अगर चंचल ने चुप्पी साध ली होती, तो प्रिया की कहानी कभी सामने नहीं आती

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पहला भाग: एक अकेली माँ की जद्दोजहद

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद की गलियों में प्रिया चौधरी की कहानी शुरू होती है। 24 साल की प्रिया अपनी ढाई साल की बेटी वंशिका को गोद में लिए, मोदीनगर के एक छोटे से मकान में किराए पर रहने आती है। घरवालों से दूर, अकेली प्रिया के पास कोई सहारा नहीं था। उसके पति राजीव ने बेटी के जन्म के बाद उसे तलाक दे दिया था, क्योंकि परिवार में बेटियों की कीमत कम समझी जाती थी। मायके लौटने के बाद भी प्रिया और उसकी बेटी बोझ समझी जाने लगीं। दूसरी शादी के रिश्ते आए, लेकिन प्रिया की शर्त थी कि उसकी बेटी को भी अपनाया जाए। कोई तैयार नहीं हुआ।

आखिरकार, प्रिया ने ठान लिया कि वह खुद ही अपनी बेटी को पालकर बड़ा करेगी। साल 2012 में वह किराए के घर में आ गई। इसी घर में चंचल चौधरी नाम की 18 साल की लड़की भी रहती थी, जो वंशिका की देखभाल में मदद करती थी। धीरे-धीरे दोनों के बीच गहरी दोस्ती हो गई। चंचल ने ही प्रिया को ब्यूटी पार्लर में काम दिलवाया। वक्त के साथ प्रिया की जिंदगी पटरी पर लौटने लगी, मगर अकेलापन अब भी उसका साथी था।

दूसरा भाग: एक नई शुरुआत, एक नई दोस्ती

2014 में प्रिया की फेसबुक पर मेरठ के अमित गुर्जर से मुलाकात हुई। दोनों की ऑनलाइन बातचीत दोस्ती में बदल गई। अमित ने न सिर्फ प्रिया को अपनाया, बल्कि उसकी बेटी को भी अपनी बेटी मानने का वादा किया। प्रिया को लगा, उसकी तलाश पूरी हो गई। कुछ ही समय बाद वह अपनी बेटी के साथ मेरठ चली गई। वहां अमित ने उसे ब्यूटी पार्लर खोलने में मदद की। शादी के बाद दोनों खरखौदा थाना क्षेत्र की कांशीराम कॉलोनी में रहने लगे। प्रिया की जिंदगी खुशहाल दिखने लगी। मगर प्रिया अपनी दोस्त चंचल को नहीं भूली थी। दोनों रोज बात करती थीं।

2015 में प्रिया और अमित ने हिंदू रीति-रिवाज से शादी कर ली। शादी के बाद प्रिया ने अपना खुद का घर भी ले लिया। वक्त बीतता गया। 2020 में लॉकडाउन से ठीक पहले वे प्रतापपुर इलाके के नए घर में शिफ्ट हो गए। सब कुछ ठीक लग रहा था, लेकिन किस्मत ने कुछ और ही सोच रखा था।

तीसरा भाग: अचानक गायब, दोस्त की बेचैनी

28 मार्च 2020 को प्रिया ने चंचल को आखिरी बार फोन किया। अगले दिन चंचल ने उसे कॉल किया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। उसने अमित को फोन किया, जिसने बताया कि प्रिया उससे नाराज है और बात नहीं करना चाहती। फिर प्रिया ने चंचल का नंबर ब्लॉक कर दिया। अमित ने कहा, प्रिया बेटी को लेकर घर छोड़कर चली गई है। चंचल परेशान हो गई। बैंक अकाउंट से ₹45,000 निकाले जाने का मैसेज आया, जिससे उसे लगा कि प्रिया सुरक्षित है। लेकिन कई दिन बीत गए, कोई खबर नहीं मिली।

15 अप्रैल को चंचल ने पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट लिखवाई। पुलिस ने अमित से पूछताछ की, जिसने वही कहानी दोहराई कि प्रिया ने उस पर चाकू से हमला किया और घर छोड़ दिया। पुलिस ने उसे क्लीन चिट दे दी। चंचल लगातार पुलिस से मदद मांगती रही, लेकिन उल्टा पुलिस ने उसे ही परेशान करना शुरू कर दिया। समाज भी चंचल को शक की नजरों से देखने लगा। बावजूद इसके, चंचल ने हार नहीं मानी।

चौथा भाग: एक दोस्त की हिम्मत

चंचल ने मनीष लोहिया नाम के एक्टिविस्ट से संपर्क किया। कई बार कोशिश के बाद मनीष ने उसकी बात सुनी। 14 जुलाई को दोनों मेरठ के पुलिस अधीक्षक से मिले। क्राइम ब्रांच की टीम बनी। अमित को गिरफ्तार किया गया। कई दिन की पूछताछ के बाद 22 जुलाई को अमित टूट गया और प्रिया व उसकी बेटी की सच्चाई सामने आई।

घर के बेडरूम के नीचे 7-8 फीट गहराई में दो कंकाल मिले। फॉरेंसिक जांच में पता चला कि वे प्रिया और वंशिका के थे। अमित ने हत्या कबूल कर ली। गिरफ्तारी के दौरान वह भागने की कोशिश में पुलिस पर फायरिंग भी कर चुका था, लेकिन पकड़ा गया।

पाँचवाँ भाग: छुपे हुए सच और समाज की बेरुखी

शादी के बाद अमित का व्यवहार बदलने लगा था। वह प्रिया को पूजा-पाठ से रोकता, बेटी को उर्दू पढ़ाने की जिद करता। प्रिया ने उसके दस्तावेज देखे तो पता चला कि उसका असली नाम शमशाद है। वह पहले से शादीशुदा था और उसके तीन बच्चे भी थे। प्रिया ने शिकायत दर्ज कराई, लेकिन समाज के डर से वापस ले ली। अमित का हिंसक व्यवहार बढ़ता गया। लॉकडाउन के दौरान उसके दोस्त घर में शराब पार्टी करते। एक रात अमित के साले दिलावर ने प्रिया के साथ जबरदस्ती की कोशिश की। विरोध करने पर अमित ने प्रिया का गला दबा दिया और बेटी वंशिका की भी हत्या कर दी। दोनों को घर में ही दफना दिया।

छठा भाग: इंसाफ की लड़ाई

चंचल ने पुलिस, समाज, सिस्टम सबका सामना किया। पुलिस ने उसे परेशान किया, समाज ने शक किया, लेकिन वह रुकी नहीं। आखिरकार सच सामने आया। अमित, उसकी पहली पत्नी अफसाना और दिलावर को गिरफ्तार किया गया। पुलिसकर्मियों को सस्पेंड किया गया, जिन्होंने चंचल को परेशान किया था।

अंतिम भाग: दोस्ती की मिसाल और समाज का सवाल

अगर चंचल ने चुप्पी साध ली होती, तो प्रिया और उसकी मासूम बेटी की दर्दनाक कहानी कभी सामने नहीं आती। चंचल ने दोस्ती का असली मतलब दिखाया—सच्चाई के लिए लड़ना, चाहे दुनिया खिलाफ हो। अदालत में केस विचाराधीन है। कानून अपना काम करेगा।

आपकी राय

क्या आपको लगता है कि शमशाद/अमित को उम्रकैद या फांसी की सजा मिलनी चाहिए? क्या समाज को ऐसे मामलों में पीड़ित के साथ खड़ा होना चाहिए, न कि उसे शक की नजरों से देखना चाहिए?