जब आर्मी ऑफिसर ने सिखाया दरोगा को सबक। फिर जो हुआ।
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दिवाली का त्योहार अपने रंग-बिरंगे दियों, मिठाइयों और खुशियों के साथ पूरे शहर में छाया हुआ था। बाजार की गलियां रौनक से भरी थीं, हर तरफ भीड़ उमड़ रही थी। बच्चे खिलखिला रहे थे, महिलाएं नए कपड़े खरीद रही थीं, और दुकानदार अपनी दुकानों को सजाने में व्यस्त थे। इसी बीच, सड़क के किनारे एक छोटी सी ठेले पर सुमित्रा देवी अपने हाथों से बनाए मिट्टी के दिये और मोमबत्तियां बेच रही थीं। उम्र के लगभग पचपन साल, चेहरे पर थकान और मेहनत की लकीरें साफ झलक रही थीं, लेकिन उसकी आंखों में उम्मीद की चमक अभी भी बरकरार थी। उसकी इकलौती बेटी पिंकी, जो भारतीय सेना में अफसर थी, देश की सीमा पर तैनात थी और देश की रक्षा कर रही थी।
सुमित्रा हर साल दिवाली से पहले मिट्टी के दिये बनाती और इन्हीं से अपना गुजारा चलाती। इस साल भी उसने बिना किसी को बताए बाजार में अपना ठेला लगाया था। वह जोर-जोर से लोगों को बुला रही थी, “दिये ले लो, दिये! बिल्कुल सस्ते दाम में, हाथों से बनाए रंग-बिरंगे दिये जलाकर देखो, सब बराबर जलेंगे।” उसकी आवाज़ में मेहनत और उम्मीद की मिठास थी।
भीड़ को चीरते हुए एक बाइक सवार दो पुलिस वाले आए। उनमें से एक दरोगा अशोक सिंह था, जो अपने गुस्से और रब के लिए पूरे इलाके में कुख्यात था। उसका एक सिपाही हमेशा उसके साथ रहता था, जो उसकी हरकतों में उसका साथ देता था। वे दिवाली के बहाने बाजार में घूम रहे थे, लेकिन असल में उनकी नजर दुकानदारों से वसूली करने पर थी।
अशोक ने दिये के ठेले पर नजर डाली और एक दिये को उठाकर उलट-पलट कर देखने लगा। उसने कहा, “अरे, दिये तो बहुत अच्छे बने हैं, रंग भी अच्छे लग रहे हैं।” सुमित्रा ने मुस्कुराते हुए कहा, “साहब, ये नए डिजाइन हैं, अगर चाहें तो कुछ पैक कर दूं।” अशोक ने कहा, “चलो, पैक कर दो कुछ दिये, और हां, मोमबत्तियां भी पैक कर देना, ध्यान रखना कहीं कोई टूटा-फूटा न हो।” सुमित्रा ने तेजी से अखबार में दिये लपेटे और पैक बनाकर उसे सौंप दिया।
जब उसने कीमत बताई, “साहब, ₹500 हुए,” तो दरोगा का चेहरा अचानक तमतमाया। “क्या बोली तू? दियों के पैसे 500?” उसने गुस्से में कहा, “मुझसे पैसे मांगती है? तू जानती नहीं मैं कौन हूं? पुलिस वाले से पैसे मांगती है?” सुमित्रा घबराई, लेकिन बोली, “साहब, ये मेहनत के पैसे हैं, मुफ्त में तो कुछ नहीं दे सकती।” अशोक ने चेतावनी दी, “ज्यादा जुबान मत चला मेरे सामने, वरना एक मिनट भी नहीं लगेगी अंदर करने में।” सुमित्रा ने शांत स्वर में कहा, “साहब, मैं मेहनत के पैसे मांग रही हूं।” इस पर दरोगा ने जोरदार थप्पड़ सुमित्रा के गाल पर जड़ दिया। थप्पड़ की आवाज इतनी तेज थी कि आसपास खड़े लोग चौंक गए, भीड़ जमा होने लगी, कुछ लोग वीडियो बनाने लगे, लेकिन कोई भी आगे नहीं आया।

दरोगा ने ठेले को लात मारी, जिससे सारे दिये सड़क पर गिर गए, कुछ टूट गए। सुमित्रा ने बिखरे हुए दिये और मोमबत्तियां समेटनी शुरू की। भीड़ में खड़ा एक नौजवान अमित था, जो उसी मोहल्ले का रहने वाला था और सुमित्रा को ‘आंटी’ कहता था। उसने मोबाइल निकाला और तुरंत सेना में तैनात पिंकी को कॉल किया। उसने बताया, “दीदी, आपकी मां को दरोगा ने बाजार में थप्पड़ मारा है, सबने देखा है।” पिंकी की आवाज भारी हो गई, “क्या कहा? सच में?” उसने कहा, “सच बोल रहा हूं, सबने देखा।” पिंकी ने कहा, “ठीक है, मैं आ रही हूं।”
अगली सुबह पिंकी छुट्टी लेकर अपने शहर पहुंची। उसने देखा कि उसकी मां थके हुए चेहरे के साथ दिए बना रही थी, पर मुस्कुराने की कोशिश कर रही थी। पिंकी ने मां को गले लगाया और पूछा, “मां, कल क्या हुआ था बाजार में?” सुमित्रा ने पहले टालना चाहा, लेकिन फिर पूरी बात बताई कि कैसे दरोगा ने पैसे मांगने पर थप्पड़ मारा, ठेला तोड़ा, और लोग तमाशा देखते रहे। उसने पिंकी से कहा, “बेटी, उससे पंगा मत लेना, वो बहुत ऊंची पहुंच वाला है, भारी पड़ जाएगा।” पिंकी ने कहा, “मां, मैंने कहा था कि आप घर पर रहो, लेकिन आपने सुनी नहीं। चिंता मत करो, मैं सब देख लूंगी। कल हम फिर वहीं जाएंगे।”
वहीं दरोगा अशोक थाने में बैठा था और अपनी हरकतों से खुश था। एसएओ के कमरे में जाकर उसने बताया, “साहब, आज तो मजा आ गया। एक बूढ़ी औरत थी, मैंने उससे दिये लिए, फिर उसने मुझसे पैसे मांगे। मैंने ऐसा थप्पड़ मारा कि दिये ही बिखर गए।” एसएओ हंस पड़ा, “वाह, अशोक, तू कमाल कर गया।” दरोगा ने कहा, “अगर रोज ऐसे दिये उठाते रहें और आधे दाम में बेच दें तो दिवाली मस्त गुजरेगी।” एसएओ ने कहा, “यह इलाका हमारा है, सब डरते हैं।”
अमित ने यह सब सुना और तुरंत पिंकी को फोन किया, “दीदी, दरोगा फिर आपकी मां के बारे में हंस रहा था, कह रहा था कि हम दिये आधे दाम में बेचेंगे।” पिंकी ने कहा, “मां, कल फिर चलो बाजार, अब डरने का वक्त नहीं।”
अगले दिन शाम को सुमित्रा फिर से वही ठेला लगाकर दिये बेच रही थी, पर इस बार उसकी बेटी पिंकी भी साथ थी। लोग उन्हें देखकर फुसफुसाने लगे, “यह वही आर्मी अफसर पिंकी है, जिसकी मां को दरोगा ने मारा था।” थोड़ी देर बाद दरोगा आया, उसी घमंड के साथ। उसने कहा, “फिर आ गई तू? कल समझाया था।” सुमित्रा कुछ नहीं बोली, लेकिन पिंकी आगे बढ़ी और दरोगा के सामने खड़ी हो गई।
दरोगा ने गुस्से में कहा, “तो तू है उसकी बेटी? चल, कुछ दिये और मोमबत्तियां पैक कर दे।” पिंकी ने बिना कुछ कहे दिये और मोमबत्तियां पैक करके उसे थमा दीं। जैसे ही दरोगा बाइक स्टार्ट करने लगा, पिंकी ने सख्त लहजे में कहा, “साहब, ₹800 हुए, जल्दी दीजिए।” दरोगा झट से बाइक से उतरा, “अरे, मुझसे पैसे मांग रही है?” पिंकी ने कहा, “साहब, मैं तो अपनी मेहनत के पैसे मांग रही हूं, और वैसे भी कोई सामान फ्री में नहीं मिलता।” दरोगा ने दांत पीसते हुए कहा, “तू जानती है मैं कौन हूं? मेरी पहुंच ऊपर तक है। एक मिनट में तेरे ठेले को उठा दूंगा और चोरी का इल्जाम लगाकर अंदर कर दूंगा। यह इलाका मेरा है।”
पिंकी ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा, “अब देख लेना, आगे क्या होता है।” बाजार में भीड़ जमा हो गई। एसएचओ को खबर मिल चुकी थी और वह मौके पर पहुंच रहा था। पिंकी ने कहा, “डराने की कोशिश मत कीजिए। यह इलाका आपका नहीं, इस देश का है, और कानून सबके लिए बराबर है।” दरोगा का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उसने जोर से कहा, “तेरी हिम्मत कैसे हुई मेरे सामने बोलने की?” और पिंकी की गाल पर जोरदार थप्पड़ जड़ दिया। पूरा बाजार सन्न रह गया।
सुमित्रा ने बेटी का हाथ थामा। पिंकी का चेहरा लाल था, लेकिन उसकी नजरें अभी भी सीधी थीं। उसने कहा, “साहब, अब देख लेना आगे क्या होता है।” दरोगा हंसा, “देखता हूं तेरे जैसे कितने आते हैं।” और दिये और मोमबत्तियों से भरा पॉलिथीन उठाकर बाइक की ओर चल पड़ा।
पिंकी ने मां से कहा, “अब डरने की कोई जरूरत नहीं है। कानून सबके लिए बराबर होता है। अगर दरोगा गलत किया है तो उसे सजा मिलेगी।” सुमित्रा ने हल्के स्वर में कहा, “बेटी, वो बड़े लोग हैं।”
कुछ देर बाद पिंकी और सुमित्रा थाने पहुंचीं। अंदर दो सिपाही उन्हें घूरने लगे। एक ने पूछा, “क्या काम है?” पिंकी ने सख्त स्वर में कहा, “हम एसएओ से मिलना चाहते हैं।” सिपाही ने कहा, “एसएचओ व्यस्त है, पहले बताओ क्या काम है?” पिंकी ने कहा, “रिपोर्ट दर्ज करवानी है।” सिपाही ने हंसकर कहा, “रिपोर्ट? यहां तो पहले एसएओ से इजाजत लेनी पड़ती है।”
थोड़ी देर बाद एसएओ राकेश चौधरी बाहर आए। उनका चेहरा घमंड से भरा था, गले में सोने की चैन चमक रही थी। उन्होंने पिंकी और उसकी मां को देखा और कहा, “बोलो, कौन हो तुम? यहां क्या करने आई हो?” पिंकी ने कहा, “रिपोर्ट लिखवाने आई हूं।” एसएओ ने कहा, “यहां रिपोर्ट नहीं लिखी जाती, चलो यहां से।” पिंकी ने कहा, “रिपोर्ट लिखना आपका काम है।” एसएओ ने कहा, “ठीक है, लेकिन इसके लिए ₹1000 फीस देनी होगी।” पिंकी ने हैरानी से पूछा, “रिपोर्ट दर्ज करवाने के लिए पैसे?” एसएओ ने कहा, “यह नियम है।” पिंकी ने पैसे निकालकर रख दिए।
एसएओ ने पूछा, “किसकी रिपोर्ट?” पिंकी ने कहा, “दरोगा अशोक सिंह की, जिसने मेरी मां के साथ मारपीट की।” एसएओ का चेहरा बदल गया। उसने कहा, “यह कोई बड़ी बात नहीं।” पिंकी ने कहा, “मुझे रिपोर्ट लिखवानी है।” एसएओ ने कहा, “यहां हमारे अपने नियम चलते हैं।”

पिंकी ने धमकी दी, “अगर रिपोर्ट नहीं लिखी गई तो मैं ऊपर तक जाऊंगी।” एसएओ का चेहरा सख्त हो गया। उसने कहा, “क्या बकवास कर रही हो? मेरे दरोगा की रिपोर्ट लिखवाना चाहती हो? अब यहां से निकल जाओ, नहीं तो अंदर कर दूंगा।”
पिंकी और सुमित्रा थाने से बाहर निकलीं। दरोगा अशोक अपने पुराने जान-पहचान वाले दुकानदार रामू के पास गया, जो चमकते दमकते दियों और मोमबत्तियों की दुकान चलाता था। अशोक ने रामू से कहा, “मेरे पास कुछ दिये हैं, आधे दाम में ले लो।” रामू ने कहा, “ठीक है, दे दो।” अशोक ने ₹500 लिए और थाने जाकर एसएओ को बताया, “उस महिला से फ्री में दिये लिए, ₹500 में रामू को दे दिए।” एसएओ खुश हुआ, “आज का खर्चा निकल गया।”
अगले दिन पिंकी ने अपने चाचा के बेटे, जो शहर का सरपंच था, रोहित को फोन किया। उसने कहा, “भाई, दरोगा ने मुझे भरे बाजार में बेइज्जत किया, थप्पड़ मारा और एसएओ ने रिश्वत मांगी। मुझे आपकी मदद चाहिए।” रोहित ने कहा, “शाम तक बाजार पहुंचो।”
शाम को सूरज की हल्की पीली रोशनी में रोहित बोलेरो लेकर बाजार पहुंचा। पिंकी ने कहा, “अब समय आ गया है, चलो थाने चलते हैं।” थाने पहुंचते ही एसएचओ ने हंसते हुए कहा, “फिर आ गई, यह कौन है तेरे साथ?” तभी गाड़ियों की हॉर्न और सायरन की आवाज़ें गूंजने लगीं। मंत्री कुलदीप सिंह थाने पहुंचे। उनका नाम सुनते ही अफसरों की धड़कनें तेज हो गईं।
मंत्री ने पिंकी को देखा और हाथ जोड़कर कहा, “मैडम, आप मुझे पहले बता देतीं, मैं खुद आ जाता।” सब सन्न रह गए। पिंकी ने कहा, “मैं शिकायत दर्ज करवाने आई हूं।” मंत्री ने पूछा, “किसकी शिकायत?” पिंकी ने रोहित की ओर देखा और कहा, “दरोगा अशोक ने मुझे भरे बाजार में थप्पड़ मारा।” मंत्री ने कहा, “मैं तुरंत इन्हें सस्पेंड कर देता हूं।” एसएओ ने हकलाते हुए कहा, “यह तो हल्का मामला है।” मंत्री ने कड़क आवाज़ में कहा, “यह कौन है? इन्हें अभी के अभी सस्पेंड करो।”
पूरा थाना सन्न रह गया। मंत्री की सख्ती देखकर दरोगा और एसएओ दोनों डर गए। यह कहानी हमें सिखाती है कि चाहे कितनी भी ताकतवर कोई हो, अगर हम अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाएं और सही रास्ते पर चलें, तो न्याय जरूर मिलता है। समाज में बदलाव तभी आता है जब हम अन्याय के खिलाफ खड़े होते हैं। पिंकी और उसकी मां की कहानी हमें यह प्रेरणा देती है कि साहस और हिम्मत से हर मुश्किल का सामना किया जा सकता है।
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