दिल्ली ब्लास्ट 2025: लाल किले के साए में मौत का तांडव, सफेद कोट वाले डॉक्टरों की साजिश ने देश को दहला दिया!

भूमिका: एक खूनी शाम, एक साजिश, एक झकझोर देने वाली हकीकत
10 नवंबर 2025 की शाम, दिल्ली की हल्की ठंडक में रौनक बसी थी। चांदनी चौक के रंग-बिरंगे बाजारों में शादियों की खरीदारी, लाल किला की प्राचीन दीवारों के साये में पर्यटकों की भीड़, जामा मस्जिद में इबादत में डूबे लोग—हर तरफ जिंदगी का उत्सव था। किसी को खबर नहीं थी कि कुछ ही मिनटों में यह जश्न मातम में बदलने वाला है। एक सफेद Hyundai i20 कार, जो आम दिखती थी, उस दिन मौत का सामान लेकर आई थी। और उसका ड्राइवर—डॉक्टर उमर मोहम्मद—एक ऐसा नाम, जो इंसानियत की सेवा से आतंक की राह पर उतर चुका था।
धमाके की घड़ी: जब दिल्ली की धड़कन थम गई
शाम 6:22 बजे, रेड फोर्ट मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर एक के पास ट्रैफिक सिग्नल पर कारें रुकी थीं। सिग्नल हरा हुआ, सब आगे बढ़े, लेकिन बीच में खड़ी Hyundai i20 आगे नहीं बढ़ी। पीछे गाड़ियों के हॉर्न, भागती भीड़, बेचैनी… और अचानक एक जोरदार धमाका! आग का गोला बन चुकी कार, उसके टुकड़े हवा में उड़ते हुए, आसपास की 10 गाड़ियां तहस-नहस, मेट्रो स्टेशन के शीशे टूटे, चीखें, खून, धुआं और मौत की गूंज।
13 लोग मौके पर ही मारे गए, 20 से ज्यादा घायल हुए। अफरातफरी का आलम, फायर ब्रिगेड, पुलिस, एंबुलेंस—हर तरफ हड़कंप। दिल्ली की वह शाम, जो कुछ देर पहले जश्न थी, अब खौफ और मातम में डूब गई।
रेस्क्यू मिशन: मौत के साये में उम्मीद की लड़ाई
धमाके के तुरंत बाद सात फायर टेंडर्स पहुंचीं। शाम 7:29 पर आग पर काबू पाया गया। दिल्ली पुलिस, एनएसजी बॉम्ब स्क्वाड, फॉरेंसिक टीम—सब मौके पर जुटे। घायलों को एलएनजेपी हॉस्पिटल पहुंचाया गया। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता समेत तमाम बड़े शहरों में हाई अलर्ट। लाल किला मेट्रो स्टेशन और रेड फोर्ट तीन दिन के लिए बंद। होम मिनिस्टर ने अस्पताल जाकर घायलों से मुलाकात की। लेकिन पहचान मुश्किल थी—कई चेहरों को उनके टैटू, कपड़ों या सामान से ही पहचाना गया।
पीड़ितों की दर्दनाक कहानी: उजड़ते परिवार, टूटी उम्मीदें
इस ब्लास्ट ने कई घरों को हमेशा के लिए उजाड़ दिया। अमर कटारिया—35 साल का युवा, जिसने अपने हाथों पर ‘मॉम माय फर्स्ट लव’ और ‘डैड माय स्ट्रेंथ’ का टैटू बनवा रखा था। वह अपनी दुकान से घर जाते वक्त मारा गया। उसका परिवार, उसकी पत्नी और तीन साल का बेटा अब बेसहारा हैं।
पंकज सहनी—22 वर्षीय कैब ड्राइवर, बिहार के समस्तीपुर से आए थे, दिल्ली में परिवार के साथ रहते थे। अशोक कुमार—डीटीसी बस कंडक्टर, जो सिक्योरिटी गार्ड की दूसरी नौकरी भी करते थे, अपने परिवार के इकलौते कमाऊ सदस्य थे। लोकेश अग्रवाल, दिनेश मिश्रा, मोसिन मलिक, नोमान अंसारी—हर नाम के साथ एक उजड़ा परिवार, एक अधूरी कहानी।
जांच की शुरुआत: एक परफेक्ट साजिश या घबराहट का नतीजा?
शुरुआती जांच में पुलिस ने इसे सीएनजी ब्लास्ट माना, लेकिन फॉरेंसिक रिपोर्ट ने सच्चाई सामने ला दी—यह एक आत्मघाती आतंकी हमला था। धमाके में इस्तेमाल हुआ अमोनियम नाइट्रेट और फ्यूल ऑयल (ANFO)। बाद में शक हुआ कि TATP—मदर ऑफ सैटन—जैसा वोलाटाइल एक्सप्लोसिव भी इस्तेमाल हुआ। जांच में सामने आया कि धमाका पूरी तरह परफेक्ट तरीके से नहीं हुआ, अगर एक्सप्लोसिव ठीक से कॉम्पैक्ट होता, तबाही कई गुना ज्यादा होती।
साजिश का पर्दाफाश: सफेद कोट में छुपा आतंक
जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, एक खौफनाक सच्चाई सामने आई। इस साजिश में कोई बेरोजगार या अनपढ़ युवक नहीं था। बल्कि ये सभी पढ़े-लिखे, प्रोफेशनल, समाज के भरोसेमंद लोग—डॉक्टर्स, प्रोफेसर्स, इंजीनियर्स थे। डॉक्टर उमर मोहम्मद, डॉक्टर आदिल अहमद राठौर, डॉक्टर मुजम्मिल शकील, डॉक्टर शाहीन सईद, इमाम इरफान अहमद, डॉक्टर अहमद मोइुद्दीन सैयद, आजाद सुलेमान शेख, मोहम्मद सुहेल खान—यह कोर ग्रुप था। इनका असली प्लान 6 दिसंबर को दिल्ली-NCR में 32 कारों में 2900 किलो एक्सप्लोसिव के साथ सीरियल ब्लास्ट करना था।
इनके निशाने पर लाल किला, इंडिया गेट, कन्नोट प्लेस, यूपी और हरियाणा के धार्मिक स्थल, अस्पताल थे। इनका मकसद सिर्फ धमाके नहीं था, बल्कि AK-47 और AK-56 से ताबड़तोड़ फायरिंग कर मास किलिंग करना था। मेडिकल हेल्प को रोकने के लिए अस्पतालों को भी निशाना बनाना था। इसके लिए इन्होंने 26 क्विंटल NPK फर्टिलाइजर, 358 किलो अमोनियम नाइट्रेट, बड़ी मात्रा में हथियार और बम बनाने का सामान इकट्ठा किया था।
अलफला यूनिवर्सिटी: शिक्षा का केंद्र या आतंक का अड्डा?
जांच में अलफला यूनिवर्सिटी का नाम बार-बार सामने आया। फरीदाबाद की यह यूनिवर्सिटी, जो 70 एकड़ में फैली है, पढ़ाई के नाम पर आतंकियों का हब बन गई थी। डॉक्टर मुजम्मिल का रूम नंबर 13 इस मॉड्यूल का सीक्रेट मीटिंग पॉइंट था। यहां प्लानिंग होती, बम बनते, पैसे और डिवाइस की डीलिंग होती। यूनिवर्सिटी के फाउंडर जावेद अहमद सिद्दीकी पर फाइनेंसियल फ्रॉड के आरोप, विदेश से फंडिंग, फर्जी इन्वेस्टमेंट स्कीम्स—यह सब जांच एजेंसियों के घेरे में है।
पोस्टर से खुली साजिश: कश्मीर की दीवारों पर लिखी गई मौत
19 अक्टूबर को कश्मीर के नौगांव इलाके में जैश-ए-मोहम्मद के जहरीले पोस्टर्स मिले। इसमें धमकी, डर फैलाने और घाटी में पकड़ मजबूत करने की बातें थीं। पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज खंगाली, पोस्टर चिपकाने वाले डॉक्टर आदिल अहमद राठौर को पकड़ा। उसके पाकिस्तान हैंडलर्स से लिंक मिले, सहारनपुर में उसकी गिरफ्तारी हुई। उसके बाद डॉक्टर मुजम्मिल, डॉक्टर शाहीन, इमाम इरफान, मौलवी इश्तियाक—सबकी गिरफ्तारी हुई। मौलवी इश्तियाक के कमरे से 2500 किलो एक्सप्लोसिव मिला।
सफेद कोट वाले डॉक्टरों की दोहरी जिंदगी
जांच में सामने आया कि ये सभी डॉक्टर्स और प्रोफेसर्स दिन में हॉस्पिटल और यूनिवर्सिटी में सम्मानित रोल निभाते थे, लेकिन रात में भारत के खिलाफ मास कैजुअल्टी टेरर अटैक की प्लानिंग करते थे। ये लोग इंक्रिप्टेड कम्युनिकेशन प्लेटफॉर्म्स, सोशल कॉज या चैरिटी के नाम पर फंड जुटाते थे, क्रिप्टो ट्रांजैक्शन करते थे, अपनी ट्रस्टेड इमेज का फायदा उठाकर आसानी से मटेरियल खरीदते और ट्रैवल करते थे। इनकी पहचान करना मुश्किल था, क्योंकि ये अर्बन क्राउड में घुलमिल जाते थे।
टेक्निकल ब्रेन और ड्रोन अटैक: आतंक का नया चेहरा
जसीर बिलाल वानी—एक पॉलिटिकल साइंस ग्रेजुएट—इस मॉड्यूल का टेक्निकल ब्रेन था। वह ड्रोन को मॉडिफाई कर रॉकेट बेस्ड एक्सप्लोसिव बनाने की कोशिश कर रहा था। इनका पहला प्लान हमर स्टाइल ड्रोन अटैक था, जो फेल हो गया। इसके बाद कार बम का प्लान आगे बढ़ाया गया।
राइसिन जहर की साजिश: साइनाइड से भी घातक
डॉक्टर अहमद मोइुद्दीन सैयद—चाइना से एमबीबीएस—अपनी टीम के साथ राइसिन तैयार कर रहा था, जो खाने-पीने की चीजों में मिलाकर मास पोइजनिंग करना चाहता था। उसका संपर्क इस्लामिक स्टेट खुरासन प्रोविंस के हैंडलर अबू खदीजा से था। पाकिस्तान से ड्रोन के जरिए हथियार भारत में आए, गुजरात तक पहुंचे। लेकिन अहमद की गिरफ्तारी से यह प्लान फेल हो गया।
एजेंसियों की सख्त निगरानी: एक बड़ा हमला टला
अगर एजेंसियों की सतर्कता न होती, तो 6 दिसंबर को दिल्ली-NCR में 32 कारें 2900 किलो एक्सप्लोसिव के साथ parked होतीं, और राइसिन जहर से ना जाने कितनी जानें जातीं। यह भारत का 21वीं सदी का सबसे बड़ा आतंकी हमला बन सकता था। लेकिन जांच एजेंसियों ने समय रहते पूरे मॉड्यूल को पकड़ लिया।
सरकार और एजेंसियों पर सवाल
फिर भी सवाल उठते हैं—इतने एक्सप्लोसिव दिल्ली तक कैसे पहुंचे? एक एक्सप्लोसिव लोडेड Hyundai i20 कई घंटों तक दिल्ली की सड़कों पर घूमती रही, पुलिस को रेड फ्लैग क्यों नहीं मिला? फरीदाबाद में 2900 किलो एक्सप्लोसिव पड़ा रहा, किसी को भनक क्यों नहीं लगी? क्या यूनिवर्सिटी मैनेजमेंट को कुछ पता नहीं था या उनकी मिलीभगत थी?
वाइट कॉलर टेररिज्म: आतंकवाद का नया दौर
यह केस एक नई सच्चाई सामने लाता है—अब आतंकवाद ब्रेन वॉश हुए अनपढ़ युवाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि highly educated, socially respected professionals भी आतंक की आईडियोलॉजी का हिस्सा बन रहे हैं। यह वाइट कॉलर टेररिज्म है—जहां डॉक्टर्स, प्रोफेसर्स, इंजीनियर्स जैसे भरोसे के लोग मास किलिंग की प्लानिंग कर रहे हैं। इनकी दोहरी जिंदगी, ट्रस्टेड इमेज, सोसाइटी में घुलमिल जाना—यह सब सुरक्षा एजेंसियों के लिए नया चैलेंज है।
जाँच और कार्रवाई: आगे क्या?
एनआईए, एनएसजी, आईबी, दिल्ली पुलिस और ईडी सभी जांच में जुटे हैं। अलफला यूनिवर्सिटी की मेंबरशिप सस्पेंड, फाइनेंसियल ट्रांजैक्शन की जांच, विदेश से फंडिंग की पड़ताल। सरकार को अब नई स्ट्रेटजी, मॉडर्न सिक्योरिटी सिस्टम्स और ग्राउंड लेवल अकाउंटेबिलिटी की जरूरत है।
निष्कर्ष: चेतावनी, सवाल और जिम्मेदारी
10 नवंबर 2025 का दिल्ली ब्लास्ट सिर्फ एक हमला नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। आतंकवाद की शक्ल बदल चुकी है। अब खतरा सिर्फ सीमाओं से नहीं, बल्कि समाज के सबसे भरोसेमंद पेशों से भी है। सरकार, एजेंसियां, समाज—सबको सतर्क रहना होगा। सवाल सिर्फ यह नहीं कि ब्लास्ट कैसे हुआ, बल्कि यह है कि अगला हमला ना हो, इसके लिए हम कितने तैयार हैं? क्या हम समय रहते अपने सिस्टम को इतना मजबूत बना सकते हैं कि सफेद कोट वाले डॉक्टरों की साजिश कभी कामयाब न हो?
यह कहानी सिर्फ दिल्ली की नहीं, पूरे भारत की है। एक ऐसी लड़ाई, जिसमें हर नागरिक की जागरूकता, हर एजेंसी की सतर्कता, और सरकार की जिम्मेदारी सबसे बड़ा हथियार है।
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