एयरपोर्ट का पूरा सिस्टम ठप हो गया.. कूड़ा बिनने वाले बच्चे ने जो किया उसे देख इंजीनियर्स दंग रह गए

दिल्ली की सर्द धुंध में इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा रोज की तरह रफ्तार से भाग रहा था। रनवे पर पहिए स्पार्क छोड़ते हुए उतरते, टर्बाइनों की गरज आकाश को चीरती, एटीसी टावर की हरी-लाल रोशनियाँ ताल-लय में झिलमिलातीं। हजारों यात्री अपने-अपने किस्से लेकर—मुलाकातें, जुदाइयाँ, बिजनेस डील, सपने—हवाई अड्डे के विशाल पेट में आते-जाते। मगर दोपहर ठीक 12 बजे, उस व्यवस्था की धड़कन पर एक अदृश्य हथौड़ा पड़ा—और सब कुछ थम गया।

एयरपोर्ट के सबसे सुरक्षित सर्वर रूम की दर्जनों बड़ी स्क्रीनें एक साथ काली पड़ गईं। एटीसी हेड मिस्टर खन्ना के कान पर लगे हेडफोन में अचानक सन्नाटा भर गया। उनकी उंगलियाँ कंसोल पर दौड़ीं—“हेलो, फ्लाइट AI-402, क्या आप सुन पा रहे हैं? रिप्लाई कीजिए।” दूसरी तरफ से कोई आवाज नहीं आई—केवल खामोशी की खरोंचें। मेनफ्रेम सर्वर ने खुद को कोकून में बंद कर लिया था। आसमान में उस वक्त पचास से अधिक विमान उड़ रहे थे—रडार से गायब। पायलट अंधे। ऊँचाई-माप, हेडिंग, रनवे स्टेटस—सब अज्ञात। मिस्टर खन्ना के माथे पर पसीना मोतियों की तरह उभर आया। उन्हें पता था—बीस मिनट के भीतर सिस्टम रिस्टोर न हुआ तो हवा में लोहे के परिंदे एक-दूसरे से टकराकर आग के गोलों में बदल जाएँगे।

इमरजेंसी प्रोटोकॉल एक्टिवेट हुआ। शहर के टॉप इंजीनियर्स, देश के नामी सॉफ़्टवेयर आर्किटेक्ट्स, और विदेशों—अमेरिका, जर्मनी—से जुड़े विशेषज्ञ वीडियो कॉन्फ्रेंस पर आ गए। करोड़ों के बैकअप सिस्टम्स, सुपरकंप्यूटर ऑनलाइन। लेकिन जैसे-जैसे मिनट कटते गए, आशा सूखती गई। एक विदेशी विशेषज्ञ ने मॉनिटर पर सिर रखकर कहा—“यह आम वायरस नहीं। एक सेल्फ-रिफ्लेक्सिव लूप है—इंटरनल लॉजिक गेट्स को शटडाउन कर चुका। इसे समझने में 24 घंटे लगेंगे।” खन्ना गरजे—“हमारे पास 24 घंटे नहीं, 15 मिनट हैं। आज का सूरज हजारों लोग नहीं देख पाएँगे अगर आपने सिस्टम न उठाया।”

हवाई अड्डे की गलियों में अफरातफरी फड़फड़ाने लगी। यात्रियों की चीखें, सुरक्षा कर्मियों की दौड़, एंबुलेंस के सायरन—जैसे सब एक भयावह सिंफ़नी में जुट गए हों। वीआईपी गेट के बाहर चमचमाती गाड़ियों के आगे, कचरे के ढेर के पास, दस बरस का आर्यन अपनी फटी बोरी में खाली बोतलें भर रहा था। धूल से सना चेहरा, नंगे पैर। उसके हाथों में कांच की बोतलों के खनक में कोई संगीत था, पर आँखों में एक सूक्ष्म निडरता—जैसे कोई पुरानी स्मृति वहाँ मद्धम रोशनी में बैठी हो।

आर्यन रोज यहीं आता—एयरपोर्ट की परिधि पर फैले कूड़े में प्लास्टिक ढूँढने। दोपहर का एक बज चुका था। वह बोरी कंधे पर रखकर शहर के किनारे अपनी झुग्गी की तरफ मुड़ा—जहाँ उसकी माँ सुमित्रा उसकी प्रतीक्षा करती। सुमित्रा—जो कभी इस शहर के एक आलिशान बंगले की मालकिन थीं—आज लोगों के कपड़े धोकर गुजारा करतीं। आर्यन के पिता—अविनाश सिंह—इस विशाल एयरपोर्ट के मूल आर्किटेक्ट और मालिक। उन्हें उनके ही सगे भाई—विक्रम—ने धोखे से रास्ते से हटाया—एक “एक्सीडेंट” में ब्रेक फेल कराकर। रातों-रात सुमित्रा और नन्हा आर्यन सड़क पर फेंक दिए गए। सुमित्रा ने आर्यन को अतीत की आग से बचाने के लिए कभी नहीं बताया कि उसके पिता कौन थे। पर आर्यन के पास पिता की एक आखिरी निशानी थी—एक काली पुरानी डायरी।

हर रात लालटेन की धीमी रोशनी में, आर्यन अपनी माँ के पास बैठकर उस डायरी को पढ़ता। सुमित्रा सोचतीं—वह चित्र देख रहा है। लेकिन उस डायरी के पन्नों में अविनाश ने कोडिंग के रहस्य लिख छोड़े थे—जो किसी किताब में नहीं मिलते। एक पन्ने पर बड़े अक्षरों में लिखा—“द घोस्ट इन द मशीन”—मशीन का प्रेत। और उसके नीचे वही एरर कोड्स, वही लॉजिक डायग्राम—जो आज एयरपोर्ट की स्क्रीन पर चमक रहे थे।

खाना खाकर आर्यन फिर एयरपोर्ट लौटा। इस बार नज़ारा बदला हुआ था—हर तरफ चीख-पुकार। एंबुलेंस, पुलिस, कमांडो। उसने भीड़ के बीच रास्ता बनाया। लोग काँप रहे थे। उसे पता चला—देश का सबसे बड़ा एयरपोर्ट अंधा हो गया है। सर्वर ठप। विमानों का संपर्क टूटा। ऊपर आसमान में उड़ते हजारों लोग—मौत के मुसाफ़िर। क्योंकि बिना सर्वर, दो विमानों को टकराने से रोकना नामुमकिन।

एयरपोर्ट प्रवेश द्वार पर लगी 50 फुट की डिजिटल स्क्रीन—जो हमेशा फ्लाइट टाइम दिखाती—आज खून-सी लाल। सफेद रंग के कोड बिजली की तरह कौंध रहे थे—“CRITICAL ERROR 0x005 / LOGIC GATE SHUTDOWN.” आर्यन के कदम वहीं जम गए। उसकी हृदयगति तेज़ हुई। उसके पिता की डायरी का पन्ना नंबर 42 उसकी आँखों के सामने घूम गया। “यह खराबी नहीं—लॉजिक गेट शटडाउन है।” उसे याद आया—उस पन्ने पर एक लाल घेरा, और अविनाश का नोट—“यदि सिस्टम इस जाल में फँसे, समझना—किसी ने जड़ों पर हमला किया है।”

आर्यन को समझ आया—यह वही पल है जिसके लिए शायद उसके पिता ने उसे तैयार किया। वह एक पल भी नहीं रुका। बोरी वहीं छोड़कर झुग्गी की ओर दौड़ा। नंगे पैर तपती सड़क पर जलते—पर उसे दर्द नहीं। उसे डायरी चाहिए। उसने फर्श खोदा, बिस्तर के नीचे छिपी काली डायरी निकाली। कांपते हाथों से पन्ने पलटे। पन्ना 42—अविनाश की लिखावट—“यदि मुख्य सर्वर कभी इस लूप में फँसे, दुनिया का कोई एंटीवायरस इसे ठीक नहीं करेगा। इसे बाहर से नहीं, कर्नल रूट के भीतर घुसकर एक मैनुअल कमांड से जिंदा किया जा सकता है। रूट कमांड अंतिम रास्ता है।” नीचे दस लंबी कोड लाइनों की लड़ी। आर्यन ने उन्हें मंत्र की तरह मन में उतार लिया। डायरी को कमीज़ के भीतर छाती से चिपकाया और फिर एयरपोर्ट की ओर दौड़ा—“बाबा, मैं किसी को मरने नहीं दूँगा।”

वीआईपी एंट्रेंस पर पहुंचते ही एक भारी हाथ ने उसे पीछे धकेल दिया—“ए भिखारी, कहाँ घुस रहा है? भाग!” गार्ड ने डाँटकर धक्का दिया। आर्यन गिरा, कोहनी छिल गई। वह फिर खड़ा हुआ—“साहब, मेरी बात सुनिए। अंदर कंप्यूटर खराब नहीं—लॉक है। मुझे पता है कैसे खोलना है। अगर मैं अंदर नहीं गया, ऊपर जहाज टकरा जाएँगे। हजारों लोग मरेंगे।” गार्ड हँसा—“अब ये कूड़ा बीनने वाला बताएगा हवाई जहाज कैसे बचेंगे? भाग यहाँ से।”

आर्यन ने विनती की—“मुझे दो मिनट दे दीजिए। अगर ठीक न कर पाया—जो सज़ा देनी हो दे देना। अभी लोग मर रहे हैं।” तभी अंदर से खबर आई—“बैकअप सिस्टम फेल। केवल दस मिनट बचे।” मौत का सन्नाटा अंदर फैल रहा था। बाहर—एक बच्चा—हाथ में समाधान।

कंट्रोल रूम में मिस्टर खन्ना अपनी कुर्सी पर ढह रहे थे। स्क्रीन पर लाल टाइमर—08:00। विदेशी इंजीनियर हाथ उठा चुके थे। एयरपोर्ट के मौजूदा मालिक—विक्रम सिंह—पसीने से लथपथ फोन पर चिल्ला रहे थे। उन्हें डर इस बात का नहीं—लोग मरेंगे। डर इस बात का—एयरपोर्ट बंद हुआ तो अरबों की संपत्ति, रसूख मिट्टी में। बाहर गार्ड ने आर्यन को फिर धक्का दिया। वह दूर गिरा—पर इरादा नहीं टूटा। उसने देखा—वीआईपी गेट पर सुरक्षा इतनी कड़ी—परिंदे का पर नहीं। विशाल खिड़कियों के पार—आसमान में कुछ विमान बहुत नीचे—बिना सिग्नल उतरने की कोशिश—आत्मघाती। एयरपोर्ट के किनारे एक सर्विस डक्ट—कचरा फेंकने का मार्ग—जहाँ से सफाई कर्मी बड़े कंटेनर अंदर ले जाते। आर्यन ने डायरी कमर में कसकर बाँधी और रेंगते हुए उस अंधेरे रास्ते में घुस गया।

एटीसी हॉल में खौफ भरा सन्नाटा। मिस्टर खन्ना हेडसेट पर चिल्ला रहे—“फ्लाइट 702, ऊँचाई बढ़ाओ। हमें कुछ नहीं दिख रहा।” सर्वर रूम का पिछला छोटा दरवाज़ा खुला—और साँस खींचते, पसीने से भीगे आर्यन भीतर दाखिल। एक सॉफ्टवेयर एक्सपर्ट चिल्लाया—“सिक्योरिटी! यह लड़का यहाँ कैसे? बाहर निकालो—यह संवेदनशील इलाका है!” दो सुरक्षा कर्मी आर्यन की तरफ लपके। आर्यन बिजली की फुर्ती से मुख्य कंसोल के नीचे घुस गया—“मिस्टर खन्ना! आपकी स्क्रीन पर जो 0x045 कोड है—कोई विदेशी इंजीनियर नहीं खोल पाएगा। वह मेरे पिता—अविनाश सिंह—का ‘डेडमैन स्विच’ है। अगर आपने मुझे एक मिनट नहीं दिया, सिस्टम हमेशा के लिए लॉक हो जाएगा!”

“अविनाश सिंह?” नाम सुनते ही मिस्टर खन्ना के हाथ काँप गए। उन्होंने इशारा किया—“रुको। छोड़ो इसे।” वे आर्यन के पास आए। उसके मैले चेहरे में उन्होंने एक चमक देखी—जो वर्षों पहले एयरपोर्ट के असली मालिक की आँखों में थी। “तुम्हें कैसे पता यह सेफगार्ड है?” आर्यन ने छाती से चिपकी फटी डायरी दिखा दी—“यह मेरे पिता की डायरी है। उन्होंने लिखा था—अगर कोई गलत इंसान सिस्टम पर कब्जा करे—सर्वर खुद को ऐसे लॉक करेगा कि कोई सुपरकंप्यूटर नहीं खोल पाएगा।”

विक्रम सिंह घबरा गया। वह चिल्लाया—“सब झूठ! यह बच्चा पागल है! बाहर फेंको!” पर खन्ना ने उसकी नहीं सुनी—“बैठिए, विक्रम जी। यह बच्चा वह कर रहा है जो आपके करोड़ों के इंजीनियर नहीं कर पाए। आपने रोका तो मैं पुलिस को फोन करूँगा।”

सर्वर रूम में सन्नाटा। एक तरफ करोड़ों की मशीनें, दुनिया के टॉप इंजीनियर्स। दूसरी तरफ—कूड़ा बीनने वाला बच्चा—हाथ में फटी डायरी। आर्यन कंप्यूटर के सामने बैठा। उसकी छोटी उंगलियाँ कीबोर्ड पर। उसने आँखें बंद कीं—डायरी का हर शब्द—मंत्र। समय—4 मिनट। इंजीनियर्स हँस रहे—“यह बच्चा क्या करेगा? इसने माउस तक नहीं पकड़ा।” आर्यन ने कमांड प्रॉम्प्ट खोला—उन कोड्स को टाइप किया—जो किसी प्रोग्रामिंग बुक में नहीं। स्क्रीन की रफ्तार इतनी तेज़—लोगों को सफेद लकीरें नजर आने लगीं। विक्रम पीछे काँप रहा था—यह कोई साधारण बच्चा नहीं—उस भाई का अंश—जिसे उसने मरा समझ लिया था।

टाइमर—3:45। तनाव—गाढ़ा। आर्यन की उंगलियाँ—जादूगर। दिमाग में डर नहीं—सिर्फ डायरी के शब्दों की गूँज। अचानक पॉपअप—“ENTER MASTER KEY.” एक वरिष्ठ इंजीनियर ने सिर पीटा—“खत्म। मास्टर की केवल मूल फाउंडर के पास थी—अब नहीं है। इसे क्रैक करने में सालों लगेंगे।” आर्यन रुका नहीं। डायरी के आखिरी पन्ने पर बना धुंधला हेक्साडेसिमल कोड—माँ का जन्मदिन + पिता के पहले पेटेंट नंबर का अनोखा मेल। उसने अंतिम बटन दबाया। कमरे में ध्वनि—“ACCESS GRANTED.” विक्रम का चेहरा रंगहीन। उसकी जेब में फोन कसकर—उसका भय—सर्वर रिस्टोर का मतलब—ऑडिट लॉक भी खुलेगा—पिछले दस साल का कच्चा चिट्ठा—वह भी—जो उसने मिटाने की कोशिश की थी।

विक्रम ने आर्यन को धक्का देने की कोशिश की—“यह बच्चा सिस्टम हैक कर रहा! हमारा डेटा चुरा रहा!”—खन्ना ने उसका हाथ झटक दिया—“बैठिए।” आर्यन ने माथे का पसीना पोंछा। अंतिम कमांड—“REBOOT SYSTEM / FORCE BYPASS WIRES.” तीस सेकंड तक पूरी स्क्रीन काली। बाहर रनवे पर पायलटों ने देखा—एटीसी टावर की लाइटें बुझीं—फिर एक झटके में—पूरी स्क्रीन हरी। रेडियो की आवाज़—“ATC, this is Flight AI-402. हमें सिग्नल मिल गया। हम लैंडिंग के लिए तैयार हैं।” एक-के-बाद-एक सभी विमानों से संपर्क जुड़ने लगा। हजारों जिंदगियाँ बच चुकी थीं। इंजीनियर्स की आँखों में आँसू। वे उस दस साल के “भिखारी” बच्चे को देख रहे थे—जो अब उनके लिए फरिश्ता।

सिस्टम का अंतिम लेयर अनलॉक हुआ। स्क्रीन पर एक फोल्डर खुला—“IN CASE OF EMERGENCY / PROJECT PHOENIX.” हवा रुक गई। यह कोई साधारण फोल्डर नहीं—एक पुराना वीडियो अपने आप प्ले हुआ—एक “डेथ नोट”—जो अविनाश सिंह ने मरने से एक घंटे पहले रिकॉर्ड किया और सर्वर के सबसे सुरक्षित कोने में छिपाया था। स्क्रीन पर अविनाश का चेहरा। “यदि आज कोई यह वीडियो देख रहा है—मतलब सिस्टम लॉक हुआ था—और इसे मेरे बेटे या किसी बहुत करीबी ने खोला है। मैं यह रिकॉर्डिंग 14 मार्च को कर रहा हूँ। मुझे पता चला है—मेरे छोटे भाई विक्रम ने एयरपोर्ट के सर्वर में एक ‘स्लीपर सेल’ वायरस डाला है—जो मेरे जाने के बाद कभी भी एक्टिवेट हो सकता है। विक्रम सोचता है—मेरे बाद वह सब चला लेगा। पर उसे नहीं पता—मैंने सर्वर की चाबी अपने बेटे आर्यन के DNA और एक खास कोड में छिपाई है।”

विक्रम चिल्लाया—“डीप फेक! झूठ!” वीडियो में अविनाश ने एक फाइल खोली—“विक्रम, मुझे पता है—तुम अभी इसे झुठलाओगे। इसलिए मैंने इस फोल्डर में वह सब कॉल रिकॉर्डिंग्स और बैंक दस्तावेज़ अटैच किए हैं—जो साबित करते हैं—तुमने मेरी कार के ब्रेक फेल कराने के लिए किसे पैसे दिए।” स्क्रीन पर लिखा—“Auto-forwarding evidence to Police HQ and CBI.” सर्वर रूम के प्रिंटर से धड़ाधड़ कागज़ निकलने लगे—डिजिटल एविडेंस—जो सालों से एन्क्रिप्टेड लॉक—केवल आर्यन के मास्टर कोड से खुलने वाले। मिस्टर खन्ना ने एक कागज़ उठाया—विक्रम की निजी बातचीत का ट्रांसक्रिप्ट—जिसमें वह अविनाश को हटाने की साज़िश रच रहा था। यह सबूत झुठलाया नहीं जा सकता था।

विक्रम गेट की तरफ भागा। सुरक्षा कर्मियों ने उसे दबोच लिया। उसके चेहरे का घमंड—मलबे। उसे समझ आ गया—उसके बड़े भाई ने कब्र से बाहर आकर आज हिसाब कर लिया है। पुलिस विक्रम को घसीटते बाहर ले गई। एयरपोर्ट के कर्मचारी—जो कल तक उसके आगे झुकते—आज नफरत भरी नजरों से देख रहे थे।

मिस्टर खन्ना आर्यन के पास घुटनों के बल बैठ गए। उनकी आँखों में ग्लानि—“बेटा, हमें माफ कर दो। हम सच देख नहीं पाए। आज तुम न होते—तो तुम्हारे पिता का सपना और हजारों लोगों की जान—दोनों खत्म।” आर्यन ने फटी डायरी छाती से लगाई—उसे समझ आया—पिता ने डायरी में जो “लॉजिक, लूप, कार्ड एरर” लिखे—दरअसल वह उसे भविष्य के लिए तैयार कर रहे थे।

खबर आग की तरह फैली। चैनलों की हेडलाइन—“10 साल के कूड़ा बीनने वाले ने बचाया आकाश।” शहर का सबसे आलीशान होटल तैयार था—आर्यन के सम्मान में। पर आर्यन मिस्टर खन्ना के साथ अपनी झुग्गी पहुँचा—जहाँ सुमित्रा फटे कपड़े धो रही थीं। सुमित्रा ने देखा—उसका बेटा महंगी गाड़ी से उतरा, पीछे पुलिस और बड़े अफसर—हाथ जोड़कर। मिस्टर खन्ना ने सुमित्रा के पैर छुए—“भाभी जी, इंसाफ हो गया। भैया के हत्यारे जेल में हैं। अब से इस एयरपोर्ट और पूरे साम्राज्य के असली मालिक—आप और आर्यन।” सुमित्रा की आँखों से आँसू—सैलाब। उसने आर्यन को गले लगा लिया। आर्यन ने फुसफुसाया—“माँ, बाबा ने डायरी में लिखा था—सच्चाई कभी हारती नहीं। बस सही समय का इंतज़ार करती है।”

कुछ महीनों में काया पलट। बोर्डरूम में अब विक्रम की जगह—आर्यन और सुमित्रा। पर आर्यन ने जड़ों को नहीं भुलाया। उसने सबसे पहले उन कूड़ा बीनने वाले बच्चों के लिए—एक वर्ल्ड-क्लास स्कूल और कोडिंग सेंटर बनवाया—ठीक वहीं—जहाँ वह खुद बोतलें चुनता था। उसने एयरपोर्ट के मेन गेट पर अपने पिता की विशाल प्रतिमा लगवाई—हाथ में वही काली डायरी। प्रतिमा के नीचे अंकित—“ज्ञान सबसे बड़ी शक्ति है। सच्चाई सबसे बड़ा सुरक्षा कवच।”

आर्यन सिंह—जो कल तक सड़कों पर बोतलें चुनता था—आज देश का टेक्नोलॉजी आइकॉन। उसने साबित कर दिया—हालात आपको नीचे गिरा सकते हैं। पर अगर आपके पास शिक्षा की चाबी है—आप अपनी किस्मत का दरवाज़ा खुद खोल सकते हैं।

पर कहानी यहीं समाप्त नहीं होती—क्योंकि जीवन रेखाएँ आगे भी लिखती हैं।

• एयरपोर्ट में “एथिक्स और एम्पैथी” मॉड्यूल शामिल हुआ—हर कर्मचारी के लिए। हर शुक्रवार—“पब्लिक ग्रिवांस” डेस्क—खुला मंच।

• एटीसी सिस्टम में “फिनिक्स प्रोटोकॉल” स्थायी बना—यदि कभी लॉजिक गेट शटडाउन—तो रूट कमांड एक समर्पित टीम के अधीन—और मास्टर की—कभी किसी एक व्यक्ति की जेब में नहीं—डिस्ट्रिब्यूटेड मल्टी-फैक्टर—जिसका एक हिस्सा “सामुदायिक ट्रस्ट” में सुरक्षित।

• सुमित्रा ने अपने हाथों से “अम्मा की कैंटीन” शुरू की—एयरपोर्ट कर्मियों और यात्रियों के लिए सस्ती, पौष्टिक भोजन। आय का हिस्सा—कचरा बीनने वाले परिवारों के स्वास्थ्य बीमा में जाता।

• आर्यन ने “मशीन का प्रेत” नाम से एक ओपन-सोर्स इनिशिएटिव लॉन्च किया—क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए लूप-डिटेक्शन और एथिकल-सेफगार्ड्स—ताकि कोई विक्रम कभी किसी सिस्टम को अपनी निजी लालच से गिरफ़्त में न ले।

एक शाम, एयरपोर्ट के गार्डन में—आर्यन, सुमित्रा, मिस्टर खन्ना, एटीसी टीम, सफाईकर्मी—सब इकट्ठे। आर्यन ने डायरी का पन्ना 42 मंच पर रखा—“यह इतिहास नहीं—मार्गदर्शिका है। अगर कभी कोई सिस्टम अंधेरे में फँसे—याद रखिए—रूट कमांड बाहर नहीं—भीतर होता है। और वह कमांड केवल कोड की नहीं—चरित्र की भी होती है।”

भीड़ में धीरे-धीरे तालियाँ बहतीं। एक छोटा बच्चा—मैला मगर मुस्कुराता—आर्यन की तरफ बढ़ा—“भैया, कंप्यूटर सीखना है।” आर्यन झुक गया—“सीखेंगे। पहले यह समझो—किसी को गिराना नहीं है। गिरा हुआ उठाना है।”

दूर, कंट्रोल टावर की हरी रोशनी स्थिर थी। आकाश में उतरते विमान—अब एक सुव्यवस्थित नृत्य। और नीचे—एक फटी डायरी—अब एक संस्थान। मशीन का प्रेत, उस दिन, अपनी जगह से उठकर—एक संरक्षक देवता बन गया था।

रात में, जब सब सो गए, आर्यन ने डायरी बंद की। उसने अपनी नई नोटबुक खोली—पहला पन्ना—लिखा—

“डेडमैन स्विच कोई हथियार नहीं—एक वचन है। यह वचन कहता है—यदि इंसानियत सो जाए—तो मशीन उसे जगाएगी। और यदि मशीन से धोखा हो—तो इंसानियत उसे बचाएगी। मैं कोड लिखता हूँ—पर पहले मैं मनुष्य हूँ। बाबा, आपकी डायरी अब किताब नहीं—एक रास्ता है। मैं चल पड़ा हूँ।”

खिड़की के बाहर, रनवे की रोशनियाँ एक-एक कर बुझीं—फिर किसी अदृश्य कमांड पर—फिर से जगमगाईं। जैसे शहर की नाड़ी कह रही हो—“रिबूट कम्प्लीट।”