ऋण: वर्दी, बाज़ार और वो मूक बलिदान

अध्याय 1: नागपुर का सीताबर्डी बाज़ार और एक साधारण दिन

नागपुर के प्रसिद्ध सीताबर्डी बाज़ार में दोपहर का सूरज आग उगल रहा था। सड़कों पर शोर था, गाड़ियों का शोर, मोल-भाव करती औरतें और पसीने से तर-बतर दुकानदार। इसी भीड़ के बीच एक किनारे पर 32 साल का माधव अपनी सब्जी की दुकान लगाए बैठा था। फटी हुई बनियान, चेहरे पर धूल और आंखों में एक अजीब सा ठहराव। माधव अन्य सब्जी वालों की तरह चिल्लाकर ग्राहक नहीं बुलाता था। वह बस चुपचाप बैठा रहता, जैसे उसे बेचने से ज्यादा किसी का इंतज़ार हो।

माधव की जिंदगी इस बाज़ार की धूल और सब्जियों के टोकरों के बीच सिमट गई थी। लोग उसे ‘बेचारा’ समझते थे। कोई नहीं जानता था कि इस साधारण से दिखने वाले सब्जी वाले के भीतर बलिदान का कितना गहरा समंदर है।

अध्याय 2: वर्दी का आगमन और बाज़ार की खामोशी

अचानक, बाज़ार के मुहाने पर सायरन की आवाज़ सुनाई दी। पुलिस की गाड़ियां, सायरन बजाती हुई जिप्सी और भारी सुरक्षा बल बाज़ार में दाखिल हुआ। पूरे बाज़ार में हड़कंप मच गया। लोग अपना सामान समेटने लगे। दुकानदारों को लगा कि शायद अतिक्रमण हटाओ अभियान है।

तभी बीच की सफेद गाड़ी से एक महिला अधिकारी उतरीं। चेहरे पर गजब का तेज, आंखों में अनुशासन की चमक और कंधे पर IPS के सितारे। वह नई तैनात हुई जिले की एसपी शिखा थीं। बाज़ार का कोलाहल एक पल में सन्नाटे में बदल गया। शिखा अपनी टीम के साथ पैदल मार्च करते हुए बाज़ार का निरीक्षण कर रही थीं।

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अध्याय 3: वह पल जिसने समय को रोक दिया

शिखा चलते-चलते अचानक रुक गईं। उनकी नज़र माधव की उस छोटी सी सब्जी की दुकान पर पड़ी। पूरे बाज़ार की सांसें थम गईं। लोगों को लगा कि अब इस गरीब सब्जी वाले की खैर नहीं। माधव भी अपनी जगह से खड़ा हो गया। उसके हाथ कांप रहे थे।

शिखा धीरे-धीरे माधव की ओर बढ़ीं। उन्होंने माधव के चेहरे को गौर से देखा। माधव की आंखों में डर नहीं था, बल्कि एक ऐसी खुशी थी जो केवल वह समझ सकता था। तभी, जो हुआ उसने इतिहास रच दिया।

सरेआम, सैकड़ों लोगों की मौजूदगी में, वर्दी पहने हुए IPS अधिकारी शिखा ने अपनी टोपी उतारी और माधव के सामने अपना सिर झुकाकर एक औपचारिक ‘सलाम’ (Salute) किया। बाज़ार में मौजूद पुलिसकर्मी, दुकानदार और आम जनता—सब पत्थर की मूर्ति की तरह जम गए। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि एक ज़िले की सबसे बड़ी अधिकारी एक सब्जी वाले को सलाम क्यों कर रही है?

अध्याय 4: अतीत की धुंध और त्याग की दास्तान

सलाम करने के बाद शिखा की आंखों से एक आंसू की बूंद गिरी। उन्होंने गूँजती हुई आवाज़ में कहा, “आज मैं जो कुछ भी हूँ, इस वर्दी में यहाँ आपके सामने खड़ी हूँ, वह इस आदमी की वजह से हूँ।”

बाज़ार के लोगों के लिए यह पहेली थी, लेकिन शिखा ने वहाँ खड़े होकर वह राज़ खोला जिसे जानकर पूरा शहर सन्न रह गया। 10 साल पहले माधव और शिखा की शादी हुई थी। माधव उस समय एक प्राइवेट कंपनी में अच्छी नौकरी करता था। शिखा के भीतर अफ़सर बनने की आग थी। माधव ने शिखा के सपनों को अपनी आंखों में सजा लिया।

जब शिखा की पढ़ाई का खर्च बढ़ा, तो माधव ने अपनी नौकरी के साथ-साथ रात में पार्ट-टाइम काम करना शुरू किया। लेकिन किस्मत को कुछ और मंजूर था। शिखा का यूपीएससी (UPSC) के दो प्रयासों में चयन नहीं हुआ। आर्थिक तंगी इतनी बढ़ गई कि घर चलाना मुश्किल हो गया।

अध्याय 5: ज़मीन और रूह का सौदा

माधव ने हार नहीं मानी। उसने शिखा से कहा, “तुम बस पढ़ो शिखा, बाकी मैं देख लूँगा।” माधव ने अपने गांव की पुरखों की ज़मीन बेच दी। जब वह भी कम पड़ी, तो उसने अपनी किडनी तक बेचने का फैसला किया था, लेकिन शिखा को कभी पता नहीं चलने दिया। उसने अपनी नौकरी छोड़कर सब्जी की दुकान लगा ली ताकि शिखा की दिल्ली की कोचिंग की भारी फीस भरी जा सके।

शिखा ने माधव का संघर्ष देखा था। लेकिन समाज और माधव के परिवार का दबाव बढ़ गया। माधव के घर वालों ने शिखा पर ताने कसे कि वह माधव का पैसा बर्बाद कर रही है। शिखा को मानसिक शांति देने के लिए माधव ने एक बहुत बड़ा और कड़वा कदम उठाया। उसने शिखा से ‘दिखावे का तलाक’ (Divorce) लिया ताकि वह बिना किसी पारिवारिक दबाव और बोझ के अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे सके। वह कागज़ों पर अलग हुए, लेकिन रूह से माधव हमेशा उसके साथ रहा।

अध्याय 6: सफलता का मीठा फल और कड़वा अहसास

शिखा का चयन IPS में हो गया। ट्रेनिंग के दौरान माधव ने कभी उससे संपर्क नहीं किया क्योंकि वह नहीं चाहता था कि उसकी गरीबी और सब्जी की दुकान शिखा के नए अफ़सरी रुतबे में रुकावट बने। उसने अपनी पहचान छुपा ली और उसी बाज़ार में सब्जी बेचता रहा।

लेकिन शिखा ने उसे कभी नहीं भुलाया। अफ़सर बनने के बाद उसने पहला काम माधव को ढूंढने का किया। आज, अपनी जॉइनिंग के पहले दिन, उसने माधव को सरेआम वह सम्मान दिया जिसका वह हकदार था।

शिखा ने माधव का हाथ पकड़ा और कहा, “ये हाथ जिन्होंने सब्जियां तौलीं, उन्होंने मेरा भविष्य गढ़ा है। समाज के लिए यह एक तलाकशुदा जोड़ा हो सकता है, लेकिन मेरे लिए माधव मेरे भगवान हैं।”

अध्याय 7: बाज़ार का हृदय परिवर्तन

जो लोग माधव को कल तक ‘बेचारा’ कहकर पुकारते थे, आज उनकी आंखों में सम्मान था। बाज़ार के अन्य दुकानदारों ने माधव पर फूलों की बारिश की। वर्दी की ताकत ने आज प्यार और त्याग के सामने घुटने टेक दिए थे।

शिखा ने माधव से कहा, “अब बहुत हो गया माधव। अब तुम सब्जी नहीं बेचोगे। अब तुम मेरे साथ चलोगे, उसी घर में जिसे तुमने अपने खून-पसीने से सींचा है।” माधव की आंखों में खुशी के आंसू थे। उसने केवल इतना कहा, “शिखा, तुम्हारी वर्दी की चमक ही मेरी सबसे बड़ी कमाई है।”

उपसंहार: रिश्तों की असली परिभाषा

यह कहानी हमें सिखाती है कि सफलता के पीछे अक्सर किसी एक व्यक्ति का मौन और अदृश्य बलिदान होता है। माधव और शिखा का रिश्ता कागजों के मोहताज नहीं था। शिखा ने अफ़सर बनकर भी अपना ‘इंसान’ होना नहीं भुलाया, और माधव ने सब कुछ खोकर भी अपना ‘प्रेम’ नहीं खोया।

नागपुर का वह बाज़ार आज भी उस सलाम की गवाही देता है। यह उन लोगों को करारा जवाब था जो सोचते हैं कि अफ़सर बनने के बाद पुराने रिश्ते बोझ बन जाते हैं।


समाप्त