रिश्तों की कीमत: एक दिल छू लेने वाली कहानी
प्रस्तावना
दोस्तों, कहते हैं कि जब इंसान अपनी मेहनत, जवानी, और उम्मीदें किसी एक सपने को पूरा करने में लगा देता है, तो उस सपने से उसे सबसे ज्यादा उम्मीद भी रहती है। और अगर वही सपना उसे धोखा दे दे, तो उसका दिल सिर्फ टूटता नहीं, बल्कि उसकी पूरी आत्मा कराह उठती है। आज मैं आपको ऐसी ही एक कहानी सुनाने जा रहा हूं—एक बेटे और उसके मां-बाप की कहानी।
रघुनाथ जी और सावित्री देवी
उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के एक छोटे कस्बे में रघुनाथ जी और उनकी पत्नी सावित्री देवी रहते थे। उनका घर पुराना था, लेकिन उस घर में एक खजाना था—ममता, स्नेह और अपने बेटे के लिए अनगिनत सपने। रघुनाथ जी एक छोटी नौकरी करते थे और सावित्री देवी घर संभालती थीं। उनका बस एक ही सपना था: उनका इकलौता बेटा संदीप बड़ा आदमी बने।
संदीप की सफलता
समय बीता और संदीप पढ़ाई में अच्छा निकला। रघुनाथ जी अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा उसकी किताबों और कोचिंग पर खर्च कर देते। आखिरकार वह दिन आया जब संदीप की नौकरी लग गई। पूरा मोहल्ला खुशी से झूम उठा। रघुनाथ जी और सावित्री देवी ने सोचा कि अब उनका बेटा उन्हें गरीबी से निकाल लेगा।
बदलाव का आगाज़
लेकिन जैसे-जैसे संदीप की तरक्की हुई, उसने अपने मां-बाप को बोझ समझने लगा। उसकी मुलाकात नेहा से हुई, जो आधुनिक और महत्वाकांक्षी थी। नेहा ने संदीप को कहा, “तुम्हारे माता-पिता गांव में ठीक हैं। हमें अपने करियर और दोस्तों पर ध्यान देना चाहिए।” धीरे-धीरे संदीप ने अपने मां-बाप से दूरी बना ली।
रिश्तों का टूटना
एक दिन नेहा ने संदीप से साफ शब्दों में कहा, “या तो तुम्हारे मां-बाप इस घर में रहेंगे या मैं। चुन लो।” संदीप ने बिना कोई और शब्द कहे, अपने मां-बाप को बुलाया और कहा, “अब आप गावी लौट जाइए। यह शहर आपके लिए नहीं है।”
सावित्री देवी का दिल दहल गया। उन्होंने कांपती आवाज में कहा, “बेटा, हमने तेरे लिए अपनी जवानी गवा दी। आज हम तेरे लिए बोझ बन गए।” रघुनाथ जी ने कहा, “अगर तुझे लगता है कि हम बोझ हैं, तो हम नहीं चाहेंगे कि तेरी जिंदगी में हमारी वजह से परेशानी आए।”
नई शुरुआत
रघुनाथ जी और सावित्री देवी ने शहर में एक टूटे-फूटे कमरे में किराए पर रहने का फैसला किया। उन्होंने सड़क किनारे चाय और पकड़ी बेचने का ठेला लगाया। धीरे-धीरे उनकी मेहनत रंग लाई और उनकी चाय और पकड़ी मशहूर होने लगी।
संदीप की वापसी
एक दिन, संदीप अपनी पत्नी नेहा और बच्चों के साथ चमचमाती कार में आया। बच्चे सड़क किनारे ठेले से आती पकड़ी की खुशबू सूंघते हुए दौड़ पड़े। नेहा ने बच्चों को रोका, लेकिन संदीप का दिल धड़क उठा। उसने अपने मां-बाप को देखा और उसे अहसास हुआ कि उसने क्या खो दिया है।
आत्मा की पुकार
संदीप ने अपने मां-बाप के चरणों में गिरकर कहा, “मां, पापा, मुझे माफ कर दो। मैंने आपको बोझ समझा।” उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे। रघुनाथ जी ने कहा, “बेटा, वक्त कभी पीछे नहीं लौटता। लेकिन दिल अगर बदल जाए तो हर पल नई शुरुआत हो सकती है।”
निष्कर्ष
इस कहानी ने हमें यह सिखाया कि मां-बाप भगवान का सबसे अनमोल तोहफा होते हैं। उनकी दुआएं सबसे बड़ी दौलत होती हैं। अगर हम उन्हें खो देंगे, तो सारी दुनिया जीत कर भी खाली रह जाएंगे।
सवाल आपके लिए
अगर कभी आपके सामने भी ऐसी परिस्थिति आ जाए कि आपको मां-बाप और अपने अहंकार या महत्वाकांक्षा में से किसी एक को चुनना हो, तो आप किसे चुनेंगे? अपनी दिल की बात हमें कमेंट में जरूर बताइए।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ हो, तो इसे लाइक करें और हमारे चैनल “स्टोरी बाय बीके” को सब्सक्राइब करें। मिलते हैं अगली कहानी में। तब तक रिश्तों की कीमत समझें और अपनों को खुश रखें।
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