चल गया पता अंकिता भंडारी केस में VIP कौन, पुलिस ने किया खुलासा। Revelations in Ankita Bhandari case

उत्तराखंड की शांत वादियों में बसे यमकेश्वर के एक रिसोर्ट से शुरू हुई एक आम पहाड़ी लड़की की कहानी, आज पूरे देश के सिस्टम, राजनीति और समाज की सच्चाई को उजागर कर रही है। अंकिता भंडारी केस ने न सिर्फ उत्तराखंड बल्कि पूरे देश को झकझोर दिया है। तीन साल पहले जिस केस को लोग बंद मान चुके थे, आज वही केस फिर से सुर्खियों में है। सवाल वही हैं, जवाब अब भी अधूरे हैं। यह सिर्फ एक क्राइम स्टोरी नहीं, बल्कि सिस्टम फेलियर, सत्ता की साजिश और समाज की संवेदनहीनता की कहानी है।
अंकिता भंडारी: सपनों वाली लड़की
अंकिता भंडारी कोई बड़े शहर की लड़की नहीं थी, न ही किसी अमीर परिवार से आती थी। वह एक साधारण परिवार की बेटी थी, जिसने इंटर पास किया था और घर की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण नौकरी करने का फैसला लिया। यमकेश्वर के वंतारा रिसोर्ट में उसे रिसेप्शनिस्ट की नौकरी मिली। शुरुआत में सबकुछ ठीक लगा – माहौल, मालिक का व्यवहार, सुरक्षा। अंकिता ने अपने दोस्तों को बताया कि वह सुरक्षित महसूस करती है।
लेकिन धीरे-धीरे चीजें बदलने लगीं। रिसोर्ट के मालिक पुलकित आर्य का व्यवहार बदलने लगा। वह ज्यादा नजदीक आने की कोशिश करने लगा। एक दिन अंकिता पर दबाव बनाया गया कि रिसोर्ट में आने वाले कुछ खास मेहमानों को खुश करना उसकी जिम्मेदारी है। उसे यह भी कहा गया कि ऐसा करने पर उसे ज्यादा पैसे और फायदे मिलेंगे। लेकिन अंकिता ने साफ मना कर दिया।
वीआईपी का रहस्य
अंकिता ने अपने दोस्त से चैट में लिखा कि उससे किसी “वीआईपी” के लिए स्पेशल सर्विस मांगी जा रही है। यही वह चैट थी जिसमें पहली बार वीआईपी शब्द आया, जिसने केस को और रहस्यमय बना दिया। अंकिता ने मना कर दिया और नौकरी छोड़ने का मन बना लिया। 18 सितंबर 2022 को उसने रिसोर्ट छोड़ने का फैसला किया, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।
उसी शाम पुलकित आर्य, अंकिता का मैनेजर अंकित और एक अन्य कर्मचारी सौरभ भास्कर के साथ अंकिता को लेकर चीला नहर के पास गए। वहां बहस हुई, अंकिता ने सबकुछ उजागर करने की धमकी दी। आरोप है कि इसी दौरान अंकिता को धक्का दिया गया और वह नहर में गिर गई। कोई उसे बचाने नहीं आया और कुछ ही मिनटों में उसकी जिंदगी खत्म हो गई।
सिस्टम की चुप्पी और परिवार की जद्दोजहद
अंकिता गायब हो जाती है। उसके दोस्त फोन करते हैं, रिसोर्ट वाले कहते हैं वह सो रही है, जिम गई है या कहीं चली गई है। उसके पिता पुलिस स्टेशन जाते हैं, लेकिन सुनवाई नहीं होती क्योंकि आरोपी राजनीतिक कनेक्शन वाले थे। मामला सोशल मीडिया पर उठता है, लोग सड़कों पर उतरते हैं, तब जाकर पुलिस हरकत में आती है। छह दिन बाद अंकिता का शव चीला नहर से बरामद होता है। पोस्टमार्टम में डूबने और चोट के निशान की पुष्टि होती है।
उत्तराखंड उबल जाता है। रिसोर्ट पर बुलडोजर चलता है, तीनों आरोपी गिरफ्तार होते हैं। लेकिन सवाल वही रहता है – आखिर वह वीआईपी कौन था जिसके लिए यह सब किया गया?
तीन साल बाद फिर उठे सवाल
तीन साल बाद एक नाम, एक ऑडियो, एक दावा और एक वीडियो ने फिर से केस को आग में घी डालने का काम किया। एक महिला उर्मिला सनावर ने दावा किया कि अंकिता भंडारी केस में जिस वीआईपी का जिक्र चैट में हुआ था, वह कोई आम आदमी नहीं, बल्कि एक बड़ा सीनियर नेता है। उसने एक ऑडियो क्लिप रिलीज की, जिसमें “गट्टू” नाम सुनाई देता है। आरोप लगाया गया कि यह नाम दुष्यंत कुमार गौतम के लिए इस्तेमाल हुआ, जो राष्ट्रीय स्तर के नेता हैं।
उर्मिला का दावा था कि यह रिकॉर्डिंग उसी रात की है जब उनके और उनके पति के बीच झगड़ा हुआ था और इसी दौरान अंकिता केस का जिक्र आया। इस ऑडियो के सामने आते ही सियासत गरमा गई। विपक्ष ने आरोप लगाया कि सरकार किसी बड़े नाम को बचाने की कोशिश कर रही है। सरकार और पार्टी ने पलटवार किया, ऑडियो को फर्जी बताया, एआई जनरेटेड कहा और नेताओं की छवि खराब करने की साजिश करार दिया। पुलिस ने उर्मिला और उनके पति के खिलाफ आईटी एक्ट के तहत केस दर्ज कर दिया।
पुलिस की जांच और प्रेस कॉन्फ्रेंस
पुलिस ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर पहली बार कहा कि जिस वीआईपी का जिक्र चैट में हुआ था, उसकी पहचान हो चुकी है। पुलिस ने दावा किया कि जांच के बाद उस व्यक्ति की पहचान धर्मेंद्र कुमार उर्फ प्रधान के रूप में हुई और यही नाम एसआईटी की फाइनल रिपोर्ट में कोर्ट के सामने रखा गया। लेकिन जनता के मन में सवाल और गहरे हो गए – अगर वीआईपी धर्मेंद्र था तो तीन साल तक उसका नाम क्यों नहीं बताया गया? जांच सही थी तो सफाई देने की जरूरत क्यों पड़ी? अगर ऑडियो फर्जी था तो डर किस बात का?
राजनीति, प्रदर्शन और जनता की आवाज
विपक्ष ने पूरे मामले को बड़ा मुद्दा बना लिया। जगह-जगह प्रदर्शन, उत्तराखंड बंद, सीबीआई जांच की मांग, हर उस नाम को सामने लाने की मांग जो केस से जुड़ा रहा। सरकार की तरफ से कहा गया कि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने एसआईटी जांच को सही माना है, दोषियों को सजा मिल चुकी है। लेकिन जनता के मन में सवाल घूमते रहे – अगर सबकुछ साफ था तो एक लड़की को स्पेशल सर्विस के लिए मजबूर क्यों किया गया? अगर उसने मना किया तो उसे मरना क्यों पड़ा? अगर कोई वीआईपी शामिल नहीं था तो चैट में यह शब्द आया ही क्यों?
इंसाफ, सच्चाई और सिस्टम की कमजोरी
कोर्ट ने एसआईटी की जांच को सही माना, ट्रायल कोर्ट ने उम्रकैद की सजा दी, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने फैसले को बरकरार रखा। लेकिन जनता पूछती है – क्या सारे तथ्य सामने रखे गए? क्या वीआईपी शब्द की पूरी कहानी कभी साफ तौर पर समझाई गई या फाइलों में दबा दी गई?
पुलिस अधिकारी कहते हैं कि वीआईपी शब्द की जांच की गई थी और धर्मेंद्र उर्फ प्रधान की पहचान पहले से केस डायरी में थी। कोर्ट में बयान दर्ज है, इसी वजह से दोषियों को सजा मिली। लेकिन सवाल फिर वहीं – अगर सब पहले से साफ था तो अब मीडिया के सामने लाने की जरूरत क्यों पड़ी?
उर्मिला सनावर और सोशल मीडिया की जंग
उर्मिला सनावर के वीडियो सामने आते हैं – कभी वह कहती हैं कि जान को खतरा है, कभी कहती हैं कि उन्हें फंसाया जा रहा है, कभी कहती हैं कि सच बोलने की सजा दी जा रही है। पुलिस कहती है कि वह फरार हैं, पार्टी कहती है कि उन्होंने ब्लैकमेल किया, जनता कहती है कि सच जानने की कीमत हमेशा भारी पड़ती है।
अंकिता की आवाज और समाज की चुप्पी
इस पूरे शोरशराबे के बीच सबसे ज्यादा खामोश है अंकिता भंडारी की आवाज। एक लड़की जिसने अपनी इज्जत के लिए जान दे दी। जिसकी ख्वाहिशें, सपने और भविष्य सबकुछ एक रात में खत्म हो गया। आज उसकी कहानी राजनीति, आरोप-प्रत्यारोप और टीवी डिबेट्स में उलझ कर रह गई है। लोग लड़ रहे हैं कि वीआईपी कौन था, लेकिन शायद कोई यह नहीं पूछ रहा कि सिस्टम ने उस लड़की को अकेला क्यों छोड़ दिया।
सवाल जो अब भी जिंदा हैं
जब भी यह केस दोबारा चर्चा में आता है, लोग वही तस्वीर याद करते हैं – एक पहाड़ी लड़की, हाथ में फाइल, नौकरी की तलाश में निकली हुई, जो अपने माता-पिता के लिए सहारा बनना चाहती थी। जिसने गलत काम करने से इंकार किया और उसी इंकार की कीमत अपनी जान देकर चुकाई। यही वजह है कि यह केस सिर्फ एक क्राइम स्टोरी नहीं है, यह सिस्टम फेलियर की कहानी है।
पुलिस कहती है इंसाफ हो चुका है। सरकार कहती है राजनीति हो रही है। विपक्ष कहता है सच छुपाया जा रहा है। लेकिन जनता कहती है – जब तक हर सवाल का जवाब नहीं मिलेगा, जब तक हर कड़ी साफ नहीं होगी, तब तक मामला बंद नहीं होगा। इंसाफ सिर्फ सजा मिलने से नहीं होता, इंसाफ तब होता है जब सच बिना डर के सामने आता है।
निष्कर्ष: लड़ाई सिर्फ अंकिता के लिए नहीं
तीन साल बाद भी अंकिता भंडारी का नाम जिंदा है – सड़कों पर, सोशल मीडिया पर, लोगों के दिलों में। यह लड़ाई सिर्फ एक लड़की के लिए नहीं, हर उस बेटी के लिए है जो नौकरी करने बाहर निकलती है, जो गलत के सामने झुकने से इंकार करती है, हर उस परिवार के लिए है जो आज भी इंसाफ की आस लगाए बैठा है।
अब सवाल यह नहीं है कि वीआईपी कौन था, सवाल यह है कि क्या सिस्टम कभी इतना मजबूत बनेगा कि किसी वीआईपी की जरूरत ही न पड़े? क्या किसी बेटी को फिर अपनी इज्जत बचाने के लिए जान देनी पड़ेगी? क्या हम इस कहानी को सिर्फ एक वीडियो देखकर भूल जाएंगे या कुछ बदलने की कोशिश करेंगे?
आप क्या सोचते हैं? क्या सच पूरी तरह सामने आ चुका है या अभी भी कुछ छुपा है? अपनी राय जरूर बताइए, क्योंकि आपकी आवाज ही तय करेगी कि ऐसी कहानियां दब जाएंगी या इंसाफ तक पहुंचेंगी।
अब फैसला सिर्फ कोर्ट या सिस्टम के हाथ में नहीं है, अब फैसला हमारे हाथ में भी है। अगर आपको लगता है कि इस केस में अब भी कई सवाल अनसुलझे हैं, सच पूरी तरह सामने नहीं आया है, हर बेटी को इंसाफ मिलना चाहिए – तो अपनी राय नीचे कमेंट में जरूर लिखिए।
शायद आपकी एक आवाज किसी दबे हुए सच को बाहर ला दे।
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उस दिन के बाद ऑफिस का पूरा माहौल बदल गया। अब कोई भी किसी की औकात या कपड़ों से तुलना नहीं करता था। सब एक-दूसरे की मदद करने लगे। अर्जुन सबसे प्रेरणा देने वाला इंसान बन गया। रिया भी अब पूरी तरह बदल चुकी थी। वह विनम्रता से छोटे काम करने लगी और धीरे-धीरे सबका विश्वास जीतने की कोशिश करने लगी।
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