रहमान डकैत की असली मुठभेड़ का एक वीडियो जारी किया गया है!

पाकिस्तान के कराची शहर की गलियों में एक समय ऐसा था जब दो नाम लोगों के दिलों में डर और साहस दोनों का पर्याय बन गए थे—रहमान डकैत और चौधरी असलम। इन दोनों की कहानी हाल ही में एक फिल्म के जरिए चर्चा में आई, लेकिन पर्दे पर दिखाई गई कहानी जितनी रोमांचक थी, असल जिंदगी उससे कहीं ज्यादा खौफनाक, जटिल और दर्दनाक रही है।
यह लेख रहमान डकैत और चौधरी असलम की असली कहानी, उनके उदय, संघर्ष, और अंत के साथ-साथ कराची के समाज, राजनीति और कानून व्यवस्था पर उनके प्रभाव को विस्तार से प्रस्तुत करता है।
लियारी की पृष्ठभूमि: अपराध और राजनीति का गठजोड़
कराची का लियारी इलाका पाकिस्तान के सबसे पुराने इलाकों में से एक है। यहाँ बलोच और अफ्रीकी मूल के लोग बसते हैं। एक समय यह इलाका खेलों—खासकर फुटबॉल और बॉक्सिंग—के लिए जाना जाता था। लेकिन जैसे-जैसे फैक्ट्रियां बंद होती गईं, बेरोजगारी बढ़ी और अफगान युद्ध के बाद हथियार और ड्रग्स की बाढ़ आई, लियारी अपराध का गढ़ बन गया।
कराची पोर्ट दुनिया के लिए स्मगलिंग का रास्ता बन गया और लियारी उसका दिल। हेरोइन, अफीम, हथियार, सब कुछ यहीं से बाहर जाने लगा। बेरोजगार युवा अपराध की ओर खिंचते चले गए। छोटे-मोटे काम से शुरू होकर पूरा इलाका एक नोगो जोन बन गया। पुलिस घुसने से डरती थी, दुकानदारों से हफ्ता वसूली आम बात थी, औरतें ड्रग्स की तस्करी में इस्तेमाल होती थीं।
रहमान डकैत: गरीबी से गैंगस्टर बनने तक
इसी माहौल में 1970 के दशक में एक बच्चा पैदा हुआ—अब्दुल रहमान। गरीबी और बेरोजगारी में उसका बचपन बीता। उसने देखा कि ताकत बंदूक में है, और वही राजा है जो हथियार रखता है।
रहमान ने कबड्डी और बॉक्सिंग जैसे खेल खेले, कुछ समय इलेक्ट्रिशियन का काम भी किया, लेकिन पेट भरने के लिए ये काफी नहीं था। 80-90 के दशक में लियारी पूरी तरह गैंगस्टर कल्चर में बदल चुका था। हाजी लाला जैसे नाम इलाके में डर फैलाते थे। रहमान भी उसी गैंग से जुड़ा।
शुरू में वह छोटे-मोटे काम करता था, लेकिन उसकी खासियत थी—गरीबों की मदद करना। धीरे-धीरे उसने खुद का गैंग बना लिया। बेरोजगार युवाओं को पैसा, पावर और सुरक्षा का लालच देकर अपने साथ जोड़ लिया।
लियारी में लोग उसे अपराधी नहीं बल्कि हीरो मानते थे। उसे ‘लियारी का रॉबिनहुड’ कहा जाने लगा।
गैंग वॉर: रहमान डकैत बनाम उज्र बलोच
इसी दौरान लियारी में एक और नाम उभर रहा था—उज्र बलोच। दोनों एक ही समुदाय से थे, लेकिन दुश्मन बन चुके थे। ड्रग्स, हथियार, हफ्ता वसूली और टेंडर माफिया के कारण दोनों के बीच जंग शुरू हो गई। कराची में गोलियां चलने लगीं, दिन-दहाड़े कत्ल होने लगे।
रहमान का नेटवर्क अब सिर्फ लियारी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि दुबई, ईरान और अफगानिस्तान तक फैल गया। हथियारों की सप्लाई, ड्रग्स की खेप सब उसके कंट्रोल में थी।
राजनीति का खेल: अपराध से सियासत तक
जब कोई गैंगस्टर इतना बड़ा हो जाता है, तो राजनीति खुद उसके दरवाजे आती है। रहमान डकैत के पास बंदूकें थीं, आदमी थे, डर था और सबसे बड़ी बात—लोग उसे मानते थे।
पीपीपी (पाकिस्तान पीपल्स पार्टी) के कई लोकल नेता उसके संपर्क में आए। चुनाव के वक्त पोस्टर लगाने से लेकर विरोधियों को दबाने तक रहमान की गैंग एक्टिव रहती थी। पुलिस का दबाव कम रहता था, केस ठंडे बस्ते में चले जाते थे, और उसका नेटवर्क फैलता चला गया।
लियारी अब अपराध का अड्डा नहीं, बल्कि वोट बैंक बन चुका था। रहमान उस वोट बैंक का राजा बन गया।
बेनजीर भुट्टो की वापसी और रहमान की ताकत
2007 में बेनजीर भुट्टो निर्वासन से लौटीं। उनके काफिले पर आत्मघाती हमला हुआ, सैकड़ों लोग मारे गए लेकिन बेनजीर बच गईं। इस हमले के बाद सहानुभूति की लहर दौड़ गई और इसका सबसे ज्यादा असर सिंध और कराची में दिखा।
रहमान खुलकर पीपीपी के समर्थन में आ गया। उसकी गैंग ने लियारी को पूरी तरह पीपीपी का गढ़ बना दिया। विरोध करने वालों को डराया गया, हिंसा हुई, लेकिन कोई खुलकर बोलने को तैयार नहीं था।
बेनजीर के निधन के बाद पार्टी की कमान आसिफ अली ज़रदारी के हाथ में आ गई। अब रहमान डकैत पार्टी के लिए बोझ बनने लगा, क्योंकि उसकी ताकत बहुत बढ़ चुकी थी।
रहमान डकैत: इंटरनेशनल ड्रग लॉर्ड
खुफिया एजेंसियों की नजर रहमान पर और गहरी हो गई। रिपोर्ट आई कि रहमान इंटरनेशनल ड्रग ट्रैफिकिंग का बड़ा नाम बन चुका है। उसके कनेक्शन ईरान, दुबई और अफगानिस्तान तक फैले हुए थे। सबसे खतरनाक बात यह थी कि उसके नेटवर्क की कुछ कड़ियां बलूचिस्तान से जुड़ती थीं, जो पाकिस्तान के लिए नेशनल सिक्योरिटी का मामला बनता है।
आईएसआई और फेडरल एजेंसियों ने रहमान को कंट्रोल से बाहर मानना शुरू कर दिया। लेकिन उसके पीछे राजनीतिक लोग थे, इसलिए सीधे हाथ डालना आसान नहीं था।
अंतिम टकराव: चौधरी असलम का उदय
कराची पुलिस में एक नाम तेजी से उभर रहा था—चौधरी असलम। उसे अंडरवर्ल्ड में ‘डॉन किलर’ कहा जाता था। उसका स्टाइल अलग था, मीडिया से दूरी रखता था, लेकिन जब उसका नाम किसी केस में आता था तो मैसेज साफ होता था कि अब मामला लंबा नहीं चलेगा।
असलम को अच्छे से पता था कि रहमान डकैत को गिरफ्तार करना सिर्फ कागजों पर आसान है, हकीकत में यह एक छोटे युद्ध जैसा है। लियारी के हर रास्ते पर रहमान के लोग थे। इसलिए असलम ने सीधे टकराव की बजाय इंतजार का रास्ता चुना। महीनों तक रहमान की मूवमेंट पर नजर रखी गई।
रहमान डकैत का एनकाउंटर
2009 की गर्मियों में एक फैसला लिया गया—रहमान डकैत को हटाना है। 9 अगस्त, 2009 की रात कराची में पुलिस और खुफिया तंत्र के अंदर हलचल थी। चौधरी असलम को इनपुट मिला कि रहमान अपने कुछ भरोसेमंद लोगों के साथ मूवमेंट में है।
पुलिस की कहानी कहती है कि रहमान की गाड़ी को रोका गया, जवाब में फायरिंग हुई और मुठभेड़ के दौरान वह मारा गया। पुलिस के मुताबिक यह पूरी तरह आत्मरक्षा में की गई कार्रवाई थी।
लेकिन दूसरी ओर परिवार, समर्थकों और कई रिपोर्ट्स का दावा है कि रहमान को पहले ही कस्टडी में लिया गया था और बाद में उसे एनकाउंटर का रूप दिया गया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गोलियों के निशान ऐसे थे, जो लंबी दूरी की मुठभेड़ में नहीं होते।
रहमान के साथ उसके तीन करीबी लोग—औरंगजेब, नज़र और अकील भी मारे गए।
मौत के बाद का माहौल
रहमान की मौत के बाद कराची का माहौल पूरी तरह बदल गया। अस्पताल के बाहर सैकड़ों लोग जमा हो गए। कुछ रो रहे थे, कुछ गुस्से में थे, कुछ चुपचाप खड़े थे।
कुछ लोगों के लिए रहमान मददगार था, गरीबों की मदद करता था, बच्चों का ख्याल रखता था। लेकिन ऐसे भी लोग थे जिनके परिवार गैंग वॉर में मारे गए थे—उनके लिए रहमान डर का दूसरा नाम था।
रहमान की तदफीन के दिन लियारी के कई इलाकों में दुकानें बंद रहीं। पुलिस और रेंजर्स की भारी तैनाती की गई। सरकार पहले ही रहमान की गिरफ्तारी पर ₹50 लाख का इनाम रख चुकी थी।
सिस्टम का सच और सवाल
रहमान के मरने के बाद उसकी पत्नी ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और जांच की मांग की। मामला कोर्ट तक पहुंचा, एफआईआर दर्ज हुई, लेकिन सच फाइलों में दबता चला गया।
हिंसा अपने साथ बदले की आग लेकर चलती है। रहमान डकैत के जाने के बाद चौधरी असलम को लगातार धमकियां मिलने लगीं। 2014 में कराची में हुए एक सुसाइड बम हमले में चौधरी असलम मारा गया।
आधिकारिक तौर पर इसकी जिम्मेदारी तालिबान ने ली, लेकिन कराची की गलियों में लोग कहते हैं कि यह उसी कहानी का आखिरी चैप्टर था जो रहमान की मौत से शुरू हुई थी।
अपराध, कानून और समाज की धुंधली रेखा
इस पूरी कहानी में कोई भी पूरी तरह सही या गलत नहीं ठहराया जा सकता। यह कहानी अपराध और कानून के बीच की उस धुंधली रेखा की है, जहां फर्क करना मुश्किल हो जाता है कि कौन किसके लिए लड़ रहा है।
रहमान डकैत अपराधी था, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन जिस सिस्टम ने उसे पनपने दिया, उसी सिस्टम ने उसे खत्म भी किया। चौधरी असलम कानून का चेहरा था, लेकिन उसकी मौत ने यह भी दिखा दिया कि हिंसा चाहे किसी भी तरफ से आए, अंत में सबको निगल जाती है।
यह कहानी आज भी लोगों को बेचैन करती है, क्योंकि यह सिर्फ दो लोगों की नहीं, बल्कि उस समाज की कहानी है, जहां बंदूक कानून से तेज चलती है।
निष्कर्ष
रहमान डकैत और चौधरी असलम की कहानी कराची के समाज, राजनीति और कानून व्यवस्था का आईना है। यह कहानी बताती है कि जब सिस्टम कमजोर पड़ता है, तो अपराधी ताकतवर बन जाता है। लेकिन आखिर में सिस्टम ही उसे खत्म करता है।
यह कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या एक आदमी के मरने से सिस्टम बदल सकता है? या फिर यह सिर्फ एक और अध्याय है उस अंतहीन संघर्ष का, जिसमें आम आदमी हमेशा कुचला जाता है।
तो दोस्तों, यह थी रहमान डकैत और चौधरी असलम की असली कहानी। यह कहानी सिर्फ पाकिस्तान की नहीं, बल्कि हर उस समाज की है, जहां कानून और अपराध की लड़ाई जारी है।
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