अधूरी मोहब्बत, समोसे का ठेला और आत्मसम्मान की गूँज

पटना की शामें अक्सर गंगा की लहरों की तरह शांत होती हैं, लेकिन शहर के भीतर शोर का एक अपना ही संगीत है। विकास, जो आज बिहार के सफलतम युवा उद्यमियों में गिना जाता था, अपनी ‘ऑडी’ की खिड़की से बाहर देखते हुए इसी शोर में अपना सुकून ढूँढ रहा था। गाड़ी की चमक और बैंक बैलेंस की ऊँचाई ने उसे दुनिया की नज़र में ‘सफल’ बना दिया था, लेकिन उसके भीतर का वह 20 साल का लड़का आज भी बी.एन. कॉलेज के उस बरगद के पेड़ के नीचे खड़ा था, जहाँ उसने आखिरी बार प्रीति को देखा था।

वह शाम और नियति का बुलावा

बारिश की हल्की फुहारों ने पटना की सड़कों को धो दिया था। बोरिंग रोड की भीड़भाड़ के बीच, विकास ने अचानक गाड़ी रोकने का फैसला किया। उसने ड्राइवर को घर जाने को कह दिया और खुद स्टेयरिंग संभाल ली। उसे नहीं पता था कि नियति ने आज उसके लिए क्या पटकथा लिखी है।

एक मोड़ पर, जहाँ स्ट्रीट लाइट्स की पीली रोशनी सड़क पर बिछी थी, उसकी नज़र एक छोटे से समोसे के ठेले पर पड़ी। वहाँ से उठती सोंधी खुशबू ने नहीं, बल्कि उस ठेले पर खड़ी एक आकृति ने उसका ध्यान खींचा। एक औरत, जिसने धुंधली सी सूती साड़ी पहनी थी, चेहरे पर पसीने की बूंदें थीं और हाथों में वह जादुई लय थी जो विकास को जानी-पहचानी लगी।

विकास ने गाड़ी किनारे लगाई और ठेले की ओर बढ़ा। जैसे-जैसे कदम करीब आ रहे थे, उसका दिल किसी पुराने ड्रम की तरह बजने लगा।

“दो समोसे देना,” विकास ने धीमी आवाज़ में कहा।

औरत ने सिर नहीं उठाया, बस प्लेट सजाने लगी। “अभी देती हूँ साहब, बस दो मिनट।”

वह आवाज़! वह आवाज़ विकास के कानों में किसी पुराने मधुर गीत की तरह गूँजी। यह वही लय थी, वही ठहराव था जिसे विकास ने दस साल पहले खो दिया था। जब औरत ने प्लेट आगे बढ़ाई और पैसे लेने के लिए नज़रें ऊपर कीं, तो जैसे वक्त की सुई वहीं रुक गई।

“प्रीति?” विकास के गले से यह नाम एक इबादत की तरह निकला।

प्रीति के हाथ कांपे, स्टील की चिमटी कड़ाही में गिरते-गिरते बची। उसकी आँखों में एक पल के लिए डर, फिर पहचान और अंत में असीम वेदना उभर आई। उसने तुरंत नज़रें झुका लीं। “आप… आप गलत समझ रहे हैं। मैं कोई प्रीति नहीं हूँ।”

“झूठ मत बोलो,” विकास ने पास आकर कहा, उसकी आवाज़ में अधिकार और रुदन दोनों थे। “इकोनॉमिक्स डिपार्टमेंट, तीसरी बेंच, और तुम्हारी वह हंसी… उसे गरीबी का यह मैला दुपट्टा नहीं छुपा सकता।”

कॉलेज की वे यादें और एक खामोश विदाई

प्रीति की आँखों से एक आंसू टपक कर गरम समोसे पर गिरा। उसने हार मान ली। “हाँ, मैं प्रीति हूँ। पर वह प्रीति मर चुकी है विकास। अब सिर्फ यह ठेला और यह भूख बची है।”

विकास की आँखों के सामने कॉलेज के दिन तैरने लगे। प्रीति कॉलेज की सबसे मेधावी छात्रा थी। उसकी सादगी और उसकी पढ़ाई के प्रति लगन ने विकास को उसका कायल बना दिया था। विकास ने उसे चाहा तो बहुत, पर कभी कह नहीं पाया। उसे डर था कि कहीं ‘आई लव यू’ कहने से वह दोस्ती भी न खो दे जो उसके जीने का सहारा थी।

कॉलेज खत्म हुआ, और समाज की रीतियों ने प्रीति को एक ऐसे बंधन में बांध दिया जहाँ उसके सपनों की बलि दे दी गई। विकास अपनी करियर की दौड़ में भागता रहा, यह सोचकर कि प्रीति खुश होगी। उसे क्या पता था कि जिस लड़की को उसने ‘राजकुमारी’ समझा था, वह जिंदगी की कड़वी धूप में झुलस रही थी।

दुखों का पहाड़ और संघर्ष की दास्तान

विकास उसे पास के एक बेंच पर ले गया। प्रीति ने अपनी कहानी सुनाई, जो किसी पत्थर को भी पिघला दे। शादी के दो साल बाद ही उसके पति का एक सड़क हादसे में निधन हो गया। ससुराल वालों ने उसे ‘मनहूस’ करार दिया और संपत्ति के लालच में घर से निकाल दिया। मायके गई, तो वहाँ भाइयों ने उसे बोझ समझा। बीमार पिता की जिम्मेदारी और अपनी भूख के लिए उसने वह रास्ता चुना जो समाज की नज़रों में ‘छोटा’ था, पर उसके चरित्र के लिए सबसे बड़ा था।

“मैंने समोसे बेचना शुरू किया विकास,” प्रीति ने शून्य में देखते हुए कहा। “शुरुआत में लोग ताने देते थे, छेड़ते थे। पर मैंने हार नहीं मानी। मुझे अपने पिता की दवा और अपनी गरिमा बचानी थी।”

विकास का सीना गर्व और दुख से भर गया। “तुमने मुझे याद क्यों नहीं किया?”

“किस हक से?” प्रीति ने पलटकर पूछा। “तुम आज कहाँ हो और मैं कहाँ। मैं तुम्हारी दुनिया में एक दाग की तरह नहीं आना चाहती थी।”

सम्मान की पुनर्स्थापना

अगले कुछ दिन विकास के लिए बेचैनी भरे थे। वह रोज़ उस ठेले पर जाता। लोग बातें बनाने लगे—”अमीर साहब को समोसे वाली से प्यार हो गया है।” लेकिन विकास को दुनिया की परवाह नहीं थी। वह प्रीति को उस दलदल से निकालना चाहता था, पर प्रीति का आत्मसम्मान बाधा बन रहा था।

“मैं तुम्हें एक दुकान देना चाहता हूँ,” विकास ने एक दिन प्रस्ताव रखा।

“नहीं,” प्रीति ने दृढ़ता से कहा। “मुझे खैरात नहीं चाहिए विकास। अगर तुम मेरा साथ देना चाहते हो, तो मेरा हाथ थाम कर समाज के सामने खड़े हो सको, तो बताओ। वरना यह एहसान मुझे छोटा महसूस कराएगा।”

विकास ने वही किया जो एक सच्चे प्रेमी को करना चाहिए। वह अपनी माँ को लेकर प्रीति के उस टूटे हुए घर में पहुँचा, जहाँ उसके पिता खाट पर पड़े थे।

विकास की माँ, सरोज देवी, एक स्वाभिमानी महिला थीं। उन्होंने प्रीति के संघर्ष को देखा और उसके हाथों को चूम लिया। “बेटा, लोग गहनों से सुंदर होते हैं, पर तुम अपने चरित्र से चमक रही हो। क्या तुम मेरे घर की लक्ष्मी बनोगी?”

ससुराल की वापसी: एक हिसाब बाकी था

शादी से पहले विकास ने तय किया कि प्रीति के अतीत के भूतों को हमेशा के लिए दफनाना होगा। वह प्रीति को लेकर उसके पुराने ससुराल गया। वही घर, जहाँ से उसे धक्के मारकर निकाला गया था।

जब चमचमाती गाड़ियों का काफिला उस गाँव में रुका, तो लोग दंग रह गए। प्रीति के ससुर और देवर, जो उसकी जमीन हड़प कर बैठे थे, थर-थर कांपने लगे। विकास ने कोई शोर नहीं मचाया, बस कानूनी कागज़ात मेज पर रखे।

“प्रीति यहाँ बदला लेने नहीं आई है,” विकास ने ठंडी आवाज़ में कहा। “वह सिर्फ अपना हक लेने आई है। और याद रखना, आज के बाद अगर किसी ने इसकी तरफ आँख उठाकर भी देखा, तो पटना का कानून तुम्हारे घर तक पहुँचेगा।”

प्रीति ने उस घर की दहलीज पर खड़े होकर सिर्फ इतना कहा, “आपने मुझे घर से निकाला था क्योंकि मैं ‘अकेली’ थी। आज मैं ‘पूर्ण’ हूँ। आपकी दी हुई नफरत ने ही मुझे आज इस प्यार के काबिल बनाया है।”

एक नई शुरुआत: ‘प्रीति के स्वाद’ की सफलता

शादी के बाद, विकास ने प्रीति को घर की चारदीवारी में कैद नहीं किया। उसने प्रीति के उस ‘समोसे के हुनर’ को एक बड़े ब्रांड में बदल दिया। आज पटना के सबसे मशहूर रेस्टोरेंट का नाम ‘प्रीति की रसोई’ है, जहाँ केवल वही औरतें काम करती हैं जिन्हें समाज ने ठुकरा दिया था।

प्रीति अब सड़क किनारे समोसे नहीं बेचती, बल्कि वह सैकड़ों औरतों को ‘सम्मान’ बेचना सिखाती है।

निष्कर्ष: कहानी का संदेश

यह कहानी सिर्फ एक अधूरी मोहब्बत के पूरा होने की नहीं है। यह कहानी है—स्थितियों से लड़ने की, एक पुरुष द्वारा महिला के संघर्ष को समझने की और सबसे बढ़कर, आत्मसम्मान की।

मोहब्बत वह नहीं जो सिर्फ महलों में मिले, मोहब्बत वह है जो सड़क किनारे धूल में सनी अपनी ‘प्रीति’ को पहचान ले और उसे दुनिया के तानों से बचाकर अपने दिल के सिंहासन पर बैठा दे।