वर्दी का घमंड और वफादार का अपमान: जब रक्षक ही भक्षक बन गई
अध्याय 1: प्यार का वादा और वर्दी की चमक
मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर की गलियों में समीर और साक्षी की प्रेम कहानी किसी मिसाल से कम नहीं थी। समीर एक साधारण परिवार से था, जो दिन में एक प्राइवेट कंपनी में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करता था और रात भर जागकर अपनी पत्नी साक्षी को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करवाता था। साक्षी मेधावी थी, लेकिन उसके सपनों को पंख समीर की मेहनत ने दिए थे। अपनी तनख्वाह का एक-एक रुपया उसने साक्षी की किताबों और कोचिंग में लगा दिया।
सालों की तपस्या रंग लाई और साक्षी का चयन पुलिस इंस्पेक्टर के पद पर हो गया। जिस दिन साक्षी ने वर्दी पहनी, समीर की आँखों में खुशी के आँसू थे। उसे लगा कि अब उनके दिन बदल जाएँगे। लेकिन उसे क्या पता था कि वर्दी के सितारों की चमक साक्षी के दिल की ममता को अंधेरे में धकेल देगी।

अध्याय 2: “गार्ड है मेरा पति, यह कहते हुए शर्म आती है”
साक्षी की पोस्टिंग शहर के मुख्य थाने में हुई। उसे सरकारी क्वार्टर मिला, नौकर-चाकर मिले और रसूख मिला। जैसे-जैसे साक्षी का ओहदा बढ़ा, उसकी नज़र में समीर की अहमियत घटने लगी। जब थाने के सहकर्मी या शहर के रईस लोग साक्षी से मिलते, तो वह समीर का परिचय देने से कतराती थी।
एक शाम साक्षी के क्वार्टर पर पुलिस विभाग की एक बड़ी पार्टी थी। समीर, जो अभी-अभी ड्यूटी से लौटा था, अपनी गार्ड की वर्दी में ही मेहमानों के बीच पहुँच गया। साक्षी का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। एक सीनियर अफसर ने मजाक में पूछा, “मैडम, यह गार्ड साहब कौन हैं? आपके यहाँ तैनात हैं क्या?” साक्षी ने कड़वाहट के साथ जवाब दिया, “नहीं सर, यह बस यहाँ का काम देखते हैं।”
उस रात जब मेहमान चले गए, साक्षी ने समीर पर अपना गुस्सा निकाला। “तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई उस फटीचर वर्दी में मेरे अफसरों के सामने आने की? मेरी इमेज खराब कर दी तुमने। लोग हँसते हैं मुझ पर कि एक इंस्पेक्टर का पति ‘गार्ड’ है!”
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अध्याय 3: सरकारी क्वार्टर से अपमानजनक विदाई
विवाद बढ़ता गया। साक्षी अब समीर को एक पति नहीं, बल्कि अपनी तरक्की में एक ‘धब्बा’ समझने लगी थी। एक सुबह, जब समीर नाश्ता कर रहा था, साक्षी ने उसके सामने तलाक के कागज़ पटक दिए।
“साक्षी, यह क्या है?” समीर ने कांपती आवाज़ में पूछा। “सच्चाई! मैं अब तुम्हारे जैसे मामूली इंसान के साथ नहीं रह सकती। मेरी दुनिया अब बहुत बड़ी है और तुम उसमें फिट नहीं बैठते।” साक्षी ने चिल्लाकर कहा।
समीर ने मिन्नतें कीं, उसे अपना बलिदान याद दिलाया, लेकिन साक्षी का दिल पत्थर हो चुका था। उसने समीर का हाथ पकड़ा और उसे घसीटते हुए सरकारी क्वार्टर के गेट तक ले आई। “निकल जाओ यहाँ से! आज के बाद इस दहलीज पर कदम रखा तो जेल में डलवा दूँगी।” उसने सरेआम समीर को धक्का दिया और गेट बंद कर दिया। समीर सड़क पर गिर पड़ा, उसकी आँखों के सामने अपनी 5 साल की मेहनत और प्यार बिखर चुका था।
अध्याय 4: संघर्ष का नया अध्याय और गुमनाम नायक
समीर ने शहर नहीं छोड़ा। उसने ठान लिया कि वह अपनी पहचान बनाएगा। उसने गार्ड की नौकरी के साथ-साथ अपनी अधूरी पढ़ाई फिर से शुरू की। वह दिन में 12 घंटे ड्यूटी करता और रात को स्ट्रीट लाइट के नीचे बैठकर पढ़ता। उसका अपमान ही अब उसकी ताकत बन चुका था।
इधर साक्षी अहंकार में डूबी रही। उसने एक भ्रष्ट बिल्डर के साथ साँठगाँठ कर ली और काले कारनामों में लिप्त हो गई। उसे लगा कि उसे रोकने वाला कोई नहीं है।
अध्याय 5: 3 साल बाद—पासा पलट गया
वक्त ने ऐसी करवट ली कि पूरे पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया। शहर में एक नए एसीपी (ACP) की पोस्टिंग हुई, जो सीधे मुख्यमंत्री की निगरानी में भ्रष्टाचार की जाँच करने आया था। साक्षी को डर लगने लगा, क्योंकि उसके कारनामे गहरे थे।
एक दिन साक्षी को एसपी ऑफिस से बुलावा आया। वह पूरी अकड़ में, अपनी वर्दी को चमकाते हुए केबिन में दाखिल हुई। लेकिन जैसे ही उसने सामने बैठी कुर्सी की ओर देखा, उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
सामने एसीपी समीर कुमार बैठे थे!
अध्याय 6: न्याय का आखिरी प्रहार
साक्षी का शरीर पसीने से भीग गया। उसने हकबकाते हुए कहा, “समीर… तुम? एसीपी?” समीर ने अपनी फाइलों से नज़र उठाई। उसकी आँखों में न नफरत थी, न ही बदला—बस एक न्यायप्रिय अफसर की गंभीरता थी। “यहाँ मैं समीर नहीं, तुम्हारा सीनियर हूँ इंस्पेक्टर साक्षी। और यह फाइल तुम्हारे भ्रष्टाचार, बिल्डर से ली गई रिश्वत और पद के दुरुपयोग का पक्का सबूत है।”
साक्षी रोने लगी, “समीर, मुझे माफ कर दो। मैंने तुम्हें पढ़ाया था… नहीं, तुमने मुझे पढ़ाया था। मुझे एक मौका दो।” समीर ने धीरे से कहा, “जिस दिन तुमने मुझे धक्का देकर घर से निकाला था, उस दिन तुमने एक पति को खोया था। लेकिन आज तुम एक ईमानदार अफसर का सामना कर रही हो। कानून किसी का सगा नहीं होता।”
समीर ने खुद अपने हाथों से साक्षी की वर्दी से उसके सितारे उतारे और उसे सस्पेंड करने का आदेश दिया। पूरे थाने के सामने, साक्षी को उसी तरह अपमानित होकर बाहर निकलना पड़ा, जैसे कभी उसने समीर को निकाला था।
निष्कर्ष: कर्मा की लाठी
समीर ने साबित कर दिया कि ओहदा छोटा या बड़ा हो सकता है, लेकिन इंसान का चरित्र ही उसे महान बनाता है। आज समीर शहर का सबसे सम्मानित अफसर है, और साक्षी सलाखों के पीछे अपने अहंकार की कीमत चुका रही है।
लेखक का संदेश: कभी भी किसी के संघर्ष का मज़ाक न उड़ाएँ। समय का पहिया जब घूमता है, तो अर्श वाले फर्श पर और फर्श वाले अर्श पर आ जाते हैं।
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