एक बूढ़ी माँ का फ़ोन, और कांप उठी पूरी भारतीय सेना!
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एक बूढ़ी माँ का फ़ोन, और कांप उठी पूरी भारतीय सेना!
अध्याय 1: पहाड़ी रास्ते की चढ़ाई
उत्तराखंड के पहाड़ी रास्तों पर सर्द हवाएं और घने जंगल जैसे हर कदम में अजनबी सन्नाटे को समेटे हुए थे। सुबह की पारदर्शी धूप इतनी तेज थी कि डामर पर कांपती हुई गर्मी की लहरें उठ रही थीं। लेकिन इस मौसम में भी एक औरत अपने बेटे से मिलने के लिए एक कड़ी यात्रा पर निकल पड़ी थी।
श्रीमती राधा शर्मा, जिनकी उम्र 70 वर्ष की हो चुकी थी, बस की खिड़की से तेज़ी से गुजरते अपरिचित चेहरों को देख रही थीं। उनका चेहरा थका हुआ था, लेकिन उसकी आँखों में एक अद्भुत उम्मीद की चमक थी। उनके हाथ में एक पुराना, लम्बा टिफिन बॉक्स था, जो उन्होंने बड़े करीने से कपड़े में लपेट कर रखा था। उनके बेटे अर्जुन शर्मा के लिए, जो भारतीय सेना की विशेष अभियान ब्रिगेड में तैनात था, ये राजमा चावल थे—उनकी मां के हाथों का प्यार, जो अर्जुन को फौज में आने के बाद से मिस कर रहा था।
अर्जुन की पहली तैनाती में ही राधा को एक खास फीलिंग हो रही थी, एक मां का ख्याल—कि कहीं उनका बेटा अकेला तो नहीं महसूस कर रहा है। चिट्ठियों में वो हमेशा लिखता था कि सब कुछ ठीक है, लेकिन एक मां के दिल से छिपी घबराहट को उसने जान लिया था। यही वजह थी कि राधा शर्मा ने तय किया कि वह अपने बेटे से मिलने जाएंगी और उसे उसका पसंदीदा खाना देंगे, ताकि वह समझ सके कि उसकी मां उसकी चिंता करती है, चाहे वह कितनी भी दूर क्यों न हो।

अध्याय 2: सेना के दरवाजे पर अजनबी ताजगी
बस जब आखिरी स्टॉप पर रुकी, तो राधा को पुरानी टैक्सी में बैठना पड़ा। टैक्सी लंबी घुमावदार सड़कों पर दौड़ती रही, और हर गुजरते सेकंड के साथ राधा की बेचैनी बढ़ रही थी। इस यात्रा की पूरी कठिनाई सिर्फ इस सोच में समाई थी कि वह अपने बेटे से मिल पाएंगी या नहीं। टैक्सी के घुमावदार रास्तों को पार करते हुए वह उस विशाल सैन्य अड्डे के मुख्य द्वार पर पहुंची, जहाँ उनके बेटे अर्जुन तैनात था।
कर्नल विक्रम सिंह, जो सेना के उच्चाधिकारी थे, इस समय उस क्षेत्र के कमांडिंग ऑफिसर थे। उनके चेहरे पर विश्वास था, लेकिन वह एक ठंडे और कठोर सैन्य अधिकारी के रूप में खड़े थे, जो किसी भी स्थिति को शांत और धैर्य से संभालने के लिए प्रशिक्षित था। राधा ने उनसे मुलाकात की कोशिश की, लेकिन कर्नल विक्रम सिंह के व्यवहार में कोई सॉफ्टनेस नहीं थी। वह सख्त थे, और उन्होंने राधा को यह कहते हुए मना कर दिया कि इस समय मुलाकात संभव नहीं है।
कर्नल विक्रम सिंह ने राधा को नकारते हुए कहा, “यह सेना है, कोई किंडर गार्डन नहीं।” उन्होंने राधा के साथ ऐसा व्यवहार किया, जैसे वह कोई अपरिचित नागरिक हो, जो सेना के नियमों की कीमत को नहीं समझता हो।
अध्याय 3: एक मां की अपील, और कर्नल का कठोर रवैया
राधा शर्मा ने फिर भी विनम्रता से अनुरोध किया, “कर्नल साहब, कृपया मुझे सिर्फ पांच मिनट के लिए अपने बेटे का चेहरा देखने की अनुमति दे दीजिए। मुझे बस उसे राजमा चावल देना है, जो मैंने रात भर बनाकर लाया हूँ।”
लेकिन कर्नल विक्रम सिंह के पास कोई जवाब नहीं था। उनका रवैया कठोर था, और उन्होंने न केवल राधा को नजरअंदाज किया, बल्कि उसे अपमानित भी किया। उनकी बातों में यह महसूस हो रहा था कि वह राधा को केवल एक मामूली नागरिक समझते थे और उनके लिए सेना के नियम सर्वोपरि थे।
“आपके बेटे को भेजना मेरी गलती थी,” कर्नल ने कहा, “इस यूनिट में सिर्फ मजबूत लोग रहते हैं, जो मां के आंचल में नहीं रहते।”
राधा शर्मा की आँखों में एक गहरी खामोशी छा गई, लेकिन वह फिर भी शांति से खड़ी रही। वह जानती थी कि सेना का अपना अनुशासन होता है, और वह यह भी समझती थी कि प्रधानमंत्री के दौरे की तैयारी के चलते यह सब हो रहा था। लेकिन कर्नल का यह बर्ताव, उस मां के साथ, जिसे अपने बेटे के लिए सिर्फ एक बार उसके चेहरे को देखना था, बहुत निराशाजनक था।
अध्याय 4: कर्नल विक्रम सिंह का अहंकार, और राधा का निर्णय
राधा ने कर्नल से कहा, “क्या मैं जान सकती हूँ कि मुलाकात कब हो सकती है? मैं बस इंतजार करने को तैयार हूं।”
कर्नल विक्रम सिंह ने इस बार भी राधा को ऐसा घूरा जैसे वह कोई दोषी हो। उसकी आवाज में अब और भी गहरी चिढ़ थी। “यह मैं कैसे बता सकता हूं? ऑपरेशन की स्थिति कभी भी बदल सकती है।”
राधा शर्मा ने एक और कोशिश की, लेकिन कर्नल के अहंकार में कोई बदलाव नहीं आया। वह पूरी तरह से अपनी पंक्तियों में खो चुका था, और राधा को बार-बार दरवाजे से बाहर जाने के लिए कहा।
वह चुपचाप लौट आई, लेकिन उसे लगा जैसे वह अपनी पूरी दुनिया के सामने हार चुकी हो। उसने एक गहरी सांस ली, और फिर अपने बेटे अर्जुन के लिए उस प्यार से भरे राजमा चावल को लेकर एक साधारण ढाबे पर बैठने का मन बनाया।
अध्याय 5: एक अपमान और एक पुकार
राधा ढाबे पर बैठी चाय की एक प्याली को देखती रही। उसकी आँखों में वे दिन ताजा हो गए, जब वह अपने बेटे अर्जुन को लेकर छोटे से गाँव में रहती थी, जहां कोई भी समस्या छोटी लगती थी और उनका प्यार सबसे बड़ा था। लेकिन आज वह एक नई परीक्षा से गुजर रही थी।
इस बीच, कर्नल विक्रम सिंह की कठोरता की वजह से सेना में एक बड़ा भूचाल आया। कर्नल ने जो किया, वह किसी भी सैनिक को नफरत करने का कारण बन सकता था। लेकिन राधा को अपनी माँ की भूमिका निभानी थी। उसने अपना पुराना फोन निकाला, और उस नंबर को दबाया, जिसे उसने कभी सोचा नहीं था कि उसे इस्तेमाल करना होगा। वह एक आपातकालीन संपर्क नंबर था।
“मैं काली बोल रही हूं, साहब से बात कराओ।”
एक पल में, राधा ने अपने बेटे अर्जुन के लिए अपनी पूरी जिंदगी का गहरा कष्ट महसूस किया। उसका संदेश अब एक बड़ी आंधी की तरह फैलने वाला था, जो पूरे भारतीय सेना के लिए एक चौंकाने वाली चेतावनी बन जाएगी।
अध्याय 6: कर्नल विक्रम सिंह की परीक्षा
कर्नल विक्रम सिंह, जो अभी भी अपने इशारे से आंतरिक गर्व महसूस कर रहा था, जल्द ही एक बहुत बड़ी परीक्षा में फंसा। जब राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने उसे फोन पर आदेश दिया और उसे अपने कृत्य की गंभीरता समझाई, तो कर्नल के चेहरे पर घबराहट और शर्मिंदगी का एहसास हुआ।
उसके सामने एक ऐसा परिवर्तन था, जिसे वह कभी भी नहीं समझ सका था—एक मां का प्यार।
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