टूटा रिश्ता, नई उम्मीद: भोपाल फैमिली कोर्ट की कहानी
नमस्कार मेरे प्यारे दर्शकों, आज मैं आपको एक ऐसी कहानी सुनाने जा रही हूँ जो सिर्फ एक अदालत का फैसला नहीं, बल्कि एक टूटे परिवार की भावनाओं, संघर्ष और नई उम्मीदों की दास्तान है।
भोपाल के फैमिली कोर्ट में उस दोपहर कुछ अलग माहौल था। कोई बहस नहीं, कोई शोरगुल नहीं। बस सबकी निगाहें टिक गई थीं जज साहब पर, जो अपना फैसला सुनाने वाले थे। जज ने फाइल बंद की, चश्मा उतारा और गंभीर आवाज में कहा, “शेखर सिंह अब अपनी तलाकशुदा पत्नी नंदिनी को हर महीने 24,000 रुपये गुजारा भत्ता देगा और 5 वर्षीय बेटी पीहू की पढ़ाई व खर्च की जिम्मेदारी निभाएगा।”
कोर्ट में सन्नाटा छा गया। शेखर सिर झुकाए बैठा था, उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे। उसकी दुनिया जैसे उसी पल टूट गई थी। मां सरला देवी ने बेटे के सिर पर हाथ फेरा, लेकिन उनके खुद के आंसू भी रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। वह जानती थीं कि उनका बेटा सिर्फ एक केस नहीं हारा, उसने अपनी सबसे प्यारी चीज, अपनी बेटी खो दी।
कोर्ट के दूसरे कोने में खड़ी थी नंदिनी। उसके चेहरे पर संतुष्टि थी, जैसे उसने कोई लंबी लड़ाई जीत ली हो। उसने पीहू का हाथ पकड़ा और कोर्ट से बाहर जाने लगी। लेकिन तभी पीहू ने हाथ छुड़ाया और दौड़कर अपने पापा की गोद में जा बैठी। “पापा, आप क्यों रो रहे हो?” उसकी मासूम आवाज कोर्ट में गूंज गई। शेखर ने पीहू को सीने से लगा लिया, दोनों रो रहे थे। पीहू बोली, “पापा, मैं अब कभी शरारत नहीं करूंगी, बस घर चलो ना पापा।” लेकिन नंदिनी ने गुस्से में पीहू का हाथ खींचा और बाहर ले गई। पीहू की आंखों में बस एक सवाल था – “पापा, आप मेरे साथ क्यों नहीं आ रहे?”
जब कोर्ट के गलियारे से पीहू ओझल हो गई, शेखर की गोद खाली हो गई। उसकी आंखें वहीं थीं, जहाँ पीहू की आखिरी झलक थी। शेखर धीरे-धीरे उस समय में लौट गया, जब ये रिश्ता शुरू हुआ था। भोपाल के एमपी नगर इलाके में छोटा सा किराए का फ्लैट, प्राइवेट कंपनी की नौकरी और मां की दुआएं। शेखर का दिल बड़ा था, वह चाहता था कि घर में एक जीवनसाथी आए। इसी उम्मीद में नंदिनी उसके जीवन में आई।
शादी अरेंज थी, लेकिन शेखर ने दिल से निभाने की ठानी। नंदिनी सुंदर, आत्मनिर्भर और आधुनिक सोच वाली थी। शेखर को लगा, वह बहुत खुशकिस्मत है। शुरूआती दिन अच्छे थे, लेकिन फिर नंदिनी के चेहरे से मुस्कान कम होने लगी। अब वह हर बात में शेखर की सादगी पर तंज करने लगी। कभी कहती, “तुम्हें पार्टीज की समझ नहीं है,” कभी कहती, “तुम्हारे दोस्त बोरिंग हैं।” शेखर सुनता रहता, शायद शादी में एडजस्ट करना पड़ता है, यही सोचकर सब सहता रहा।
नंदिनी आजादी पसंद करती थी, इसलिए शेखर ने कभी टोकाटाकी नहीं की। लेकिन यह आजादी धीरे-धीरे दूरी में बदलने लगी। नंदिनी देर रात तक अपने कॉलेज फ्रेंड्स से बात करती, पार्टीज में जाती, कई बार सुबह लौटती। शेखर इंतजार करता, खाना गर्म करता, फिर चुपचाप सोने की कोशिश करता। वह टूट रहा था, लेकिन दिखा नहीं रहा था।
फिर एक दिन उनकी जिंदगी में पीहू आई। डॉक्टर ने बेटी होने की खबर दी, शेखर की आंखें भर आईं। उसने सोचा, अब सब बदल जाएगा। शुरूआत में नंदिनी ने पीहू को बाहों में भरकर तस्वीरें खिंचवाईं, इंस्टा स्टोरीज डालीं, लेकिन फिर सब कुछ पहले जैसा हो गया। पीहू के रोने की आवाज से उसे सिर दर्द होता, वह कहती, “मैं मां बनी हूं, आया नहीं।” जिम्मेदारी सरला देवी पर आ गई। शेखर ऑफिस और घर दोनों संभाल रहा था, लेकिन नंदिनी अब भी पार्टीज और दोस्तों में व्यस्त थी।
पीहू धीरे-धीरे मां की गोद से नहीं, दादी की कहानियों और पापा की गोद से जुड़ने लगी। शेखर उम्मीद में था – शायद वक्त के साथ सब ठीक हो जाएगा। लेकिन किसे पता था कि अब जो तूफान आने वाला है, वह उसका पूरा वजूद तोड़ देगा।
एक शाम, शेखर ऑफिस से जल्दी लौटा। हाथ में पीहू के लिए गुलाबी गुब्बारा और नंदिनी के लिए गुलाब। दरवाजा खोला तो मां मिलीं – “नंदिनी तीन दिन की ट्रिप पर गई है, अपने कॉलेज फ्रेंड्स के साथ।” यह पहली बार नहीं था, लेकिन इस बार दिल में कुछ चुभ रहा था। तीन दिन बीते, फिर चार, फिर पांच। नंदिनी ना लौटी, ना कॉल किया। फोन करने पर बस एक जवाब – “ट्रिप बढ़ गई है।”
फिर एक दिन, शेखर के सहकर्मी ने उसे इंस्टाग्राम पर एक फोटो दिखाई – लोकेशन इंदौर, नंदिनी के साथ एक लड़का रोहित। कैप्शन – “अब जाकर जिंदगी में सच में खुश रहने का एहसास हो रहा है।” शेखर की उंगलियां कांप गईं, दिल में किसी ने नश्तर चुभा दिया। उस रात शेखर छत पर बैठा रहा, आंखों में आंसू नहीं थे, बस एक सवाल था – “मैंने क्या गलत किया?”
नंदिनी लौटी, तो शेखर ने सिर्फ इतना कहा – “क्या हम पीहू के लिए फिर से कोशिश कर सकते हैं?” नंदिनी हंस दी, “जिस आदमी के साथ रहते हुए दम घुटता है, उसी के साथ दोबारा जिंदगी शुरू?” फिर एक झटका – “मैं रोहित से प्यार करती हूं, मुझे तलाक चाहिए।” शेखर की जुबान सूख गई, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। मां ने बेटे की पीठ थपथपाई, लेकिन कुछ कह नहीं सकीं।
नंदिनी ने तलाक की अर्जी डाल दी। शेखर ने कोर्ट में कोई लड़ाई नहीं की, क्योंकि वह नहीं चाहता था कि पीहू की मासूमियत इन करवाहटों में उलझ जाए। लेकिन जब फैसला आया कि पीहू की कस्टडी मां को दी जाएगी, और शेखर को महीने में एक बार मिलने की इजाजत होगी, तो उसकी दुनिया खत्म हो गई। वह घर भी नंदिनी को दे दिया, अब मां के साथ टीटी नगर के एक छोटे किराए के घर में रहने लगा, सिर्फ इस उम्मीद में कि महीने का वह एक दिन आएगा जब वह अपनी बेटी से मिल सकेगा।
तलाक के बाद नंदिनी ने नई जिंदगी शुरू कर दी। अब वह नौकरी करती थी, लेकिन जिम्मेदारी नहीं थी। पीहू उसके लिए बस एक रूटीन बन चुकी थी – सुबह जल्दी निकलती, आया के भरोसे छोड़ देती। अब नंदिनी की जिंदगी में विक्की नाम का बेरोजगार, गैर जिम्मेदार और शराबी आदमी आ गया था। विक्की अब खुलेआम उसके घर आने लगा। पीहू सब देख रही थी, लेकिन समझ नहीं पा रही थी।
आया ने कई बार देखा कि विक्की की नजरें पीहू पर कुछ ज्यादा ही ठहर जाती थीं। वह सतर्क रहने लगी। एक दिन जब नंदिनी घर पर नहीं थी, विक्की आया, आया को चाय लाने भेजा और खुद पीहू के पास जा बैठा। उसने पीहू को गोद में लिया और उसके मासूम शरीर को ऐसे छूने लगा जैसे वह कोई खिलौना हो। पीहू डर गई, विक्की ने धमकी दी – “अगर किसी को बताया तो तुझे और तेरी मम्मी को मार डालूंगा।” पीहू चुप हो गई, उसके मन में डर बैठ गया।
अब जब भी विक्की आता, पीहू सहम जाती। एक दिन उसने जलती सिगरेट से पीहू की जांघ पर दाग दिया। पीहू चीख पड़ी, आया दौड़ी आई। विक्की ने कहा – “हाथ से सिगरेट गिर गई, गलती हो गई।” लेकिन आया को यकीन हो चुका था, अब बहुत हो गया।
आया ने शेखर से सब बताया। शेखर टूट गया, लेकिन अब उसने फैसला लिया – वह चुप नहीं रहेगा। शेखर और आया ने मिलकर एक प्लान बनाया। आया ने नंदिनी से कहा कि वह सब्जी लाने जा रही है, लेकिन उसका फोन रिकॉर्डिंग ऑन था। वह दरवाजे के पीछे छुपी थी। जैसे ही विक्की ने फिर वही घटिया हरकत की, सब रिकॉर्ड हो गया। आया ने दरवाजा खोला, विक्की घबरा गया। आया ने रिकॉर्डिंग लेकर शेखर को दी।
शेखर फूट-फूट कर रो पड़ा, लेकिन आंसू पोछते ही वह पुलिस स्टेशन गया, सबूतों के साथ रिपोर्ट दर्ज करवाई। विक्की को गिरफ्तार कर लिया गया। कोर्ट में मामला गया, जज ने फैसला सुनाया – “बच्ची पीहू की कस्टडी तत्काल प्रभाव से पिता शेखर को दी जाती है। मां नंदिनी को मानसिक काउंसलिंग के बाद ही बच्ची से मिलने की सशर्त इजाजत दी जाएगी।”
शेखर ने पीहू को गोद में उठाया, उसकी आंखों के आंसू पोछे – “अब कोई तुझे डराएगा नहीं बेटा, अब तेरा पापा तेरे साथ है हमेशा।” पीहू ने पूछा – “अब मैं वहां नहीं जाऊंगी ना पापा, अब वो अंकल नहीं आएंगे ना?” शेखर ने माथा चूमा – “अब सिर्फ कहानियां आएंगी बेटा, डर नहीं।”
शेखर अब फिर से जीने लगा था, मां फिर से दादी बनने लगी थी। लेकिन मां वाला कोना अब भी उसके दिल में खाली था। नंदिनी, जो सब छोड़कर चली गई थी, अब अकेली थी। जब कोर्ट का फैसला आया, वह टूट गई। एक दिन वह शेखर के दरवाजे पर पहुंची – “मैं पीहू से मिलना चाहती हूं।” शेखर ने कहा – “तुमने अपनी बेटी का भरोसा तोड़ा है, अगर वाकई मां हो तो उसका डर पहले खत्म करो, फिर प्यार की बात करना।”
कुछ हफ्तों बाद कोर्ट की निगरानी में मुलाकात की अनुमति मिली। नंदिनी आई, पीहू ने उसे देखा और शेखर की गोद में छुप गई। लेकिन नंदिनी ने हार नहीं मानी। हर मुलाकात में वह चॉकलेट, किताबें और सच्चा प्यार लेकर आती। धीरे-धीरे पीहू ने उसकी तरफ देखना शुरू किया, पास बैठना शुरू किया। एक दिन पार्क में झूला झूलते हुए बोली – “मम्मी, वो गाना गाओ ना, जो आप मुझे बचपन में सुनाती थीं।” नंदिनी की आंखें भर आईं, उसने वही गाना गुनगुनाया, पहली बार पीहू ने उसका हाथ नहीं हटाया।
अब पीहू फिर से मुस्कुराने लगी थी। रात में डरकर उठना नहीं पड़ता था, तकिए पर कहानियों की मीठी यादें होती थीं। शेखर अब सिर्फ एक बाप नहीं था, एक ढाल था। नंदिनी अब अपनी बेटी का भरोसा जीतने के रास्ते पर थी। एक दिन पीहू ने खुद शेखर और नंदिनी का हाथ थामा, मुस्कुराई – “अब डर नहीं लगता बाबा, अब तो मैं फिर से आपकी नन्ही परी बन गई हूं।”
उस दिन शेखर की आंखों में जो आंसू थे, वह सुकून के थे। एक पिता की सबसे बड़ी जीत के आंसू। अब नंदिनी के साथ शेखर जिंदगी तो बिता रहा था, लेकिन पहले जैसा प्यार नहीं रहा। अब दोनों साथ रहते थे, क्योंकि उनकी बेटी को पूरा परिवार चाहिए था। शेखर ने सब कुछ भुलाकर माफ कर दिया, लेकिन दिल फिर से वैसा नहीं हुआ। वह अब जिम्मेदार बाप था, जो बेटी को सुकून देने के लिए अपना दर्द छुपाकर जी रहा था।
नंदिनी भी अब समझ गई थी कि शेखर उसे वैसे कभी नहीं देखेगा जैसे पहले देखा करता था। लेकिन वह अब अपनी बेटी के लिए एक अच्छी मां बनने की कोशिश में लगी थी।
क्या हर टूटे रिश्ते को माफी और समझदारी से फिर से जोड़ा जा सकता है, या कुछ दरारें हमेशा के लिए रह जाती हैं?
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