दिल्ली धमाके का मास्टरमाइंड: डॉक्टर उमर की दहशतगर्दी की कहानी

भूमिका

दिल्ली में हुए भीषण आत्मघाती धमाके ने पूरे देश को झकझोर दिया। इस हमले के पीछे पुलवामा का रहने वाला, पेशे से असिस्टेंट प्रोफेसर डॉक्टर उमर था। एक पढ़ा-लिखा, सभ्य परिवार का युवक कैसे आतंक की राह पर चल पड़ा, उसने किस तरह धमाके की साजिश रची, उसका परिवार इस सब से कैसे जूझ रहा है – इन तमाम सवालों के जवाब तलाशती यह रिपोर्ट देश के सामने आतंकवाद के बदलते चेहरे को उजागर करती है।

उमर की पृष्ठभूमि: एक सामान्य जीवन से आतंक की राह तक

पुलवामा के एक छोटे से गाँव में जन्मा उमर इलाही एक सामान्य कश्मीरी परिवार का हिस्सा था। उसके पिता एक शिक्षक थे, माँ गृहिणी, दो भाई और भाभी। परिवार ने बड़ी उम्मीदों से उमर को पढ़ाया-लिखाया, डॉक्टर बनाया। उमर की शुरुआती शिक्षा गाँव के ही स्कूल में हुई, आगे चलकर उसने मेडिकल की पढ़ाई पूरी की और फरीदाबाद की अलफला यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर बना।

परिवार के अनुसार, उमर हमेशा शांत स्वभाव का था, पढ़ाई में अव्वल रहता था और उसकी कोई आपराधिक पृष्ठभूमि नहीं थी। माता-पिता और भाईयों के लिए उमर एक आदर्श बेटा और भाई था। लेकिन किसी को क्या पता था कि वही उमर एक दिन देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बन जाएगा।

आतंक की ओर बढ़ते कदम

जांच एजेंसियों की रिपोर्ट के मुताबिक, उमर पिछले कई महीनों से आतंकी गतिविधियों में संलिप्त था। वह दिल्ली में आत्मघाती हमले की योजना बना रहा था। एजेंसियों के अनुसार, उमर ने अपने मेडिकल प्रोफेशन का इस्तेमाल आतंकी नेटवर्क को मजबूत करने के लिए किया। यूनिवर्सिटी में रहते हुए वह युवाओं को कट्टरपंथी विचारधारा की ओर आकर्षित करता, उन्हें जिहाद के नाम पर भड़काता और गुप्त बैठकों में साजिश रचता।

आतंकी संगठन के अन्य सदस्य – डॉक्टर आदिल, डॉक्टर मुजम्मिल – भी इसी नेटवर्क का हिस्सा थे। उमर ने इन लोगों के साथ मिलकर दिल्ली को दहलाने की साजिश रची। धमाके के लिए उसने आई20 कार का इस्तेमाल किया, जिसमें विस्फोटक सामग्री फिट की गई थी।

धमाके से पहले उमर की गतिविधियाँ

दिल्ली धमाके से लगभग दो हफ्ते पहले उमर पुलवामा अपने घर गया। उस दौरान उसने अपने दो मोबाइल फोन में से एक अपने छोटे भाई जहूर इलाही को दिया। जहूर ने सुरक्षा एजेंसियों को बताया कि उमर ने फोन देते समय कहा था, “अगर टीवी पर मेरे बारे में कोई खबर आए, तो फोन पानी में फेंक देना।”

यह बात जहूर के लिए चौंकाने वाली थी, लेकिन उस समय उसने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। बाद में जब दिल्ली धमाके की खबर आई, तो जहूर डर गया और दोनों फोन तालाब में फेंक दिए। जम्मू-कश्मीर पुलिस ने तकनीकी निगरानी के जरिए फोन की लोकेशन ट्रेस की और तालाब से बरामद कर लिया। उसी फोन में उमर का एक वीडियो मिला, जिसमें उसने हमले से पहले अपनी जिहादी मानसिकता का खुलासा किया था।

परिवार की प्रतिक्रिया: विश्वासघात और दर्द

उमर के परिवार के लिए यह घटना किसी सदमे से कम नहीं थी। माता-पिता, भाई, भाभी – सभी ने मीडिया और पुलिस को बताया कि उन्हें उमर की आतंकी गतिविधियों की कोई जानकारी नहीं थी। परिवार का कहना था कि उमर कभी-कभार ही घर आता था, फोन भी बहुत कम करता था। पिता ने बताया, “वो जब बाहर काम कर रहा था, तो कभी-कभी ही फोन करता था। यहाँ से ही कोई उसे फोन करता था, वहाँ से कभी नहीं।”

माँ का कहना था, “ऐसा आदमी कुछ गलत काम करेगा, यह तो बात ही नहीं। वो इतना तशद्दुद पसंद भी नहीं है, उतना रेडिकल भी नहीं है। हमें तो आज भी यकीन नहीं हो रहा कि उमर ऐसा कर सकता है।”

परिवार ने कई बार उमर की तारीफ की, “हम क्या किसी गैर से भी पूछ सकते हैं, दुश्मन से भी पूछो, वो भी बोलेगा कि उमर जैसा बेटा चाहिए।”

लेकिन अब जब घर के पास से उसका फोन मिला, परिवार पर सवाल उठने लगे – उमर जब घर पर फोन देकर गया था, तो परिजनों ने इसकी वजह क्यों नहीं पूछी? क्या परिवार को सच में कोई अंदेशा नहीं था?

जांच एजेंसियों की कार्यवाही

दिल्ली धमाके के बाद सुरक्षा एजेंसियों ने जांच तेज कर दी। उमर के परिवार के सदस्यों से डीएनए मैच करवाया गया, जिससे यह पुख्ता हो गया कि आत्मघाती हमलावर उमर ही था। परिवार पर कानून का शिकंजा कसा गया, पूछताछ हुई, और पुलवामा स्थित उमर के घर को आईडी विस्फोट से उड़ा दिया गया। दो मंजिला इमारत, जिसमें उमर का बचपन बीता था, अब मिट्टी में मिल चुकी थी।

एजेंसियों ने उमर के आतंकी नेटवर्क का भी पर्दाफाश किया। यूनिवर्सिटी में उसके संपर्कों, सोशल मीडिया गतिविधियों, बैंक ट्रांजेक्शंस, और फोन रिकॉर्ड्स की गहन जांच की गई। उमर के संपर्क में आए कई अन्य युवाओं को हिरासत में लिया गया। जांच में यह भी सामने आया कि उमर ने मेडिकल प्रोफेशन का इस्तेमाल आतंकी साजिशों में मास्किंग के तौर पर किया।

समाज पर आतंकवाद का असर

उमर की घटना ने पूरे समाज को सोचने पर मजबूर कर दिया कि पढ़ा-लिखा नौजवान भी कट्टरपंथ की राह पर कैसे चल सकता है। पुलवामा के गाँव में लोग सदमे में थे – जहाँ कभी उमर की तारीफ होती थी, वहाँ अब लोग उसके नाम से डरने लगे थे। गाँव के बुजुर्ग कहते हैं, “हमने तो सोचा था कि उमर डॉक्टर बनकर गाँव का नाम रोशन करेगा, लेकिन उसने तो पूरे देश को शर्मसार कर दिया।”

युवाओं में भी भय और असमंजस था। कई लोग सोचते थे कि कहीं वे भी किसी कट्टरपंथी विचारधारा के शिकार न हो जाएँ। स्कूलों और कॉलेजों में सुरक्षा बढ़ा दी गई, युवाओं को जागरूक करने के लिए विशेष कार्यक्रम आयोजित किए गए।

आतंकवाद के बदलते तौर-तरीके

उमर का मामला इस बात को साबित करता है कि आतंकवाद का चेहरा बदल रहा है। अब आतंकी संगठन पढ़े-लिखे युवाओं को अपने जाल में फँसा रहे हैं, उन्हें धार्मिक कट्टरता, सोशल मीडिया प्रचार और गुप्त नेटवर्किंग के जरिए भड़काया जा रहा है। मेडिकल, इंजीनियरिंग, आईटी – हर क्षेत्र में ऐसे मामलों की संख्या बढ़ रही है।

सुरक्षा एजेंसियों के लिए यह नई चुनौती है – कैसे पहचानें कि कौन सा युवक गुप्त रूप से कट्टरपंथी बन रहा है? कैसे रोकें कि कोई प्रोफेशनल अपनी पहचान छिपाकर देश के खिलाफ साजिश न रचे?

सरकार और सुरक्षा एजेंसियों की रणनीति

दिल्ली धमाके के बाद केंद्र सरकार और राज्य सरकारों ने आतंकवाद के खिलाफ अपनी रणनीति और सख्त कर दी है। जम्मू-कश्मीर, दिल्ली, फरीदाबाद – सभी जगह सुरक्षा बढ़ा दी गई है। विश्वविद्यालयों में छात्रों की गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है, संदिग्ध सोशल मीडिया अकाउंट्स को मॉनिटर किया जा रहा है।

पुलवामा के गाँव में भी सेना और पुलिस की गश्त बढ़ा दी गई है। युवाओं को जागरूक करने के लिए सेमिनार, वर्कशॉप, काउंसलिंग सत्र आयोजित किए जा रहे हैं। सरकार ने स्पष्ट संदेश दिया है कि आतंकवाद को किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

मीडिया और जनमानस की भूमिका

इस पूरे मामले में मीडिया ने अहम भूमिका निभाई। उमर की कहानी को सामने लाकर उसने समाज को जागरूक किया कि आतंकवाद किसी भी रूप में आ सकता है – यहाँ तक कि वह आपके पड़ोस, आपके परिवार, आपके स्कूल-कॉलेज में भी छुपा हो सकता है। मीडिया ने परिवार के दर्द, गाँव की प्रतिक्रिया, सुरक्षा एजेंसियों की कार्यवाही और आतंकवाद के खतरे को विस्तार से दिखाया।

जनमानस में भी इस घटना के बाद जागरूकता बढ़ी। लोगों ने सोशल मीडिया पर आतंकवाद के खिलाफ आवाज उठाई, युवाओं को सतर्क रहने की सलाह दी, और सरकार से सख्त कार्रवाई की मांग की।

निष्कर्ष: आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता

डॉक्टर उमर की घटना ने देश को एक बार फिर यह सिखाया कि आतंकवाद का कोई चेहरा नहीं होता – वह किसी भी रूप में आ सकता है। पढ़ा-लिखा युवक भी कट्टरपंथी बन सकता है, सभ्य परिवार भी आतंक की चपेट में आ सकता है। ऐसे में जरूरी है कि समाज, परिवार, सरकार, सुरक्षा एजेंसियाँ – सभी एकजुट होकर आतंकवाद के खिलाफ लड़ें।

परिवारों को चाहिए कि वे अपने बच्चों की गतिविधियों पर नजर रखें, स्कूल-कॉलेज सतर्क रहें, सरकार सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करे और समाज जागरूक रहे। तभी देश सुरक्षित रह सकता है।