लखनऊ में सनसनी: तीन रातों से जाम नाला—सफाई के दौरान सूटकेस में मिला शव!

बारिश का मौसम लखनऊ की पुरानी बस्तियों में हमेशा नमी, कीचड़ और हल्की बदबू लेकर आता है। लोग इसे रोजमर्रा की चीज मानकर स्वीकार कर लेते हैं। लेकिन जुलाई 2022 की शुरुआत में एक गली में तीन रातों तक जो हुआ, उसने सबको भीतर तक हिला दिया। यह सिर्फ गंदगी और मौसम की कहानी नहीं थी, बल्कि एक ऐसे सच की, जो बहुत देर तक दबा रहा और जब बाहर आया, तो सबका भरोसा तोड़ गया।

पहली रात: अनदेखी बदबू

पहली रात जब नालियों से अजीब सी दुर्गंध उठी, किसी ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। लोग खिड़कियां बंद करके, अगरबत्ती जलाकर सोने की कोशिश करते रहे। बुजुर्गों ने सोचा, यह भी बारिश के साथ चला जाएगा। लेकिन दूसरी रात हालात बदले नहीं। बदबू और तेज हो गई। नालियों का पानी ऊपर तक भर आया था और गली में चलते समय जूतों के नीचे से अजीब सी आवाजें आने लगी थी। बच्चों ने खाना खाने से मना कर दिया। एक बुजुर्ग महिला बेचैनी से तुलसी के सामने बैठी रही। उसे समझ नहीं आ रहा था कि दिल में ये डर क्यों घर कर रहा है।

तीसरी रात: डर की शुरुआत

तीसरी रात सब्र जवाब देने लगा। बदबू अब सिर्फ नालियों तक सीमित नहीं थी, वह दीवारों से टकराकर कमरों में फैल चुकी थी। मच्छर और मक्खियां रात के अंधेरे में भी दीवारों पर जमा थी। नींद बार-बार टूट रही थी। करवटें बदलते लोग सोच रहे थे – क्या यह सच में सिर्फ गंदगी है या कुछ और?

गली की खासियत थी कि वहां सभी लोग एक-दूसरे को वर्षों से जानते थे। किसी के घर में अजीब बात होती तो खबर फैलने में देर नहीं लगती। फिर भी उसी गली के कोने में बना छोटा सा मकान इन तीन रातों में पूरी तरह खामोश रहा। वहां रोशनी नहीं जली, दरवाजा नहीं खुला। उस घर में रहने वाला राकेश वर्मा वैसे भी कम बोलने वाला आदमी था। उसकी पत्नी सुनीता वर्मा अक्सर पड़ोस की महिलाओं से बात करती, लेकिन इन दिनों किसी ने उसे देखा नहीं था।

शुरू में किसी ने ध्यान नहीं दिया। शादीशुदा औरतें कई बार मायके चली जाती हैं, यह सोचकर सबने मन को समझा लिया। लेकिन जब तीसरी रात बदबू के साथ-साथ यह ख्याल भी आया कि सुनीता कई दिनों से दिखाई नहीं दी, तब लोगों के दिल में एक अनजाना डर घर करने लगा।

सुबह की हलचल: नाली का राज

रात के सन्नाटे में कुछ लोग बाहर निकले। नाली के पास खड़े होकर नीचे झांका। अंधेरे और गंदगी के सिवा कुछ दिखाई नहीं दिया। लेकिन पानी का बहाव रुका हुआ था। जैसे किसी ने रास्ता बंद कर दिया हो। मोहल्ले के एक बुजुर्ग ने कहा, “नाली में कुछ फंसा है।” सवाल हवा में लटका रह गया।

तीसरी रात के आखिर में जब नींद लगभग नामुमकिन हो गई, लोगों ने तय किया कि सुबह होते ही नगर निगम को खबर दी जाएगी। यह अब सिर्फ असुविधा नहीं थी, बल्कि डर था। कोई नहीं जानता था कि अगली सुबह क्या सामने आएगा।

सच का सामने आना: सूटकेस में छुपा सच

सुबह जब आई तो गली में हलचल शुरू हो गई। नगर निगम को सूचना दे दी गई थी, लेकिन उनके आने में समय लगना तय था। तब तक लोग खुद ही अंदाजा लगाने की कोशिश कर रहे थे कि आखिर नाली में ऐसा क्या फंस गया है। सफाई कर्मचारी पहुंचे। उन्होंने लोहे की रड नाली में डाली और जोर लगाया। रोड किसी सख्त चीज से टकराई। धीरे-धीरे एक चीज ऊपर आई – एक पुरानी घिसी हुई सूटकेस।

सूटकेस भारी था। सफाई कर्मचारियों ने उसे सड़क के किनारे रखा। उससे टपकता गंदा पानी नाली में गिर रहा था और बदबू अब असहनीय हो चुकी थी। पुलिस को बुलाया गया। पुलिस ने गली को खाली करवाया। जब सूटकेस खोला गया तो वहां खड़े कई लोगों ने अपनी आंखें बंद कर ली। अंदर एक औरत का शरीर था – बुरी तरह सड़ा हुआ, पहचान में मुश्किल, लेकिन इंसानी होने में कोई शक नहीं।

गली में फुसफुसाहटें शुरू हो गई। यह औरत कौन थी? वहां कैसे पहुंची? सबसे बड़ा सवाल – यह सब किसने किया? धीरे-धीरे बातें जुड़ने लगीं। किसी को याद आया कि सुनीता कई दिनों से दिखाई नहीं दी थी। लोग एक दूसरे का चेहरा देखने लगे। मन ही मन सब समझने लगे थे कि जो सूटकेस से निकला है, वह शायद सुनीता का शरीर है।

पुलिस जांच: शक की दिशा

पुलिस ने सवाल-जवाब शुरू किए। किसने आखिरी बार सुनीता को देखा था? क्या किसी ने कुछ अजीब सुना या देखा? जवाब अधूरे थे। लेकिन एक बात साफ थी – इस गली में कुछ दिनों से कुछ गलत चल रहा था और किसी ने उसे समय पर समझने की कोशिश नहीं की।

पुलिस ने आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की जांच शुरू की। रात के समय एक आदमी दिखा, जिसके हाथ में बड़ा सा सूटकेस था। उसकी चाल, उसका झुका हुआ कंधा और सावधानी – यह सब किसी आम इंसान जैसा नहीं लग रहा था। पहचान की गई – वह राकेश वर्मा था। वही आदमी जिसकी पत्नी गायब थी, वही जिसके घर की बत्तियां रातों से बंद थी। अब उसकी खामोशी एक नए अर्थ के साथ सामने खड़ी थी।

अपराध की रात: रिश्तों की दरार

राकेश को थाने बुलाया गया। वह बिना विरोध के आया। उसकी आंखों में अजीब सी बेचैनी थी। पुलिस ने साधारण सवाल पूछे – आपकी पत्नी कहां है? आखिरी बार कब देखा? राकेश के जवाब सीधे नहीं थे। कभी कहता – मायके गई है, कभी कहता – याद नहीं। उसकी कहानी बिखरी हुई थी।

पुलिस ने उसके घर की तलाशी ली। घर के भीतर एक अजीब सी ठंडक थी। अलमारी में सुनीता के कपड़े थे, लेकिन सलीका कहीं गुम था। पड़ोसियों से पूछताछ हुई – किसी ने कहा, रात को झगड़े की आवाज आती थी। किसी ने कहा, सुनीता बहुत चुप हो गई थी। राकेश पहले जैसा नहीं रहा था, जैसे भीतर ही भीतर टूट रहा हो।

रात को लॉकअप में बैठा राकेश सब याद कर रहा था। सुनीता हमेशा ऐसी नहीं थी। शादी के शुरुआती सालों में वह हंसती थी, बात करती थी। लेकिन समय के साथ सब कुछ बदल गया। राकेश की नौकरी में तनाव, पैसों की कमी, बातें कम, कटुता ज्यादा। सुनीता ने चुप रहना सीख लिया। लेकिन चुप्पी भी एक बोझ होती है। हर अनकहा शब्द भीतर जमा होता गया।

आखिरी रात बारिश थी। घर में अंधेरा था। दोनों के बीच बहस शुरू हुई। सुनीता ने पहली बार ऊंची आवाज में कुछ कहा। राकेश को वही आवाज चुभ गई। उसके भीतर जमा गुस्सा अचानक बाहर आ गया। शब्द हाथ बन गए और हाथ अपराध। सब कुछ पलों में हुआ। जब होश आया, सुनीता जमीन पर पड़ी थी। हिल नहीं रही थी। राकेश ने दरवाजा, खिड़कियां बंद की। डर ने उसके शरीर को जकड़ लिया। उसने सब कुछ छुपा देना ही रास्ता माना। पुराना सूटकेस निकाला, सुनीता के शरीर को उसमें रखा, और नाली में धकेल दिया।

कबूलनामा: सच की स्वीकारोक्ति

पुलिस ने सुबह होते ही दोबारा पूछताछ शुरू की। इस बार उसके पास कहने को कुछ नहीं था। झूठ अब बहुत भारी हो चुका था। जब अफसर ने शांत आवाज में पूछा – “सच बताओ राकेश,” तो वह टूट गया। उसने सब कुछ स्वीकार कर लिया। उसकी आवाज में कोई गुस्सा नहीं था, सिर्फ थकान थी। जैसे वर्षों से बोझ ढो रहा हो और अब उतार देने की इजाजत मिल गई हो।

जब उसका बयान लिखा जा रहा था, बाहर गली में लोग इकट्ठा हो रहे थे। खबर फैल चुकी थी। कुछ लोग रो रहे थे, कुछ स्तब्ध थे। कोई समझ नहीं पा रहा था कि जो आदमी रोज उनके बीच रहता था, वह इतना बड़ा सच छुपाए हुए था।

सुनीता की कहानी: समाज की चुप्पी

राकेश की स्वीकारोक्ति के बाद जैसे पूरा मोहल्ला एक अजीब सी चुप्पी में डूब गया। पुलिस की गाड़ियां आकर चली गई। लोग धीरे-धीरे अपने घरों में लौट आए। लेकिन किसी के भी मन में पहले जैसी शांति नहीं थी। यह सिर्फ एक हत्या की खबर नहीं थी। यह उस भरोसे का टूटना था जो बरसों से एक दूसरे के साथ रहने से अपने आप बन जाता है।

सुनीता का नाम अब हर किसी की जुबान पर था। वही सुनीता जिसे लोग रोजमर्रा की जिंदगी में अक्सर नजरअंदाज कर देते थे। कोई याद करने लगा कि वह कितनी चुपचाप सबकी बात सुन लेती थी। कोई बोला – उसने कभी किसी से ऊंची आवाज में बात नहीं की। कुछ औरतों ने उसकी आंखों में थकान देखी थी, लेकिन कभी पूछा नहीं। अब सब सोच रहे थे – अगर पूछा होता तो क्या कुछ बदल सकता था?

बदलाव की शुरुआत: सीख और जिम्मेदारी

सुनीता का अंतिम संस्कार सादगी से हुआ। कोई बड़ा शोर नहीं, कोई लंबा भाषण नहीं। बारिश के बाद की गीली जमीन पर लोग खामोशी से खड़े रहे। हर किसी के मन में अपराध बोध था। जैसे वे सब किसी ना किसी तरह से इस कहानी का हिस्सा हो।

उस दिन के बाद गली की दिनचर्या बदल गई। पहले जहां शाम को लोग बाहर बैठकर बातें करते थे, अब दरवाजे जल्दी बंद होने लगे। बच्चे जो पहले बेफिक्र होकर खेलते थे, अब मां-बाप की निगरानी में रहने लगे। हर छोटी आवाज पर लोग चौकन्ने हो जाते। यह डर किसी एक इंसान का नहीं था। यह उस एहसास का था कि बुराई कहीं बाहर से नहीं आती, वह हमारे बीच ही पल सकती है।

मोहल्ले की बुजुर्ग महिलाएं अब अक्सर एक-दूसरे के घर जाने लगी। वे देर तक बैठती, बातें करती, छोटी-छोटी शिकायतें जो पहले मन में दबा ली जाती थी, अब बाहर आने लगी। शायद सुनीता की कहानी ने उन्हें यह एहसास दिला दिया था कि चुप रहना हमेशा समझदारी नहीं होती।

अदालत का फैसला और समाज का सबक

अदालत की तारीखें तय हो रही थी। लेकिन कानून की भाषा गली के लोगों के दिलों तक नहीं पहुंच पा रही थी। उनके लिए यह सब कागजों का मामला नहीं था। यह रोजमर्रा की जिंदगी में उतरी एक स्थाई उदासी थी। राकेश को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। अदालत में पेशी के दिन कुछ लोग दूर से देखने गए, लेकिन किसी ने आंख मिलाने की हिम्मत नहीं की। वह आदमी जिसे वे वर्षों से देखते आए थे, अब एक अपराधी के रूप में उनके सामने था।

अदालत की सुनवाई में जब अभियोजन पक्ष ने घटनाओं का क्रम पढ़ा तो गली के कुछ लोग भी वहां थे। शब्द औपचारिक थे – तारीख, समय, साक्ष्य – लेकिन हर शब्द के पीछे एक जीवन था। सुनीता का जीवन और राकेश का पतन।

फैसला आया – राकेश को सजा मिली। लेकिन राहत किसी को नहीं थी। मां ने बस इतना कहा – “अब वह वापस तो नहीं आएगी।” यह वाक्य में कोई आरोप नहीं था, सिर्फ थकान थी।

कहानी का असर: सुनना, समझना, बदलना

गली में एक छोटी सी बैठक हुई। लोगों ने तय किया कि अगर किसी घर में ज्यादा झगड़े की आवाज आएगी तो वे अनदेखा नहीं करेंगे। यह कोई कानूनी नियम नहीं था, यह इंसानी था। एक बुजुर्ग ने कहा – “हम पुलिस नहीं हैं, लेकिन हम पड़ोसी हैं।”

रात को जब सब अपने घरों में लौटे, कई लोगों ने दरवाजे बंद करने से पहले भीतर झांका। पति-पत्नी एक दूसरे से कुछ ज्यादा देर बात करते रहे। कोई यह नहीं कह रहा था कि सब ठीक हो गया है, बस यह कि कोशिश की जा रही है।

सुनीता की कहानी अब किसी डर की तरह नहीं बल्कि एक चेतावनी की तरह गली में मौजूद थी। उसकी कहानी ने लोगों को यह सिखाया कि हिंसा अचानक नहीं आती। वह धीरे-धीरे चुपचाप रोज के व्यवहार में घुसती है और अगर समय रहते उसे पहचाना ना जाए तो वह सब कुछ तोड़ देती है।

अंत: कहानी का सबक

समय बीत गया। गली में नया पौधा लगाया गया – सुनीता की याद में। बच्चे उसे पानी देते, शायद उन्हें पूरी कहानी नहीं पता थी, लेकिन वे जानने लगे थे कि इस पौधे का ध्यान रखना जरूरी है। त्यौहार आए, शादियां हुई, जनाजे भी। जिंदगी ने अपना संतुलन फिर से बना लिया। लेकिन अब एक अतिरिक्त सावधानी थी। लोग पहले से ज्यादा सुनते थे, पहले से ज्यादा रुकते थे।

हरिशंकर मिश्रा, गली के बुजुर्ग, अब बहुत कम बाहर आते थे। लेकिन जब भी कोई उनसे पूछता – “क्या हमने कुछ सीखा?” वह हल्की सी मुस्कान के साथ कहते – “सीखना रोज का काम है।”

यह कहानी हमें यह नहीं सिखाती कि कौन सही था और कौन गलत। यह हमें यह सिखाती है कि चुप्पी कितनी खतरनाक हो सकती है अगर उसे समय पर ना सुना जाए। यह हमें यह भी सिखाती है कि गुस्सा दुश्मन नहीं है, लेकिन अगर उसे पहचाना ना जाए तो वह सब कुछ नष्ट कर सकता है।

सबसे जरूरी बात यह है – अगर आपके आसपास कोई चुप है, तो क्या आप सुनेंगे? अगर आप खुद टूट रहे हैं, तो क्या आप बोलेंगे? क्योंकि हर कहानी अखबार में नहीं आती। बहुत सी कहानियां घरों के भीतर ही दब जाती हैं। जब तक बहुत देर ना हो जाए।

अगर इस कहानी ने आपको थोड़ी देर के लिए भी सोचने पर मजबूर किया है तो यह कहानी अपना काम कर चुकी है।