वफ़ादारी का महाकाव्य: बालू और मोती की अमर गाथा
अध्याय 1: कड़ाके की ठंड और भूख का तांडव
दिसंबर की वह रात दिल्ली की सड़कों पर कहर बनकर टूटी थी। सर्द हवाएं छुरियों की तरह खाल को चीर रही थीं। शहर की ऊंची इमारतों की खिड़कियों से आती सुनहरी रोशनी और हीटरों की गर्माहट उन लोगों के लिए एक सपना थी जो फुटपाथ पर ज़िंदगी बसर करते थे। उन्हीं बदनसीबों में से एक था 12 साल का बालू।
बालू अनाथ था। 5 साल पहले एक सड़क दुर्घटना ने उसके माता-पिता को छीन लिया था। तब से यह फुटपाथ ही उसका बिस्तर था और फटा हुआ बोरा उसकी रजाई। बालू का पूरा दिन कूड़ा बिनने और लोहे के टुकड़े बेचने में गुज़रा था, जिससे उसने कुल ₹20 कमाए थे। सुबह से उसके पेट में चूहे दौड़ रहे थे। भूख के कारण उसकी आंखों के सामने अंधेरा छा रहा था।
उसकी नज़र सामने वाली ‘बनवारी बेकरी’ पर टिकी थी। ताज़ा ब्रेड और बन की खुशबू उसे पागल कर रही थी। बालू ने कांपते हाथों से अपने ₹20 निकाले और बेकरी की ओर बढ़ा।
“ए लड़के! पीछे हट! गंदी बदबू फैला रहा है,” सेठ बनवारी ने उसे देखते ही चिल्लाकर कहा। बालू ने चुपचाप सिक्के काउंटर पर रखे। सेठ ने नफरत से एक पुराना ब्रेड का पैकेट उसकी ओर फेंक दिया। बालू के लिए वह सूखी ब्रेड किसी शाही पकवान से कम नहीं थी। वह उसे लेकर अपनी गली के कोने में, एक पीली स्ट्रीट लाइट के नीचे आ बैठा।
अध्याय 2: एक बेजुबान का दर्द और पहली मुलाकात
बालू ने जैसे ही पैकेट खोला, उसे एक कराहने की आवाज़ सुनाई दी। “कुं… कुं…” बालू रुका। उसने अपनी दाईं ओर देखा। कचरे के ढेर के पास एक मरियल सा कुत्ता लेटा था। उसका रंग मैला था, हड्डियां पसलियों से बाहर झांक रही थीं और उसके पिछले पैर से खून रिस रहा था।
कुत्ते की आँखें बालू की ब्रेड पर टिकी थीं। उन आँखों में वही भूख थी जो बालू के पेट में थी। बालू को अपनी माँ की बात याद आई—”बेटा, जो दूसरों का पेट भरता है, भगवान उसका पेट कभी खाली नहीं रहने देता।” बालू ने अपनी भूख को एक तरफ रखा और ब्रेड का एक बड़ा टुकड़ा उस कुत्ते की तरफ बढ़ाया।
कुत्ते ने पहले उसे सूंघा और फिर बिजली की तेज़ी से निगल गया। बालू मुस्कुराया। उसने दूसरा टुकड़ा दिया, फिर तीसरा। देखते ही देखते बालू ने अपनी पूरी ब्रेड उस कुत्ते को खिला दी। खुद भूखा रहकर उसने एक बेजुबान की जान बचाई। कुत्ता लंगड़ाते हुए बालू के पास आया और अपना सिर उसके पैरों पर रख दिया। उस रात फुटपाथ की उस ठंडी ज़मीन पर दो अनाथ रूहों ने एक-दूसरे में अपना परिवार ढूंढ लिया था।
बालू ने उसका नाम रखा—’मोती’।
अध्याय 3: वफ़ादारी का साया और संघर्ष के दिन
अगले कुछ महीनों में बालू और मोती की जोड़ी मशहूर हो गई। जहाँ बालू कूड़ा बिनने जाता, मोती उसके पीछे-पीछे चलता। मोती अब थोड़ा सेहतमंद हो गया था, लेकिन उसका असली रूप उसकी वफ़ादारी में था। एक बार कुछ आवारा लड़कों ने बालू से उसके पैसे छीनने की कोशिश की, तो मोती एक बाघ की तरह उन पर झपटा। उसके बाद किसी की हिम्मत नहीं हुई कि बालू को हाथ भी लगाए।
बालू जो भी कमाता, उसका आधा हिस्सा मोती के लिए दूध और बिस्कुट में खर्च करता। “देख मोती, एक दिन हम एक बड़े घर में रहेंगे,” बालू अक्सर रात को मोती के कान में फुसफुसाता। मोती अपनी पूंछ हिलाकर जैसे हामी भरता।

लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। जनवरी के अंत में बारिश शुरू हो गई। कड़ाके की ठंड और लगातार भीगने के कारण बालू को तेज़ निमोनिया हो गया। उसका छोटा सा शरीर बुखार से आग की तरह जलने लगा। वह फुटपाथ के एक कोने में अपनी फटी चादर में सिमट गया। उसके पास न दवा के पैसे थे, न ही कोई अपना।
मोती व्याकुल हो उठा। वह बालू के चेहरे को चाटता, उसके पास लेटकर उसे गर्मी देने की कोशिश करता। जब बालू बेहोश हो गया, तो मोती सड़क के बीचों-बीच खड़ा होकर राहगीरों पर भौंकने लगा, जैसे उनसे मदद की भीख मांग रहा हो।
अध्याय 4: शैतान की नज़र और रक्षक का पराक्रम
तभी वहां से एक संदिग्ध आदमी गुज़रा। उसका नाम शंकर था, जो शहर के ‘भिखारी माफिया’ का गुर्गा था। शंकर ने देखा कि एक लावारिस बच्चा मरणासन्न स्थिति में पड़ा है। उसकी आँखों में चमक आ गई। “यह बच्चा मर गया तो बेकार है, लेकिन अगर इसे उठा ले चलूँ, तो इसके ज़ख्मों को दिखाकर अच्छी भीख मिलेगी,” उसने सोचा।
शंकर जैसे ही बालू को उठाने के लिए झुका, मोती की गुर्राहट ने उसे जमा दिया। मोती के बाल खड़े हो गए थे और उसकी आँखें खून की तरह लाल थीं। “हट जा कुत्ते!” शंकर ने पत्थर मारा। पत्थर मोती के सिर पर लगा, खून बहने लगा, लेकिन मोती अपनी जगह से 1 इंच भी नहीं हिला। वह बालू के ऊपर किसी ढाल की तरह खड़ा हो गया।
जब शंकर ने डंडा उठाया, तो मोती पूरी ताकत से उसके गले की तरफ झपटा। शंकर चिल्लाया और पीछे गिर पड़ा। मोती ने उसकी टांग पकड़कर उसे सड़क के बीच तक घसीट दिया। शोर सुनकर वहां से गुज़र रही एक आलीशान कार रुकी।
अध्याय 5: देवदूत का आगमन: हेमंत का प्रवेश
कार से एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति उतरे। उनका नाम हेमंत था, जो शहर के सबसे बड़े परोपकारी उद्योगपति थे। उन्होंने देखा कि एक ज़ख्मी कुत्ता एक बीमार बच्चे की रक्षा कर रहा है और एक गुंडा वहां से भाग रहा है।
हेमंत ने तुरंत अपनी कार से पानी निकाला और बालू के माथे पर रखा। “इसे तुरंत अस्पताल ले जाना होगा!” उन्होंने अपने ड्राइवर से कहा। जब उन्होंने बालू को उठाया, तो मोती ने उन्हें नहीं रोका। उसे पता था कि यह इंसान उसके दोस्त की जान बचा सकता है।
मोती भी कार में कूद गया। हेमंत उसे बाहर नहीं निकाल पाए। अस्पताल पहुँचने पर डॉक्टरों ने कहा, “अगर आप इसे 15 मिनट और देर से लाते, तो यह बच्चा नहीं बचता।” बालू को आईसीयू में भर्ती किया गया। मोती अस्पताल के बाहर गेट पर तीन दिनों तक बिना खाए-पिए बैठा रहा। वह सिर्फ कांच के दरवाज़े से अंदर झांकता था।
हेमंत यह सब देख रहे थे। उन्हें अपनी करोड़ों की संपत्ति और सूना बंगला याद आया। उनका अपना बेटा सालों पहले विदेश जाकर बस गया था और उन्हें भूल चुका था। “इंसानियत और वफ़ादारी का ऐसा रिश्ता मैंने आज तक नहीं देखा,” हेमंत ने बुदबुदाया।
अध्याय 6: बंगले की रौनक और नया परिवार
एक हफ्ते बाद बालू ठीक हो गया। हेमंत उसे और मोती को अपने आलीशान बंगले ‘शांति निवास’ ले आए। बालू को नए कपड़े मिले, नरम बिस्तर मिला और मोती को एक बड़ा सा बगीचा। बालू अब ‘बालू’ नहीं रहा, वह हेमंत का दत्तक पुत्र बन गया।
लेकिन बंगले में सब खुश नहीं थे। हेमंत का बिज़नेस पार्टनर, कुंदन, हेमंत की जायदाद का इकलौता वारिस बनना चाहता था। बालू के आने से उसका रास्ता रुक गया था। कुंदन ने बालू को रास्ते से हटाने की साज़िश रची।
एक दिन जब हेमंत शहर से बाहर थे, कुंदन बंगले पर आया। उसने अपने साथ ज़हरीले लड्डू लाए थे। “बेटा बालू, तुम्हारे पापा ने तुम्हारे लिए यह खास मिठाई भेजी है,” कुंदन ने चालाकी से कहा।
बालू लड्डू लेने ही वाला था कि मोती ने खतरे को भांप लिया। मोती ने कुंदन के हाथ पर झपट्टा मारा और लड्डू का डिब्बा नीचे गिर गया। लड्डू बिखर गए। तभी वहां दाना चुग रहे एक मोर ने लड्डू का एक टुकड़ा खा लिया और कुछ ही पलों में तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया।
बालू सन्न रह गया। कुंदन घबरा गया और उसने चाकू निकालकर बालू पर हमला करना चाहा। लेकिन मोती बिजली की फुर्ती से कुंदन की कलाई पर झपटा और उसे ज़मीन पर पटक दिया। नौकरों ने कुंदन को पकड़ लिया और पुलिस के हवाले कर दिया।
अध्याय 7: वफ़ादारी का प्रतिफल और अंतिम सत्य
जब हेमंत वापस लौटे और उन्हें पूरी सच्चाई पता चली, तो उनकी आँखों से आँसू बह निकले। उन्होंने बालू को गले लगाया और मोती के सिर पर हाथ फेरा।
“बालू, उस रात तुमने एक भूखे कुत्ते को अपनी रोटी दी थी। आज उसी कुत्ते ने तुम्हें एक नया जीवन और एक पिता दिया है,” हेमंत ने भावुक होकर कहा।
बालू ने मोती को गले लगा लिया। “बाबूजी, माँ कहती थी कि कर्म लौटकर ज़रूर आता है। मैंने मोती को सिर्फ एक ब्रेड दी थी, उसने मुझे पूरी दुनिया दे दी।”
आज उस बंगले में सन्नाटा नहीं है। बालू अब एक बड़े स्कूल में पढ़ता है और मोती उसका सबसे वफादार अंगरक्षक है। हेमंत ने अपनी वसीयत में लिखा कि उनकी संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा शहर के आवारा जानवरों और अनाथ बच्चों के कल्याण के लिए जाएगा।
शिक्षा: भूख की मार भले ही खतरनाक हो, लेकिन त्याग की शक्ति उससे बड़ी होती है। एक छोटी सी नेकी भी समय आने पर पहाड़ जैसी ढाल बनकर आपकी रक्षा कर सकती है। परिवार सिर्फ खून के रिश्तों से नहीं, बल्कि वफ़ादारी और एहसासों से बनता है।
समाप्त
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