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“जिस गरीब लड़के को समझा अनपढ़… उसी ने सबसे मुश्किल सवाल Solve कर दिया”
भाग 1: एक साधारण दिन की शुरुआत
समीह का घर एक छोटे से गांव चिरागपुर में था। यह गांव बहुत ही शांत और पुरसुकून था, जहां हर सुबह की शुरुआत अज़ान से होती थी और बकरों के बच्चे खेलते हुए खेतों में दौड़ते थे। समीह की हंसी के बिना यह गांव अधूरा सा लगता था, क्योंकि उसकी मुस्कान में एक खास तरह की नजाकत और मासूमियत थी। समय के साथ साथ वह और बड़ी होती गई और अपनी नज़रें हर उस सपना पर लगाती गईं, जो उसे अपनी मेहनत और इमानदारी से हासिल करना था।
उसके घर का माहौल बहुत ही धार्मिक था। उसके माता-पिता दोनों ही धार्मिक थे और समीह ने बचपन से ही उनके साथ नमाज़ अदा की थी। हर रात अपनी दुआ में वह अपनी ख्वाहिशों और भगवान से सहायता मांगती। उसकी दिलचस्पी पढ़ाई में थी और वह हमेशा अपनी किताबों में खोई रहती थी। लेकिन साथ ही साथ उसके मन में शादी की ख्वाहिशें भी पलने लगीं।
समीह की सुंदरता के चर्चे आसपास के गांवों तक पहुंच चुके थे और कई रिश्ते उसके लिए आने लगे थे, लेकिन हर बार किसी न किसी वजह से रिश्ते टूट जाते थे। एक बार, उसे एक अच्छे घराने से रिश्ता आया, लेकिन अचानक लड़के की मां ने उसकी कुंडली देखने के बाद रिश्ते को तोड़ दिया क्योंकि उसे उसमें मांगलिक दोष मिला था।
अगला रिश्ता एक डॉक्टर से आया। यह रिश्ता भी टूट गया जब लड़के के चाचा ने कहा कि समीह की खूबसूरती सादा घराने से मेल नहीं खाती। तीसरा रिश्ता सबसे ज्यादा दर्दनाक था। लड़का कराची से आया था, इंजीनियर था, और शादी की तारीख भी तय हो चुकी थी, लेकिन एक हादसे में उसकी मौत हो गई। समीह टूट गई। उसने खुद को दोषी ठहराया और यही ख्याल उसके दिल में घर करने लगा कि वह अपने परिवार के लिए एक अभिशाप बन गई है।

भाग 2: नए सवाल, नई राह
एक दिन, समीह की भाभी रुखसाना ने तंज किया, “समय, तुम्हारा हुस्न तो काबिले तारीफ है, लेकिन तुम्हारी किस्मत क्यों साथ नहीं देती?” इस तंज से समीह के दिल में एक नई सोच का जन्म हुआ। उसने अपनी सहेली नादिया से सुना कि किसी ने उसे नजरें या बंदिशों का शिकार बना दिया है। समीह ने नादिया से सुना कि एक वली अल्लाह पीर मूसा शाह हैं, जो हर तरह की बंदिशों को खोलने में माहिर हैं।
समीह और उसकी मां पीर साहब के पास पहुंचे, जहां उन्होंने अपनी दुआओं से पीर साहब से मदद मांगी। पीर साहब ने बताया कि समीह पर किसी ने काला जादू करवा रखा है, जो उसकी शादी के रास्ते में रुकावट डालता है। पीर साहब ने सलाह दी कि समीह को एक खास तरह का सदक़ा देना होगा, लेकिन इसमें एक महत्वपूर्ण शर्त थी: उसे किसी भी हालत में पीछे मुड़कर नहीं देखना होगा, वरना जादू और भी गहरा हो जाएगा।
भाग 3: कठिन रास्ता
समीह ने पूरे विश्वास के साथ उस सदक़े का काम शुरू किया। उसने रोटी के चार टुकड़े बनाए और गांव के वीराने में कुत्तों को देने के लिए निकली। लेकिन रास्ते में, जैसे ही उसने पीछे मुड़कर देखा, उसे महसूस हुआ कि कुछ गलत हो गया है। पीर साहब की हिदायतों के बावजूद उसने अपना वचन तोड़ा।
घर लौटने के बाद उसे यह अहसास हुआ कि उसने बहुत बड़ी गलती की है। पीर साहब ने उसे बताया कि उसकी गलती के कारण आने वाले समय में उसे बड़ी परेशानियों का सामना करना होगा। समीह को यह सुनकर बुरी तरह डर लगने लगा और वह सोचने लगी कि क्या सच में उसकी तकदीर में कोई काला धागा है?
भाग 4: अंत में, सच्चाई का सामना
समय के साथ समीह की हालत बिगड़ने लगी। उसकी सेहत खराब हो गई, और वह व्हीलचेयर पर बैठने लगी। आरिफ, उसके पति, ने उसे डॉक्टर के पास दिखाया, और डॉक्टर ने उसे न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर बताया। अब आरिफ पर दोहरी जिम्मेदारी आ गई थी – एक ओर अपनी पत्नी की देखभाल करना, और दूसरी ओर कर्ज और काम का दबाव सहना।
आरिफ के परिवार में भी समीह को लेकर उलझनें थीं। उसकी सास, हफीजा बेगम, ने कई बार तंज किए थे कि समीह अब बोझ बन चुकी है। उसकी बीमारी के कारण आरिफ की जिंदगी भी परेशानी में आ गई थी। एक दिन समीह ने देखा कि आरिफ की मां कह रही थी कि वह दूसरी शादी कर ले, क्योंकि समीह अब सिर्फ बोझ बन चुकी है।
यह बात आरिफ के दिल को खटका। वह सच्चाई को नहीं समझ पा रहा था। उसे इस उलझन से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा था। एक दिन समीह ने एक आखिरी कोशिश की। उसने आरिफ से कहा, “अगर तुम मुझे छोड़ोगे तो मैं मर जाऊंगी।” लेकिन आरिफ ने उसे स्वीकार किया कि वह उसे छोड़ने का सोच रहा था।
भाग 5: चमत्कारी बदलाव
आखिरकार समीह ने अपने पति की मदद के लिए अल्लाह से मदद मांगी और पीर साहब के बताई रास्ते पर चलने की कोशिश की। एक दिन, जब वह एक पेड़ के नीचे बैठी थी, वहां एक बुजुर्ग शख्स आए और आरिफ को डांटा। उन्होंने आरिफ को बताया कि यह महिला उसकी पत्नी है, और उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी सिर्फ उसकी है, न कि उसकी तबाही की।
यह सुनकर आरिफ को अपनी गलती का अहसास हुआ। उन्होंने अपनी बीवी के साथ बदसलूकी की थी। फिर, एक दिन, समीह की हालत में बदलाव आया। उसकी बीमारी ठीक होने लगी और वह फिर से चलने लगी। समीह ने अपने पति को माफ किया और वह दोनों एक नए रास्ते पर चल पड़े।
भाग 6: नया जीवन
वह दिन समीह और आरिफ के लिए एक नई शुरुआत थी। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी बदल दी थी। अब वे दोनों मिलकर उन लोगों की मदद करते थे जो बीमार थे, और जीवन के सही मायनों को समझने की कोशिश करते थे। समीह ने अपने घर के एक कमरे को मदरसा बना दिया, जहां वह बच्चों को कुरान पढ़ाती थी।
उनके जीवन में अब प्यार, शांति और सुकून था। समीह ने अपनी गलतियों से सीखा था और अब उसे यकीन हो गया था कि अल्लाह पर विश्वास और सब्र से हर समस्या का हल निकल सकता है।
समाप्त
संदेश: कभी भी हमें अपनी तकदीर पर भरोसा नहीं खोना चाहिए। इबादत, सब्र और सही रास्ते पर चलने से हमें हर मुश्किल का सामना करने की ताकत मिलती है।
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