10 साल बाद मिला सेनापति का खोया बेटा, अपनों ने रची मौत की भयानक साजिश!

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10 साल बाद मिला सेनापति का खोया बेटा — अपनों ने रची मौत की भयानक साजिश

दिल्ली की उस पुरानी सब्ज़ी मंडी में उस सुबह कड़ाके की ठंड हड्डियों तक उतर रही थी।
कीचड़ से सने रास्ते, सब्ज़ियों की सड़ी गंध और फटे तिरपालों के नीचे सिकुड़े हुए गरीब—सब कुछ हमेशा जैसा ही था।

लेकिन उस दिन कुछ अलग होने वाला था।

मंडी के एक कोने में खड़ा था एक दस साल का बच्चा—मैले कपड़े, नंगे पैर, और गले में लटका हुआ एक पुराना सा चांदी का लॉकेट
उसके हाथ में सिंघाड़ों की एक छोटी टोकरी थी।

“साहब… सिंघाड़े ले लो ना। दस रुपये के हैं।”
उसकी आवाज़ में भूख थी, डर था, और मजबूरी थी।

उसका नाम था अर्जुन

वह अपनी बीमार माई सावित्री के लिए दवा खरीदने आया था। सावित्री—एक बूढ़ी औरत, जिसने दस साल पहले रेल की पटरियों के किनारे पड़े एक बोरे से इस बच्चे को उठाया था। उस बोरे में बस यही लॉकेट था और एक नवजात की कमजोर सी सांसें।

सावित्री ने भीख नहीं मांगी।
उसने बर्तन मांझे।
लोगों के घर झाड़ू-पोंछा किया।
खुद भूखी रही, लेकिन अर्जुन को कभी भूखा नहीं सोने दिया।

अर्जुन को नहीं पता था कि असली मां-बाप का प्यार क्या होता है।
उसकी दुनिया बस “माई” थी।


लॉकेट का रहस्य

उसी मंडी में उस दिन अचानक अफरा-तफरी मच गई।

काली चमचमाती गाड़ियाँ रुकीं।
सशस्त्र गार्ड उतरे।
और उनके बीच से निकले—
जनरल विक्रम प्रताप सिंह

देश का नामी सेनापति।
वह आदमी जिसके नाम से दुश्मन भी कांपते थे।

विक्रम वहां किसी निरीक्षण के सिलसिले में आए थे। लेकिन उनकी नजर अचानक अर्जुन के गले में लटके उस लॉकेट पर अटक गई।

उनका चेहरा सफेद पड़ गया।

वे झपटकर आगे बढ़े।

“यह लॉकेट… यह तुम्हें कहां मिला?”
उनकी आवाज़ कांप रही थी।

अर्जुन डर गया।
“साहब… चोरी नहीं किया। गंगा मैया की कसम। यह तो तब से मेरे पास है जब मैं पैदा भी नहीं हुआ था। माई कहती है यही मेरी किस्मत है।”

विक्रम के हाथ कांपने लगे।

वह लॉकेट कोई आम चीज़ नहीं था।
उस पर भारतीय सेना की एक विशेष रेजिमेंट का निशान खुदा था—
और पीछे लिखा था—

“विक्रम प्रताप सिंह”

अगले ही पल, वह महान सेनापति उस कीचड़ में घुटनों के बल बैठ गया

“अर्जुन… मेरा बेटा… मेरा बेटा…”

मंडी सन्न रह गई।

एक तरफ सितारों से सजी वर्दी,
दूसरी तरफ फटे कपड़ों में एक बच्चा।

दोनों की आंखों से आंसू उसी गंदी मिट्टी में गिर रहे थे।


10 साल पुरानी वह रात

विक्रम को सब याद आ गया।

दस साल पहले की वह मनहूस रात।

सीमा से लौटते वक्त उनकी जीप की ब्रेक फेल हो गई थी।
जीप खाई में जा गिरी।

उनकी पत्नी उसी हादसे में मर गई।
और नवजात बेटा—अर्जुन—उस भयानक तूफान में कहीं खो गया।

दुनिया ने कहा—बच्चा मर गया।

लेकिन एक बाप का दिल मानने को तैयार नहीं था।

आज वही दिल उसके सीने में धड़क रहा था—
जीवित, सांस लेता हुआ।


माई सावित्री की आख़िरी लड़ाई

विक्रम अर्जुन को गोद में उठाकर सीधे झुग्गियों की ओर दौड़े।

टिन की चादरों से बनी एक झोपड़ी।
अंदर टूटी चारपाई पर लेटी थी माई सावित्री

उसकी सांसें उखड़ रही थीं।

विक्रम उसके चरणों में गिर पड़ा।

“माई… आपने मेरे खून को जिंदा रखा।
आपने एक फौजी की लाज बचा ली।”

सावित्री मुस्कुराई।

“मुझे पता था बेटा… एक दिन तुम आओगे।
इसके माथे पर राजतिलक लिखा था।
मेरा काम पूरा हो गया…”

कुछ घंटों बाद—
सावित्री चली गई।

अर्जुन पहली बार समझा कि मां क्या होती है।


खून के रिश्तों की साजिश

अस्पताल के वीआईपी वार्ड में अर्जुन भर्ती था।

खबर फैल चुकी थी—
जनरल का खोया बेटा जिंदा है।

यह खबर कुछ के लिए खुशी थी…
और कुछ के लिए मौत का फरमान।

विक्रम की बहन देविका
जिसकी नजर सालों से विक्रम की जायदाद पर थी—
उसके चेहरे पर मुस्कान थी, लेकिन आंखों में ज़हर।

“भाई… पक्का है न यह तुम्हारा खून है?”
“कहीं किसी ने नाटक तो नहीं रचा?”

विक्रम दहाड़ उठा।

“यह मेरा बेटा है।
और अगर किसी ने इसकी तरफ टेढ़ी नजर भी डाली—
तो मैं भूल जाऊंगा कि वह अपना है या पराया।”

देविका पीछे हट गई।

लेकिन साजिश वहीं खत्म नहीं हुई।


मौत की कोशिश

उसी रात अस्पताल में नकाबपोश घुसे।

उनके हाथों में इंजेक्शन थे—
हवा भरने वाले।

लेकिन उन्हें नहीं पता था कि जनरल खुद पहरे पर थे

गलियारे में खामोश लेकिन खून से सना संघर्ष हुआ।

एक हमलावर के गले से गिरा लॉकेट—
विक्रम के घर के नौकरों का निशान।

सच सामने आने लगा।


असली गद्दार

कुछ दिन बाद—
हरिद्वार।

पिंडदान के दौरान साधुओं के वेश में हमला।

अर्जुन को गंगा में फेंक दिया गया।

विक्रम बिना सोचे नदी में कूद पड़े।

बर्फीला पानी।
तेज धार।
लेकिन एक बाप की जिद—
यमराज से भी बड़ी।

अर्जुन बच गया।

और तभी उसने सच बताया—

“बाबूजी… आपकी डायरी में नाम लिखा है।
कर्नल सूर्यकांत।”

विक्रम का सबसे करीबी दोस्त।

वही था साजिशकर्ता।

सामने आकर सूर्यकांत ने कबूल किया—

“हां, मैंने सब किया।
तुम्हारी पत्नी… तुम्हारा बेटा…
सब मेरी वजह से।”


न्याय का पल

अर्जुन के हाथ में पिस्तौल थी।

दस साल का बच्चा।
लेकिन आंखों में योद्धा की आग।

ट्रिगर दबा।

गोली दीवार में लगी।

“तुम्हें मारना मेरे हाथों को गंदा करना है।
तुम गद्दार की तरह जियोगे।”

यही असली जीत थी।

सूर्यकांत और देविका—
दोनों को उम्रकैद हुई।


भविष्य का सेनापति

पांच साल बाद।

देहरादून।
इंडियन मिलिट्री अकादमी।

स्वॉर्ड ऑफ ऑनर
कैडेट अर्जुन प्रताप सिंह।

विक्रम की आंखों से आंसू बह रहे थे।

लेकिन अर्जुन की मंजिल अभी बाकी थी।

वह अपने पिता को लेकर फिर उसी सब्ज़ी मंडी में लौटा।

जहां कभी वह सिंघाड़े बेचता था।

आज वहां खड़ा था—
एक फौजी अफसर

और उसी जगह बना था—

“सावित्री विद्या मंदिर”
अनाथ बच्चों के लिए मुफ्त स्कूल।


अंत नहीं… शुरुआत

अर्जुन ने एक सिंघाड़ा उठाया।

“यह मेरा अतीत है।
मैं चाहे आसमान छू लूं—
मेरे पैर इसी मिट्टी में रहेंगे।”

विक्रम समझ गए—

सबसे बड़ी जीत सरहद पर नहीं,
किसी टूटे बच्चे के दिल में उम्मीद जगाने में होती है।


समाप्त