5 साल बाद सीसीटीवी में सच आया सामने! Detailed Case Study Of Sushant Singh Rajput | Who killed him ?

प्रस्तावना
14 जून 2020 का दिन भारतीय फिल्म इंडस्ट्री और लाखों युवाओं के दिल में हमेशा के लिए एक खालीपन छोड़ गया। एक रविवार की सुबह, जब देश अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में था, अचानक एक खबर ने सबको झकझोर दिया। सुशांत सिंह राजपूत अब इस दुनिया में नहीं रहे। यह सिर्फ एक अभिनेता के जाने की खबर नहीं थी, बल्कि एक सपने के टूटने की खबर थी। यह उस लड़के की कहानी का अधूरा रह जाना था, जिसने जीरो से शुरू करके अपनी मेहनत और प्रतिभा के दम पर वह मुकाम हासिल किया था, जहां पहुंचना लाखों लोगों का सपना होता है।
बचपन, परिवार और शिक्षा
सुशांत सिंह राजपूत का जन्म 21 जनवरी 1986 को बिहार की राजधानी पटना में हुआ था। उनका परिवार साधारण मध्यवर्गीय था। पिता कृष्ण कुमार सिंह सरकारी नौकरी में थे और मां उषा सिंह घर संभालती थीं। घर में चार बहनें और सबसे छोटे सुशांत, सबके लाडले थे। परिवार का माहौल अनुशासन और संस्कारों से भरा था। मां बच्चों को सपने देखने की आज़ादी देती थीं, जबकि पिता अनुशासन में विश्वास रखते थे।
सुशांत बचपन से ही पढ़ाई में तेज थे। उन्हें विज्ञान, गणित, अंतरिक्ष और दर्शन जैसे विषयों में गहरी रुचि थी। वह चीजों को रटने के बजाय समझने में विश्वास रखते थे। स्कूल के दिनों में ही उनका झुकाव ब्रह्मांड, तारों और ग्रहों के रहस्यों की ओर हो गया था। वह घंटों छत पर लेटकर आसमान को निहारते रहते थे। उनका सपना था कि वह एक दिन नासा जाएं और अंतरिक्ष वैज्ञानिक बनें।
पटना से दिल्ली आकर सुशांत ने कुलाची हंसराज मॉडल स्कूल में दाखिला लिया। साइंस ओलंपियाड में ऑल इंडिया लेवल पर सातवां रैंक हासिल किया। लाखों बच्चों के बीच टॉप 10 में जगह बनाना आसान नहीं था, लेकिन सुशांत ने यह कर दिखाया।
मां का निधन और जीवन में खालीपन
16 साल की उम्र में जब सुशांत 10वीं कक्षा में थे, तभी उनकी मां का कैंसर के कारण निधन हो गया। मां का जाना उनके जीवन का सबसे बड़ा खालीपन बन गया। बाहर से वह पहले की तरह मुस्कुराते रहे, पढ़ाई भी करते रहे, लेकिन भीतर कुछ हमेशा के लिए बिखर चुका था। मां ही वह इंसान थीं, जो उन्हें सबसे ज्यादा समझती थीं। उनका अचानक जाना सुशांत के दिल में एक ऐसा घाव छोड़ गया, जिसकी टीस कभी खत्म नहीं हुई।
कॉलेज, इंजीनियरिंग और करियर की तलाश
मां के जाने के बाद भी सुशांत ने खुद को संभाला और मेहनत जारी रखी। दिल्ली कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में मैकेनिकल इंजीनियरिंग में उनका दाखिला हुआ। परिवार खुश था, सबको लग रहा था कि अब लड़का सही रास्ते पर है। लेकिन कॉलेज के दिनों में सुशांत के अंदर एक अलग तरह की बेचैनी थी। उन्हें स्टेज, लाइट्स और तालियों में अजीब सी ऊर्जा महसूस होती थी। कॉलेज के फेस्ट में डांस, परफॉर्मेंस और स्टेज पर खड़े होने पर उनके चेहरे पर जो चमक आती थी, वह क्लासरूम में नहीं दिखती थी।
धीरे-धीरे उन्हें यह साफ नजर आने लगा कि इंजीनियरिंग उनका सपना नहीं है। उनका दिल एक्टिंग और परफॉर्मिंग आर्ट्स में था। उन्होंने चौथे साल में, जब डिग्री पूरी होने में सिर्फ एक साल बाकी था, कॉलेज छोड़ दिया और मुंबई जाने का फैसला कर लिया। यह फैसला बहुत कम लोग लेने की हिम्मत करते हैं। परिवार नाराज था, पिता को लगा कि बेटा अपने भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहा है। लेकिन सुशांत का मानना था कि अगर उन्होंने कोशिश नहीं की, तो पूरी जिंदगी पछतावा रहेगा।
मुंबई का संघर्ष और एक्टिंग की शुरुआत
2006 में सुशांत मुंबई पहुंचे। न कोई जान-पहचान, न गॉडफादर, न कोई सिस्टम। रहने के लिए छोटा सा कमरा शेयरिंग में लिया। जगह कम थी, गर्मी ज्यादा थी और हालात मुश्किल थे। शुरुआत में उन्होंने बैकग्राउंड डांसर के तौर पर काम किया। बड़े-बड़े अवार्ड शोज़ में परफॉर्म किया। चमकती लाइट्स थी, बड़े सितारे स्टेज पर होते थे और सुशांत पीछे लाइन में खड़े होकर नाचते रहते थे। तालियां किसी और के लिए बजती थीं, नाम किसी और का लिया जाता था।
रात को जब वह उस छोटे से कमरे में लौटते थे, तब अकेलापन और सवाल उनका इंतजार करते थे। क्या सही फैसला लिया है? क्या कभी कुछ बन पाएंगे? लेकिन हार नहीं मानी। एक्टिंग सीखने के लिए बैरी जॉन एक्टिंग स्टूडियो ज्वाइन किया। थिएटर किया, छोटे-छोटे रोल किए, वर्कशॉप्स में हिस्सा लिया। पैसे लगभग नहीं थे, कई बार खाने तक के पैसे जोड़कर चलाने पड़ते थे। लेकिन जुनून जिंदा था।
रिजेक्शन, ऑडिशन और पहला मौका
अगले दो-तीन साल लगातार ऑडिशन, रिजेक्शन और इंतजार में गुजरे। कभी कहा गया कि लुक ठीक नहीं है, कभी कहा गया कि तुम हीरो मटेरियल नहीं हो, कभी टीवी एक्टर जैसे लगते हो। लेकिन हर रिजेक्शन के बाद सुशांत और मेहनत के साथ अगले ऑडिशन की तैयारी में लग जाते थे। उन्हें भरोसा था कि एक दिन मुंबई उनके नाम को पहचानेगी।
2008 में उन्हें पहला टीवी शो मिला—”किस देश में है मेरा दिल”। रोल छोटा था, शो भी ज्यादा नहीं चला, लेकिन कैमरे के सामने काम करने का अनुभव मिल गया। फिर 2009 में “पवित्र रिश्ता” में मानव देशमुख का किरदार मिला। यह किरदार सीधे लोगों के दिल में उतर गया और सुशांत ने उसे सिर्फ निभाया नहीं, बल्कि जिया। देखते ही देखते वह घर-घर में पहचाने जाने लगे। गली-मोहल्लों में लोग उन्हें मानव कहकर बुलाने लगे। इसी शो के दौरान उनकी मुलाकात अंकिता लोखंडे से हुई। ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री धीरे-धीरे रिश्ते में बदल गई। छह साल तक दोनों साथ रहे।
टीवी से बॉलीवुड तक का सफर
सुशांत का करियर तेजी से आगे बढ़ रहा था, नाम मिल रहा था, पैसा भी आने लगा था। लेकिन वह सिर्फ टीवी स्टार बनकर नहीं रुकना चाहते थे। 2013 में उन्होंने पवित्र रिश्ता छोड़ दिया और बॉलीवुड में कदम रखा। यहां सब कुछ फिर से जीरो से शुरू हुआ था। नए तरीके, नए नियम, नए लोग। सुशांत ने बिना शिकायत के ऑडिशन देना शुरू किया, स्क्रिप्ट पढ़ना शुरू किया और हर मौके को पकड़ने की कोशिश की।
अभिषेक कपूर से मुलाकात के बाद “काई पो चे” में ईशान का रोल मिला। फिल्म रिलीज हुई और दर्शकों ने दिल से अपनाया। क्रिटिक्स ने उनकी एक्टिंग की जमकर तारीफ की। पहली बार फिल्म इंडस्ट्री ने सुशांत को एक सीरियस अभिनेता के तौर पर देखना शुरू किया। उन्हें बेस्ट डेब्यू का अवार्ड भी मिला।
इसके बाद “शुद्ध देसी रोमांस”, “पीके” जैसी फिल्मों में काम किया। “पीके” में आमिर खान के साथ स्क्रीन शेयर करना और राजकुमार हिरणी की फिल्म में काम करना अपने आप में बड़ी बात थी। लेकिन बार-बार मजबूत परफॉर्मेंस देने के बावजूद भी उन्हें लीड स्पेस से दूर रखा जा रहा था।
निजी जीवन की उथल-पुथल
इसी दौरान अंकिता लोखंडे के साथ उनका रिश्ता कमजोर पड़ने लगा। छह साल साथ रहने के बाद दोनों की राहें अलग हो गईं। सुशांत ने कभी खुलकर दर्द नहीं दिखाया, लेकिन भीतर कुछ टूट गया था। यह खालीपन उनके चेहरे पर नहीं दिखता था, लेकिन मन पर गहरा असर पड़ा।
“डिटेक्टिव ब्योमकेश बक्शी” जैसी इंटेलिजेंट फिल्म में उनकी एक्टिंग को सराहा गया, लेकिन फिल्म बॉक्स ऑफिस पर नहीं चली। धीरे-धीरे इंडस्ट्री में यह चर्चा होने लगी कि सुशांत भरोसेमंद स्टार नहीं हैं, उनका नाम टिकट खिड़की की गारंटी नहीं देता।
धोनी की कहानी और स्टारडम
फिर आया “एम एस धोनी: द अनटोल्ड स्टोरी”। यह सिर्फ एक क्रिकेटर की कहानी नहीं थी, बल्कि छोटे शहर के लड़के की संघर्ष की कहानी थी। इस किरदार के लिए सुशांत ने महीनों तक मेहनत की, क्रिकेट की ट्रेनिंग ली, धोनी की चाल-ढाल, बॉडी लैंग्वेज, सादगी और शांत स्वभाव को बारीकी से समझा। फिल्म रिलीज हुई तो देश में तहलका मच गया। लोग स्क्रीन पर सुशांत को नहीं, बल्कि धोनी को देखने लगे। थिएटर तालियों से गूंज उठे। फिल्म ने जबरदस्त कमाई के रिकॉर्ड तोड़े। पहली बार सुशांत को वह पहचान मिली, जिसके लिए वह सालों से संघर्ष कर रहे थे।
इंडस्ट्री का व्यवहार और अकेलापन
सफलता के बाद भी सुशांत को इंडस्ट्री का पूरा सपोर्ट नहीं मिला। बड़े बैनर उनसे दूरी बना रहे थे, अवार्ड शो में नजरअंदाज किया जा रहा था। सुशांत खुद को अकेला महसूस करने लगे। “राब्ता” फ्लॉप हुई, “केदारनाथ” विवादों में उलझ गई, “सोनचिड़िया” जैसी शानदार फिल्म को दर्शक नहीं मिले। यह सब सुशांत के मन में भारी बैठने लगा। उन्हें लगने लगा कि चाहे कितना भी अच्छा काम कर लो, अगर सही लोगों का साथ नहीं है, तो आगे बढ़ना मुश्किल है।
निजी जीवन में भी रिश्ते टूटने लगे। कृति सेनन, सारा अली खान के साथ नाम जुड़ा, लेकिन यह रिश्ते भी ज्यादा समय तक टिक नहीं पाए। हर बार एक उम्मीद टूटती रही और हर टूटन उनके दिल पर असर डालती रही। बाहर से मजबूत दिखते थे, लेकिन अंदर अकेले पड़ते जा रहे थे।
छिछोरे, मानसिक स्वास्थ्य और समाज का रवैया
2019 में “छिछोरे” आई। कॉलेज लाइफ, दोस्ती और जिंदगी को हल्के में न लेने का संदेश देने वाली यह फिल्म सुपरहिट रही। लोगों ने खूब प्यार दिया, लेकिन इंडस्ट्री का व्यवहार नहीं बदला। इसी समय रिया चक्रवर्ती उनके जीवन में आई। शुरुआत में सब सामान्य था, लेकिन धीरे-धीरे परिवार से दूरी बनने लगी। सुशांत पहले जो अपने परिवार से जुड़े रहते थे, अब कम बात करने लगे। उनकी सेहत और मन की स्थिति ठीक नहीं चल रही थी। डॉक्टर से इलाज चल रहा था, दवाइयां चल रही थीं, लेकिन वह पूरी तरह ठीक महसूस नहीं कर रहे थे।
सुशांत बहुत ज्यादा सोचने वाले इंसान थे। ब्रह्मांड के बारे में सोचते थे, जिंदगी के मतलब पर सवाल करते थे। जब सवालों के जवाब नहीं मिलते, तो मन भारी हो जाता था। काम को लेकर अनिश्चितता, रिश्तों की असफलता और इंडस्ट्री से मिल रही ठंडक—यह सब मिलकर उनके अंदर एक अजीब खालीपन भरने लगा।
लॉकडाउन, अकेलापन और अंत
लॉकडाउन का समय आया, पूरा देश बंद हो गया। शूटिंग रुक गई, बाहर जाना बंद हो गया। सुशांत जो पहले ही अकेलेपन से जूझ रहे थे, अब पूरी तरह एक दायरे में सिमट गए। घर में वही चार दीवारें, वही सोच, वही सवाल। उनकी पूर्व मैनेजर दिशा साल्यान के जाने की खबर ने उन्हें अंदर तक हिला दिया। 8 जून को रिया घर छोड़कर चली गई। इसके बाद सुशांत पूरी तरह अकेले रह गए। कुछ दिनों बाद उनकी बहन मिलने आई, लेकिन शायद वह सहारा बहुत देर से पहुंचा था।
सुशांत अंदर ही अंदर बहुत थक चुके थे। यह थकान शरीर की नहीं थी, मन की थी। 14 जून की सुबह आई, घर में सन्नाटा था। बाहर दुनिया अपनी रफ्तार में थी, लेकिन उस घर के अंदर एक कहानी खत्म हो चुकी थी। जब यह खबर बाहर आई, पूरे देश में सन्नाटा छा गया। हर कोई यही पूछ रहा था—ऐसा कैसे हो सकता है? जो इंसान दूसरों को जिंदगी का महत्व सिखा रहा था, वह खुद इस हालत तक कैसे पहुंच गया?
समाज के लिए संदेश
इसके बाद जांच एजेंसियां, मीडिया बहस, सोशल मीडिया ट्रेंड—हर कोई अपने-अपने तरीके से सच ढूंढने लगा। किसी ने रिश्तों पर सवाल उठाए, किसी ने इंडस्ट्री पर, किसी ने सिस्टम पर। लेकिन जवाब किसी के पास नहीं था। कुछ लोगों का मानना था कि यह सब मन की बीमारी का नतीजा था, कुछ को लगा कि इसके पीछे और भी बहुत कुछ छिपा है।
सुशांत की कहानी यहां खत्म नहीं होती। वह सिर्फ एक इंसान नहीं थे, एक सोच थे, एक सपना थे, उन लाखों युवाओं की उम्मीद थे जो छोटे शहरों से निकल कर बड़े सपने देखते हैं। उन्होंने दिखाया कि बिना गॉडफादर के भी ऊपर पहुंचा जा सकता है, लेकिन यह भी दिखाया कि यह रास्ता कितना अकेला और थकाने वाला होता है।
आज भी जब कोई नया कलाकार संघर्ष करता है, रिजेक्शन झेलता है, खुद पर सवाल करता है, तब सुशांत की याद आती है। उनकी मुस्कान, आंखों की चमक और सपने आज भी लोगों को प्रेरित करते हैं। सच क्या था, यह शायद कभी पूरी तरह सामने ना आए। लेकिन यह जरूर सामने आ गया कि हमें एक दूसरे की बात सुननी चाहिए, वक्त पर सहारा देना चाहिए और मन की हालत को हल्के में नहीं लेना चाहिए।
निष्कर्ष
सुशांत चले गए, लेकिन उनकी कहानी आज भी जिंदा है और शायद हमेशा जिंदा रहेगी। यह कहानी हमें सिखाती है कि सफलता के पीछे संघर्ष, दर्द और अकेलापन भी होता है। समाज, परिवार और दोस्तों को चाहिए कि वे सिर्फ बाहरी मुस्कान पर न जाएं, बल्कि भीतर की पीड़ा को भी समझें। मानसिक स्वास्थ्य को हल्के में न लें, और समय रहते अपनों का साथ दें।
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