरी का फटा पन्ना मिला—जिसमें लिखा था, “मैं अपने घरवालों से परेशान हूं, किसी को जिंदा नहीं छोड़ूंगी।” पुलिस को शक हुआ। सोनिया से पूछताछ की गई, वह डायरी उसकी थी। जब पन्ना दिखाया गया, सोनिया कांपने लगी, सच उगल दिया।

अदालत में सुनवाई और सजा

पुलिस ने संजीव को दिल्ली से गिरफ्तार किया। सोनिया ने कबूल किया कि उसने पूरे परिवार को संपत्ति के लिए मार डाला। अदालत ने इसे रेयर ऑफ द रेयरेस्ट केस माना। 3 साल की सुनवाई के बाद 31 मई 2004 को सोनिया और संजीव को फांसी की सजा सुनाई गई।

लेकिन मामला यहीं नहीं रुका। 2005 में हाईकोर्ट ने फांसी को उम्रकैद में बदल दिया। सुप्रीम कोर्ट ने फिर फांसी की सजा सही ठहराई, लेकिन कई वजहों से समय पर फांसी नहीं दी जा सकी। 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया—फांसी की सजा में असामान्य देरी हो तो उसे उम्रकैद में बदला जाए।

2018 में संजीव को 15 दिन की पैरोल मिली, वह फरार हो गया। 2021 में फिर गिरफ्तार हुआ। 13 दिसंबर 2025 को सोनिया और संजीव को अंतरिम जमानत पर रिहा कर दिया गया।

सवाल और सीख

यह घटना बताती है कि अंधा प्यार, लालच और नफरत इंसान को राक्षस बना सकता है। जब प्यार में समझ और सीमाएं खत्म हो जाती हैं, तब इंसानियत की सारी हदें टूट जाती हैं। सबसे बड़ा सवाल—क्या हमारा कानून पीड़ितों के साथ है या अपराधियों को रास्ता देता है? आठ लोगों की हत्या करने वाला, जिसे मौत की सजा मिल चुकी हो, पैरोल पर फरार रह चुका हो, अगर बाहर आ सकता है तो इंसाफ क्या है?

जब तक सवाल उठते रहेंगे, शायद तभी सिस्टम जागेगा।

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