“दरोगा को नहीं पता था ये लड़की IPS की बहन है… आगे देखिए क्या हुआ!”

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वर्दी का घमंड और बहन का संकल्प

उत्तर भारत के एक छोटे मगर तेजी से विकसित होते जिले में दिव्या सिंह नाम की एक तेजतर्रार आईपीएस अधिकारी तैनात थीं। उनकी पहचान सिर्फ एक सख्त पुलिस अफसर के रूप में ही नहीं थी, बल्कि एक ऐसी ईमानदार अधिकारी के रूप में थी जो कानून को किताबों से निकालकर सड़क तक लाने में विश्वास रखती थी। जिले के लोग उन्हें सम्मान से देखते थे। अपराधियों के लिए उनका नाम डर था और आम जनता के लिए भरोसे की निशानी।

दिव्या की एक छोटी बहन थी—प्रिया। प्रिया अभी-अभी कॉलेज में दाखिल हुई थी। घर में सब उसे प्यार से “छोटी” कहते थे। वह चंचल, हंसमुख और थोड़ी बेफिक्र किस्म की लड़की थी। दिव्या उससे उम्र में काफी बड़ी थीं, इसलिए उनके मन में बहन से ज्यादा मां जैसा स्नेह था। हर सुबह, हर शाम, हर छोटी-बड़ी बात पर वह प्रिया को समझातीं, पूछतीं, टोकतीं, और यही वजह थी कि प्रिया अक्सर मुस्कुराकर कहती, “दीदी, आप हर वक्त मेरी फिक्र करती रहती हो।”

उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ।

सुबह कॉलेज का पहला दिन था। दिव्या अपने दफ्तर में थीं। फाइलों का ढेर सामने था, जिले की कानून-व्यवस्था से जुड़ी बैठकों का सिलसिला चल रहा था, लेकिन मन बार-बार उसी बात पर अटक जा रहा था—प्रिया पहली बार कॉलेज अकेले गई थी। उन्होंने फोन मिलाया।

“हां दीदी, बताओ क्या हुआ?” उधर से प्रिया की आवाज आई।

“अरे प्रिया, क्या हुआ तेरे कॉलेज का? घर पहुंची या नहीं?”

“अरे दीदी, अभी तो छुट्टी हुई है। आप चिंता मत कीजिए, मैं घर पहुंच जाऊंगी।”

दिव्या ने धीमे स्वर में कहा, “चिंता कैसे न करूं? आज तेरा पहला दिन है।”

प्रिया हंस पड़ी। “आप भी ना दीदी। ठीक है, अब मैं निकल रही हूं।”

दिव्या ने फोन रख दिया, लेकिन बेचैनी गई नहीं।

उनके सामने बैठा कॉन्स्टेबल राहुल उन्हें गौर से देख रहा था। “मैडम, आज आप कुछ टेंशन में लग रही हैं।”

दिव्या ने सहज बनने की कोशिश की। “कुछ नहीं राहुल, बस छोटी कॉलेज गई थी, उसी को लेकर थोड़ा मन लगा हुआ है।”

राहुल मुस्कुराया। “मैडम, आप इस जिले की आईपीएस हैं। अगर आप ही हर बात पर डरेंगी तो आम जनता क्या करेगी?”

दिव्या ने हल्की मुस्कान दी, मगर दिल फिर भी शांत नहीं हुआ।

उधर प्रिया अपनी स्कूटी पर हवा से बातें करती चली जा रही थी। सड़क पर शाम उतर रही थी। हवा ठंडी थी। कॉलेज के पहले दिन की हल्की खुशी उसके चेहरे पर थी। उसे यह आजादी अच्छी लग रही थी—अपनी स्कूटी, अपनी सड़क, अपना सफर।

लेकिन शहर से थोड़ा बाहर, हाईवे के किनारे एक अलग ही खेल चल रहा था।

दरोगा भवानी सिंह अपनी जीप को सड़क के किनारे खड़ी किए हुए था। उसके साथ दो सिपाही—सोनू और सागर—खड़े थे। यह चेकिंग नहीं, वसूली का अड्डा था। दिन भर में इक्का-दुक्का गाड़ियां निकलतीं, तो वे किसी न किसी बहाने उन्हें रोक लेते। कभी हेलमेट, कभी कागज, कभी तेज रफ्तार, कभी सिर्फ शक—कारण कोई भी हो सकता था। मकसद सिर्फ एक था: पैसा।

भवानी सिंह उन पुलिसवालों में था जिन्हें वर्दी जिम्मेदारी नहीं, ताकत लगती है। उसे लगता था सड़क उसका इलाका है, और जो भी वहां से गुजरे, वह उसका शिकार है। उसके चेहरे पर हमेशा एक सस्ता-सा आत्मविश्वास चिपका रहता था, जैसे कानून उसकी जेब में मुड़ा पड़ा हो।

सोनू ने दूर से आती स्कूटी की ओर इशारा किया। “साहब, कोई आ रहा है।”

सागर ने आंखें मिचमिचाईं। “लगता है लड़की है।”

भवानी की आंखों में चमक आ गई। “आज तो मजा आ जाएगा।”

कुछ ही पलों बाद प्रिया वहां पहुंची। उसने देखा कि बीच हाईवे पर पुलिसवाले खड़े हैं। उसने सोचा शायद कोई हादसा हुआ होगा। वह धीरे हुई ही थी कि भवानी ने हाथ उठाकर उसे रोक लिया।

“ए छोरी, रुक जा!”

प्रिया ने स्कूटी साइड में लगाई। “क्या हुआ सर? आपने मुझे क्यों रोका?”

भवानी ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा और फिर बनावटी रौब से बोला, “कुछ नहीं, तुम्हें पुरस्कार देना है।”

प्रिया चौंकी। “पुरस्कार?”

सोनू और सागर हंसी दबाने लगे।

भवानी बोला, “पहले नीचे उतर, फिर बताते हैं।”

प्रिया अब सावधान हो गई थी। “बताइए, बात क्या है?”

भवानी ने कड़ककर कहा, “एक तो तेज बाइक चला रही थी, दूसरा हेलमेट नहीं है। दोनों का चालान बनता है। सोनू, बता कितना?”

“ढाई हजार,” सोनू तुरंत बोला।

प्रिया की आंखों में हैरानी उतर आई। “सर, आप बीच हाईवे पर लोगों से ऐसे पैसे लेते हो? यह तो रिश्वत है।”

भवानी के चेहरे का रंग बदल गया। “रिश्वत नहीं, हमारा धंधा है। ज्यादा ज्ञान मत दे। चुपचाप पैसे निकाल।”

“मेरे सामने पैसे की बात मत कीजिए,” प्रिया ने तिरस्कार से कहा, “आपको मेरा बैकग्राउंड नहीं पता।”

भवानी हंसा। “कौन है रे तू?”

प्रिया ने सीधी नजरों से उसकी तरफ देखा। “मैं इस जिले की आईपीएस अधिकारी दिव्या सिंह की बहन हूं। प्रिया सिंह।”

कुछ क्षण के लिए सोनू और सागर एक-दूसरे को देखने लगे, लेकिन भवानी के घमंड ने उसे रुकने नहीं दिया।

“तू चाहे किसी की बहन हो,” वह गरजा, “मैं हूं दरोगा भवानी सिंह। मेरे सामने अकड़ दिखाएगी?”

प्रिया ने कहा, “सोच लो सर, वर्दी से हाथ धो बैठोगे।”

भवानी ने हाथ उठाया—और अगले ही पल एक तेज थप्पड़ प्रिया के गाल पर पड़ा।

सड़क की हवा जैसे एक पल को थम गई।

प्रिया की आंखों में गुस्सा भर आया। गाल जल रहा था, लेकिन आवाज स्थिर थी। “भवानी, तूने मुझे थप्पड़ मारा? अब तुझे कोई नहीं बचा सकता।”

भवानी हंसा। “जा, अपनी आईपीएस दीदी को बुला ले।”

प्रिया ने मोबाइल निकाला। कांपते हाथों से उसने दिव्या को फोन किया।

“दीदी…”

उधर से आवाज आई, “क्या हुआ छोटी? ऐसे क्यों बोल रही है?”

“दीदी, यहां कुछ पुलिस वाले मुझे रोककर बदतमीजी कर रहे हैं। आपका नाम बताया तो मजाक उड़ा रहे हैं। दरोगा का नाम भवानी है… इसने मुझे थप्पड़ भी मारा… पैसे मांग रहा है…”

दिव्या की आंखों में खून उतर आया।

“भवानी?” उन्होंने दांत भींचकर कहा। “तू वहीं रह। मैं आ रही हूं। और सुन—डरना मत। मैं हूं ना।”

फोन कटते ही दिव्या सिंह का चेहरा बदल चुका था। अब वह सिर्फ बहन नहीं, एक अधिकारी थीं जिसे अपनी ही वर्दी के भीतर छिपे सड़ांध से सामना करना था।

कॉन्स्टेबल राहुल सामने खड़ा था। दिव्या ने धीमे स्वर में कहा, “ऑपरेशन शुरू करो।”

राहुल एकदम सतर्क हो गया। “मैडम, आप खुद जाएंगी?”

“हां,” दिव्या बोलीं, “लेकिन वर्दी में नहीं। मुझे उसका असली चेहरा देखना है।”

कुछ ही मिनटों में योजना बन गई। दिव्या ने सादी साड़ी पहनी, अपनी वर्दी ऊपर से ढक ली, और स्कूटर पर निकल पड़ीं। पीछे-पीछे उनकी टीम तैयार थी। आदेश साफ था—जब तक वह संकेत न दें, कोई सामने नहीं आएगा।

उधर हाईवे पर प्रिया खड़ी थी। भवानी, सोनू और सागर उसका मजाक उड़ा रहे थे।

“कहां है तेरी आईपीएस दीदी?” भवानी ने ताना मारा।

“आ जाएंगी,” प्रिया ने दृढ़ स्वर में कहा।

सागर हंसा। “साहब, यह तो यहीं रात करवाएगी।”

भवानी बोला, “पंद्रह मिनट और। फिर घसीट कर थाने ले चलूंगा।”

उसी समय दूर से एक स्कूटर तेजी से आता दिखाई दिया।

दिव्या ने पास आते ही अचानक ब्रेक लगाया। स्कूटर हल्का डगमगाया। वह उतरीं, प्रिया की ओर बढ़ीं और उसे गले लगा लिया।

“दीदी…” प्रिया की आंखें भर आईं।

भवानी अभी भी उन्हें पहचान नहीं पाया था। वह गुर्राया, “अब कौन है रे तू? यहां तमाशा लगा रखा है?”

दिव्या ने शांत स्वर में कहा, “क्या हुआ? मैं अपनी बहन से गले भी नहीं मिल सकती?”

“जितना मिलना है मिलो,” भवानी ने व्यंग्य से कहा, “हम भी फ्री का मनोरंजन कर लें।”

प्रिया ने तुरंत कहा, “दीदी, यही है वो। इसी ने मुझे थप्पड़ मारा था।”

दिव्या की आंखें अब सीधे भवानी पर टिक गईं। “क्यों बे भवानी? तूने थप्पड़ भी मारा?”

भवानी अब भी अकड़ा हुआ था। “हां, मारा। क्या कर लेगी?”

बस, यही वह पल था।

दिव्या ने अपनी साड़ी का पल्लू हटाया। भीतर चमकते सितारे रात से भी ज्यादा तेज लग रहे थे।

“अबे दरोगा भवानी,” उनकी आवाज़ लोहे जैसी ठंडी थी, “जानता भी है मैं कौन हूं? मैं इस जिले की आईपीएस अधिकारी दिव्या सिंह हूं। यह देख—मेरा स्टार।”

भवानी के पैरों तले जमीन खिसक गई।

“मै… मैडम… आप?”

दिव्या एक कदम आगे बढ़ीं। “अब तू गया। तेरी सच्चाई मेरे सामने है। मेरी बहन के साथ बदतमीजी की, रिश्वत मांगी, थप्पड़ मारा, वर्दी का दुरुपयोग किया। अब तुझे कोई नहीं बचा सकता।”

भवानी के चेहरे पर डर फैल गया। वह हकलाया, “मैडम, माफ कर दीजिए। गलती हो गई। दोबारा नहीं होगा।”

दिव्या ने कठोर स्वर में कहा, “गलती? यह गलती नहीं है। यह तेरी सोच है।”

उसी क्षण सड़क के दूसरी ओर से पुलिस की गाड़ियां आकर रुकीं। पूरी टीम उतर चुकी थी।

“गिरफ्तार करो इन्हें,” दिव्या ने आदेश दिया।

सोनू और सागर के चेहरों की हंसी गायब हो चुकी थी। भवानी को हथकड़ियां लगा दी गईं। वह गिड़गिड़ाता रहा, लेकिन अब सब खत्म हो चुका था।

प्रिया दूर खड़ी उसे देख रही थी। उसके गाल पर थप्पड़ का निशान अब भी था, लेकिन आंखों में डर नहीं, संतोष था।

दिव्या उसके पास आईं। “अब कोई तुझे कुछ नहीं कहेगा।”

प्रिया ने धीरे से पूछा, “दीदी, अगर आप नहीं आतीं तो?”

दिव्या ने उसका हाथ पकड़ा। “इसलिए हमेशा आवाज उठाना। चुप रहने से ऐसे लोग और बढ़ते हैं।”

उस रात भवानी सिंह सलाखों के पीछे था। उसकी जीप जब्त कर ली गई। रिश्वतखोरी, कर्तव्य में दुराचार, महिला से अभद्रता, और वर्दी का दुरुपयोग—सबकी फाइलें एक-एक कर खुलने लगीं। विभागीय जांच बैठी। पुराने मामलों की भी छानबीन शुरू हुई। जिन लोगों से वह सालों से वसूली करता आया था, वे भी अब बोलने लगे।

दूसरी तरफ, प्रिया ने पहली बार समझा कि आत्मरक्षा सिर्फ शारीरिक ताकत नहीं होती। सच बोलने का साहस भी आत्मरक्षा है। और दिव्या ने फिर साबित कर दिया कि वर्दी सिर्फ ताकत नहीं, जिम्मेदारी भी होती है।

कुछ दिनों बाद, घर की छत पर बैठी प्रिया ने मुस्कुराकर कहा, “दीदी, आपने तो फिल्मी स्टाइल में एंट्री मारी थी।”

दिव्या हंस पड़ीं। “कभी-कभी अपराधियों को उनके ही अंदाज में जवाब देना पड़ता है।”

प्रिया ने गाल पर हाथ फेरते हुए कहा, “अब अगर कोई पूछे कि मेरी दीदी कौन है, तो मैं कहूंगी—सिर्फ आईपीएस नहीं, मेरी ढाल है।”

दिव्या ने उसे गले लगा लिया।

रात का आसमान शांत था। लेकिन उस रात के बाद जिले की सड़कों पर एक नई खबर फैल चुकी थी—दरोगा भवानी का जलवा खत्म हो चुका था, और कानून का असली चेहरा अभी जिंदा था।

यह कहानी केवल दो बहनों की नहीं थी। यह उस साहस की कहानी थी जो अन्याय के सामने झुकता नहीं। यह याद दिलाने वाली कहानी थी कि चाहे सामने वर्दी में खड़ा व्यक्ति ही क्यों न हो, अगर वह कानून से भटकता है तो उससे बड़ा कोई नहीं होता—सिवाय न्याय के।

और न्याय, देर से सही, आता जरूर है।