अर्जुन की कहानी: एक पिता का संघर्ष और सफलता
प्रस्तावना
यह कहानी है अर्जुन की, एक गरीब भुट्टा बेचने वाले लड़के की, जो पहाड़ों से आया था। उसने मेहनत और आत्मसम्मान के सहारे अपने जीवन की बाजी पलट दी। कभी सड़क किनारे ठेले पर पसीना बहाने वाला अर्जुन किस तरह एक मासूम बच्ची का हीरो पापा बना और फिर एक मां का सहारा बना। यही इस कहानी का सबसे बड़ा चमत्कार है।
बचपन की कठिनाइयां
मेरा नाम अर्जुन है। मैं काशीपुर नाम के छोटे से गांव से आया हूं, जहां ना सड़कें हैं, ना बिजली, और ना ही शहर जैसी चमकदमक। वहां की रात का अंधेरा इतना गहरा होता है कि लगता है जैसे पूरा आसमान ही जमीन पर उतर आया हो। गरीबी ऐसी कि बच्चों की आंखों की चमक जवान होने से पहले ही खो जाती है। मेरे मां-बाप ने कभी सपने नहीं देखे। उन्हें पता था कि सपने देखने वाले अक्सर भूखे ही सो जाते हैं।
मेरे भाई-बहन भी उसी मिट्टी में पले-बढ़े हैं, लेकिन मेरे दिल में एक जिद थी। मैंने ठान लिया था कि मुझे कुछ करना है। मैं एक दिन अपने मां-बाप का चेहरा रोशन करूंगा, बहनों के हाथ पीले करूंगा और भाइयों को पढ़ा-लिखाकर उन्हें इज्जत दूंगा। यही ख्वाहिश मुझे पहाड़ छोड़कर शहर खींच लाई।
शहर में संघर्ष
शहर आया तो पहला काम मिला भुट्टे बेचना। पहले पहल मन बहुत टूटा, लेकिन मां की झुर्रियों का ख्याल, पिता की चुप निगाहें और बहनों के पुराने कपड़े सबने मुझे मजबूर कर दिया कि मैं ठेला पकड़ लूं। धीरे-धीरे आदत पड़ गई। लोग पूछते, “तुम तो पढ़े-लिखे लगते हो, भुट्टे क्यों बेच रहे हो?” मैं बस मुस्कुरा कर कह देता, “मजबूरी इंसान से सब कुछ करवाती है।”
दिन गुजरते गए, और मैंने समझा कि हर ठेले के पीछे एक कहानी होती है। मेरी भी थी। शाम को जब ठेला समेटता तो बचा हुआ भुट्टा खुद खाने के बजाय किसी भूखे बच्चे को दे देता। मेरे लिए वही असली तृप्ति थी। कुछ बच्चे आते, हाथ में फटा हुआ नोट पकड़े हुए, जिसे बाकी दुकानदार लेने से मना कर देते थे। पर मैं बिना कुछ कहे भुट्टा उनके हाथ में रख देता। बच्चों से मुझे बहुत लगाव था, शायद इसलिए कि मेरे अपने छोटे भाई-बहन भी गांव में मेरे इंतजार में बैठे थे।
एक अजीब मोड़
तभी मेरी जिंदगी ने एक अजीब मोड़ लिया। हर रोज मेरे ठेले के सामने एक बड़ी काली गाड़ी आकर रुकने लगी। उसके शीशे इतने गहरे थे कि अंदर कोई चेहरा दिखता ही नहीं था। पहले तो मैंने इसे इत्तेफाक समझा, लेकिन जब यह रोज होने लगा तो मेरे मन में बेचैनी बढ़ गई। दिल कहता था, “कोई मुझे अंदर से देख रहा है।”
एक सुबह हल्की धूप थी। पार्क के बाहर बच्चे खेल रहे थे। मेरी नजर एक छोटी सी बच्ची पर गई। वह अकेली सड़क के किनारे पत्थरों से खेल रही थी। अचानक एक गाड़ी तेज रफ्तार से उसी तरफ बढ़ी। मेरा दिल जैसे सीने से बाहर कूद आया। मैं दौड़ा और उस बच्ची को अपनी बाहों में उठाकर सड़क से खींच लिया। गाड़ी अचानक ब्रेक मारकर रुकी। ड्राइवर गुस्से से चिल्लाने लगा, लेकिन उस दिन पहली बार मेरी आवाज ऊंची हुई। मैंने कहा, “यह बच्चों का पार्क है। इतनी तेज गाड़ी क्यों चला रहे हो?”
हीरो पापा बनना
उस दिन की घटना के बाद, मैं अक्सर सोचता था कि वो छोटी सी बच्ची कौन थी? कुछ हफ्तों बाद वही काली गाड़ी फिर से आई। इस बार अंदर एक महिला बैठी थी। उसने कहा, “10 भुट्टे पैक कर दो।” मैंने जल्दी से भुट्टे पैक किए और जब उसने नोटों की मोटी गड्डी मेरी तरफ बढ़ाई, तो मैं चौंक गया। उसने कहा, “यह भुट्टों के पैसे नहीं, एक ऑफर है। अगर मान लिया तो तुम्हारी जिंदगी बदल जाएगी। बस ठेला छोड़ना होगा और मेरे साथ चलना होगा।”
दिल धड़कने लगा। इतनी बड़ी रकम मैंने कभी नहीं देखी थी। मन के किसी कोने ने कहा, “शायद यही वह दरवाजा है जो मां की झुर्रियों को मिटा देगा।” मैंने हक कह दी। गाड़ी चली और कुछ देर बाद एक बड़े बंगले के सामने रुक गई।
जब मैं गाड़ी से उतरा, तो वही छोटी बच्ची दौड़ती हुई आई और मेरे पैरों से लिपट गई। उसकी मासूम आवाज गूंजी, “मम्मा, यही है वो हीरो पापा जिन्होंने मुझे बचाया था।” उस क्षण मेरी सांसे थम गईं। मेरे लिए “पापा” हमेशा एक सपना था, लेकिन उस बच्ची ने मुझे “हीरो पापा” कह दिया।
प्रियंका का प्रस्ताव
महिला ने कहा, “मेरा नाम प्रियंका है। मायरा मेरी इकलौती बेटी है। उसकी तबीयत बेहद नाजुक है। शरीर खुद खून नहीं बना पाता। बड़ा इलाज है।” प्रियंका ने आगे कहा, “जिस दिन तुमने मायरा को बचाया था, मैं कार में बैठी सब देख रही थी। उसके बाद से मायरा तुम्हें हीरो पापा कहने लगी।”
प्रियंका ने कहा, “मैं तुम्हारी खरीदफरोख्त नहीं कर रही। मैं अपनी बेटी के लिए एक रिश्ता ढूंढ रही हूं। उसे आसरा चाहिए।” मैंने मायरा के बालों पर हाथ फेरते हुए कहा, “बेटा, तुम सच में मुझे हीरो पापा मानते हो?” उसकी मासूम आंखों में चमक थी। मैंने प्रियंका से कहा, “एक शर्त है। मैं बिना रिश्ते के इस घर में नहीं रहूंगा।”
प्रियंका ने कहा, “मंजूर है।” उस दिन के बाद से मेरी जिंदगी का हर पल बदल गया। मैं अब सिर्फ ठेले वाला अर्जुन नहीं था, बल्कि मायरा का हीरो पापा बन चुका था।
नई जिम्मेदारियां
मायरा की देखभाल करना मेरी प्राथमिकता बन गई। सुबह सैर के लिए ले जाना, स्कूल की कहानियां सुनाना, झूले पर खिलाना और रात को लोरी गाकर सुलाना। प्रियंका दूर खड़ी सब देखती रहती। उसके चेहरे पर एक शब्द उतर आता था।
कुछ हफ्ते बीते और मायरा की रिपोर्ट्स में सुधार दिखने लगा। डॉक्टर ने कहा, “आपका साथ उसके लिए दवा से कम नहीं है।” एक दिन मायरा ने कान में फुसफुसाया, “पापा, मुझे एक छोटा भाई चाहिए।” मैंने हंसकर कहा, “जब ऊपर वाले की क्लास लगेगी, तब बुलावा जरूर आएगा।”
प्रियंका ने कहा, “अर्जुन, मैं सचमुच तुम्हारे साथ औपचारिक रूप से जीवन बिताना चाहती हूं।” मैंने उसकी आंखों में देखते हुए कहा, “प्रियंका, तुम्हारा यही वाक्य मेरे लिए हाय, हम शादी करेंगे।”
शादी का प्रस्ताव
कुछ ही हफ्तों बाद हमने शादी का फैसला किया। मंदिर के आंगन में पीपल के पेड़ पर पीली चुनरी बंधी हुई थी। पंडित मंत्र पढ़ रहा था। मायरा ने दोनों हाथों में माला पकड़ी और हमें पहनाई। उसकी मासूम आवाज गूंजी, “अब आप दोनों मेरे मम्मा-पापा हो।”
सिंदूर भरते समय मेरी उंगली कांपी। उसमें मेरे सात साल का संघर्ष, भूख, ठेले का धुआं और हर बूंद पसीने की याद थी। लेकिन जैसे ही मंगलसूत्र की डोर गले में पड़ी, ऐसा लगा जैसे भगवान ने मुझे दूसरी जिंदगी दे दी हो।
नया परिवार
शादी के बाद जिंदगी का रंग बदल गया। घर में रूटीन बन गया। सुबह मायरा की दवाइयां, दोपहर को उसकी कहानियां, शाम को झूला और रात को लोरी। डॉक्टर ने कहा था, “आपका साथ मायरा के लिए किसी दवा से कम नहीं।”
मायरा की रिपोर्ट्स सुधर रही थी। प्रियंका धीरे-धीरे मुस्कुराने लगी थी। एक शाम उसने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “अर्जुन, हमारे घर में शायद एक और सदस्य आने वाला है।” मैंने उसका हाथ थाम लिया।
जब मायरा को यह खबर दी गई, तो वो खुशी से उछल पड़ी। “मेरा छोटा भाई आएगा। मैं उसका नाम रखूंगी अंश।”
संकट का समय
लेकिन खुशियों के बीच एक रात मायरा को तेज बुखार हो गया। हम तुरंत अस्पताल भागे। डॉक्टर ने कहा, “संक्रमण है लेकिन घबराइए नहीं। खतरे से बाहर है।” रात भर मैं उसकी हथेली थामे रहा। सुबह तक बुखार उतर गया। मायरा ने आंखें खोली और मुस्कुरा कर बोली, “पापा, मैं ब्रेव हूं?”
परिवार की खुशी
अब हमारा घर सचमुच हंसी से भर चुका था। प्रियंका की गोद में अंश आने वाला था और मायरा अपने छोटे भाई के लिए खिलौने सहेज रही थी। हम तीनों बालकनी के झूले पर बैठते। मैं मायरा को चिड़िया की नई कहानियां सुनाता।
एक दिन प्रियंका ने मुझे एक चिट्ठी दी। उसमें लिखा था, “अर्जुन, रिश्ते केवल मंजूर नहीं किए जाते। उन्हें जिया जाता है। तुम मुझसे उम्र में छोटे हो, पर मेरे डर से बड़े हो। धन्यवाद कि तुमने हमारे घर में रिदमम ला दी।”
निष्कर्ष
इस कहानी ने मुझे सिखाया कि हीरो सिर्फ फिल्मों में नहीं होते, हीरो एक पिता भी बन सकता है। जरा सोचिए, क्योंकि आपके एक छोटे से व्यवहार से किसी की पूरी जिंदगी बदल सकती है। आज मेरे पास सिर्फ एक परिवार नहीं, एक कहानी है।
इस कहानी का सबसे खूबसूरत हिस्सा अभी बाकी है। क्योंकि जिस दिन अंश इस घर की दहलीज पार करेगा, उस दिन हमारी हंसी सिर्फ इन चार दीवारों में नहीं गूंजेगी। बल्कि पूरी दुनिया सुन पाएगी कि हीरो सिर्फ फिल्मों में नहीं होते, हीरो एक पिता भी बन सकता है।
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