Bollywood सिंगर ने जवान बेटे और बेटी को दिया खो, घर में एक साथ छाया मातम। सदमे में इंडस्ट्री!

प्रस्तावना

बॉलीवुड की रंगीन दुनिया जितनी बाहर से चमकदार और आकर्षक दिखती है, उतनी ही इसके भीतर छुपी कहानियां दर्द, संघर्ष और जिजीविषा से भरी होती हैं। भारतीय संगीत जगत में एक नाम ऐसा है, जिसने अपनी सुरीली आवाज़ से करोड़ों दिलों पर राज किया, लेकिन निजी जीवन में उतना ही गहरा दर्द झेला। वह नाम है आशा भोसले – सुरों की मलिका, जिनकी आवाज़ ने न जाने कितनी पीढ़ियों को झूमने पर मजबूर किया। आशा भोसले का जीवन जितना प्रेरणादायक है, उतना ही भावुक और संघर्षपूर्ण भी रहा है। इस लेख में हम उनकी जिंदगी के हर पहलू को करीब से जानेंगे।

बचपन और परिवार

आशा भोसले का जन्म 8 सितंबर 1933 को महाराष्ट्र के सांगली जिले के छोटे से गांव गोवा में हुआ था। उनके पिता, पंडित दीनानाथ मंगेशकर, शास्त्रीय गायक और रंगमंच के कलाकार थे। आशा, स्वर कोकिला लता मंगेशकर की छोटी बहन हैं। उनके परिवार में संगीत की परंपरा थी, लेकिन जब आशा बहुत छोटी थीं, तभी उनके पिता का निधन हो गया। परिवार पर आर्थिक संकट आ गया और मां शेवंती मंगेशकर ने बच्चों की परवरिश का जिम्मा संभाला।

पिता के जाने के बाद लता मंगेशकर ने परिवार की जिम्मेदारी उठाई, लेकिन आशा भी कम उम्र में ही गाने के लिए स्टेज पर आने लगीं। मात्र 10 वर्ष की उम्र में आशा ने मराठी फिल्म ‘माझा बाल’ में अपना पहला गाना गाया। परिवार की आर्थिक हालत को सुधारने के लिए आशा ने बचपन से ही कड़ी मेहनत शुरू कर दी थी।

पहली शादी: दर्द और संघर्ष

आशा भोसले की निजी जिंदगी हमेशा चर्चाओं का विषय रही है। मात्र 16 साल की उम्र में उन्होंने अपने घर से भागकर लता मंगेशकर के सेक्रेटरी गणपत राव भोसले से शादी कर ली। उस वक्त गणपत राव उनसे 15 साल बड़े थे। इस शादी से परिवार बेहद नाराज हो गया और लता मंगेशकर ने भी कुछ समय के लिए आशा से रिश्ता तोड़ लिया।

आशा के मुताबिक, उनकी ससुराल बेहद रूढ़िवादी थी और उनके पति का स्वभाव बहुत गुस्सैल था। आशा ने अपनी बायोग्राफी ‘आशा भोसले: अ लाइफ इन म्यूजिक’, जिसे राम्या शर्मा ने लिखा, में बताया कि पति गणपत राव का व्यवहार उनके प्रति बहुत कठोर था। वे न केवल मानसिक, बल्कि शारीरिक प्रताड़ना भी देती थीं। आशा ने लिखा, “मैंने हमेशा उनका सम्मान किया, कभी सवाल नहीं किया, लेकिन धीरे-धीरे मैं पूरी तरह टूट गई थी।”

गणपत राव ने आशा को उनके परिवार से मिलने-जुलने से भी मना कर दिया था। आशा ने बताया कि एक समय ऐसा आया जब वे इतनी परेशान हो गई थीं कि उन्होंने आत्महत्या करने की कोशिश की। वे चार महीने की गर्भवती थीं, बीमार थीं और अस्पताल में भर्ती थीं। उन्होंने नींद की गोलियों की पूरी शीशी खाली कर ली थी, लेकिन पेट में पल रहे बच्चे के लिए उनका प्यार इतना गहरा था कि वे बच गईं।

मातृत्व और अलगाव

आशा भोसले को अपनी पहली शादी से तीन संतानें हुईं – हेमंत, आनंद और वर्षा। गणपत राव के अत्याचारों से तंग आकर, जब आशा तीसरी बार मां बनने वाली थीं, तब उन्हें घर से निकाल दिया गया। इसके बाद आशा ने पति से अलग होने का फैसला किया और 11 साल बाद दोनों की राहें जुदा हो गईं।

इस कठिन दौर में भी आशा ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने बच्चों की परवरिश खुद की और अपने करियर पर ध्यान केंद्रित किया। आशा बताती हैं कि वे अपने बच्चों को लेकर मुंबई के एक छोटे से कमरे में रहती थीं, जहां ना तो सुविधाएं थीं, ना ही कोई सहारा। लेकिन उनके भीतर संगीत के प्रति अनूठा जुनून था, जिसने उन्हें आगे बढ़ने की ताकत दी।

दूसरा विवाह: प्यार और साझेदारी

आशा भोसले की जिंदगी में दूसरी बार प्यार ने दस्तक दी। 1980 में उन्होंने प्रसिद्ध संगीतकार राहुल देव बर्मन (आरडी बर्मन) से शादी की। आरडी बर्मन उम्र में उनसे छह साल छोटे थे, इसलिए यह रिश्ता भी समाज और परिवार के लिए असामान्य था। लेकिन दोनों ने पारिवारिक विरोध के बावजूद शादी की और संगीत के क्षेत्र में एक नई मिसाल कायम की।

आशा और पंचम दा (आरडी बर्मन) की जोड़ी ने हिंदी फिल्म संगीत को नया आयाम दिया। दोनों ने मिलकर एक से बढ़कर एक सुपरहिट गाने दिए – चाहे वह ‘दम मारो दम’ हो, ‘पिया तू अब तो आजा’ हो या ‘महबूबा महबूबा’। लेकिन शादी के 14 साल बाद 1994 में आरडी बर्मन का निधन हो गया। यह आशा के जीवन का एक और बड़ा झटका था।

बच्चों का दुख: वर्षा और हेमंत की मौत

आशा भोसले की जिंदगी में जितनी ऊंचाइयां आईं, उतना ही गहरा दर्द भी रहा। उनकी बेटी वर्षा ने 2012 में आत्महत्या कर ली। वर्षा लंबे समय से डिप्रेशन में थीं। इससे पहले 2008 में भी उन्होंने आत्महत्या की कोशिश की थी, लेकिन बचा लिया गया था। वर्षा की मौत आशा के लिए सबसे बड़ा सदमा थी।

इसके अलावा, उनके बेटे हेमंत की भी कैंसर के कारण स्कॉटलैंड में मृत्यु हो गई। एक मां के लिए अपने बच्चों को खोना शायद सबसे बड़ा दुख होता है, लेकिन आशा ने इन दुखों को भी अपनी ताकत बना लिया। वे कहती हैं, “दर्द तो जिंदगी का हिस्सा है, लेकिन जीना नहीं छोड़ सकते। संगीत ही मेरी सबसे बड़ी दवा है।”

करियर की बुलंदियां

आशा भोसले ने 1940 के दशक से गाना शुरू किया और आज भी सक्रिय हैं। उन्होंने हिंदी के अलावा 20 से अधिक भारतीय और विदेशी भाषाओं में 12,000 से ज्यादा गाने गाए हैं। उनका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में ‘मोस्ट रिकॉर्डेड आर्टिस्ट इन म्यूजिक हिस्ट्री’ के लिए दर्ज है।

आशा भोसले ने हर जॉनर में अपनी आवाज़ का जादू बिखेरा – रोमांटिक, सैड, आइटम नंबर, ग़ज़ल, भजन, लोकगीत, और पॉप। उनके गाए ‘ओ हसीना जुल्फों वाली’, ‘चुरा लिया है तुमने जो दिल को’, ‘पिया तू अब तो आजा’, ‘जाने दो ना’, ‘रात अकेली है’, ‘ये मेरा दिल’, ‘झुमका गिरा रे’, ‘इन आंखों की मस्ती’ जैसे गाने आज भी अमर हैं।

पुरस्कार और सम्मान

आशा भोसले को भारतीय संगीत जगत का सबसे बड़ा सम्मान – दादा साहब फाल्के अवार्ड (2000) मिला। इसके अलावा, उन्हें सात बार फिल्मफेयर अवार्ड, दो बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, पद्म विभूषण (2008), पद्म भूषण (2000), और कई अन्य अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा गया है।

उनका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज है। आशा भोसले को भारत के अलावा विदेशों में भी अद्भुत सम्मान मिला है। वे पहली भारतीय गायिका हैं, जिन्होंने रॉयल अल्बर्ट हॉल (लंदन), कार्नेगी हॉल (न्यूयॉर्क) जैसी प्रतिष्ठित जगहों पर परफॉर्म किया।

लता मंगेशकर के साथ रिश्ते

बॉलीवुड में अक्सर अफवाहें उड़ती रहीं कि लता मंगेशकर और आशा भोसले के बीच पेशेवर प्रतिद्वंद्विता है। दोनों बहनों के बीच मनमुटाव की बातें भी सामने आईं। लेकिन आशा और लता दोनों ने कभी खुलकर इन बातों पर प्रतिक्रिया नहीं दी। आशा ने हमेशा अपनी बहन को आदर्श माना और कहा कि लता दीदी के बिना उनका संगीत अधूरा है।

बिजनेस वेंचर: रेस्टोरेंट्स की दुनिया

संगीत के अलावा आशा भोसले एक सफल उद्यमी भी हैं। 2002 में उन्होंने दुबई में अपना पहला रेस्टोरेंट ‘आशा’ खोला। आज उनके नाम से दुबई, कुवैत, अबू धाबी, दोहा और बहरीन में कई रेस्टोरेंट्स हैं, जहां भारतीय व्यंजन परोसे जाते हैं। आशा भोसले खुद बहुत अच्छी कुक हैं और अपने रेस्टोरेंट के मेन्यू में व्यक्तिगत रुचि लेती हैं।

व्यक्तित्व और प्रेरणा

आशा भोसले का जीवन संघर्ष, साहस और सकारात्मक सोच की मिसाल है। उन्होंने हर कठिनाई को मुस्कान के साथ झेला। वे कहती हैं, “संगीत मेरी पूजा है, मेरी आत्मा है।” आशा आज भी स्टेज पर गाती हैं, नए कलाकारों को प्रोत्साहित करती हैं और संगीत के प्रति अपने प्रेम को हर दिन जीती हैं।

निष्कर्ष

आशा भोसले की कहानी सिर्फ एक गायिका की नहीं, बल्कि एक जुझारू महिला की है, जिसने हर दर्द, हर ठोकर को अपनी ताकत बना लिया। उन्होंने साबित किया कि हालात चाहे जैसे भी हों, अगर जज्बा मजबूत है तो कोई भी सपना अधूरा नहीं रहता। आशा भोसले आज भी भारतीय संगीत की प्रेरणा हैं और उनकी आवाज़ आने वाली पीढ़ियों तक गूंजती रहेगी।

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