संजना और कुणाल: बिछड़ने से

मुंबई की चमकती सड़कों पर हर सुबह एक अमीर महिला, संजना, अपने पति मनीष के साथ कार में बैठकर ऑफिस जाती थी। बाहर की दुनिया उनके लिए बस एक भागती-भागती भीड़ थी, जिसमें ट्रैफिक की झुंझलाहट और रेड सिग्नल की खामोशी शामिल थी। लेकिन हर रोज़, उसी रेड सिग्नल पर, संजना के दिल को छू जाने वाली एक मासूमियत नज़र आती थी—कुछ छोटे-छोटे बच्चे, जो कभी गुब्बारे बेचते, कभी फूल, कभी किताबें।
उन बच्चों में से एक था कुणाल। उम्र बस दस-ग्यारह साल, कद छोटा, चेहरा भोला। उसकी आवाज़ में एक मिठास थी, जैसे सड़क पर कोई फरिश्ता उतर आया हो। वह कभी गुब्बारे लेकर कार के पास दौड़ता, कभी रंग-बिरंगे फूल या किताबें। एक दिन वह संजना की विंडो के पास आकर बोला, “आंटी, गुब्बारा ले लीजिए। आपके बच्चे बहुत खुश हो जाएंगे।” संजना मुस्कुरा दी, “मेरे बच्चे नहीं हैं।” कुणाल ने मासूमियत से सिर हिलाया, “आंटी, ले लो ना, सुबह से एक भी नहीं बिका।”
उसकी बात संजना के दिल में उतर गई। उसने दो गुब्बारे खरीद लिए। कार आगे बढ़ गई, लेकिन उस मासूम चेहरे की छवि दिल में रह गई। अगले कुछ दिनों में, वही सिग्नल, वही जगह, लेकिन इस बार कुणाल के हाथ में किताबें थीं। संजना ने मुस्कुरा कर पूछा, “क्या बात है? आज गुब्बारे नहीं?” कुणाल ने भोलेपन से जवाब दिया, “आंटी, गुब्बारे फट जाते हैं, नुकसान हो जाता है। आज किताब ले लो, बस बीस रुपये की है।”
संजना ने किताब खरीद ली, जरूरत ना होने के बावजूद। धीरे-धीरे दोनों के बीच एक अजीब सा लगाव बनने लगा। हर बार संजना उससे कुछ खरीदती, उसकी हथेली में चुपचाप नोट सरका देती। कुणाल की मुस्कान उसके लिए मरहम बन गई थी। लेकिन एक दिन, वही सिग्नल, वही हलचल, लेकिन कुणाल नहीं था। संजना बेचैन होकर शीशे से बाहर झांकती रही। तभी कुछ बच्चे भागते हुए आए, “मैडम, आप कुणाल को ढूंढ रही हैं?” संजना की सांस अटक गई। “हाँ, कहाँ है वो?” बच्चों ने बताया, “दीदी, उसका एक्सीडेंट हो गया है। एक कार ने टक्कर मारी और भाग गई। सिर फट गया था। अस्पताल ले गए, बचने की उम्मीद कम है।”
संजना के हाथ कांपने लगे, आँखों से आँसू गिरने लगे। दिल में एक अजीब सी टीस उठी—कुणाल के लिए और किसी अनकही याद के लिए। उसे अंदाजा नहीं था कि यह हादसा उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी सच्चाई लेकर आने वाला है। वही बच्चा, कुणाल, उसका खोया हुआ बेटा था, जिसे मजबूरी में जन्म के बाद छोड़ना पड़ा था।
अतीत की परछाई
साल 2020, कोलकाता। संजना, 19 साल की, खूबसूरत और जिद्दी। उसे अजय से प्यार हो गया। परिवार ने लाख समझाया, लेकिन उसने घर छोड़ दिया और अजय से शादी कर ली। दोनों एक छोटे किराए के घर में रहने लगे। संजना के परिवार ने रिश्ता तोड़ लिया। एक साल बाद, संजना ने बेटे को जन्म दिया—कुणाल। लेकिन इसी बीच उसे पता चला कि अजय एक खतरनाक गैंग से जुड़ा है। पैसों के लिए हत्या करता है।
संजना ने बहुत समझाया, “अजय, ये रास्ता ठीक नहीं।” लेकिन अजय नहीं बदला। एक दिन उसकी हत्या हो गई। संजना टूट गई, अकेली रह गई। मायके जाने की हिम्मत नहीं थी। उसके पास बस उसका बेटा था। जब परिवार को अजय की मौत की खबर मिली, वे लौट आए। बोले, “बेटी, हम तेरी दूसरी शादी करा देंगे, लेकिन बच्चे को भूलना होगा।”
संजना सन्न रह गई, “मैं अपने बच्चे को कैसे छोड़ दूं?” लेकिन परिवार ने कहा, “अगर यह बच्चा रहेगा तो कौन तुझसे शादी करेगा?” अजय के माता-पिता भी बोले, “हम कुणाल को पाल लेंगे।” आंसुओं के समंदर में डूबते हुए संजना ने अपने बेटे को उसकी दादी-दादा को सौंप दिया और खुद माता-पिता के साथ चली गई।
नई शुरुआत, छुपा हुआ सच
माता-पिता ने उसका अतीत मिटाने की कोशिश की। एक अच्छे, सुसंस्कृत लड़के मनीष से शादी करवाई। मनीष को बताया गया कि संजना अविवाहित है। शादी के बाद संजना मुंबई आ गई। मनीष की मोबाइल की दुकान थी। घर में कभी पैसों की कमी नहीं थी। संजना भी दुकान में हाथ बटाने लगी। जिंदगी संभल रही थी, लेकिन उसके छोड़े हुए बच्चे की जिंदगी में तूफान आने वाला था।
कुणाल के दादा का देहांत हो गया। घर में माहौल बदल गया। रोज बातें शुरू हो जातीं, “इस बच्चे को उसकी मां छोड़कर भाग गई, अब हम क्यों पालें?” लेकिन दादी अडिग थीं, “यह मेरा अजय है, मैं इसे कहीं नहीं भेजूंगी।” एक दिन बुआ आई, बोली, “बच्चे को मुझे दे दो, मैं मुंबई ले जाऊंगी।” दादी ने मना कर दिया, “नहीं, यह मेरे साथ रहेगा।” बुआ ने समझाया, “तो आप मेरे साथ चलिए।” और इसी तरह कुणाल अपनी दादी के साथ मुंबई आ गया।
मुंबई की सड़कों पर संघर्ष
समय बीतता गया। कुणाल अब दस साल का हो चुका था। एक दिन उसने देखा कि उसकी उम्र के बच्चे रोज़ पैसे लेकर घर लौटते हैं। उसने पूछा, “पैसे कहाँ से लाते हो?” बच्चों ने हंसते हुए कहा, “मुंबई की सड़कों पर रेड सिग्नल पर गाड़ियों के पास जाते हैं और मांग लेते हैं।” कुणाल के मन में भी पैसे कमाने की चाह जागी। बोला, “मैं भी तुम्हारे साथ चलूंगा।” दादी ने मना किया, “भीख मांगना बुरी बात है बेटा।” कुणाल ने मुस्कान के साथ कहा, “दादी, मैं भीख थोड़ी मांगूंगा, सामान बेचूंगा—गुब्बारे।”
दादी ने अनमने ढंग से सही, पर उसे रोक ना सकी। कुणाल ने गुब्बारे खरीदे और रेड सिग्नल पर बेचने जाने लगा। कभी गुब्बारे, कभी फूल, कभी किताबें। इसी दौरान उसकी जिंदगी में बिना पहचान के उसकी असली मां वापस आ चुकी थी—संजना। लेकिन दोनों एक दूसरे को पहचान नहीं पाए। संजना अंदर ही अंदर अपने बेटे को हर रोज़ याद करती, लेकिन माता-पिता ने सख्त हिदायत दी थी—कभी कुणाल का नाम मत लेना। इसलिए वह चुप रही।
टकराव और खुलासा
एक दिन, संजना ने कुणाल को तलाशते हुए उसके घर पहुंची। दादी को सामने देखा, दिल में बिजली सी कौंधी। “क्या यह मेरा ही बेटा है?” दादी ने कांपती आवाज़ में कहा, “हाँ बेटी, यही तेरा कुणाल है। उसका एक्सीडेंट हो गया है।” संजना चीख पड़ी, “कहाँ है वो? मुझे अभी उसके पास ले चलो।” दादी ने बताया, “अस्पताल ले गए हैं, हालत गंभीर है।”
अस्पताल पहुंचते ही कुणाल की बुआ उसे देखकर रोने लगी। डॉक्टर ने कहा, “उम्मीद बहुत कम है।” संजना कांपती आवाज़ में बोली, “ऐसा मत कहिए, दुआ कीजिए कि वह मुझे छोड़कर ना जाए।” छह घंटे बीत गए, हर मिनट भारी। आईसीयू का दरवाजा बंद, अंदर कुणाल जिंदगी से लड़ता हुआ, बाहर संजना खुद से।
मनीष के फोन लगातार बज रहे थे। आखिरकार उसने फोन उठाया, “मनीष, उस लड़के के बचने की शायद कोई उम्मीद नहीं है। मैं आज नहीं आ पाऊंगी। माफ करना।” मनीष हैरान था, “क्या तुम अस्पताल पहुंच गई हो?” लेकिन संजना उसे कैसे बताती कि वही उसका अपना बेटा है।
तीन दिन बाद, डॉक्टर ने मुस्कुराते हुए खबर दी, “लड़का होश में आ गया है। अब आप लोग मिल सकते हैं।” उस पल रोने वालों की भीड़ में एक ही आवाज़ थी—सुकून की। संजना दौड़ती हुई अंदर गई। कुणाल की आँखें आधी खुली थीं। उसने धीमी आवाज़ में पूछा, “आंटी, आप आ गई?” संजना टूट गई, सिर पर हाथ फेरते हुए बोली, “बेटा, मैं आंटी नहीं हूं, मैं तुम्हारी मां हूं।”
पुनर्मिलन और नई शुरुआत
डॉक्टर ने समझाया, “ज्यादा बात ना करें, बच्चे को आराम चाहिए।” तीन दिनों से संजना ने मनीष को फोन नहीं किया था। मनीष चिंता में पागल हो गया था। आखिरकार वह कुणाल के घर पहुंचा और पूरी सच्चाई जान गया। अस्पताल में उसने गुस्से से कहा, “तुम लोगों ने मुझसे धोखा किया है। हमारा रिश्ता यहीं खत्म।” संजना सिर झुकाकर सब सुनती रही। उसके पास बचा ही क्या था? बस उसका बेटा।
एक हफ्ते बाद कुणाल घर आ गया। संजना उसकी देखभाल में लग गई। जब उसने मनीष को फोन किया, तो फोन नहीं उठा। दस दिन बाद अचानक मनीष अपने घर वालों के साथ कुणाल के घर आया। संजना फूट पड़ी। उसकी सास ने उसे गले लगाया, “बेटी, मत रो, चलो घर चलते हैं।” संजना घबरा गई, “मैं अपने बेटे को छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी।” सास मुस्कुराई, “किसने कहा उसे छोड़कर चलने को? तुम्हारा बेटा, उसकी दादी, सब साथ चलेंगे।”
मनीष बहुत देर बाद बोला, “चलो संजना, मैं भी तुम्हारे बिना नहीं रह सकता।” और यूं वह टूटा हुआ परिवार फिर से एक हो गया।
अंतिम संदेश
यह घटना 2020 की है। उस समय संजना दो महीने की गर्भवती थी। सात महीने बाद उसने एक प्यारे बेटे को जन्म दिया। कुछ साल बाद एक बेटी हुई। आज कुणाल, संजना, उसका छोटा भाई-बहन सब एक साथ खुशहाल जिंदगी जी रहे हैं।
तो दोस्तों, बात समझना चाहिए कि प्यार-मोहब्बत के चक्कर में घर छोड़कर, मां-बाप की इज्जत को दांव पर लगाकर कोई फैसला नहीं लेना चाहिए। अगर कहानी पसंद आई हो, तो लाइक करें, दोस्तों के साथ शेयर करें, और नई कहानियों के लिए चैनल को सब्सक्राइब जरूर करें।
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