आश्रम में बाबा ने महिलाओं के साथ कर दिया कां#ड/बाबा महिलाओं के साथ गलत करता था/

अंधविश्वास की आड़ में विश्वासघात: ममता देवी की आपबीती
यह हृदयविदारक घटना राजस्थान के ऐतिहासिक जिले उदयपुर के एक छोटे से गाँव सराड़ा की है। अरावली की पर्वत श्रृंखलाओं की गोद में बसा यह गाँव अपनी शांति के लिए जाना जाता था, लेकिन यहाँ के शांत वातावरण के पीछे अंधविश्वास और धोखे का एक ऐसा जाल बुना गया, जिसने न केवल एक परिवार की खुशियाँ छीन लीं, बल्कि मानवता के अस्तित्व पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिया। यह कहानी है ममता देवी की, जिसने एक विधवा होने के नाते समाज के तानों और अपनों के विश्वासघात के बीच अपनी गरिमा को बचाने के लिए एक लंबी और कठिन लड़ाई लड़ी।
ममता का संघर्षपूर्ण अतीत
ममता देवी का व्यक्तित्व सादगी और शालीनता का संगम था। गाँव की हर महिला उसकी सुंदरता और उसके मधुर स्वभाव की प्रशंसा करती थी। लगभग तीन साल पहले, ममता का जीवन पूरी तरह बदल गया जब उसके पति का अचानक हृदय गति रुकने (हार्ट अटैक) से देहांत हो गया। वह दिन ममता के लिए किसी प्रलय से कम नहीं था। वह टूट चुकी थी, बिखर चुकी थी। लेकिन जब वह अपने चार साल के मासूम बेटे अंकुर के चेहरे को देखती, तो उसे जीने की एक नई वजह मिल जाती। अपनी बुजुर्ग सासू माँ गायत्री देवी की देखभाल की जिम्मेदारी भी अब उसी के कंधों पर थी।
ममता का दिन बहुत ही व्यस्त रहता था। सुबह के सूरज की पहली किरण के साथ वह जागती। घर में तीन-चार पशु थे, जिनके लिए चारा लाना, उनकी सफाई करना और दूध निकालना उसका मुख्य कार्य था। हर सुबह 8 बजे वह खेत की ओर निकल जाती। लेकिन पति के जाने के गम ने उसके मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रहार किया था। कुछ महीनों के बाद, उसे अचानक अजीब से दौरे पड़ने लगे। दौरे के दौरान वह तीन-चार घंटे तक अचेत पड़ी रहती, उसे अपने आस-पास की दुनिया का कोई बोध नहीं रहता था।
अंधविश्वास की बेड़ियाँ
ममता की सासू माँ गायत्री देवी, एक पारंपरिक और धार्मिक महिला थीं, लेकिन उनकी धर्मपरायणता अंधविश्वास की सीमा तक पहुँच चुकी थी। जब आधुनिक चिकित्सा और डॉक्टरों की दवाइयों ने ममता के दौरों पर तुरंत असर नहीं दिखाया, तो गायत्री देवी का धैर्य जवाब दे गया। उन्होंने डॉक्टरों पर भरोसा करने के बजाय गाँव के प्रचलित अंधविश्वासों की शरण ली।
उन्हें लगने लगा कि ममता पर किसी /प्रेत/ का साया है या उनके बेटे की /आत्मा/ अपनी पत्नी को पुकार रही है। गाँव में जब भी कोई घूमता हुआ तांत्रिक, ढोंगी बाबा या ओझा आता, गायत्री देवी उसे ममता के सामने ले आतीं। वे ढोंगी बाबा ममता के चेहरे पर राख फेंकते, डरावने मंत्रों का उच्चारण करते और ‘झाड़-फूंक’ के नाम पर गायत्री देवी से उनकी मेहनत की कमाई लूट लेते। ममता इन सब से और अधिक मानसिक तनाव में रहने लगी, लेकिन वह अपनी सासू माँ की आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर पाती थी।
दिव्या का षडयंत्रकारी प्रवेश
10 जनवरी 2026 की उस मनहूस शाम को, गायत्री देवी की पड़ोसन दिव्या उनके घर आई। दिव्या भी एक विधवा थी, लेकिन पूरे सराड़ा गाँव में उसका चरित्र संदिग्ध माना जाता था। वह अक्सर बनाव-श्रृंगार में रहती और उसका कोई निश्चित आय का साधन नहीं था। दिव्या ने गायत्री देवी को अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों में फंसाना शुरू किया।
दिव्या ने कहा, “गायत्री जी, आप इन छोटे-मोटे ओझाओं के पीछे क्यों भटक रही हैं? पास के गाँव में ‘कालूनाथ’ बाबा का एक विशाल आश्रम है। वे सिद्ध पुरुष हैं। मैंने देखा है कि कई महिलाएँ वहाँ से बिल्कुल स्वस्थ होकर लौटी हैं। बाबा का दिया हुआ प्रसाद खाते ही सारे /अशुभ/ साये नष्ट हो जाते हैं।”
गायत्री देवी, जो पहले से ही परेशान थीं, दिव्या की बातों में आ गईं। वे नहीं जानती थीं कि दिव्या दरअसल कालूनाथ बाबा की पुरानी शिष्या और उसकी /अवैध/ साथी थी। दिव्या का काम था गाँव की भोली-भाली और बेबस महिलाओं को फुसलाकर बाबा के पास ले जाना, जिसके बदले उसे मोटा कमीशन मिलता था।
अगले ही दिन, दिव्या ने ममता को अकेले आश्रम ले जाने की योजना बनाई। ममता अपनी सासू माँ को साथ ले जाना चाहती थी, लेकिन दिव्या ने बहाना बनाया कि बाबा केवल पीड़ित महिला को ही दर्शन देते हैं।
आश्रम का वीभत्स काला सच
जब ममता और दिव्या आश्रम पहुँचे, तो वहाँ का वातावरण बहुत रहस्यमयी बनाया गया था। कालूनाथ बाबा धुएँ के बीच बैठकर ऊँचे स्वर में मंत्र पढ़ रहा था। ममता की सादगी और उसके /यौवन/ को देखकर कालूनाथ की नीयत में /खोट/ आ गया। उसने आँखों ही आँखों में दिव्या को संकेत किया और उसे कुछ नकद राशि थमा दी। बाबा ने गायत्री देवी को संदेश भेजा कि ममता का ‘शुद्धिकरण’ करना अनिवार्य है।
बाबा ने ममता को एक विशेष कक्ष में बुलाया और उसे एक ‘सिद्ध प्रसाद’ खाने को दिया। उस प्रसाद में पहले से ही शक्तिशाली नशीला पदार्थ मिलाया गया था। मात्र 15-20 मिनट के भीतर ही ममता की चेतना लुप्त होने लगी और वह बिस्तर पर अचेत होकर गिर पड़ी। दिव्या कमरे के बाहर पहरा देने लगी ताकि कोई भीतर न आ सके।
उस बंद कमरे के भीतर, उस वहशी और ढोंगी बाबा ने ममता की विवशता का घोर /अपमान/ किया। उसने ममता की अचेत अवस्था का लाभ उठाते हुए उसके साथ /शारीरिक/ और /अमानवीय/ कृत्य किया। वह ममता की /अस्मत/ और उसके /शरीर/ के साथ तब तक खेलता रहा जब तक उसकी /हवस/ की आग शांत नहीं हो गई।
जब घंटों बाद ममता को होश आया, तो उसके कपड़े अस्त-व्यस्त थे और उसे शरीर में पीड़ा महसूस हो रही थी। उसने दिव्या से पूछा कि क्या हुआ था, तो दिव्या ने सफाई से झूठ बोला, “ममता, तुम्हें दौरा पड़ा था। बाबा ने तुम्हें दवा दी और तुम्हें आराम करने के लिए यहाँ लेटा दिया। तुम्हारी बीमारी बहुत गंभीर है, तुम्हें बार-बार यहाँ आना होगा।”
निरंतर शोषण और गर्भावस्था
यह सिलसिला कई महीनों तक चलता रहा। दिव्या हर तीसरे-चौथे दिन ममता को आश्रम ले जाती। हर बार ममता को वही नशीला प्रसाद दिया जाता और कालूनाथ बाबा उसके /जिस्म/ के साथ अपना /घिनौना/ खेल खेलता। ममता को अक्सर अहसास होता कि कुछ गलत हो रहा है, लेकिन दिव्या और बाबा उसे यह कहकर चुप करा देते कि यह उसके /पापों/ का प्रायश्चित और /शुद्धिकरण/ की प्रक्रिया है।
15 मार्च 2026 की सुबह ममता की हालत बहुत खराब हो गई। उसे बार-बार उल्टियाँ होने लगीं और वह खेत में ही चक्कर खाकर गिर गई। गायत्री देवी घबरा गईं और उसे गाँव के बड़े अस्पताल ले गईं। डॉक्टर ने जब जाँच की, तो रिपोर्ट देखकर सब दंग रह गए। डॉक्टर ने कहा, “गायत्री जी, आपकी बहू दो महीने की गर्भवती है।”
यह सुनते ही गायत्री देवी के पैरों तले जमीन खिसक गई। एक विधवा बहू का गर्भवती होना समाज में मौत से बदतर माना जाता था। गायत्री देवी ने ममता को बीच सड़क पर ही गालियाँ देना शुरू कर दिया, उसे ‘कुलटा’ और ‘चरित्रहीन’ कहा।
न्याय की कठिन डगर
ममता सदमे में थी, लेकिन अब उसके भीतर का डर समाप्त हो चुका था। उसे समझ आ गया था कि आश्रम में उसके साथ क्या हुआ है। उसने रोते हुए अपनी सासू माँ से कहा, “माँ जी, मैंने कभी किसी गैर मर्द की तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखा। यह सब उस कालूनाथ बाबा की करतूत है। जब मैं बेहोश होती थी, वह मेरा /शोषण/ करता था।”
गायत्री देवी बदनामी के डर से मामला दबाना चाहती थीं, लेकिन ममता ने फैसला कर लिया था कि वह उस /पापी/ को सजा दिलाकर रहेगी। वह अकेले पुलिस स्टेशन पहुँची और थाना प्रभारी मनोज कुमार को अपनी पूरी व्यथा सुनाई। ममता के साहस को देखकर पुलिस ने तुरंत टीम गठित की और कालूनाथ के आश्रम पर छापा मारा।
पुलिस की सख्ती और पूछताछ के बाद कालूनाथ टूट गया। उसने स्वीकार किया कि वह ‘प्रसाद’ के नाम पर महिलाओं को /नशा/ देता था और उनके साथ /दुराचार/ करता था। दिव्या के घर से भी बाबा द्वारा दिए गए पैसों की गड्डी बरामद हुई।
एक नई शुरुआत और समाज को संदेश
ममता की इस लड़ाई ने पूरे सराड़ा गाँव को हिलाकर रख दिया। कालूनाथ और दिव्या को जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया गया। यद्यपि समाज की नज़रें ममता के लिए अभी भी पूरी तरह उदार नहीं थीं, लेकिन उसने अपने स्वाभिमान को बचाने के लिए जो साहस दिखाया, उसने कई अन्य पीड़ित महिलाओं को भी अपनी आवाज़ उठाने की प्रेरणा दी।
निष्कर्ष और सीख: ममता की यह कहानी इस बात का प्रमाण है कि अंधविश्वास की जड़ें हमारे समाज में कितनी गहरी हैं। यह हमें सचेत करती है कि:
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कभी भी किसी व्यक्ति पर, चाहे वह धार्मिक गुरु ही क्यों न हो, आँख मूँदकर विश्वास न करें।
बीमारी का इलाज डॉक्टर से कराएं, न कि तांत्रिकों से।
समाज की ‘लोक-लाज’ के डर से /अपराध/ को सहना, अपराधी को बढ़ावा देना है।
नोट: यह कहानी वास्तविकता पर आधारित एक सामाजिक संदेश है। इसका उद्देश्य अंधविश्वास के खतरों के प्रति लोगों को जागरूक करना और महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति सशक्त बनाना है।
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