बेटे ने माँ और बहन को घर से निकाल दिया… लेकिन माँ ने जो किया, पूरी दुनिया रो पड़ी

माँ का बलिदान और स्वाभिमान

भाग 1: पुराने आंगन की महक और ममता

गांव के उस छोटे से कच्चे-पक्के घर में आज भी वही पुरानी सी खुशबू बसी हुई थी। सुबह होते ही गोबर से लिपे आंगन की मिट्टी से उठती सौंधी महक, तुलसी के चौरे के पास जलता दिया और दीवार पर टंगी भगवान की तस्वीर, जिसके सामने रोज शारदा देवी हाथ जोड़कर खड़ी हो जाया करती थीं। समय बदल गया था, लेकिन उस घर में समय जैसे ठहर गया था। शारदा देवी ने अपनी पूरी जिंदगी इसी घर में गुजार दी थी। यही घर उनकी हंसी, उनके आंसू, उनकी मेहनत और उनकी कुर्बानी का साक्षी था।

शारदा देवी एक ऐसी माँ थीं, जिसने कभी अपने लिए कुछ नहीं मांगा। अपने पति के देहांत के बाद, उन्होंने अपने दोनों बच्चों—अमित और राधा—को पालने के लिए अपनी खुशियों को तिलांजलि दे दी थी। अमित तब बहुत छोटा था और राधा तो गोद में ही थी। शारदा देवी की दिनचर्या सूरज उगने से पहले शुरू होती थी। दूसरों के खेतों में मजदूरी करना, शाम को थककर घर लौटना और फिर बच्चों के लिए चूल्हे पर रोटियां सेंकना—यही उनका जीवन था। कभी बुखार होता, कभी बदन दर्द, लेकिन बच्चों के सामने उन्होंने कभी हार नहीं मानी।

भाग 2: सपनों की उड़ान और बदलती फितरत

अमित पढ़ाई में बहुत तेज था। शारदा देवी ने उसे बड़ा आदमी बनाने के लिए अपने गहने तक बेच दिए, खेत गिरवी रख दिए और शहर के बड़े कॉलेजों की फीस भरने के लिए दूसरों के घरों में बर्तन तक माँझे। उनका बस एक ही सपना था—”मेरा बेटा बड़ा आदमी बने।” वह दिन आया भी, अमित शहर गया, अच्छी नौकरी मिली और उसकी शादी नेहा से हो गई। नेहा शहर की पढ़ी-लिखी और आधुनिक विचारों वाली लड़की थी, जिसे गांव की सादगी ‘गवारपन’ लगती थी।

शादी के कुछ समय बाद अमित माँ और बहन को शहर ले आया। शारदा देवी को लगा कि अब बुढ़ापे में सहारा मिलेगा, पर उन्हें क्या पता था कि शहर की ऊंची इमारतों में रिश्तों की गहराई कम हो चुकी है। नेहा को शारदा देवी का पहनावा, उनकी पूजा-पाठ और राधा की सादगी से चिढ़ होने लगी। घर में तनाव बढ़ने लगा। अमित, जो कभी माँ के आंचल में छिपता था, अब अपनी पत्नी की खुशी के लिए माँ को ही बोझ समझने लगा था।

भाग 3: घर से निकाला जाना और माँ का संकल्प

एक बरसात की रात, जब राधा की तबीयत बहुत खराब थी, घर में कलेश बढ़ गया। नेहा ने ताना मारा, “इन दोनों का खर्च और बीमारी का नाटक अब मुझसे बर्दाश्त नहीं होता।” अमित ने भी अपना आपा खो दिया और चिल्लाकर कहा, “बस माँ! अब बहुत हो गया। तुम दोनों इस घर में सिर्फ बोझ हो। कल सुबह तुम लोग गांव चली जाओ।”

शारदा देवी सन्न रह गईं। जिस बेटे की उंगली पकड़कर चलना सिखाया, आज वही उन्हें दरवाजे के बाहर का रास्ता दिखा रहा था। “बेटा, यह घर किसका है?” उन्होंने कांपती आवाज में पूछा। अमित ने बेरुखी से कहा, “अब मेरा है माँ, कागजों में भी और हक में भी।” उस रात शारदा देवी सो नहीं पाईं। उन्होंने चुपचाप अपना पुराना बक्सा उठाया। जाते समय उन्होंने बस इतना कहा, “बेटा, माँ कभी खाली हाथ नहीं जाती।”

गांव वापस पहुँचकर शारदा देवी और राधा को बहुत तंगी देखनी पड़ी। रहने को सिर्फ खंडहर नुमा घर बचा था। लेकिन शारदा देवी टूटी नहीं। उन्होंने फिर से मजदूरी शुरू की और राधा को फिर से पढ़ने के लिए प्रेरित किया। अब वह सिर्फ एक माँ नहीं थीं, बल्कि एक ऐसी औरत बन चुकी थीं जिसने अपने वजूद की लड़ाई शुरू की थी।

भाग 4: एक नई पहचान और समाज की आवाज

शारदा देवी ने गांव की अन्य औरतों को इकट्ठा किया। उन्होंने सिखाया कि बच्चों को सब कुछ देना ठीक है, लेकिन अपना स्वाभिमान और अपना हक कभी नहीं छोड़ना चाहिए। उनकी कहानी अखबारों में छपने लगी। शहर के एक पत्रकार ने उनका इंटरव्यू लिया और देखते ही देखते शारदा देवी ‘बुजुर्गों के सम्मान’ का चेहरा बन गईं। उनकी आवाज़ टीवी चैनलों तक पहुँची।

उधर शहर में अमित और नेहा की जिंदगी भी सुखद नहीं रही। नेहा का व्यवहार और कड़वा हो गया और अमित को अपनी गलती का अहसास होने लगा। एक दिन अमित ने टीवी पर अपनी माँ को देखा। शारदा देवी कह रही थीं, “मैंने अपने बेटे को सब कुछ दिया, पर जब मुझे सहारे की जरूरत थी, तो मुझे बोझ कहा गया। मैं बदला नहीं चाहती, बस अपना हक चाहती हूँ।” अमित की आँखों से आंसू बहने लगे। उसे अपनी माँ के वे छाले याद आए जो उसकी फीस भरने के लिए बर्तन मांजते हुए पड़े थे।

भाग 5: कानूनी न्याय और अंतिम बदलाव

शारदा देवी ने कानूनी सहायता ली। वह सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि उन हजारों माताओं के लिए लड़ रही थीं जिन्हें बुढ़ापे में दर-दर भटकना पड़ता था। कोर्ट में सुनवाई हुई। अमित और नेहा को बुलाया गया। शारदा देवी ने जज के सामने बस इतना कहा, “मुझे पैसे नहीं चाहिए, मुझे अपना वह घर वापस चाहिए जहाँ मेरी ममता का अपमान हुआ।”

कोर्ट ने फैसला शारदा देवी के पक्ष में सुनाया। वह घर अब कानूनी रूप से उनके नाम था। अमित और नेहा को वहां से अलग रहने का आदेश मिला। नेहा पछतावे में शहर लौट गई, लेकिन अमित का हृदय परिवर्तन हो चुका था। वह माँ के पैरों में गिरकर फूट-फूटकर रोया। शारदा देवी ने उसे माफ तो कर दिया, लेकिन अब वह गांव में ही रहकर समाज सेवा करना चाहती थीं।

अमित ने अपनी नौकरी छोड़ दी और गांव आकर माँ के साथ रहने लगा। राधा की पढ़ाई पूरी हुई और वह एक वकील बनी, ताकि अपनी माँ की तरह अन्य महिलाओं को न्याय दिला सके। आज भी उस घर के आंगन में तुलसी का चौरा है और दिया जलता है। शारदा देवी अब सिर्फ एक माँ नहीं, बल्कि एक मिसाल हैं।

सीख: माँ का प्रेम निस्वार्थ होता है, लेकिन उसे कमजोरी नहीं समझना चाहिए। जो बेटा अपनी माँ का सम्मान नहीं करता, वह दुनिया में कभी सफल नहीं हो सकता। असली घर ईंट-पत्थर से नहीं, बल्कि रिश्तों के सम्मान से बनता है।