ट्रक ड्राइवर ने महिला पत्नी के साथ किया करनामा/लोगों के होश उड़ गए/

मायाजाल: धोखे की दहलीज

अध्याय 1: बाड़मेर का वह गांव

राजस्थान के बाड़मेर जिले की रेतीली धरती पर बसा ‘मेवा नगर’ नाम का एक शांत गांव। इसी गांव के एक साधारण से मकान में रहने वाला उज्जवल सिंह, जो पेशे से एक ट्रक ड्राइवर था। वह एक मेहनती व्यक्ति था, जिसका जीवन केवल अपने ट्रक के पहियों और अपने परिवार की खुशियों के बीच घूमता था। उज्जवल दिन-रात मेहनत करता ताकि अपने परिवार की हर छोटी-बड़ी जरूरत को पूरा कर सके।

उज्जवल के परिवार में उसकी पत्नी माया देवी और उनका तीन साल का बेटा बबलू था। माया देवी स्वभाव से थोड़ी चंचल और सजावट की शौकीन महिला थी। उसे अच्छे कपड़े पहनना और सजना-संवरना बहुत पसंद था। गांव के लोग अक्सर उसकी सुंदरता की चर्चा करते थे, लेकिन माया के मन में कुछ और ही चल रहा था।

अध्याय 2: माया की असंतोष और बदलती नीयत

उज्जवल अपनी नौकरी के कारण महीने में केवल एक-दो दिन ही घर आ पाता था। माया को यह अकेलापन खलने लगा था। उसे लगने लगा था कि उसका पति उसे वह समय और ध्यान नहीं दे पा रहा है, जिसकी वह हकदार है। धीरे-धीरे माया का मन घर की चारदीवारी से ऊबने लगा और वह अपनी सुख-सुविधाओं और व्यक्तिगत इच्छाओं के लिए गलत रास्तों की तलाश करने लगी।

उसी गांव में रामकुमार नाम के एक व्यक्ति की कपड़े की दुकान थी। रामकुमार का स्वभाव थोड़ा चुलबुला और अवसरवादी था। वह दुकान पर आने वाली महिलाओं से अक्सर हंसी-मजाक किया करता था। माया देवी भी कई बार उसकी दुकान पर जाती थी और रामकुमार की नजरें हमेशा माया की सुंदरता पर टिकी रहती थीं।

अध्याय 3: पहली शर्त और गलत कदम

15 दिसंबर 2025 की सुबह, माया ने उज्जवल को फोन किया और अपनी शादी की सालगिरह के लिए नई साड़ियों और गहनों की मांग की। उज्जवल ने आर्थिक तंगी का हवाला देते हुए सोने की अंगूठी के लिए मना कर दिया, लेकिन उसने कहा कि वह गांव के दुकानदार रामकुमार से साड़ियां उधार ले ले, जिसका भुगतान वह अगले महीने कर देगा।

माया तैयार होकर रामकुमार की दुकान पर पहुंची। उस समय दुकान खाली थी। रामकुमार ने जब माया को देखा, तो उसकी नीयत डोल गई। माया ने बताया कि उसके पास पैसे नहीं हैं और उज्जवल बाद में भुगतान करेगा।

रामकुमार ने मुस्कुराते हुए कहा, “भाभी जी, साड़ियां तो आप जितनी चाहें ले जाएं, लेकिन इसकी कीमत मैं आपसे ही वसूलना चाहूंगा।”

माया, जो पहले से ही अपने जीवन से नाखुश थी, रामकुमार के संकेतों को समझ गई। उसने 10 महंगी साड़ियां पसंद कीं और रामकुमार को रात के समय अपने घर आने का निमंत्रण दे दिया। उस रात, मर्यादा की सारी सीमाएं टूट गईं। माया ने अपनी व्यक्तिगत जरूरतों और भौतिक लालच के लिए अपने चरित्र और उज्जवल के विश्वास के साथ समझौता कर लिया।

अध्याय 4: लालच का बढ़ता दायरा

रामकुमार के साथ शुरू हुआ यह सिलसिला अब माया की आदत बन चुका था। वह रामकुमार से पैसे और उपहार लेती और बदले में उसे अपने घर आने की अनुमति देती। लेकिन माया का लालच यहीं नहीं रुका। उसने सोचा कि जब एक व्यक्ति से उसे इतना लाभ मिल रहा है, तो क्यों न किसी और को भी इस जाल में फंसाया जाए।

अब उसकी नजर गांव के एक सुनार गिरधारी लाल पर पड़ी। गिरधारी लाल एक विधुर था और उसकी पत्नी की मृत्यु के बाद वह काफी अकेला रहता था। माया ने उसे भी अपने जाल में फंसाने की योजना बनाई। वह गिरधारी की दुकान पर पहुंची और एक सोने की अंगूठी उधार मांगी। गिरधारी ने भी रामकुमार की तरह ही शर्त रखी, जिसे माया ने तुरंत स्वीकार कर लिया।

माया ने अब दो-दो लोगों के साथ अनुचित संबंध बना लिए थे। वह उनसे गहने, कपड़े और नकद पैसे वसूलती और अपनी मौज-मस्ती में खर्च करती।

अध्याय 5: उज्जवल की वापसी और संदेह के बादल

5 जनवरी 2026 की रात, उज्जवल अचानक घर लौट आया। माया को उम्मीद नहीं थी कि वह इतनी जल्दी आ जाएगा। घर में रखे नए सामान और माया की उंगली में चमकती सोने की अंगूठी को देखकर उज्जवल को संदेह हुआ।

माया ने झूठ बोला कि ये सब उसकी मां लीला देवी ने दिया है। उज्जवल ने पहले तो विश्वास कर लिया, लेकिन अगले दिन जब वह रामकुमार की दुकान पर पैसे देने पहुंचा, तो रामकुमार ने अनजाने में सच उगल दिया। रामकुमार ने कहा, “उज्जवल भाई, पिछले पैसे तो भाभी जी ने चुका दिए थे।”

उज्जवल हैरान रह गया। उसकी पत्नी के पास इतने पैसे कहां से आए? घर लौटकर उसने फिर पूछा, तो माया ने फिर वही पुराना झूठ दोहराया।

अध्याय 6: झूठ का पर्दाफाश

कुछ दिनों बाद, माया ने अपनी जरूरतों के लिए फिर से रामकुमार और गिरधारी को बुलाया। उसने घर के लिए नया फ्रिज, एलईडी टीवी और वाशिंग मशीन खरीदी। 8 जनवरी की रात जब उज्जवल घर आया, तो घर के अंदर का नजारा किसी शोरूम जैसा था।

तभी उज्जवल के फोन पर उसकी सास लीला देवी का फोन आया। लीला देवी ने बताया कि वह पिछले तीन महीनों से बहुत बीमार है और माया उसे देखने तक नहीं आई। यह सुनते ही उज्जवल के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसे समझ आ गया कि उसकी पत्नी महीनों से उससे झूठ बोल रही थी।

अध्याय 7: भयानक अंत

क्रोध और अपमान की आग में जलते हुए उज्जवल ने रसोई से चाकू उठाया और माया से सच उगलवाया। मौत के डर से माया ने अपनी सारी काली करतूतें और रामकुमार व गिरधारी के साथ अपने संबंधों का सच स्वीकार कर लिया।

उज्जवल, जो अपनी पत्नी के लिए दिन-रात मेहनत करता था, इस विश्वासघात को बर्दाश्त नहीं कर पाया। उसने मर्यादा और विवेक खो दिया। उसने माया को आंगन के पेड़ से बांध दिया और अपने ट्रक से एक लोहे की रॉड निकाल लाया। गुस्से के पागलपन में उसने माया पर प्राणघातक हमला किया, जिससे उसकी मौके पर ही मृत्यु हो गई।

चीख-पुकार सुनकर पड़ोसी इकट्ठा हो गए। पुलिस को सूचना दी गई। पुलिस ने उज्जवल को गिरफ्तार कर लिया और माया के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा।

निष्कर्ष:

यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि विश्वासघात और असंतोष किस तरह हंसते-खेलते परिवारों को उजाड़ देते हैं। माया का लालच और गलत रास्ता उसे मौत की दहलीज तक ले गया, वहीं उज्जवल का अनियंत्रित क्रोध उसे जेल की सलाखों के पीछे ले गया।

लेखक का संदेश: संबंधों में पारदर्शिता और ईमानदारी ही किसी भी परिवार की नींव होती है। कानून को हाथ में लेना कभी भी समाधान नहीं होता।

समाप्त