एक मां की कुर्बानी: दरिया की कहानी
एक समय की बात है, जब लोग बिजली से अंजान थे और घरों में केवल चिरागों की टिमटिमाती रोशनी होती थी। एक छोटे से गांव में, जहां घने पेड़, मिट्टी के मकान और खामोश फिजाएं थीं, एक नेकदिल लड़की आलिया रहती थी। आलिया की शादी कम उम्र में ही यूसुफ नाम के एक मेहनती किसान से कर दी गई। यूसुफ दिनभर खेतों में मेहनत करता और रात को थककर सो जाता। आलिया की जिंदगी सादगी से भरी थी, लेकिन उसके दिल में एक ख्वाब पलता था—मां बनने का ख्वाब।
जब आलिया को पता चला कि वह उम्मीद से है, तो उसकी आंखों में खुशी की चमक आ गई। उसकी सास, जो अक्सर सख्त और तल्ख मिजाज की होती थी, पोते की खुशी में नरम नजर आई। यूसुफ भी चुप था, लेकिन उसकी आंखों में उम्मीद की झलक थी। समय बीता और आखिरकार वह लम्हा आया जिसका सभी को इंतजार था। लेकिन जैसे ही बच्ची पैदा हुई, खुशी का माहौल एक अजीब सन्नाटे में बदल गया। बच्ची निहायत कमजोर थी, उसकी आंखें बंद थीं, और उसका चेहरा ऐसा था जैसे किसी अजीब साए का असर हो।
सास ने तुरंत मुंह मोड़ लिया और आलिया की आंखों में जो मां बनने की खुशी थी, वह डर और अजनबीपन में बदल गई। उसने बच्ची को देखते ही घिन महसूस की, जैसे यह बच्ची इंसानों में नहीं रह सकती। यूसुफ ने चुपचाप अपनी नजरें हटा लीं। उसकी खामोशी ने आलिया को यकीन दिला दिया कि शायद वह भी यही सोचता है। सास ने साफ कह दिया कि यह बच्ची मनहूस है और इसे घर से बाहर फेंक देना चाहिए, वरना सब कुछ बर्बाद हो जाएगा।
उस रात, जब सब सो रहे थे, आलिया चुपचाप उठी। उसने बच्ची को सफेद कपड़े में लपेटा और घर से निकल पड़ी। आसमान पर चांद अपनी पूरी आबो-ताब में चमक रहा था, जैसे पूरी कायनात उस लम्हे की गवाह बनना चाहती हो। दरिया के किनारे पहुंचकर आलिया कुछ पल खामोश रही। पानी की सतह ठहरी हुई थी, जैसे किसी बड़ी कुर्बानी को अपने सीने में समेटने को तैयार हो।
आलिया ने आंखें बंद की, अपने दिल को पत्थर बनाया और आहिस्ता से कहा, “ए पानी, तू सब कुछ बहा ले जाता है। आज मेरी यह आजमाइश भी ले जा।” फिर उसने बच्ची को दरिया के हवाले कर दिया। एक पल के लिए कुछ नहीं हुआ, फिर पानी की सतह पर हल्की सी लहर उठी और बच्ची गायब हो गई। आलिया ने एक गहरी सांस ली और फिर पीठ मोड़कर वापस चल दी।
उस रात दरिया खामोश रहा। चांदनी धीमी पड़ गई और आलिया के दिल में सुकून के बजाय एक अजीब सा खालीपन उतर आया। वह समझ रही थी कि उसने एक बोझ उतार दिया है, लेकिन उसे यह नहीं पता था कि दरिया कभी-कभी लौटाता भी है। तभी पानी की सतह में हलचल हुई। आलिया ने आंखें खोलकर देखा। दरिया जैसे सांस ले रहा हो। एक ही लम्हे में पानी की तह से कुछ उभरा। वही बच्ची, जिसे आलिया ने अपने हाथों से दरिया के हवाले किया था।
लेकिन हैरत की बात यह थी कि ना तो उसकी उम्र बदली थी, ना हालात। वह बिल्कुल वैसी ही थी जैसे उस रोज थी। आलिया की चीख निकल गई। वह जमीन पर गिर पड़ी और कुछ पल बाद हिचकियों के साथ बच्ची को अपनी गोद में उठा लिया। बच्ची ने कुछ नहीं कहा। बस खाली सी आंखों से उसे देखा, जैसे जानती हो कि यह उसकी मां है और जैसे उसके दिल में कोई अनकहा राज दबा हो।
आलिया उसे घर ले आई। सास और यूसुफ सन्न रह गए। सास ने तो फौरन पीछे हटकर इस्तिगफार पढ़ना शुरू कर दिया और यूसुफ कुछ कहे बगैर कमरे का दरवाजा बंद कर लिया। मगर यह वापसी खुशी की नहीं, बल्कि फैसले की नजर थी। ऐसा फैसला जो दरिया ने आलिया की सच्ची ममता का हिसाब लेकर सुनाया था।
अब दिन और रात आलिया के लिए एक से हो गए थे। वह दरिया से लौटी बच्ची को सीने से लगाए जीती रही। लेकिन दिल में एक ना मिटने वाला खौफ पल रहा था। वह बच्ची ना बड़ी हुई, ना बोली, ना आम बच्चों की तरह हिली-डुली। उसकी आंखें ऐसी थीं जैसे रूह नहीं, सिर्फ एक साया बाकी हो। आलिया ने उसका नाम फरज़ाना रखा ताकि कम से कम उसका एक रिश्ता दुनिया से जुड़ा रहे।
यूसुफ अब भी उसे बेटी मानने से इंकार करता था। वह अक्सर कहता, “यह बच्ची जिंदा नहीं। यह कोई साया है। होश में आओ, वरना सब कुछ तबाह हो जाएगा।” मगर आलिया खामोश रहती। उसके अंदर सिर्फ एक जुमला गूंजता रहता। “मैंने इसे मारा था और यह लौट आई है। अब मुझे पनाह देनी होगी, वरना सब कुछ छीन जाएगा।”
लेकिन जिंदगी कहां ठहरती है? अब गांव की औरतें सवाल करने लगीं। आलिया की बेटी ना स्कूल जाती है, ना गली में दिखती है, ना हंसती है, ना रोती है। एक दिन गांव की एक बूढ़ी औरत, जो ख्वाबों की ताबीर जानती थी, आलिया के पास आई और धीरे से कान में फुसफुसाई, “बेटी, दरिया से जो लिया है, वह सिर्फ तेरा नहीं। दरिया हिसाब जरूर लेता है। देर से ले, पर लेता जरूर है।”
उसी रात आलिया ने एक ख्वाब देखा। वही दरिया, वही चांदनी रात और पानी की तह से एक आवाज आती है, “अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ। अगर औलाद चाहती हो, तो फिर आना। मगर इस बार शर्तों के साथ।” सुबह होते ही आलिया कांपते हाथों और धड़कते दिल के साथ दोबारा दरिया किनारे जा पहुंची। अचानक दरिया की सतह फटी और एक जलपरी नमूदार हुई।
जलपरी का चेहरा इंसानी था, लेकिन आंखों में अजब जलाल था। बाल लंबे और काले, और आवाज में ऐसा जादू कि आलिया की सांसें थम गईं। जलपरी बोली, “तेरी बेटी मर चुकी है, मगर उसका खून मेरे पास है। अगर तू दोबारा मां बनना चाहती है, तो यह खून पी ले। मगर सुन, तुझे जुड़वा बच्चे होंगे। उनमें से एक आम नहीं होगा। वह अजीब होगा, शायद डरावना। उससे कभी नफरत मत करना। ना तू, ना तेरा शौहर। यह राज कभी किसी से ना कहना, वरना अंजाम बेहद सख्त होगा।”
आलिया ने बगैर कुछ सोचे सब मंजूर कर लिया। जलपरी ने एक कटोरे में लाल रंग का भाप उड़ता खून थमाया। आलिया ने आंखें बंद कीं, बिस्मिल्लाह पढ़ा और एक ही सांस में सब पी गई। उसके हलक में जैसे आग लग गई। वह जमीन पर गिर पड़ी। जब होश आया, जलपरी गायब थी और दरिया फिर से खामोश हो गया।
कुछ दिनों बाद आलिया को पता चला कि वह उम्मीद से है। यह सुनकर यूसुफ के चेहरे पर सालों बाद रोशनी लौटी। सास ने चढ़ावे चढ़ाए, गांव में मिठाइयां बंटी और हर जुबान पर यही था, “अल्लाह ने आखिरकार आलिया पर रहमत कर दी।” मगर कोई शर्तों को नहीं जानता था।
नौ महीने बाद आलिया के यहां जुड़वा बच्चों की पैदाइश हुई। एक खूबसूरत सा लड़का सलमान, मां की आंखों का तारा, और दूसरी एक अजीब-ओ-गरीब लड़की, जिसका चेहरा डरावनी नक्श-ओ-निगार से भरा था। आंखें भीतर को धंसी हुई, बदन पर अजीब धब्बे और हाथों की उंगलियां असामान्य तौर पर लंबी थीं। उसका नाम रखा गया शायस्ता, लेकिन गांव की जबानों पर वह बला की बच्ची बन गई।
यूसुफ ने बेटी को देखकर मुंह फेर लिया। सास ने उसे शैतानी निशानी कहकर कई बार अजान पढ़ी। मगर आलिया ने उसे सीने से लगाया और दिल ही दिल में दरिया से कहा, “इस बार मैं वादा नहीं तोड़ूंगी। चाहे दुनिया जो भी कहे।” सलमान की पैदाइश ने घर में जैसे बाहर लौटा दी थी। यूसुफ ने पहली बार खुद जाकर अजान दी।
सास ने कुर्बानी दी और गांव भर में जश्न हुआ। हर जुबान पर यही था, “अल्लाह ने आखिरकार आलिया की झोली भर दी।” मगर शायस्ता का जिक्र कोई नहीं करता था। कुछ चुप रहते, कुछ हंसते, कुछ नजरें चुरा लेते। शायस्ता, जो ना रोती, ना हंसती, बस छत को घूरती रहती। डॉक्टर कुछ नहीं बोले, सिर्फ नजरें झुका लीं।
सास ने फिर कहा, “यह किसी पुराने गुनाह की सजा है। यह बच्ची मनहूस है।” यूसुफ ने सलमान को सीने से लगाया और शायस्ता से नजरें चुरा लीं। उसके लिए अब भी सिर्फ सलमान उसका बेटा था और वही उसके खानदान का वारिस। लेकिन आलिया चुप रही। सिर्फ एक वादे पर जिंदा थी जो उसने दरिया से किया था।
शायस्ता दिन-ब-दिन अजीब होती जा रही थी। उसने कभी अपने कदमों पर खड़े होकर चलना नहीं सीखा। वह रेंगती थी, जैसे कोई छोटा जंगली जानवर, अक्सर कमरे के एक कोने में बैठकर दीवार को घूरती रहती या फर्श को अपने नाखूनों से कुरेदती। उस तक पहुंचती ही नहीं थी। मगर जब आलिया उसे गोद में लेती, तो वह कुछ पल के लिए एकदम साकेत हो जाती।
आलिया ने उसे एक मां की तरह अपनाया। उसे साफ करती, कपड़े बदलती, खाना खिलाती, सुलाती और हर रोज दिल ही दिल में कहती, “मेरी जान, तू जैसी भी है, तू अल्लाह की अमानत है।” लेकिन यूसुफ की नफरत हर दिन तेज होती जा रही थी। जब वह शायस्ता को गंदगी करते या फर्नीचर पर चढ़ते देखता, तो गुस्से में पागल हो जाता।
उसके लबों पर सिर्फ एक ताना होता, “मैं ऐसी बेटी का क्या करूं जो ना इंसान लगती है, ना जानवर।” यूसुफ सिर्फ सलमान को साथ ले जाता। बाजार, मस्जिद, यहां तक कि खेतों तक। शायस्ता को हमेशा घर में कैद रखा जाता। सलमान भी धीरे-धीरे बहन से अजनबी होता गया।
फिर एक दिन ऐसा वाकया हुआ जिसने सब कुछ बदल दिया। आलिया किसी रिश्तेदार की तमारदारी के लिए दूसरे गांव गई थी। सलमान स्कूल में था और शायस्ता घर में अकेली। यूसुफ ने दोपहर को जमीन के कुछ कीमती कागजात निकालने के लिए दराज खोली और उसके होश उड़ गए। सारे कागज चबाए जा चुके थे। वसीयत, नोट्स, जमीन के दस्तावेज, सब गीले, फटे हुए और अब पहचान के काबिल नहीं।
उसने घर के कोने में बैठी शायस्ता को देखा, जो वही कागज का गुड़ा अपने मुंह में दबाए चबा रही थी। उसके होठों से लाल लिसलिसा सा बह रहा था। शायद स्याही या कोई और रंग। यूसुफ एक लम्हे में पागल हो गया। अब बहुत हो गया। आज हद पार हो गई। उसने बेल्ट निकाली और शायस्ता की तरफ झपटा।
वह ना चीखी, ना भागी। बस आंखें बंद कर वहीं बैठी रही, जैसे सब जानती हो, जैसे उसका वक्त आ गया हो। यूसुफ ने उसे पीटा। बेरहम दरो-दीवार खामोश गवाह बने रहे और शायस्ता का नाजुक जिस्म सुर्ख होता गया। जब आलिया घर लौटी और अपनी बेटी को लहूलुहान हालत में देखा, तो जैसे उसकी रूह निकल गई।
उसके लबों पर सिर्फ एक जुमला था, “हमने वादा तोड़ दिया है। हमने दरिया से किया गया अहेद तोड़ दिया है।” शायस्ता का जिस्म खून से लथपथ था और उसकी आंखें आधी खुली थीं, जैसे अंदर से टूट चुकी हों। आलिया ने उसे सीने से लगाया और चीख मार दी। “या अल्लाह, मैंने तो अपना वादा निभाया था। कभी नफरत नहीं की। मगर मेरे शौहर ने…”
यूसुफ जो अब भी गुस्से से कांप रहा था, एक लफ्ज भी नहीं बोला। उसकी निगाहें शायस्ता के जख्मों पर नहीं बल्कि उस कमरे की तबाही पर थीं, जहां उसकी कीमती फाइलें बिखरी पड़ी थीं। “तुम्हें होश नहीं है?” आलिया चीखी। “यह कोई आम बच्ची नहीं। यह वही है जो दरिया से लौटी थी। वो दरिया जिससे हमने वादा किया था कि कभी इस पर हाथ नहीं उठाएंगे। तुमने वह वादा तोड़ दिया, यूसुफ। तुमने हमें तबाह कर दिया है।”
यूसुफ ने ठहाका लगाते हुए कहा, “अगर वह वाकई दरिया की थी, तो जाके वही संभाले उसे।” यह जुमला जैसे कयामत का दरवाजा खोल गया। उसी रात जैसे वक्त ने करवट बदल ली। घर में एक अजीब सी खामोशी छा गई। आलिया ने शायस्ता को अपने पहलू में लिटाया, जख्मों पर मरहम लगाया और सारी रात उसके सिर पर हाथ फेरती रही।
उसकी जुबान पर बस एक दुआ थी, “या अल्लाह, अगर मुझसे गलती हुई है तो मुझे सजा दे। मेरी बेटी को नहीं। वो तो बस मुझ पर लौट आई थी।” सुबह जब धूप की पहली किरण कमरे में दाखिल हुई, शायस्ता गाड़ाब थी। ना दरवाजा खुला था, ना कोई खिड़की, ना कोई चोर, ना कोई सुराग। बस खाली बिस्तर और कमरे में फैली हल्की सी सीलन की खुशबू जैसे कहीं पानी मौजूद हो।
आलिया ने पूरा घर छान मारा, लेकिन बेटी का कोई निशान नहीं मिला। वह नंगे पांव, बिखरे बालों और हाफती सांसों के साथ दरिया की ओर दौड़ी। दरिया के किनारे पहुंचकर वह जमीन पर बैठ गई, हाथ फैलाए और चीख-चीख कर पुकारने लगी, “ए दरिया, मैं जानती हूं तू सुन रहा है! मेरी बेटी कहां है? तूने उसे वापस ले लिया है ना? अगर हमने वादा तोड़ा है, तो सजा मुझे दे। मेरी बेटी को कुछ ना हो।”
उसी वक्त दरिया की सतह पर हलचल हुई। पानी धीरे-धीरे पीछे सरकने लगा और फिर दरमियान में एक साया उभरा। वही जलपरी, जो बरसों पहले आलिया के ख्वाब में आई थी। लेकिन इस बार उसका चेहरा और भी खौफनाक था। आंखें सुर्ख और माथे पर जैसे शोले उठते हों।
“मैंने तुझे खबरदार किया था, आलिया,” जलपरी की आवाज गूंजी, जो कानों ही नहीं, रूह को भी चीर रही थी। “तूने वादा किया था कि कभी बच्ची को तकलीफ नहीं देगी। मगर तेरे शौहर ने उस पर हाथ उठाया। अब फैसला तेरी बेटी का है। मैं कुछ नहीं कर सकती।”
“फैसला कैसा?” आलिया बिलखती रही। “या तो वह तुझे माफ कर देगी या खुद इंसाफ करेगी।” उसी लम्हे पीछे से एक जोरदार चीख आई—यूसुफ की। आलिया फौरन पलटी और उसके साथ गांव के कुछ लोग भी भागते हुए पीछे आ गए। यूसुफ दरवाजे के सामने बेहोश पड़ा था। उसकी गर्दन पर सांप के दांतों के गहरे निशान थे। आंखें खुली की खुली रह गई थीं और सांसें थम चुकी थीं।
लोगों ने शोर मचाया, “सांप! सांप ने काट लिया!” लेकिन घर के अंदर कोई सांप नहीं मिला। सिर्फ एक गीली सी लकीर, जो जमीन से शुरू होकर छत की तरफ जाती थी, जैसे पानी से बना कोई वजूद वहां से गुजरा हो। आलिया सलमान को गोद में लेकर दरिया की तरफ भागी। उसे लग रहा था कि अब वक्त उससे भी बदला लेने आया है।
दरिया किनारे पहुंचकर उसने फिर जलपरी को पुकारा, “अगर सजा बाकी है, तो मुझे दो। मेरे बेटे को छोड़ दो। मैं वादा करती हूं, अब कभी शिकवा नहीं करूंगी। बस शायस्ता को माफ कर दो।” जलपरी ने खामोशी से उसे देखा। फिर कहा, “फैसला हो चुका है। अब सिर्फ अंजाम बाकी है।”
यूसुफ की मौत के बाद गांव पर एक अजीब सी खामोशी छा गई। वह किसान, जो हर रोज खेतों में नजर आता था, अब जमीन के नीचे दफन था। लोगों ने रस्मी ताजियत की, लेकिन हर दिल में एक ही सवाल था। क्या वाकई सांप ने काटा था या कुछ और था?
आलिया, जो शौहर की मौत के बाद अंदर से बिल्कुल खाली हो चुकी थी, अब एक नई आजमाइश का सामना कर रही थी। सलमान के लिए वह सब कुछ बन चुकी थी—मां, बाप, साया। लेकिन अंदर ही अंदर उसका दिल अब भी शायस्ता के लिए तड़पता था। हर दिन, हर रात दरिया का वह मंजर उसकी आंखों के सामने घूमता रहता।
शायस्ता के जाने के बाद घर की दीवारों में अजीब सी नमी, फर्श पर गीली लकीरें और कभी-कभी दीवारों पर उभरते नक्श नजर आते। सलमान पूछता, “अम्मी, यह फर्श पर पानी क्यों होता है? दरवाजे के पास मिट्टी कैसे आ जाती है?” आलिया चुप रहती। बस उसके सिर पर हाथ फेरकर उसे सुला देती।
लेकिन हकीकत यह थी कि वह खुद भी डर में जी रही थी। उसे एहसास हो चुका था कि शायस्ता कहीं गई नहीं है। वह यहीं है, आसपास, खामोश और देख रही है। गांव की औरतों ने अब आना-जाना कम कर दिया था। कुछ कानों में कहतीं, “आलिया के घर में साया है।” सास तो पहले ही मर चुकी थी। अब आलिया बिल्कुल तन्हा थी। सिर्फ सलमान उसका सहारा था, जो अब भी कुछ समझने लायक नहीं था।
फिर एक दिन, आलिया रसोई में कुछ पका रही थी। सलमान दौड़ता हुआ अंदर आया। “अम्मी, दरवाजे के बाहर कोई बैठा है। उसके बाल बहुत लंबे हैं और वह मुझे देखकर मुस्कुरा रही है।” आलिया का रंग उड़ गया। वह तुरंत बाहर भागी, लेकिन दरवाजे पर कोई नहीं था। सिर्फ गीली मिट्टी में दो छोटे कदमों के निशान थे, जो दरवाजे से कमरे की दीवार तक जाते थे और फिर गायब हो जाते थे।
उस रात आलिया ने पहली बार दरिया किनारे बैठकर दुआ नहीं मांगी। बस रोती रही। उसने आसमान की तरफ देखा और कहा, “ए रब, अगर तू सुन रहा है तो रहम कर। मेरी बेटी को सुकून दे। मेरी रूह को करार दे। हम सब गुनहगार हैं, मगर तू माफ करने वाला है।”
अगली सुबह सलमान ने कहा, “रात को खिड़की खुली थी और किसी ने मेरे सिर पर हाथ रखा था। वह हाथ ठंडा था, मुलायम था, मगर अजीब सा था। मैं डरा नहीं, मगर नींद नहीं आई।” उस दिन आलिया ने एक फैसला लिया। वह हर कमरे में सूरह यासीन की तिलावत करेगी।
उसने कुरान खोला। आंखों से आंसू बह रहे थे। जबान पर आयातें थीं। मगर जैसे ही वह शायस्ता के पुराने कमरे में दाखिल हुई, उसका दिल जैसे धड़कना भूल गया। दीवार पर उंगली से लिखा हुआ था, “मां, क्या मैं अब भी तेरी हूं?” आलिया जमीन पर गिर पड़ी। कुरान उसके हाथ से छूट गया।
उसने अपनी पेशानी जमीन पर रख दी और बिलक-बिलक कर रोने लगी। अब उसे यकीन हो चुका था कि शायस्ता ना सिर्फ जिंदा है, बल्कि सवाल कर रही है। इंसाफ मांग रही है और सब देख रही है। अब हर रात आलिया और सलमान जल्दी सो जाते। दरवाजे बंद करके, खिड़कियां जकड़ कर कुरान पढ़कर, मगर अजीब ख्वाब अब भी उनका पीछा नहीं छोड़ते।
ख्वाबों में जलपरी वापस आती। शायस्ता चुपचाप खड़ी रहती और दरिया का पानी धीरे-धीरे खून में बदलता जाता। अब आलिया जान चुकी थी कि यूसुफ की मौत सिर्फ आगाज थी, अंजाम नहीं। दरिया अब भी देख रहा है और फैसला अभी पूरा नहीं हुआ है। अब घर की खामोशी सुकून नहीं, एक खौफ बन चुकी थी।
गहरी बोझिल और सांस रोक देने वाली हर रात, जैसे कोई अदृश्य वजन घर पर उतरता। दीवार सिसकते और वक्त जैसे थम जाता। आलिया रोज-बरोज कमजोर होती जा रही थी। उसकी आंखों के नीचे काले गहरे घेरे थे, जैसे नींद उससे रूठ चुकी हो। वह अब सलमान को सीने से लगाकर सोती थी, जैसे डर हो कि कहीं उसे भी ना छीन लिया जाए।
लेकिन असली खौफ वह था जो उसके कमरे की दीवारों में बस चुका था—शायस्ता की खामोश मौजूदगी। एक रात, जब आसमान पर बादल गरज रहे थे और हवाएं दरवाजों को झिंझोड़ रही थीं, सलमान ने नींद में बड़बड़ाना शुरू किया। “अम्मी, वो आई है। वो कहती है, ‘मैं तेरा नहीं, मैं उसका हूं।’”
आलिया ने घबराकर उसे झिंझोड़ा। “कौन आई है? क्या कहा उसने?” सलमान ने अंधेरे में कांपती आवाज में कहा, “वह कहती है, ‘तूने उसे छोड़ दिया। अब मेरी बारी है।’” आलिया का दिल कांप उठा।
उसने फौरन वजू किया और पूरी रात कुरान पढ़ती रही। लेकिन सुबह जब उठी, दीवार पर फिर वही उंगली से लिखा था, “मां, क्या तू अब भी मुझे चाहती है या सिर्फ उसे, जो तेरी गोद में सो रहा है?” अब आलिया समझ चुकी थी कि वक्त करीब है। कुछ बड़ा होने वाला है।
कुछ दिन बाद, जब वह बाजार गई, तो सलमान घर पर अकेला रह गया। पहले भी ऐसा कई बार हो चुका था, लेकिन उस दिन कुछ अलग हुआ। आलिया अभी आधे रास्ते में ही थी, जब गांव की एक छोटी बच्ची दौड़ती हुई मिली। “खाला, खाला, आपके घर से अजीब आवाजें आ रही हैं।” आलिया के कदम लड़खड़ा गए। उसने दुपट्टा संभाला और दीवानी सी दौड़ पड़ी अपने घर की तरफ।
दरवाजे पर पहुंची तो अंदर से चीखों की गूंज आ रही थी। सलमान की आवाज थी, लेकिन उसमें डर नहीं था, बल्कि गुस्सा, हैरानी और कुछ ना समझ पाने का अजीब सा जज्बा था। जब आलिया ने दरवाजा खोला, उसने जो मंजर देखा, उसके नीचे से जमीन खिसक गई। सलमान कमरे के बीचों-बीच बैठा था।
उसके चेहरे पर आंसू भी थे और एक अजीब सी हंसी भी, जैसे पागलपन और मासूमियत साथ-साथ हों। उसके सामने खिड़की के पास एक साया खड़ा था। धुंधला, मगर इंसानी शक्ल का। लंबी उंगलियां, भीगे बाल, झुकी हुई गर्दन, जैसे किसी को घूर रहा हो। आलिया ने चीखते हुए सलमान को खींचा। दरवाजा बंद किया और जोर से कलमा पढ़ने लगी।
“कौन है तू? क्या चाहती है?” आलिया दीवार की तरफ चीखी। फिर अचानक दीवार पर नमी उभरने लगी और उसमें एक जुमला खुद ब खुद लिखा गया। “बस एक सवाल का जवाब दे दे। मां, मैं कौन हूं?” आलिया के हाथ से कुरान गिर गया। उसका जिस्म जैसे बेजान हो गया। कांपती आवाज में उसने कहा, “तू मेरी बेटी है, मेरी शायस्ता। मैंने तुझे अपनाया था, गोद में पाला था, मगर शायद वादा निभाने में कमी रह गई।”
फिर साया गायब हो गया। सलमान बेहोश हो गया और कमरे की रोशनी खुद-ब-खुद धीमी होती चली गई। उस रात के बाद, आलिया ने हर दिन दरिया किनारे बिताना शुरू कर दिया। वह हर रोज जाकर सिर्फ एक ही जुमला दोहराती, “मैं तैयार हूं। जो फैसला दरिया का है, कहूूल है। बस मेरे बेटे को बचा लेना।”
मगर अब दरिया खामोश नहीं था। उसकी लहरों में अजीब सा शोर था, जैसे कोई मां की फरियाद सुनने आया हो। या फैसला सुनाने। सलमान के कमरे में साए का वह मंजर और दीवार पर लिखे अल्फाज ने आलिया को हिलाकर रख दिया था। अब हर रात, जैसे वक्त की रफ्तार धीमी पड़ गई थी।
हर सांस में दरिया की गवाही शामिल थी। अब आलिया को यकीन हो चुका था। शायस्ता अब सिर्फ याद नहीं, बल्कि जिंदा, होशमंद और ताकतवर वजूद बन चुकी है। एक ऐसी दुनिया से, जहां इंसाफ वक्त से नहीं, वादे से तय होता है। आलिया ने घर के हर कोने में कुरान लटका दिए। हर दरवाजे पर सूरह इख्लास की तहरीर चिपकाई।
खिड़कियों के पास नमक के छोटे-छोटे ढेर रख दिए। अब वह हर वक्त वजू में रहती। हर नमाज के बाद देर तक सजदे में गिर जाती और एक ही दुआ दोहराती, “ए मेरे रब, मेरे बेटे को बचा ले। अगर मैं गुनाहगार हूं, तो सजा मुझे दे। अगर शायस्ता नाराज है, तो मुझसे बदला ले। मगर सलमान को ना छूना।”
लेकिन अंदर ही अंदर वह जानती थी। अब फैसला उसके हाथ में नहीं था। पांच दिन बीत चुके थे। सलमान अब बिल्कुल चुप था। ना बाहर जाता, ना मां से बात करता। अक्सर दीवार को घूरता या खिड़की से बाहर देखता, जैसे किसी का इंतजार कर रहा हो।
एक रात, आलिया ने उसके कमरे के दरवाजे के पीछे खड़े होकर सुना, “मैं तुम्हें जानता हूं, तुम शायस्ता हो ना?” “हां, मैं मां को नहीं बताऊंगा, वादा करता हूं।” आलिया के पांव तले जमीन खिसक गई। उसने दरवाजा खोला। सलमान चौंक गया। उसने नजरें चुरा लीं और चादर में मुंह छिपा लिया।
“सलमान, तुम किससे बात कर रहे थे?” “किसी से नहीं, अम्मी, बस ख्वाब था।” आलिया जान चुकी थी। यह कोई ख्वाब नहीं था। यह शायस्ता का नया रास्ता है। अब वह भाई के जरिए मां से बात कर रही है।
अगली सुबह, आलिया दरिया किनारे गई। मगर इस बार गवाह बनकर नहीं, गुनहगार बनकर। हाथ जोड़कर बोली, “ए दरिया, तूने मुझे मौका दिया था। मैंने वादा किया था, मगर मेरा शौहर कमजोर निकला और मैं खामोश रही। अब मैं सब कुछ कुर्बान करने को तैयार हूं, बस मेरा बेटा बच जाए।”
पानी की सतह शांत थी, लेकिन उसके नीचे जैसे कुछ हलचल हो रही थी। आसमान पर बादल गिरने लगे, हवा में नमी फैलने लगी। आलिया झुककर पानी को छूने ही वाली थी। एक लहर उठी और उसके हाथ पर ठंडा स्पर्श छोड़ गई। उसी लम्हे उसके दिल में एक आवाज आई, “फैसला हो चुका है, आलिया। अब सवाल यह नहीं कि क्या होगा। सवाल यह है कि तू देखने की हिम्मत रखती है या नहीं।”
वह पीछे हटी, कांपती हुई और वहीं दरिया किनारे बैठ गई। फिर अचानक गांव की तरफ से एक आवाज चीखपकार लोगों की दौड़ती हुई कदमों की धड़कनें। आलिया ने तुरंत दुपट्टा ठीक किया और भागती हुई घर लौटी। दरवाजे पर भीड़ थी। गांव की औरतें रो रही थीं। मर्द हैरानी में खड़े थे और बीच में सलमान बेहोश पड़ा था।
उसकी कलाई पर नीले गहरे निशान थे, जैसे किसी ने उसे जोर से पकड़ा हो। उसके मुंह से झाग निकल रहा था। “क्या हुआ मेरे बच्चे को?” आलिया चीख पड़ी और सलमान को गोद में उठाया। उसकी सांसे बेतरतीब थीं। वह आंखें खोलता और बंद करता, जैसे कुछ कहना चाहता हो, मगर आवाज ना निकले।
फिर बहुत मुश्किल से उसने फुसफुसाकर कहा, “अम्मी, वो कहती है मुझे वापस लाना है। वो तन्हा है।” यह सुनकर आलिया की चीख निकल गई। अब वह जान चुकी थी। शायस्ता अब सिर्फ इंसाफ नहीं मांग रही, बल्कि अपनी तन्हाई का बदला भी मांग रही है।
वह चाहती है कि कोई उसके साथ हो, उसकी दुनिया में, उसकी खामोशी में, और उससे बेहतर कौन हो सकता था? उसका अपना भाई सलमान। अब आलिया के पास वक्त बहुत कम था। शाम ढल चुकी थी। गांव में अजान की आवाज गूंज रही थी, लेकिन आलिया का दिल बेचैन था। जैसे कोई आखिरी लम्हा बहुत करीब आ चुका हो।
सलमान बेहोश था। गांव के हकीम ने नब्ज़ देखी और सिर्फ सर झुका कर बोला, “बीबी, यह रूहानी मसला लगता है। दवा से ज्यादा अब दुआ की जरूरत है।” आलिया ने सलमान के चेहरे को देखा। अब भी बेहोश था, मगर चेहरे पर एक अजीब सी राहत थी, जैसे वह किसी ख्वाब में हो या शायद किसी और दुनिया में।
आलिया जान चुकी थी। अब फैसला सिर्फ दरिया से होगा और वक्त बहुत कम है। उसने कपड़े बदले, कुरान साथ लिया और धीरे-धीरे दरिया की तरफ रवाना हो गई। रास्ते में गांव वाले हैरत से देख रहे थे। कुछ ने टोका भी, “आलिया बहन, रात हो रही है। दरिया की तरफ मत जाओ।” लेकिन आलिया खामोश थी, जैसे किसी और ही आवाज के पीछे चल रही हो।
दरिया किनारे पहुंचकर उसने वही पत्थर चुना, जहां वह पहले शायस्ता के लिए दुआ मांगती थी। मगर आज उसके लबों पर दुआ नहीं थी। सवाल था, “क्या एक मां दो बच्चों में से किसी एक को चुन सकती है? क्या कोई मां इंसाफ से ज्यादा मोहब्बत मांग सकती है?” पानी की सतह खामोश थी। आसमान पर बादल मंडरा रहे थे।
तभी पानी में हलचल हुई। एक लहर उठी और गहराई से वही जलपरी नमूदार हुई। आज भी उसके चेहरे पर वही जलाल था, लेकिन आंखों में हैरानी थी, जैसे वह खुद भी जानना चाहती हो कि आलिया अब क्या कहेगी। जलपरी ने सर्द लहजे में पूछा, “क्या तू अपनी दूसरी औलाद को भी गवाना चाहती है?”
आलिया ने आंखें बंद कीं और रोते हुए कहा, “नहीं, मैं अपनी औलाद को खोना नहीं चाहती। लेकिन मैं अपनी बेटी से नजर नहीं चुरा सकती। उससे जो सात साल दरिया में रही, जो वापस आई और फिर हमसे जुदा हो गई।”
“वह जुदा नहीं हुई, आलिया। उसे जुदा किया गया। उस पर हाथ उठाया गया। वादे तोड़े गए। और जब उसने सवाल किया, तू खामोश रही। अब वह खुद इंसाफ चाहती है।” आलिया ने आसमान की तरफ देखा और कांपती आवाज में कहा, “मैं उससे मिलना चाहती हूं। आखिरी बार मां के तौर पर, गुनहगार के तौर पर, मजरिम के तौर पर, जो भी तू कहे, मैं तैयार हूं।”
उस लम्हे दरिया की सतह से एक धुंध सी उठी और एक साया जाहिर हुआ। शायस्ता, वही बिखरे बाल, खाली आंखें, लंबे हाथ, कदम पानी से जुड़े हुए। लेकिन आज उसकी आंखें खाली नहीं थीं। उनमें आग थी, सवाल था, और एक ऐसी चुप्पी जो दिल को चीर देती है।
आलिया रोते हुए आगे बढ़ी। “बेटी, मैंने तुझे जन्म दिया था। लेकिन शायद मां बनने का हक मैं अदा ना कर सकी। तू चाहे तो मुझे ले जा, मगर सलमान को माफ कर दे।” शायस्ता खामोश रही। आलिया ने अपने हाथ फैला दिए। “ले जा मुझे, ले जा ताकि तू तन्हा ना रहे। मैं तेरी हूं, सिर्फ तेरी।”
तभी एक जोरदार गरज गूंजी। पानी की एक दीवार उठी। शायस्ता आगे बढ़ी। उसने अपनी मां की तरफ हाथ बढ़ाया। एक लंबा ठंडा हाथ, जो ना जमीन का था, ना आसमान का। आलिया ने बगैर झिझके वो हाथ थाम लिया। पानी की दीवार उन दोनों को निगल गई। दरिया फिर खामोश हो गया।
उसी रात सलमान की आंख खुली। वह सीधा उठ बैठा। चेहरे पर हैरानी थी, मगर सुकून भी। उसने आसमान की तरफ देखा और बस एक जुमला कहा, “अम्मी, शायस्ता चली गई।”
सुबह जब गांव वाले दरिया पहुंचे, वहां सिर्फ एक चीज थी—आलिया की चादर। वही चादर, जिसे ओढ़े बगैर वह कभी घर से बाहर नहीं निकलती थी। और रेत पर बस एक जुमला लिखा था, “मां, कभी किसी औलाद को तन्हा नहीं छोड़ती। चाहे वह जमीन पर हो या दरिया की गहराइयों में।”
अगली सुबह जब सूरज निकला, गांव पर एक अजीब सन्नाटा छाया हुआ था। दरिया के किनारे, जहां जिंदगी की हलचलें होती थीं—पानी भरती औरतें, मछली पकड़ते बच्चे, शरारतें, हंसी—वहां अब सिर्फ खामोशी का राज था।
एक बुजुर्ग गांव वाला, जो हर सुबह दरिया से पानी भरता था, वही सबसे पहले उस मंजर को देखकर कांप गया। गीली रेत पर एक च
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उस दिन के बाद ऑफिस का पूरा माहौल बदल गया। अब कोई भी किसी की औकात या कपड़ों से तुलना नहीं करता था। सब एक-दूसरे की मदद करने लगे। अर्जुन सबसे प्रेरणा देने वाला इंसान बन गया। रिया भी अब पूरी तरह बदल चुकी थी। वह विनम्रता से छोटे काम करने लगी और धीरे-धीरे सबका विश्वास जीतने की कोशिश करने लगी।
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