कलंक से गौरव तक: मनहूसियत के दाग और IAS की वर्दी का सफर
उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के एक सुदूर गाँव में, जहाँ नदी की लहरें किनारे की मिट्टी को काटती रहती थीं, वहाँ रोहित की एक कच्ची झोपड़ी थी। वह झोपड़ी केवल मिट्टी और घास-फूस का ढेर नहीं थी, बल्कि रोहित के सपनों का कब्रिस्तान बन चुकी थी। रोहित बुरा इंसान नहीं था, पर उसकी किस्मत और उसकी माँ की कट्टर सोच ने उसे एक ऐसे चक्रव्यूह में फँसा दिया था जहाँ से निकलना नामुमकिन था।
अंधविश्वास का ज़हर और प्रिया का आगमन
प्रिया जब ब्याह कर इस घर में आई थी, तो वह अपने साथ सुनहरे भविष्य के सपने लाई थी। वह पढ़ी-लिखी थी, समझदार थी और शांत स्वभाव की थी। लेकिन रोहित के घर में कदम रखते ही जैसे दुर्भाग्य ने डेरा डाल लिया। रोहित ने किराना दुकान खोली—फेल हो गई। मोबाइल रिपेयरिंग सीखी—हाथ खाली रहे। ट्रैक्टर लिया—कर्ज के बोझ तले दब गया।
रोहित की माँ, जो पुरानी मान्यताओं और अंधविश्वास की बेड़ियों में जकड़ी हुई थी, उसने हर असफलता का ठीकरा प्रिया के सिर पर फोड़ना शुरू कर दिया। उनके लिए प्रिया बहू नहीं, बल्कि एक ‘मनहूस’ साया थी।

वह काली रात और टूटी हुई उम्मीद
वह शाम सबसे भयावह थी जब रोहित अपनी पैतृक जमीन का मुकदमा हार गया। घर लौटते ही उसकी माँ का धैर्य टूट गया। उन्होंने चिल्लाकर कहा, “रोहित! आज फैसला होगा। या तो यह मनहूस औरत इस घर में रहेगी, या मैं। इसके कदम पड़ते ही हमारा हँसता-खेलता घर श्मशान बन गया।”
रोहित, जो अपनी असफलताओं से पहले ही टूट चुका था, अपनी माँ के सामने खड़ा होने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। उसने नज़रें झुकाकर प्रिया से कह दिया, “प्रिया, तुम यहाँ से चली जाओ।”
प्रिया स्तब्ध रह गई। उसने रोहित की आँखों में देखा—वहाँ प्यार नहीं, सिर्फ कायरता थी। प्रिया ने एक शब्द नहीं कहा। उसने अपने कपड़े समेटे और उस झोपड़ी से बाहर निकल गई। जाते-जाते उसने बस इतना कहा, “मैं मनहूस नहीं हूँ रोहित, मनहूस तुम्हारी सोच है। आज तुमने एक पत्नी को नहीं, अपने घर की बरकत को निकाला है।”
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संघर्ष की भट्टी में तपता सोना
प्रिया के पास कोई ठिकाना नहीं था। उसने पहली रात बस स्टैंड की ठंडी बेंच पर काटी। शहर की भीड़ में वह अकेली थी। उसने एक छोटी सी चाय की दुकान पर बर्तन धोने और चाय बनाने का काम शुरू किया। हाथ जलते थे, पीठ में दर्द होता था, और लोगों की गंदी नज़रें उसे चुभती थीं। लेकिन उसके भीतर एक आग जल रही थी।
दुकान के पास ही एक सरकारी लाइब्रेरी थी। प्रिया दिन भर काम करती और रात को उन्हीं जली हुई उंगलियों से पन्ने पलटती। उसने यूपीएससी (UPSC) को अपना लक्ष्य बनाया। वह जानती थी कि उसे समाज को जवाब नहीं देना है, बल्कि खुद को साबित करना है।
सात साल बीत गए। सात साल का वनवास, सात साल का अपमान और सात साल की कड़ी तपस्या। एक सुबह जब अखबार आया, तो पूरी दुनिया दंग रह गई। चाय की दुकान पर काम करने वाली ‘प्रिया’ आज IAS अधिकारी बन चुकी थी।
झोपड़ी में ‘कलेक्टर’ की वापसी
जौनपुर की उसी गली में जहाँ कभी प्रिया को धक्के देकर निकाला गया था, आज सरकारी गाड़ियों का काफिला था। रोहित की झोपड़ी और जर्जर हो चुकी थी। रोहित आज भी दिहाड़ी मज़दूरी करता था और उसकी माँ बीमारियों से घिरी खाट पर पड़ी रहती थी।
जैसे ही नीली बत्ती वाली गाड़ी झोपड़ी के सामने रुकी, पूरा गाँव जमा हो गया। प्रिया गाड़ी से उतरी—चेहरे पर वही गरिमा, वही शांति। रोहित उसे पहचान नहीं पाया, लेकिन जब उनकी नज़रें मिलीं, तो वह सुबक उठा।
माँ, जो कभी उसे मनहूस कहती थी, आज उसके सामने खड़ी होने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी। प्रिया ने आगे बढ़कर माँ के पैर छुए। माँ फूट-फूट कर रो पड़ी, “प्रिया, मुझे माफ कर दे! मैंने तुझे क्या-क्या नहीं कहा।”
प्रिया ने बहुत ही मार्मिक स्वर में जवाब दिया, “माँ, मैं उस दिन भी मनहूस नहीं थी और आज भी वही प्रिया हूँ। फर्क बस इतना है कि उस दिन मैं दूसरों के फैसलों पर निर्भर थी, और आज मैं खुद फैसले लेती हूँ।”
अंतिम फैसला और सीख
प्रिया ने उस अपराधी को सबक सिखाया जिसने रोहित की जमीन हड़पी थी। उसने कानून के दायरे में रहकर न्याय दिलाया। लेकिन वह रोहित के साथ दोबारा उस घर में नहीं बसी। उसने साबित किया कि आत्मसम्मान एक बार खो जाए तो वह वापस नहीं आता।
वह गाँव से वापस लौट गई, लेकिन गाँव की हर बेटी के लिए एक मिसाल छोड़ गई।
निष्कर्ष (The Depth of the Story): यह कहानी हमें तीन बड़ी बातें सिखाती है:
मनुष्य की स्थिति नहीं, मनोस्थिति मनहूस होती है।
शिक्षा वह हथियार है जो सबसे गहरे अपमान का बदला सबसे गरिमामय तरीके से लेती है।
कमज़ोर पुरुष अक्सर अपनी असफलताओं का दोष अपनी स्त्री पर मढ़ देते हैं, जबकि एक मज़बूत स्त्री अपने दुखों को सीढ़ी बनाकर सफलता के शिखर तक पहुँचती है।
उपदेश: “किसी को इतना मत झुकाओ कि वह खड़ा होना ही भूल जाए, क्योंकि जब वह खड़ा होगा, तो शायद आप उसके सामने बहुत छोटे नज़र आएंगे।”
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