माँ गायब थी, बेटा ढूंढ रहा था… सच्चाई ऐसी जो यकीन से बाहर थी | Reema Jain Case | Hidden Reality

पंजाब के उद्योगनगरी लुधियाना से निकलने वाली यह कहानी किसी क्राइम थ्रिलर से कम नहीं लगती। एक संपन्न जैन परिवार, आलीशान घर, करोड़ों का बिजनेस, सामाजिक प्रतिष्ठा और फिर अचानक से एक-एक कर परिवार के मुखिया और गृहिणी का यूं गायब हो जाना।
पहले 2002 में पति की संगीन हालात में मौत, फिर 2005 में पत्नी का रहस्यमय गुम हो जाना — और सालों तक किसी को सच का अंदाज़ा तक न हो पाना। जब आखिरकार चार साल बाद सच्चाई सामने आई, तो यह केवल एक हत्या नहीं, बल्कि लालच, बदले और रिश्तों के पतन की ऐसी कहानी बन गई, जिसे सुनकर लोगों के रोंगटे खड़े हो गए।
जैन परिवार: रुतबा, पैसा, प्रतिष्ठा… और भीतर का खालीपन
लुधियाना शहर में जैन परिवार का नाम किसी से छिपा नहीं था। यह परिवार शहर के सबसे बड़े और प्रभावशाली घरानों में गिना जाता था।
परिवार के केन्द्र में थीं रीमा जैन, जो अपने तीन बच्चों के साथ शहर के पॉश इलाके में स्थित शानदार घर में रहती थीं।
बड़ा बेटा: भानु प्रताप जैन – बी.कॉम का छात्र, उम्र लगभग 20 वर्ष
छोटा बेटा: भरत जैन
बेटी: भानवी जैन
पति सुनील जैन लुधियाना के नामी इंडस्ट्रियलिस्ट थे। उनके कई बिजनेस थे, जिन्हें वह स्वयं संभालते थे। आर्थिक रूप से सब कुछ किसी सपने जैसा था, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।
2002: जब पहली बार इस घर पर टूटा था कहर
साल 2002 की एक शाम जैन परिवार के लिए हमेशा के लिए काली साबित हुई।
उस दिन सुनील जैन अपने रोज़ाना के टाइम पर घर नहीं लौटे।
पहले हल्की चिंता, फिर बेचैनी, और अंततः घबराहट… पत्नी रीमा ने ऑफिस में फोन किया तो पता चला कि सुनील तो काफी पहले ऑफिस से निकल चुके थे।
रीमा खुद कार लेकर पति की तलाश में निकलीं। सुनसान इलाके से गुजरते हुए उन्हें सड़क किनारे सुनील की कार दिखी।
अंदर झांका तो उनकी दुनिया उजड़ चुकी थी—
सुनील जैन कार के अंदर खून से लथपथ पड़े थे। किसी ने उन पर गोलियां बरसा दी थीं। उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाया गया, मगर अत्यधिक रक्तस्राव के कारण डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
डॉक्टरों का साफ कहना था—
“अगर कुछ देर पहले अस्पताल पहुंचते, तो शायद इनकी जान बच सकती थी।”
सुनील जैन की हत्या: शक, जांच और अधूरा इंसाफ
फोकल प्वाइंट पुलिस स्टेशन में हत्या का केस दर्ज हुआ। हत्या में गोलियों के इस्तेमाल से यह साफ था कि मामला साधारण नहीं था। पुलिस ने कई एंगल से जांच शुरू की।
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क्या यह बिजनेस राइवलरी थी?
पुलिस ने देखा कि सुनील की मौत से किसका फायदा हो सकता था।
क्या कोई ऐसा बिजनेस पार्टनर था जो उनकी जगह लेना चाहता था?
क्या कोई पुराना विवाद था?
क्या सुनील किसी गैरकानूनी काम में शामिल थे?
परिवार का बयान था कि सुनील सीधे-सादे, पारिवारिक और ईमानदार व्यक्ति थे। किसी अपराधी से उनका कोई नाता नहीं था।
शक की सूची और सबसे चौंकाने वाला नाम
पुलिस ने रीमा और अन्य परिजनों से कहा कि वे उन सभी लोगों की सूची बनाएं जिन पर उन्हें जरा भी शक हो सकता है।
इस लिस्ट में बिजनेस प्रतिद्वंद्वी, कुछ कर्मचारी और रिश्तेदारों के नाम थे।
लेकिन सबसे चौंकाने वाला नाम था –
अनिल जैन उर्फ मिक्की जैन, सुनील के बड़े भाई।
अनिल खुद बिजनेसमैन था। उसका रियल एस्टेट और टेक्सटाइल का बड़ा बिजनेस था। शेरपुर खुर्द गांव में उसकी “अरनाथ टेक्सटाइल मिल” नाम की फैक्ट्री थी।
जांच के दौरान यह भी सामने आया कि अनिल के संपर्क में कुछ संदिग्ध लोग थे और वह मनी लॉन्ड्रिंग जैसी अवैध गतिविधियों से भी जुड़ा रहा था।
पुलिस ने अनिल को हिरासत में लेकर पूछताछ की, लेकिन वह लगातार खुद को निर्दोष बताता रहा।
केस सेशन कोर्ट तक पहुंचा। सबूतों की कमी, गवाहों के कमजोर बयानों और ठोस वैज्ञानिक साक्ष्यों के अभाव में अनिल जैन केस से बरी हो गया।
रीमा ने हाई कोर्ट में अपील की, लेकिन वहां भी अनिल को राहत मिल गई।
नतीजा:
सुनील जैन की हत्या की फाइल बंद नहीं हुई, लेकिन कातिल का नाम किसी फाइल में दर्ज नहीं हो सका। यह गुत्थी आज तक अनसुलझी है।
2005: जब वही कहानी दोहराई गई, इस बार निशाने पर थी रीमा जैन
30 जुलाई 2005 की सुबह भी बाकी दिनों की तरह शुरू हुई थी।
रीमा जैन रोज़ की तरह सतलुज क्लब जाने की तैयारी में लगी थीं। फिटनेस के लिए वह रोज़ सुबह स्विमिंग और एक्सरसाइज करती थीं और आमतौर पर 9 बजे तक घर लौट आती थीं।
उस सुबह भी उन्होंने अपने बड़े बेटे भानु से कहा—
“मैं सतलुज क्लब जा रही हूं, 9 बजे तक वापस आ जाऊंगी।”
लेकिन यह वह सुबह थी, जो जैन परिवार की जिंदगी हमेशा के लिए बदलने वाली थी।
गायब हो जाने के शुरुआती घंटे
9 बजे बीते
9:30 हुआ
फिर 10 बज गए
लेकिन रीमा घर नहीं लौटीं।
भानु ने मां को फोन किया, फोन स्विच्ड ऑफ था।
घबराहट बढ़ने लगी।
भानु एक रिश्तेदार को साथ लेकर सतलुज क्लब पहुंचा।
पार्किंग में मां की कार नहीं थी।
क्लब स्टाफ ने बताया – “रीमा जी तो 9 बजे के आसपास जा चुकी हैं।”
भानु ने ऑफिस फोन किया, सोचा कि मां सीधे वहां चली गई होंगी। लेकिन ऑफिस से भी जवाब मिला—“मैडम आज ऑफिस आई ही नहीं।”
अब यह गायब होना साधारण नहीं लगा।
तीन साल पहले पिता का अचानक न लौटना, अब मां का ठीक उसी तरह गायब होना… पुरानी यादें ताजा हो गईं।
गुमशुदगी की रिपोर्ट और पहला शक फिर उसी ताऊ पर
भानु प्रताप ने उसी दिन लुधियाना के डिवीजन नंबर 5 पुलिस स्टेशन में मां की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई।
जैन परिवार पहले ही एक हत्या झेल चुका था, इसलिए पुलिस ने मामले को बेहद गंभीरता से लिया।
शहर के एसपी ने खुद केस की कमान संभाल ली।
भानु और परिवार के अन्य सदस्यों ने पुलिस को बताया कि
रीमा और ताऊ अनिल जैन उर्फ मिक्की के बीच बिजनेस को लेकर विवाद था।
यह विवाद संपत्ति और कारोबार के बंटवारे को लेकर था।
हालांकि परिवार का यह भी कहना था कि बड़े बिजनेस घरानों में ऐसे मतभेद होना असामान्य नहीं।
फिर भी पुलिस का पहला शक स्वाभाविक तौर पर अनिल की ओर गया।
30 जुलाई की रात अनिल के खिलाफ किडनैपिंग का केस दर्ज हुआ।
अगले दिन लुधियाना के पखोवाल रोड स्थित उसके प्रीमियम अपार्टमेंट पर रेड हुई और अनिल को हिरासत में ले लिया गया।
तीन दिन की कड़ी पूछताछ
अनिल ने हर आरोप से इंकार कर दिया—
“पहले भी मुझे झूठा फंसाया गया, अब फिर वही हो रहा है। मेरा इससे कोई लेना-देना नहीं।”
कोई ठोस सबूत न होने पर 2 अगस्त 2005 को पुलिस को अनिल को छोड़ना पड़ा।
कार की तलाश और दिल्ली एयरपोर्ट पर बड़ा सुराग
रीमा की कार का रजिस्ट्रेशन नंबर पूरे पंजाब के थानों, टोल नाकों और पड़ोसी राज्यों – हरियाणा, यूपी, दिल्ली – तक फ्लैश कर दिया गया।
लेकिन कई दिनों तक कार का कोई उत्थान-पत्थान नहीं मिला।
फिर 16 अगस्त को दिल्ली में इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट के इंटरनेशनल टर्मिनल की पार्किंग में ड्यूटी कर रहे एक पुलिस कॉन्स्टेबल की नजर एक गाड़ी पर पड़ी।
नंबर प्लेट ने उसका ध्यान खींचा—
यह वही नंबर था जो पंजाब पुलिस द्वारा सर्कुलेट किया गया था।
सीनियर अफसर मौके पर पहुंचे
गाड़ी की जांच हुई
रंग, मॉडल, नंबर — सब रीमा की कार से मैच कर रहे थे
दिल्ली पुलिस ने तुरंत लुधियाना पुलिस को सूचना दी।
भानु और परिवार के सदस्य भी दिल्ली पहुंचे।
गाड़ी की पहचान कन्फर्म हो गई।
गाड़ी के अंदर क्या मिला?
गाड़ी की तलाशी में मिला—
रीमा का स्विमिंग कॉस्ट्यूम
कुछ निजी सामान
गाड़ी ठीक से पार्क की गई थी, बाकायदा पार्किंग टिकट कटा था।
पार्किंग अटेंडेंट को याद नहीं कि गाड़ी किसने पार्क की थी। रोज़ सैकड़ों गाड़ियां आती-जाती हैं, किसी एक को याद रखना मुश्किल था।
लुधियाना पुलिस ने एक थ्योरी बनाई—
शायद रीमा को अचानक किसी इमरजेंसी में दिल्ली जाना पड़ा
उन्होंने खुद कार से दिल्ली आकर एयरपोर्ट से इंटरनेशनल फ्लाइट ली होगी
विदेश जाने पर मोबाइल भी बंद हो सकता है
लेकिन यह थ्योरी तब ध्वस्त हो गई जब पुलिस ने रीमा के कमरे की तलाशी ली।
पासपोर्ट घर में मिला, थ्योरी ध्वस्त
रीमा का पासपोर्ट उनके कमरे की अलमारी से बरामद हुआ।
स्पष्ट था—
यदि पासपोर्ट घर पर है तो रीमा किसी भी हाल में विदेश नहीं जा सकती थीं।
अब पुलिस इस निष्कर्ष पर पहुंची कि—
कार को जानबूझकर एयरपोर्ट पर पार्क किया गया है, ताकि जांच भटक जाए और यह लगे कि रीमा विदेश चली गई हैं।
फिर भी,
न कोई फिरौती कॉल आया
न किसी लावारिस शव की सूचना मिली
केस और उलझता जा रहा था।
अपराधियों तक पहुंचने वाला पहला धागा: जसबीर का नाम
जब सारे पारंपरिक तरीके असफल हो रहे थे, पुलिस ने मुखबिरों का सहारा लिया।
सूचना मिली कि रीमा के गायब होने से कुछ दिन पहले सतलुज क्लब के आसपास जसबीर नाम का व्यक्ति मंडराता देखा गया था।
जांच में पता चला—
जसबीर, अनिल जैन के संपर्क में रहने वाला पुराना अपराधी था
उसके साथ दो और नाम जुड़े – कुलदीप और तरसेम
इन तीनों पर पहले से रंगदारी, गुंडागर्दी और जबरन वसूली के केस दर्ज थे
पुलिस ने तीनों को एक पुराने केस के बहाने उठाया, लेकिन असली पूछताछ रीमा जैन के केस को लेकर शुरू हुई।
सख्त पूछताछ के बाद धीरे-धीरे ये टूटने लगे।
आख़िरकार जसबीर ने स्वीकार कर लिया—
रीमा जैन की हत्या उन्होंने की
यह “कॉन्ट्रेक्ट किलिंग” थी
सौदा ₹2 लाख में तय हुआ
₹1 लाख एडवांस दिया गया था
और सबसे बड़ा नाम:
यह सब अनिल जैन उर्फ मिक्की के कहने पर किया गया।
अनिल जैन की स्वीकारोक्ति: भाभी की हत्या, फैक्ट्री में टॉर्चर और सेप्टिक टैंक में शव
16 फरवरी 2006 को पुलिस ने एक बार फिर अनिल जैन को हिरासत में लिया।
इस बार पुलिस के पास सिर्फ शक नहीं, बल्कि सहयोगियों के बयान, डील की रकम और अन्य विवरण थे।
थोड़ी सख्ती के बाद अनिल भी टूट गया।
उसने स्वीकार किया—
हां, रीमा की हत्या उसी की साजिश थी
हत्या उसकी टेक्सटाइल मिल, शेरपुर खुर्द स्थित अरनाथ टेक्सटाइल में की गई
और शव को फैक्ट्री के सेप्टिक टैंक में फेंका गया
हत्या की योजना कैसे बनी?
अनिल घर का आदमी था, उसे रीमा की दिनचर्या अच्छी तरह पता थी—
वह रोज़ सुबह बिना ड्राइवर के खुद कार चलाकर सतलुज क्लब जाती थीं
स्विमिंग के बाद लगभग 9 बजे लौट आती थीं
उस समय वे पूरी तरह अकेली होती थीं
30 जुलाई 2005 की सुबह—
जसबीर, कुलदीप और तरसेम सतलुज क्लब के बाहर पहले से मौजूद थे
रीमा ने स्विमिंग की, कपड़े बदले, सामान उठाया और अपनी कार की ओर बढ़ीं
इससे पहले कि वह कार में बैठ पातीं, तीनों ने उन्हें घेर कर दूसरी कार में बैठा लिया
कुलदीप उनकी कार खुद चलाते हुए पीछे-पीछे आया
रीमा को सीधे ले जाया गया – अनिल की टेक्सटाइल फैक्ट्री।
फैक्ट्री में टॉर्चर और इंसुलिन से मौत
सुबह का समय था, फैक्ट्री में वर्कर्स अभी नहीं पहुंचे थे।
चारों – अनिल और तीनों गुर्गे – ने मिलकर रीमा को टॉर्चर किया।
मारपीट
धमकियां
और बिजनेस व प्रॉपर्टी के कागजों पर साइन करवाए गए
इसके बाद हत्या को “नेचुरल डेथ” जैसा दिखाने की खौफनाक योजना पर अमल हुआ—
इंसुलिन के इंजेक्शन।
रीमा डायबिटिक नहीं थीं।
स्वस्थ व्यक्ति को इंसुलिन देना, खासकर अधिक मात्रा में, जानलेवा हो सकता है।
इंसुलिन ब्लड शुगर को तेजी से गिराता है।
चार शॉट दिए गए।
कुछ देर में रीमा की मौत हो गई।
अनिल की साजिश थी कि—
पोस्टमार्टम में मृत्यु का कारण “लो ब्लड शुगर” दिखे
ताकि यह नैचुरल या मेडिकल इश्यू लगे
शव का ठिकाना और कार की साजिश
वर्कर्स आने का समय नजदीक था, इसलिए शव को फैक्ट्री के स्टोरेज एरिया में अस्थायी रूप से छिपा दिया गया
कुलदीप को रीमा की कार लेकर दिल्ली एयरपोर्ट जाकर पार्क करने का निर्देश मिला, ताकि जांच भटक जाए
अगले दिन रीमा का शव फैक्ट्री के गटर/सेप्टिक टैंक में फेंक दिया गया, जो समय के साथ टैंक में धंस गया
सात महीने तक न कोई शव मिला, न कोई गंध, न कोई ठोस सुराग।
सेप्टिक टैंक से बरामद कंकाल, डीएनए रिपोर्ट और अंतिम पुष्टि
16 फरवरी 2006 को अनिल पुलिस व मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में अपनी फैक्ट्री लेकर पहुंचा।
फॉरेंसिक टीम भी साथ थी, ताकि बाद में कोई छेड़छाड़ या फेक रिकवरी की बात न उठे।
सेप्टिक टैंक के ऊपर रखे प्लाईवुड और सामान हटाए गए
कर्मचारी अंदर उतरे
नीचे से हड्डियों का लगभग पूरा कंकाल मिला
साथ ही कुछ सामान –
सफेद पेन
चप्पल
कढ़ाई वाला कपड़ा
भानु प्रताप को बुलाकर पूछताछ की गई।
कढ़ाई देखकर उसने तुरंत पहचान लिया—
“यह वही कपड़ा है, जो मां ने उस दिन पहना था।”
शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया।
हड्डियां लगभग पूरी तरह डीकंपोज थीं, फिर भी खोपड़ी पर गहरे निशान मिले, जैसे किसी भारी वस्तु से वार किया गया हो।
पहचान की अंतिम पुष्टि के लिए—
रीमा की मां और भानु प्रताप के रक्त के नमूने लिए गए
चंडीगढ़ फॉरेंसिक लैब में डीएनए टेस्ट हुआ
रिपोर्ट:
हड्डियां 100% रीमा जैन की ही थीं।
हत्या की तीन वजहें – लालच, बदला और अहंकार
अनिल जैन ने हत्या के पीछे तीन प्रमुख कारण बताए—
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बदला:
उसे यह गुस्सा था कि छोटे भाई सुनील की हत्या में उसे “झूठा फंसाया” गया और एक साल जेल में रहना पड़ा।
संपत्ति और बिजनेस पर कब्जा:
सुनील की मौत के बाद पूरा बिजनेस रीमा और बच्चों के नियंत्रण में आ गया था। अनिल परोक्ष रूप से इस पर कब्जा चाहता था।
भाभी के प्रति दुश्मनी:
उसे यह भी खटकता था कि रीमा ने अदालतों में, पुलिस में उसके खिलाफ बयान दिए, उसे समाज में बदनाम किया।
इस अंधे लालच और अहंकार ने उसे इस हद तक अंधा कर दिया कि वह अपने ही भाई की पत्नी – अपनी भाभी – की हत्या का मास्टरमाइंड बन बैठा।
अदालती फैसला: उम्रकैद, लेकिन एक गुत्थी आज भी अनसुलझी
2012 तक इस केस में 34 गवाहों के बयान दर्ज हुए।
चार प्रमुख आरोपी थे—
अनिल उर्फ मिक्की जैन
जसबीर
कुलदीप
तरसेम
3 दिसंबर 2012 को अदालत ने फैसला सुनाया—
चारों को आजीवन कारावास (उम्रकैद) की सजा।
लेकिन सबसे कड़वी सच्चाई यह है कि—
सुनील जैन की हत्या आज भी आधिकारिक रूप से अनसुलझी है।
शक की उंगली भले ही उसी दिशा में उठती हो, लेकिन क़ानूनी रूप से अदालत ने उसे उस केस में बरी कर दिया था।
सीख: कभी-कभी सबसे बड़ा खतरा घर की चारदीवारी के भीतर छिपा होता है
रीमा जैन की कहानी हमें कई कड़वे लेकिन ज़रूरी सच सिखाती है—
हर खतरा बाहर से नहीं आता,
कई बार सबसे बड़ा दुश्मन वही निकलता है, जिस पर हमने सबसे ज्यादा भरोसा किया होता है।
पैसा, प्रॉपर्टी और सत्ता का लालच,
खून के रिश्तों को भी बेरहम बना सकता है।
सच को दबाया जा सकता है,
लेकिन हमेशा के लिए मिटाया नहीं जा सकता।
न्याय भले देर से मिले, जब आता है तो हर साजिश को बेनकाब कर देता है।
यह केस चेतावनी है—
रिश्तों की आड़ में चल रही साजिशों से सावधान रहना भी ज़रूरी है, और यह समझना भी कि आर्थिक लालच जब इंसानियत से बड़ा हो जाता है, तो इंसान अपने ही घर को कत्लगाह बना देता है।
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