मोची से मजिस्ट्रेट: स्वाभिमान की एक अमर गाथा
अध्याय 1: सोनपुर की धूल और पीपल की छांव
उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले का एक छोटा सा गांव, सोनपुर। यहाँ की सड़कें कच्ची थीं, छतें खपरैल की थीं और लोगों की उम्मीदें अक्सर शाम ढलते ही गरीबी के अंधेरे में खो जाती थीं। इसी गांव के एक कोने में, एक विशाल पीपल का पेड़ था जिसकी जड़ें सदियों पुरानी थीं। उसी पेड़ के नीचे बैठता था अजय।
अजय की दुकान के नाम पर केवल एक पुराना लकड़ी का तख्त था। उसके चारों ओर पुराने जूतों का ढेर, धागे की गिल्लियां और लोहे के कुछ औजार बिखरे रहते थे। अजय की उम्र बमुश्किल 25 साल रही होगी, लेकिन उसके चेहरे पर छाई गंभीरता उसे उम्र से कहीं बड़ा दिखाती थी। वह दिन भर लोगों की फटी हुई चप्पलें सिलता, जूतों पर पॉलिश करता और हर उस इंसान के सामने सिर झुकाता जो उसे एक-दो रुपये फेंक कर देता था।
लेकिन शाम होते ही अजय का एक दूसरा रूप सामने आता। जैसे ही सूरज की रोशनी मद्धम पड़ती, वह अपने हाथ धोकर एक पुराने बस्ते से कुछ किताबें निकालता। वह कोई साधारण किताबें नहीं थीं—वे भारतीय इतिहास, राजनीति और अर्थशास्त्र की भारी-भरकम पुस्तकें थीं। गांव वाले उसे देखकर ठहाके मारते थे।
“अबे ओ अजय! चप्पल सिलने वाले अब अफसर बनेंगे क्या?” गांव का जमींदार राम सिंह अक्सर उसे चिढ़ाता।
अजय कुछ नहीं कहता। वह बस एक शांत मुस्कान देता और अपनी पढ़ाई में डूब जाता। उसकी माँ, सरस्वती देवी, दूर से उसे देखती और अपनी साड़ी के पल्लू से आंसू पोंछ लेती। वह जानती थी कि उसका बेटा सिर्फ चमड़ा नहीं सिल रहा, वह अपनी टूटी हुई किस्मत को जोड़ने की कोशिश कर रहा है।
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अध्याय 2: कविता का प्रवेश और सपनों का टकराव
उसी गांव में कविता रहती थी। कविता के पिता रामदीन एक साधारण किसान थे, लेकिन कविता की आँखों में शहर की चकाचौंध के सपने थे। जब अजय और कविता की शादी की बात चली, तो गांव में फुसफुसाहट शुरू हो गई। कविता सुंदर थी, थोड़ी पढ़ी-लिखी थी और उसे मोची की पत्नी कहलाना कतई पसंद नहीं था।
शादी सादगी से हुई। अजय को लगा कि उसे एक जीवनसाथी मिल गया है जो उसके संघर्षों में उसका साथ देगी। लेकिन कविता की सोच अलग थी। शादी के पहले ही हफ्ते उसे घर की तंगी और जूतों की गंध से नफरत होने लगी।
“अजय, कब तक यह सब चलेगा? लोग पूछते हैं कि पति क्या करता है, तो मुझे शर्म आती है,” कविता अक्सर कहती।
अजय उसे समझाने की कोशिश करता, “कविता, थोड़ा धैर्य रखो। मैं मेहनत कर रहा हूँ, पढ़ रहा हूँ। एक दिन हालात बदलेंगे।”
लेकिन कविता का धैर्य अब खत्म हो रहा था। उसे अजय की किताबें बेकार के कागज लगते थे और उसकी मेहनत एक मोची की लाचारी।

अध्याय 3: वह काली पंचायत और अपमान की चोट
वह गर्मी का एक दिन था जब गांव में पंचायत बैठी थी। पूरे गांव के सामने कविता का सब्र टूट गया। गांव के शरारती तत्वों ने अजय का मजाक उड़ाना शुरू किया।
“क्यों अजय भाई! कलेक्टर बन गए या अभी भी तलवे ही रगड़ रहे हो?”
पूरा गांव ठहाकों से गूँज उठा। कविता, जो वहाँ खड़ी थी, अपमान की आग में जल उठी। उसने अजय की ओर देखा और चिल्लाकर कहा, “मैंने सोचा था पति मिलेगा, यहाँ तो सिर्फ एक मोची मिला है! जिसे अपनी औकात और काम से बाहर निकलने का रास्ता नहीं पता।”
अजय सन्न रह गया। पूरे गांव के सामने अपनी ही पत्नी के इन शब्दों ने उसे अंदर तक चीर दिया। कविता ने अपनी साड़ी का पल्लू संभाला और उसी वक्त अपने पिता के घर चली गई, यह कहकर कि वह अब इस मोची के साथ नहीं रहेगी।
उस रात अजय पीपल के पेड़ के नीचे घंटों बैठा रहा। उसकी आँखों में आंसू नहीं थे, बल्कि एक पत्थर जैसी कठोरता आ गई थी। उसने उसी रात गांव छोड़ने का फैसला किया। उसने अपनी माँ के पैर छुए और चुपचाप रात के अंधेरे में गायब हो गया।
अध्याय 4: प्रयागराज की तंग गलियां और तपस्या
अजय प्रयागराज पहुँचा। यह शहर प्रतियोगियों का गढ़ था। उसके पास जेब में केवल कुछ सौ रुपये थे। उसने एक धर्मशाला के कोने में जगह बनाई। दिन में वह निर्माण स्थलों पर ईंटें ढोता, लोगों के घरों में बर्तन साफ करता और जो भी समय मिलता, वह लाइब्रेरी के बाहर बैठकर पढ़ता।
उसने अपनी भूख को अपनी ताकत बनाया। जब भी उसे नींद आती या मन कमजोर होता, उसे कविता के वे शब्द याद आते— “यहाँ तो सिर्फ एक मोची मिला है।”
साल बीतते गए। अजय ने यूपीएससी (UPSC) की तैयारी शुरू की। पहले दो प्रयासों में वह असफल रहा। उसके पास कोचिंग के पैसे नहीं थे, वह दूसरों के फेंके हुए नोट्स और पुरानी किताबों से पढ़ता था। उसकी माँ गांव में अकेली थी, और अंततः लंबी बीमारी के बाद उनका देहांत हो गया। अजय अंतिम संस्कार में भी नहीं जा सका क्योंकि उसके पास किराए के पैसे नहीं थे।
उस दिन अजय स्टेशन के प्लेटफार्म पर फूट-फूट कर रोया। लेकिन उसने हार नहीं मानी। उसने माँ की राख की एक पोटली अपने पास रखी और खुद से वादा किया कि अब वह तभी लौटेगा जब वह ‘अजय कुमार’ से ‘कलेक्टर अजय कुमार’ बन जाएगा।
अध्याय 5: नियति का चक्र और सोनपुर वापसी
दस साल बीत गए। सोनपुर गांव में अब काफी कुछ बदल चुका था। कविता की जिंदगी भी एक बुरा सपना बन चुकी थी। उसने अजय को छोड़कर जिससे दूसरी शादी की थी, वह शराबी निकला। उसने घर-बार सब बेच दिया और एक दिन उसे बेसहारा छोड़कर गायब हो गया। कविता अब नहर के किनारे एक कच्ची झोपड़ी में रहने को मजबूर थी।
एक दिन गांव में खबर फैली— “कलेक्टर साहब आ रहे हैं!”
पूरा गांव सड़क के किनारे जमा हो गया। सरकारी गाड़ियों का काफिला धूल उड़ाता हुआ गांव में दाखिल हुआ। सबसे आगे वाली नीली बत्ती की गाड़ी पीपल के उसी पेड़ के पास आकर रुकी। दरवाजा खुला और एक लंबा, गंभीर और रोबीला व्यक्तित्व बाहर निकला।
सफेद शर्ट, सादे पैंट और आँखों पर चश्मा—वह अजय था।
पूरा गांव सन्न रह गया। जो लोग कल तक उसे मोची कहकर दुत्कारते थे, वे आज हाथ जोड़कर कतार में खड़े थे। अजय सीधे उसी चबूतरे पर गया जहाँ वह कभी चप्पलें सिलता था। उसने झुककर उस मिट्टी को छुआ।
अध्याय 6: झोपड़ी और इंसाफ का तराजू
अजय की नजर दूर नहर के किनारे खड़ी एक टूटी हुई झोपड़ी पर पड़ी। उसने अपने मातहतों से पूछा, “यह झोपड़ी किसकी है?”
पता चला कि वहां एक बेसहारा महिला रहती है जिसका घर अतिक्रमण के दायरे में आ रहा है। अजय धीरे-धीरे उस झोपड़ी की तरफ बढ़ा। कविता झोपड़ी के बाहर खड़ी कांप रही थी। उसने पहचान लिया था। वह वही अजय था जिसे उसने ‘मोची’ कहकर ठुकराया था।
कविता की आँखों से आंसुओं का सैलाब बह निकला। वह अजय के पैरों में गिर पड़ी। “अजय… मुझे माफ कर दो। मैं अंधी थी।”
अजय ने कविता को हाथ लगाकर नहीं उठाया। उसने बस शांति से कहा, “कविता, अगर मैं आज भी मोची होता, तो क्या तुम मुझे इंसान समझती?”
कविता के पास कोई जवाब नहीं था। अजय ने प्रशासन को आदेश दिया कि झोपड़ी न गिराई जाए और उस महिला को सरकारी योजना के तहत घर दिया जाए। उसने बदला नहीं लिया, बल्कि अपनी महानता से कविता को उसकी छोटी सोच का अहसास करा दिया।
उपसंहार: एक नई रोशनी
अजय गांव से चला गया। उसने अपनी माँ के नाम पर गांव में एक बड़ा स्कूल बनवाया ताकि फिर किसी गरीब बच्चे को ‘मोची’ कहकर न चिढ़ाया जाए। कविता आज भी उसी गांव में रहती है, लेकिन अब वह दूसरों की आँखों में नहीं, बल्कि खुद की नजरों में गिर चुकी है।
अजय की यह सफलता चीख-चीख कर कहती है कि इंसान की पहचान उसके जन्म या काम से नहीं, बल्कि उसके चरित्र और संकल्प से होती है।
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