IPS मैडम जिस रिक्शे पर बैठकर मथुरा में घूम रही थीं… वही निकला उनका अपना पति!..
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IPS मैडम जिस रिक्शे पर बैठकर बनारस में घूम रही थीं… वही निकला उनका अपना पति!
प्रस्तावना
बनारस की सुबह हमेशा की तरह सुकून से भरी थी। घाटों पर गंगा की लहरें हल्की धूप में चमक रही थीं, मंदिरों की घंटियों की आवाज वातावरण में गूंज रही थी। इसी सुबह एक सरकारी गाड़ी आकर रुकी। दरवाजा खुला, और बाहर उतरीं IPS आरती शर्मा। कई सालों बाद वे बनारस आई थीं। दिल में बोझ था, मन में सवाल थे। उन्होंने सोचा पैदल ही मंदिर चलेंगी, लेकिन समय कम था। तभी उनकी नजर एक पुराने से रिक्शे पर पड़ी।
रिक्शा चलाने वाला आदमी करीब 45 साल का था। चेहरे पर उम्र की थकान, लेकिन आंखों में गहरी शांति। आरती ने हाथ उठाकर उसे बुलाया, “भैया, मंदिर तक चलोगे?”
“जी मैडम, बैठिए,” उसने सिर झुकाकर जवाब दिया।
आरती शर्मा रिक्शे पर बैठ गईं। कुछ देर तक दोनों खामोश रहे। बनारस की गलियों में रिक्शा धीरे-धीरे सरक रहा था। आरती ने पूछा, “तुम रोज यहीं रिक्शा चलाते हो?”
“हां मैडम, कई साल हो गए,” उसने सहजता से जवाब दिया।
उसके जवाब में कोई शिकायत नहीं थी, न दुखों की लंबी कहानी, न मजबूरी का रोना। यही आरती को अजीब सा लगा। वे बाहर देखने लगीं, लेकिन दिल कहीं और भटक गया था। बार-बार महसूस हो रहा था, जैसे यह आवाज उन्होंने पहले भी सुनी हो, बहुत करीब से।
पहचान की पहली झलक
अचानक आगे भीड़ बढ़ गई। रिक्शा चालक ने रिक्शा रोक दिया, “मैडम, थोड़ा पैदल चल लें।”
आरती नीचे उतरीं, दो-चार कदम चलीं। तभी पहली बार उन्होंने उस आदमी के चेहरे को ध्यान से देखा और उसी पल उनका दिल जोर से धड़क उठा।
“नहीं, यह मुमकिन नहीं है,” उन्होंने खुद से कहा। इतने सालों में इंसान बदल जाता है, वक्त सब कुछ बदल देता है। शायद यह बस एक भ्रम हो।
वे फिर रिक्शे पर बैठ गईं। थोड़ी देर बाद उन्होंने पूछा, “तुम्हारा नाम क्या है?”
रिक्शा चालक कुछ पल चुप रहा, फिर बोला, “मनोज शर्मा।”
यह नाम सुनते ही आरती के होश उड़ गए। वही नाम जिसे उन्होंने सालों से अपने सीने में दफन कर रखा था। किसी तरह खुद को संभालते हुए पूछा, “कहां के रहने वाले हो?”
“पहले शहर में रहता था मैडम, अब यहीं हूं,” उसने छोटा सा जवाब दिया।
हर शब्द के पीछे एक अधूरी कहानी छुपी थी। अब उन्हें यकीन होने लगा था, यह कोई इत्तेफाक नहीं है। यह वही इंसान हो सकता है जिसे उन्होंने सालों पहले खो दिया था। लेकिन इतनी बड़ी सच्चाई को मानना आसान नहीं था।
मंदिर के पास आकर रिक्शा रुका। मनोज नीचे उतरा और बोला, “मैडम, मंदिर आ गया।”
आरती उतरते वक्त कुछ पल उसे देखती रहीं। मनोज ने किराए के लिए हाथ बढ़ाया। पैसे देते हुए आरती ने पूछा, “तुम यहां अकेले रहते हो?”
“हां मैडम, अकेला ही हूं।”
वह कुछ और पूछना चाहती थीं, बहुत कुछ। लेकिन तभी मंदिर की घंटियां तेज बज उठीं, भीड़ दर्शन के लिए आगे बढ़ने लगी। मनोज ने कहा, “मैडम, मैं चलता हूं,” और वह रिक्शा खींचते हुए आगे बढ़ गया।

अतीत की परछाई
आरती शर्मा वहीं की वहीं खड़ी रह गईं। आज उनका मन भगवान के दर्शन में नहीं था, उनका दिल उस रिक्शा चालक के पीछे चला गया था, जिसे उन्होंने एक साधारण आदमी समझकर रिक्शे पर बैठकर सफर किया था। वह शायद उनका ही अतीत था, उनका ही खोया हुआ रिश्ता था।
दर्शन के बाद वह बाहर आईं और मंदिर के एक कोने में बैठ गईं। दिल सवालों से भरा हुआ था।
अगर वह आदमी वही मनोज है, तो यहां कैसे पहुंचा? इतने सालों तक कहां रहा? और सबसे बड़ा सवाल — उसने कभी उनसे मिलने की कोशिश क्यों नहीं की?
दिल में हल्का सा गुस्सा भी था, लेकिन उससे कहीं ज्यादा एक अनजानी चिंता।
कुछ देर बाद उन्होंने अपने सुरक्षाकर्मी को बुलाया और कहा, “उस रिक्शा वाले को ढूंढकर ले आओ।”
सच का सामना
ज्यादा वक्त नहीं लगा। मनोज शर्मा मंदिर के पास ही एक पुराने पेड़ के नीचे बैठा मिला, शायद रोज की तरह भक्तों के बाहर निकलने का इंतजार कर रहा था। जब उसे बुलाया गया तो वह थोड़ा घबरा गया, उसे लगा शायद कोई शिकायत हो गई है। उसने सिर झुकाकर कहा, “मैडम, कोई गलती हो गई क्या?”
आरती शर्मा ने पहली बार उसकी सामने अपनी आवाज नरम रखी, “नहीं, कोई गलती नहीं है। बस तुमसे कुछ बात करनी है।”
मनोज सोच भी नहीं सकता था कि इतनी बड़ी अफसर उसके साथ यूं बैठकर बात करेंगी। दोनों पास की सीढ़ियों पर बैठ गए। कुछ पल खामोश ही रहे। फिर आरती ने धीरे से पूछा, “तुम यहां कब से हो?”
“लगभग 7 साल हो गए मैडम।”
यह सुनते ही आरती की आंखें भर आईं। ठीक वही वक्त जब मनोज अचानक उनकी जिंदगी से गायब हो गया था। उन्होंने खुद को संभालते हुए पूछा, “इससे पहले क्या करते थे?”
“जो सामने आ गया, वही करता रहा मैडम।”
जवाब छोटा था, लेकिन दर्द बहुत बड़ा।
अब आरती का दिल मान चुका था, सामने बैठा आदमी वही मनोज है — उनका पति। लेकिन वह चाहती थीं कि सच्चाई उसके मुंह से निकले।
उन्होंने सीधा सवाल किया, “मनोज, तुम भागे क्यों थे?”
यह सुनते ही मनोज जैसे पत्थर का हो गया। उसने इधर-उधर देखा जैसे कोई सुन तो नहीं रहा।
“मैडम, मैं भागा नहीं था, मुझे मजबूर किया गया था।”
“किसने मजबूर किया और क्यों?”
“जब आप आईपीएस बनी थीं, आपने बहुत लोगों के खिलाफ कार्रवाई की थी। कई लोगों का धंधा बंद हो गया था। वे लोग आपसे बदला लेना चाहते थे। उन्होंने मुझे निशाना बनाया। कहा गया कि मैं आपका नाम लेकर लोगों से पैसे मांगता हूं। फर्जी शिकायतें करवाई गईं, नकली वीडियो और फोटो बनाए गए। धीरे-धीरे बात फैल गई कि आईपीएस का पति ही ठीक आदमी नहीं है।”
“लेकिन तुमने मुझे बताया क्यों नहीं?”
“बताने आया था मैडम, मगर आपके ऑफिस के कुछ लोगों ने कहा, अगर मैं आपके पास आया तो मामला और बिगड़ जाएगा, आपकी नौकरी खतरे में पड़ जाएगी। मैं डर गया। मैंने सोचा अगर मैं दूर चला जाऊं तो शायद आपकी इज्जत बच जाए।”
“तो तुम सब कुछ छोड़कर चले गए?”
मनोज ने सिर हां में हिला दिया, “मेरे पास ना घर था, ना पहचान। जहां गया लोग कहते आईपीएस का पति है, जरूर गड़बड़ करेगा। आखिरकार बनारस आ गया। यहां किसी ने सवाल नहीं किए, बस यही कहा — मेहनत करो, पेट भर लो।”
उसकी बातें सुनते-सुनते आरती की आंखें नम हो गईं। कुछ पल की खामोशी के बाद उन्होंने आखिरी सवाल किया, “और तुमने कभी मुझसे मिलने की कोशिश नहीं की?”
“रोज मन करता था आपसे मिलने का, लेकिन डर लगता था मैडम। सोचता था कहीं मेरी वजह से आपको फिर से नुकसान ना हो जाए। यहां आकर बस भगवान के सहारे जीने लगा।”
“मनोज, तुमने बहुत बड़ा त्याग किया है। मगर अब चुप रहने का वक्त खत्म हो गया है।”
मनोज घबरा गया, “मैडम, मैं नहीं चाहता कि आप फिर किसी मुसीबत में पड़ें।”
आरती ने पहली बार पूरे यकीन के साथ कहा, “अब मैं अकेली नहीं हूं, और जिन लोगों ने यह सब किया है, उन्हें उनकी सजा जरूर मिलेगी।”
यह सुनकर मनोज की आंखों में डर और उम्मीद दोनों एक साथ उतर आए। “क्या सच में अब कुछ बदल सकता है?”
“अब सच्चाई बाहर आएगी। जो लोग समझते थे कि तुम्हें तोड़कर मुझे भी तोड़ देंगे, वे गलत थे।”
साजिश की परतें खुलती हैं
उसी रात आरती ने मनोज से साफ कहा, “अभी किसी को कुछ नहीं बताना है। अभी तुम सिर्फ मनोज नहीं हो, तुम मेरे पति हो। लेकिन दुनिया के लिए फिलहाल तुम वहीं रहोगे जो आज हो। हर कदम सोच-समझकर उठाना होगा।”
अगली सुबह बहुत जल्दी आरती की नींद खुल गई। मंदिरों के कपाट खुल रहे थे, साधु-संत गंगा स्नान को जा रहे थे। बनारस की हवा में वही पुरानी शांति थी, लेकिन उनके दिल में अब तूफान उठ चुका था। उन्होंने अपने सुरक्षाकर्मी को बुलाया और साफ निर्देश दिए, “मनोज को चुपचाप सरकारी गेस्ट हाउस ले आओ, बिना किसी शोर के, बिना किसी सवाल के।”
जब मनोज गेस्ट हाउस पहुंचा तो उसका दिल तेज धड़क रहा था। सालों बाद किसी सरकारी इमारत में कदम रखते ही पुराने जख्म जाग उठे — झूठे आरोप, बदनामी, अपमान — सब कुछ आंखों के सामने घूम गया। उसने घबरा कर पूछा, “मैडम, अगर किसी ने मुझे पहचान लिया तो?”
आरती ने पूरे भरोसे से कहा, “कोई नहीं पहचानेगा और अगर पहचान भी लिया तो अब डरने की जरूरत नहीं है।”
कमरे में बैठकर आरती ने एक-एक बात फिर से पूछी, “शुरुआत से बताओ, कौन-कौन लोग थे, किसने क्या किया, एक भी बात मत छुपाना।”
मनोज ने गहरी सांस ली और बोलना शुरू किया, “सब कुछ तब बिगड़ना शुरू हुआ जब आपने उस बड़े जमीन घोटाले पर कार्रवाई की थी। कई बड़े लोग पकड़े गए थे। आपके ऑफिस के कुछ लोग अचानक बदलने लगे।”
उसने बताया, “कैसे एक दिन कुछ लोग मेरे पास आए और बोले, तुम आईपीएस के पति हो, लोगों की मदद करनी चाहिए। जब मैंने मना किया, उसी दिन से मेरे खिलाफ बातें फैलनी शुरू हो गईं। फिर एक दिन मुझसे कहा गया कि आप पर ऊपर से दबाव है, अगर मैं चुपचाप दूर चला जाऊं तो सब शांत हो जाएगा।”
थोड़ी देर की खामोशी के बाद मनोज ने एक नाम लिया, “आपका पीए — सुधीर वर्मा।”
सबूतों की तलाश
सुधीर वर्मा — वही इंसान जिस पर आरती ने आंख बंद करके भरोसा किया था। आरती ने फौरन अपना लैपटॉप और फाइलें मंगवाईं, पुराने मामलों को खोलकर देखने लगीं। मनोज जो-जो बता रहा था, हर बात फाइलों से मेल खा रही थी। जिन दिनों मनोज पर इल्जाम लगे थे, उन्हीं दिनों कई बड़े मामलों की जांच जानबूझकर धीमी कर दी गई थी।
“मैं बस यही चाहता था कि आप सुरक्षित रहें, मैडम।”
उसी दिन आरती ने अपने सबसे भरोसेमंद अफसर को फोन किया, “मुझे 7 साल पुराने कुछ केस की पूरी फाइलें चाहिए, बिना किसी को बताए।”
शाम होते-होते वे फाइलें उनके सामने थीं। हर पन्ने के साथ सच्चाई अब और साफ होती जा रही थी। तारीखों में हेरफेर था, और सबसे चौंकाने वाली बात — कुछ अहम दस्तावेजों पर सुधीर वर्मा के दस्तखत साफ नजर आ रहे थे।
अब आरती को पूरा यकीन हो चुका था, यह कोई छोटी चाल नहीं थी, यह एक गहरी सोची-समझी साजिश थी।
रात को मनोज ने डरते-डरते पूछा, “मैडम, अगर आपने यह मामला उठाया तो बहुत लोग आपके खिलाफ खड़े हो जाएंगे।”
आरती ने कहा, “अगर पुलिस डरने लगे तो अपराधी बेखौफ हो जाते हैं। अब ऐसा नहीं होगा।”
उन्होंने तय कर लिया था — जल्दबाजी नहीं, पहले सबूत मजबूत होंगे, फिर कार्रवाई। मनोज को फिलहाल वहीं सुरक्षित रहने को कहा गया।
उस रात मनोज देर तक सो नहीं पाया। बरसों बाद पहली बार उसे महसूस हुआ कि उसका दर्द सुना गया है, समझा गया है।
दूसरी तरफ आरती शर्मा खिड़की के पास खड़ी थीं। अब उनकी लड़ाई सिर्फ अपने पति के लिए नहीं है, बल्कि हर उस बेगुनाह के लिए है जिसे ताकतवर लोग कुचल देते हैं।
सच्चाई की लड़ाई
अगली सुबह उन्होंने मनोज से कहा, “अब हर कदम सोच-समझकर उठेगा, जो भी होगा सबूत के साथ होगा।”
“मैडम, मुझे आपके फैसले पर पूरा भरोसा है।”
उसी दिन आरती बनारस से सीधे अपने कार्यक्षेत्र के लिए रवाना हो गईं। ऑफिस पहुंचते ही उन्होंने अपने सबसे भरोसेमंद इंस्पेक्टर को बुलाया, “मुझे 7 साल पुराने तीन मामलों की पूरी फाइल चाहिए, बिना किसी को बताए।”
इंस्पेक्टर ने हैरानी से देखा, मगर सवाल नहीं किया, “जी मैडम।”
फाइलें आईं तो आरती ने एक-एक कागज ध्यान से पढ़ा — तारीखें, बयान, गवाह — सब कुछ धीरे-धीरे एक तस्वीर बना रहा था। जिन गवाहों ने मनोज के खिलाफ बयान दिए थे, वे सब एक ही इलाके से थे। कई बयान बिल्कुल एक जैसे शब्दों में लिखे गए थे। आरती ने फाइल बंद की और गहरी सांस ली — यानी सच जानबूझकर दबाया गया था।
इसके बाद कॉल रिकॉर्ड निकलवाए गए — जिन नंबरों से मनोज को धमकियां दी गई थीं, वे सभी एक ही दायरे में घूम रहे थे। कुछ नंबर एक बड़े व्यापारी के ऑफिस से जुड़े थे, तो कुछ एक वरिष्ठ अधिकारी के निजी फोन से।
अब शक यकीन में बदल चुका था। अगला नाम था — सुधीर वर्मा।
साजिश का पर्दाफाश
शाम को सुधीर वर्मा को ऑफिस बुलाया गया। वह अंदर आया तो चेहरे पर बनावटी मुस्कान थी, “मैडम, आपने याद किया?”
आरती ने बिना मुस्कुराए कहा, “हां, बैठो।”
फिर सीधे सवाल किया, “सुधीर वर्मा, 7 साल पहले मनोज शर्मा के खिलाफ जो शिकायतें आई थीं, उनमें तुम्हारी क्या भूमिका थी?”
सुधीर ने बचाव की कोशिश की, “मैडम, मैं तो सिर्फ आदेश मान रहा था।”
“किसके आदेश?”
“ऊपर से दबाव था मैडम।”
“ऊपर कौन?”
सुधीर चुप रहा।
आरती ने सख्ती से कहा, “अगर सच नहीं बताया तो यही खामोशी तुम्हें जेल पहुंचाएगी।”
“मैडम, बड़े लोग थे। एक वरिष्ठ अधिकारी और एक बड़ा व्यापारी। उन्होंने कहा था अगर मनोज शर्मा हट जाएगा तो आप कमजोर पड़ जाएंगी।”
आरती ने तुरंत आदेश दिया, “सुधीर वर्मा को निलंबित किया जाए और हिरासत में लिया जाए।”
अगले दो दिनों में जांच और तेज हो गई। व्यापारी राकेश गुप्ता के ठिकानों पर छापे पड़े — नकद पैसा, फर्जी कागजात और रिश्वत के ठोस सबूत मिले। राकेश गुप्ता को हिरासत में ले लिया गया। फिर नंबर आया वरिष्ठ अधिकारी सोनू सिंह का। सोनू सिंह ने बचने की बहुत कोशिश की — फोन किए, दबाव डलवाया। लेकिन इस बार आरती शर्मा पीछे हटने वाली नहीं थीं। सबूत इतने मजबूत थे कि अब बचने का कोई रास्ता नहीं बचा था। सोनू सिंह को भी निलंबित कर गिरफ्तार कर लिया गया।
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