पसीने की कमाई और वर्दी का अहंकार: जब कुली पति को पहचानने से मुकर गई टीटी पत्नी
प्रस्तावना: स्टेशन की पटरियाँ और तकदीर का खेल रेलवे स्टेशन की पटरियाँ कभी खत्म नहीं होतीं, ठीक वैसे ही जैसे एक गरीब इंसान के संघर्ष की कहानी। यह कहानी है “माधव” और “रश्मि” की। माधव ने अपनी पीठ पर दुनिया भर का बोझ उठाया ताकि उसकी पत्नी रश्मि के सिर पर सम्मान की टोपी हो। लेकिन जब रश्मि के कंधों पर टीटी (TT – Train Ticket Examiner) की वर्दी आई, तो उसे अपने ही पति का चेहरा “मैला” लगने लगा।
अध्याय 1: लाल वर्दी का संघर्ष और रश्मि का सपना
माधव बनारस रेलवे स्टेशन पर एक कुली था। तपती धूप हो या कड़ाके की ठंड, माधव अपनी लाल शर्ट पहनकर यात्रियों का भारी सामान उठाता था। उसकी कमाई का एक-एक रुपया रश्मि की किताबों, कोचिंग और फीस में जाता था। रश्मि पढ़ने में तेज थी और उसका सपना रेलवे में अफसर बनने का था।
माधव अक्सर मुस्कुराकर कहता, “रश्मि, तुम बस पढ़ाई पर ध्यान दो। जब तुम वर्दी पहनकर स्टेशन पर चलोगी, तो मेरा सीना गर्व से चौड़ा हो जाएगा।” रश्मि भी उस वक्त भावुक होकर वादा करती थी कि वह माधव के इस एहसान को कभी नहीं भूलेगी। माधव दिन में कुली का काम करता और रात को स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर ही सो जाता ताकि वह किराए के पैसे बचाकर रश्मि को भेज सके।
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अध्याय 2: वर्दी की चमक और बदलती नीयत
सालों की मेहनत रंग लाई। रश्मि का चयन रेलवे में टीटी के पद पर हो गया। जिस दिन उसे वर्दी मिली, माधव की खुशी का ठिकाना नहीं था। उसने पूरे स्टेशन पर मिठाइयां बांटीं। उसे लगा कि अब उसके दुखों के दिन खत्म हो गए।
लेकिन रश्मि के मन में कुछ और ही चल रहा था। ट्रेनिंग के दौरान वह नए लोगों से मिली, बड़े अफसरों के साथ उठी-बैठी। उसे अब माधव की “कुली” वाली पहचान से शर्म आने लगी। उसने माधव के फोन उठाने कम कर दिए और मिलने से कतराने लगी।
अध्याय 3: स्टेशन पर वह खौफनाक मुलाकात
एक दिन रश्मि की ड्यूटी उसी बनारस स्टेशन पर लगी जहाँ माधव काम करता था। माधव को जब पता चला, तो वह फटे-पुराने लेकिन साफ कपड़े पहनकर, हाथ में गुलाब का फूल लिए प्लेटफॉर्म नंबर 1 पर पहुँच गया। वह अपनी पत्नी का स्वागत करना चाहता था।
जैसे ही ट्रेन रुकी, रश्मि अपनी काली कोट और सफेद पैंट वाली टीटी की वर्दी में नीचे उतरी। वह बहुत प्रभावशाली लग रही थी। माधव खुशी से चिल्लाया— “रश्मि! देखो मैं यहाँ हूँ!”
माधव दौड़कर उसके पास पहुँचा। लेकिन रश्मि के चेहरे पर खुशी नहीं, बल्कि नफरत थी। उसके साथ उसके सीनियर अफसर और अन्य स्टाफ भी थे। रश्मि ने माधव को ऊपर से नीचे देखा जैसे वह कोई अजनबी हो।
माधव ने कहा, “रश्मि, पहचानो! मैं तुम्हारा माधव। आज तुम्हारी वर्दी देखकर मेरा जीवन सफल हो गया।”

Staff ने पूछा, “मैडम, क्या आप इस कुली को जानती हैं?”
रश्मि ने ठंडे स्वर में जवाब दिया— “नहीं, मैं इसे नहीं जानती। शायद कोई पागल है जो मुझे परेशान कर रहा है। पुलिस, इसे यहाँ से हटाओ!”
अध्याय 4: कुली का स्वाभिमान और बिखरते सपने
माधव सन्न रह गया। उसे अपनी कानों पर यकीन नहीं हुआ। जिस औरत को उसने खून-पसीना एक करके पढ़ाया, आज वही उसे “पागल” और “अजनबी” कह रही थी। पुलिस वाले माधव को धक्का देने लगे। माधव की आँखों से आंसू बह रहे थे, लेकिन वह कुछ बोला नहीं। उसने वह गुलाब का फूल जमीन पर फेंक दिया और चुपचाप वहाँ से चला गया।
उस रात माधव प्लेटफॉर्म के कोने में बैठा रहा। उसने तय किया कि वह अब कभी रश्मि के सामने नहीं जाएगा। लेकिन नियति का हिसाब अभी बाकी था।
अध्याय 5: भ्रष्टाचार का जाल और रश्मि की मुसीबत
कुछ महीनों बाद, रश्मि एक बड़े भ्रष्टाचार के मामले में फंस गई। उस पर आरोप था कि उसने बिना टिकट यात्रियों से अवैध वसूली की है। विभाग ने उसे सस्पेंड कर दिया और जांच शुरू हो गई। रश्मि के वे सारे “नए दोस्त” और अफसर गायब हो गए। वह अकेली पड़ गई।
जांच के दौरान यह बात सामने आई कि रश्मि ने अपनी नौकरी पाने के लिए जो हलफनामा (Affidavit) दिया था, उसमें उसने अपनी पारिवारिक जानकारी गलत दी थी। उसने खुद को अनाथ बताया था ताकि उसे कुछ सरकारी लाभ मिल सकें। अब उसकी नौकरी पर खतरा था।
अध्याय 6: माधव की गवाही और रश्मि का अंत
रेलवे की एक उच्च स्तरीय जांच कमेटी स्टेशन पर आई। उन्हें उस इंसान की तलाश थी जिसने रश्मि की पढ़ाई का खर्च उठाया था। जब उन्हें पता चला कि वह इंसान वहीं का एक कुली है, तो उन्होंने माधव को बुलाया।
रश्मि को लगा कि माधव अब उससे बदला लेगा। वह कमेटी के सामने कांप रही थी। माधव गवाही देने पहुँचा। जज ने पूछा, “माधव, क्या यह सच है कि तुमने इस महिला को पढ़ाया है? क्या यह तुम्हारी पत्नी है?”
माधव ने रश्मि की तरफ देखा। रश्मि की आँखों में डर और शर्म थी। माधव ने शांति से कहा—
“साहब, यह सच है कि मैंने एक लड़की को पढ़ाया था। मैंने अपनी पीठ पर पत्थर ढोए ताकि वह अफसर बन सके। लेकिन वह लड़की रश्मि नहीं थी। मेरी रश्मि तो उसी दिन मर गई थी जिस दिन उसने मुझे पहचानने से इनकार कर दिया था। यह महिला जो आपके सामने खड़ी है, मैं इसे नहीं जानता। यह मेरे लिए एक अजनबी है।”
माधव की इस “गवाही” ने रश्मि के झूठ को कानूनी रूप से साबित कर दिया। रश्मि को नौकरी से बर्खास्त (Dismiss) कर दिया गया और उस पर धोखाधड़ी का केस दर्ज हुआ।
निष्कर्ष: कर्मा का चक्र
रश्मि का अहंकार टूट चुका था। वह सड़क पर आ गई। उसने माधव से माफी मांगने की कोशिश की, लेकिन माधव अब स्टेशन छोड़ चुका था। उसने अपनी मेहनत से एक छोटा सा ढाबा खोल लिया था और अब वह गरीब बच्चों की पढ़ाई में मदद करता था।
कहानी की सीख:
अहंकार पतन की जड़ है: जब इंसान अपनी जड़ों को भूल जाता है, तो उसकी सफलता की इमारत ढहने में देर नहीं लगती।
कर्म का फल: आप दूसरों के साथ जो करते हैं, वह घूमकर आपके पास जरूर आता है।
इंसानियत और स्वाभिमान: पद और वर्दी किसी को महान नहीं बनाते, महान बनाते हैं उसके संस्कार और वफादारी।
आज भी बनारस स्टेशन पर लोग उस कुली की कहानी सुनाते हैं जिसने एक अफसर बनाई, लेकिन जब अफसर ने इंसानियत छोड़ी, तो कुली ने अपना स्वाभिमान चुन लिया।
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