शीर्षक: “भरोसे की वापसी”

सुबह की हल्की बारिश थी। गली की टूटी सड़कें पानी से भरी थीं, जैसे आसमान भी किसी दर्द को बहा रहा हो। उस छोटे से कमरे में एक पुराना पंखा घिसट-घिसट कर घूम रहा था, और कोने में रखी चाय की केतली से भाप उठ रही थी। कमरे के बीचोंबीच एक औरत धीरे-धीरे झुककर अपनी चप्पल पहन रही थी। पेट पर हाथ रखा था — आठ महीने की गर्भवती। वह थी संगीता, उम्र मात्र अट्ठाईस साल, पर ज़िंदगी ने उसके चेहरे पर सालों की थकान की लकीरें छोड़ दी थीं।
उसने दुपट्टा ओढ़ा, बायोडाटा पुराने बैग में रखा और दरवाज़ा बंद किया। जाते-जाते नज़र दीवार पर लगे एक पुराने फ़ोटो फ्रेम पर ठहर गई — उसमें वह और उसका पति राकेश मुस्कुरा रहे थे। कभी वही मुस्कान उसकी दुनिया थी, लेकिन अब वो दुनिया टूट चुकी थी।
तीन साल पहले की बात है। राकेश और संगीता की मुलाक़ात एक मार्केटिंग कंपनी में हुई थी। राकेश सीनियर था, और संगीता नई जॉइनिंग। कॉफी, प्रोजेक्ट्स और फिर प्यार — सब तेज़ी से हुआ। शादी के बाद कुछ समय तक सब ठीक रहा, पर जब राकेश का बिज़नेस डूबा, तो वही रिश्ता जो प्रेम पर टिका था, पैसों की कमी से डगमगा गया। छोटी-छोटी बातों पर झगड़े शुरू हुए, और एक रात राकेश ने कहा, “तुम मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी गलती हो।”
उस रात संगीता बिना कुछ कहे मायके चली गई। कुछ महीनों में तलाक हो गया। कोर्ट में दस्तखत करते हुए उसने आँसू नहीं बहाए — शायद अब आँसू सूख चुके थे।
आज वही संगीता, जो कभी किसी की पत्नी थी, अब अकेली माँ बनने जा रही थी। कोई सहारा नहीं, बस पेट में पलता बच्चा और एक ज़िद — “मैं अपने बच्चे को किसी की मोहताज नहीं बनाऊँगी।”
वो बारिश में नौकरी की तलाश में निकली। बेकरी गई — मालिक ने हँसते हुए कहा, “मैडम, आपसे केक उठेगा नहीं।” सिलाई के कारखाने में बोला गया, “जब बच्चा होगा, छुट्टी लोगी, हमें ऐसे लोग नहीं चाहिए।” तीसरी जगह किराने की दुकान थी — “घर जाओ, बेटा संभालो।” हर जगह दरवाज़े बंद। भीगती, थकती, वह बस स्टैंड पर बैठ गई। पेट पर हाथ रखकर बोली, “बेटा, मम्मी हार नहीं मानेगी।”
उसी वक्त बगल में बैठी एक बुज़ुर्ग महिला ने पूछा, “बिटिया, इतनी बारिश में कहाँ जा रही हो?”
संगीता बोली, “काम ढूंढ रही हूँ, अम्मा।”
अम्मा ने उसे एक काग़ज़ दिया — “यहाँ जाओ, बड़ी कंपनी है। मालिक सख़्त है, पर दिल छू जाए तो काम दे देता है।”
अगले दिन वह कंपनी के गेट के सामने खड़ी थी। दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। रिसेप्शनिस्ट ने शक से देखा, “मैडम, हमारे बॉस बहुत सख़्त हैं।” फिर भी उसे बुला लिया गया।
केबिन का दरवाज़ा खुला, और उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई — सामने राकेश था।
तीन साल बाद, वही चेहरा, वही आँखें, लेकिन अब भाव बदल चुके थे।
राकेश ने ठंडे स्वर में कहा, “तुम? इस हालत में नौकरी?”
संगीता ने सीधा जवाब दिया, “हाँ, मुझे काम चाहिए। अपने बच्चे को मैं मोहताज नहीं बनने दूँगी।”
राकेश बोला, “हमारी कंपनी में फिट रहना ज़रूरी है।”
संगीता ने कहा, “और इज़्ज़त देने के लिए क्या फिट होना पड़ता है?”
कुछ पल की खामोशी के बाद राकेश बोला, “एक हफ्ते का ट्रायल दूँगा।”
संगीता ने सिर उठाकर कहा, “मुझे ट्रायल की नहीं, मौके की ज़रूरत है।”
ऑफिस से निकलते हुए उसकी चाल में थकान नहीं, दृढ़ता थी।
अगले दिन से उसने काम शुरू किया। पूरे ऑफिस में फुसफुसाहट थी — “अरे, ये प्रेग्नेंट है… ये काम कैसे करेगी?”
एचआर ने फाइलों का ढेर सामने रख दिया। पीठ दर्द से कराह उठी, लेकिन उसने शिकायत नहीं की। दोपहर में पानी पीने गई तो एक लड़की बोली, “दीदी, घर पर आराम नहीं मिला क्या?”
संगीता मुस्कुराई, “आराम तो ज़िंदगी के बाद भी मिलेगा, अभी तो इज़्ज़त कमानी है।”
शाम को राकेश आया। “लगता है तुमने मेहनत की है।”
संगीता ने कहा, “मेहनत तो करनी ही होगी, ताकि मेरा बच्चा कह सके कि उसकी माँ हार नहीं मानी।”
राकेश कुछ पल चुप रहा। क्लाइंट मीटिंग में जब उसका काम देखा गया, तो सबने कहा, “इम्प्रेसिव वर्क।”
राकेश ने स्वीकार किया — “यह संगीता का काम है।”
कमरे में हल्की तालियाँ बजीं। संगीता की आँखें भर आईं — यह उसकी पहली जीत थी।
पर असली परीक्षा बाकी थी। अगले दिन उसे आउटडोर साइट विज़िट का काम दिया गया। धूप, बारिश, घंटों खड़े रहना — सब जानबूझकर राकेश की परीक्षा थी।
संगीता ने बस एक बात कही — “ठीक है।”
वह पूरे दिन भागती रही। पसीना, दर्द, थकान, पर हार नहीं। एक वर्कर बोला, “मैडम बैठ जाइए।”
उसने मुस्कुराकर कहा, “अगर मैं बैठ गई, तो मेरे बच्चे को कौन बताएगा कि उसकी माँ ने हार मानी थी?”
शाम को जब सब सेटअप परफेक्ट था, क्लाइंट ने राकेश से कहा, “इवेंट शानदार है, किसने मैनेज किया?”
राकेश ने कहा, “हमारी टीम की नई मेंबर — संगीता।”
तालियों की गूंज में राकेश की आँखों में पहली बार गर्व था।
दिन गुजरते गए। एक मीटिंग में जब किसी ने प्रेजेंटेशन देने से मना किया, संगीता आगे बढ़ी।
“मैं दूँगी,” उसने कहा।
क्लाइंट मुश्किल था, लेकिन उसने अपनी कहानी को तर्कों में पिरो दिया। मीटिंग के अंत में क्लाइंट ने कहा, “आपने हमें सिर्फ़ प्रोजेक्ट नहीं, विज़न दिया है।”
डील साइन हुई। राकेश ने सबके सामने कहा, “थैंक यू, संगीता।”
और उसने जवाब दिया, “यह कंपनी की जीत है, मेरी नहीं।”
रात में जब वह घर जा रही थी, बारिश फिर शुरू हुई। राकेश ने कहा, “बैठ जाओ, छोड़ देता हूँ।”
वह बोली, “मैं खुद जा सकती हूँ। अब मैं किसी पर बोझ नहीं।”
गाड़ी में सन्नाटा था, लेकिन दोनों के मन में शब्दों का तूफान।
कुछ हफ्तों बाद कंपनी में सबसे बड़ा कॉन्ट्रैक्ट कैंसिल हो गया। नुकसान करोड़ों का था। राकेश जानता था, केवल संगीता ही इसे संभाल सकती है। वह उसके घर पहुँचा।
“मुझे तुम्हारी मदद चाहिए।”
संगीता बोली, “अगर मैं ना कह दूँ?”
“तो मान लूँगा कि तुम मेरी कर्मचारी हो, कभी कुछ और नहीं थीं।”
संगीता ने लंबी साँस ली, “मैं यह काम कंपनी के लिए करूँगी, तुम्हारे लिए नहीं।”
दोनों ने साथ मिलकर प्रस्तुति तैयार की। मीटिंग में संगीता ने अपनी पर्सनल कहानी बताई — संघर्ष, आत्मनिर्भरता, मातृत्व। क्लाइंट की आँखें भर आईं। कॉन्ट्रैक्ट फिर साइन हुआ।
राकेश ने सबके सामने कहा, “यह जीत मेरी नहीं, संगीता की है।”
तालियाँ बजीं, पर संगीता शांत रही।
कंपनी की एनिवर्सरी पार्टी में राकेश स्टेज पर आया। उसने कहा,
“तीन साल पहले मैंने एक औरत को छोड़ा था। वो गर्भवती थी। मैंने उसकी ताकत को कमजोरी समझा। लेकिन आज वही औरत मेरी कंपनी की रीढ़ है, और मेरे बेटे की माँ।”
हॉल में सन्नाटा था।
“संगीता, मैं माफ़ी नहीं मांगता। बस कहना चाहता हूँ — अगर तुम चाहो, तो हम दोबारा शुरू कर सकते हैं।”
तालियाँ बजीं।
संगीता स्टेज पर आई, बोली,
“शुरुआत के लिए माफ़ी नहीं, भरोसा चाहिए। और भरोसा टूटे तो उसे फिर से बनाने में ज़िंदगी लगती है।”
वो नीचे उतर गई। राकेश के पास शब्द नहीं थे।
कुछ महीने बाद एक इंटरनेशनल प्रोजेक्ट आया। नया टीम लीडर था — विक्रम अरोड़ा। स्मार्ट, शालीन, और समझदार। उसने पहली मीटिंग में कहा, “मिस संगीता, आपकी सोच अद्भुत है।”
राकेश के भीतर ईर्ष्या की लहर दौड़ गई।
विक्रम और संगीता साथ काम करने लगे। वह उसकी मेहनत की तारीफ़ करता, बेटे के लिए गिफ्ट लाता।
एक दिन बोला, “आप बहुत मज़बूत हैं।”
संगीता मुस्कुराई, “जिंदगी ने सिखाया है कि अगर खुद नहीं खड़े होंगे, तो कोई नहीं खड़ा करेगा।”
राकेश दूर से देखता रहा। उसे एहसास हुआ — यह सिर्फ़ प्रोफेशनल नहीं, भावनात्मक प्रतिस्पर्धा है।
एक दिन विक्रम ने कहा, “राकेश, वह अब अपने लिए जी रही है। उसे वो चाहिए जो उसके साथ चले, ऊपर से नहीं।”
राकेश के हाथ कांप गए।
संगीता के बेटे का पहला जन्मदिन था। विक्रम भी आया, बच्चे को गोद में लेकर हँसा।
राकेश बोला, “यह मेरे बेटे का जन्मदिन है, और मैं चाहता हूँ कि उसकी हँसी मेरे पास रहे।”
संगीता ने कहा, “राकेश, यह मेरे बेटे का दिन है। यहाँ झगड़ा नहीं, खुशियाँ होंगी।”
रात को राकेश बाहर खड़ा था। बोला, “मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता।”
संगीता ने कहा, “मैं अब फैसला जल्दबाजी में नहीं करूँगी। मुझे वो चाहिए जो बुरे वक्त में भी साथ रहे।”
कुछ हफ्ते बाद, रात में तेज़ बारिश हो रही थी। संगीता का बेटा तेज बुखार से तप रहा था। विक्रम लंदन में था। घबराकर उसने राकेश को कॉल किया —
“राकेश, अर्जुन को 104 बुखार है।”
“मैं आ रहा हूँ।”
बीस मिनट में राकेश अस्पताल पहुँचा। बच्चे को गोद में उठाकर डॉक्टर के पास दौड़ा।
डॉक्टर ने कहा, “अगर एक घंटा और देरी होती, तो मुश्किल हो जाती।”
राकेश की आँखों में पानी और बारिश एक हो गए।
“मैं हमेशा रहूँगा, बेटा,” वह फुसफुसाया।
अगले दिन अस्पताल में संगीता ने कहा, “राकेश, कल मैं बहुत डरी हुई थी, लेकिन तब समझ आया — रिश्ता वही सच्चा है जो मुश्किल वक्त में बिना बुलाए भी साथ खड़ा हो।”
राकेश ने पूछा, “क्या इसका मतलब है…?”
संगीता ने मुस्कुराकर कहा, “अगर हमें नया सफर शुरू करना है, तो भरोसे से शुरू होगा, पुराने घावों से नहीं।”
कुछ महीनों बाद एक सादी-सी शादी हुई। ना शोर, ना दिखावा। बस परिवार, कुछ दोस्त, और बीच में हँसता हुआ छोटा अर्जुन।
विक्रम भी आया। बोला, “तुमने सही फैसला लिया, संगीता। प्यार वही जो बुरे वक्त में थामे रखे।”
शादी के बाद संगीता स्टेज पर खड़ी थी। राकेश का हाथ थामकर बोली,
“आज मैंने सीखा — प्यार सिर्फ दिल जीतना नहीं, भरोसा निभाना है। और भरोसा वही टिकता है जो अहंकार से ऊपर हो।”
संदेश:
जिंदगी में सबसे बड़ा रिश्ता वही है जो कठिन वक्त में भी साथ खड़ा रहे। प्यार शब्दों से नहीं, कर्म से साबित होता है।
कभी किसी को उसकी स्थिति से मत आँकिए — क्योंकि जो आज गिरा है, वही कल आपको थाम सकता है।
News
उस दिन के बाद ऑफिस का पूरा माहौल बदल गया। अब कोई भी किसी की औकात या कपड़ों से तुलना नहीं करता था। सब एक-दूसरे की मदद करने लगे। अर्जुन सबसे प्रेरणा देने वाला इंसान बन गया। रिया भी अब पूरी तरह बदल चुकी थी। वह विनम्रता से छोटे काम करने लगी और धीरे-धीरे सबका विश्वास जीतने की कोशिश करने लगी।
चायवाले से मालिक तक: इंसानियत की असली पहचान सुबह-सुबह जयपुर शहर की सबसे बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी के ऑफिस के गेट…
रिया फूट-फूट कर रो पड़ी। उसके सारे सपने, घमंड और अभिमान पल भर में टूट गए थे। बाकी सभी कर्मचारी भी कांप गए। सब सोचने लगे, “हे भगवान, हमने भी कल उस चायवाले की हंसी उड़ाई थी। अब अगर मालिक को याद आ गया तो हमारी भी छुट्टी हो जाएगी।”
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दूसरे दिन का माहौल चायवाले से मालिक तक: इंसानियत की असली पहचान
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चायवाले से मालिक तक: इंसानियत की असली पहचान
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I gave a drenched old man shelter in my home. The next morning, he offered to buy my house for $1. “I’m not joking,” he said. “I can’t explain, but you need to leave it immediately.”
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शीर्षक: “शिखर पर अहंकार नहीं, इंसानियत टिकती है”
शीर्षक: “शिखर पर अहंकार नहीं, इंसानियत टिकती है” सुबह के दस बजे थे। शहर के सबसे आलीशान रेस्टोरेंट “एमराल्ड टैरेस…
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