शीर्षक: “सिग्नल पर खड़ा मेरा ही खून: एक माँ की अधूरी दास्तां”
प्रस्तावना: रेड लाइट का वह अजीब आकर्षण
मुंबई की भागती-दौड़ती जिंदगी में, जहाँ किसी के पास सांस लेने की भी फुर्सत नहीं थी, वहां संजना की सुबह एक अजीब सी ठहराव के साथ शुरू होती थी। वह एक बेहद अमीर घराने की बहू थी। उसके पति, मनीष, शहर के प्रतिष्ठित व्यापारी थे। हर सुबह, जब उनकी आलीशान कार एयर कंडीशनर की ठंडक के साथ शहर की सड़कों से गुजरती, तो ट्रैफिक संजना के लिए सिर्फ शोरगुल नहीं, बल्कि एक अलग ही दुनिया का दरवाजा बन जाता था।
मनीष अक्सर अपनी बिज़नेस कॉल्स में व्यस्त रहते या एफएम रेडियो पर बजते गानों में खोए रहते, लेकिन संजना की निगाहें कार की खिड़की के बाहर उस दुनिया को तलाशती थीं, जो धूल और धुएं के बीच भी मुस्कुराना जानती थी। ट्रैफिक सिग्नल लाल होते ही कई बच्चे गाड़ियों की तरफ दौड़ते—कोई भीख मांगता, कोई फूल बेचता, तो कोई अखबार। लेकिन उन सब में एक चेहरा ऐसा था, जो संजना को चुंबक की तरह अपनी ओर खींचता था।
उसका नाम कुणाल था। बमुश्किल 10 या 11 साल का वह लड़का, जिसके कपड़ों पर मैल की परतें थीं, लेकिन आंखों में एक ऐसी चमक थी जो किसी हीरे से कम नहीं थी।
भाग 1: वह मासूम बंधन
कुणाल बाकी बच्चों से अलग था। वह कभी भीख मांगते हुए गिड़गिड़ाता नहीं था। उसके चेहरे पर एक स्वाभिमान था। कभी वह गुब्बारे लेकर आता, तो कभी पुरानी किताबें। उसकी आवाज में एक अजीब सी मिठास थी, जो संजना के दिल के किसी ऐसे कोने को छू जाती थी, जो बरसों से वीरान पड़ा था।
एक दिन वह कार के पास आया और बोला, “आंटी, गुब्बारे ले लो ना। आपके बच्चे खेलेंगे तो बहुत खुश होंगे।” संजना के चेहरे पर एक फीकी मुस्कान तैर गई। उसने धीरे से कहा, “बेटा, मेरे कोई बच्चे नहीं हैं। मैं गुब्बारे लेकर क्या करूंगी?”
कुणाल ने अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से उसे देखा और मासूमियत से बोला, “तो क्या हुआ आंटी? आप ले लो ना, सुबह से मेरी बोहनी नहीं हुई है। आप ले लोगी तो मेरा दिन बन जाएगा।” उसकी बातों में इतना अपनापन था कि संजना मना नहीं कर सकी। उसने पैसे दिए और गुब्बारे खरीद लिए, जिन्हें उसने अगली गली में किसी और बच्चे को दे दिया। लेकिन उस दिन के बाद, यह एक नियम बन गया।
कुणाल और संजना के बीच एक अजीब सा रिश्ता बन गया। वह सिग्नल पर उसका इंतज़ार करती और कुणाल उसकी कार को दूर से ही पहचान लेता। कभी वह कहता, “आंटी, आज गुब्बारे फट गए, नुकसान हो गया,” तो संजना बिना जरूरत के उससे किताबें खरीद लेती। वह हर बार उसकी हथेली में चुपके से कुछ एक्स्ट्रा पैसे रख देती और कुणाल की मुस्कान उसके दिन भर की थकान मिटा देती। संजना को नहीं पता था कि वह इस सड़क छाप बच्चे की तरफ इतनी आकर्षित क्यों है। उसे लगता था कि यह शायद उसकी अपनी ममता है, जो बेऔलाद होने के कारण इस बच्चे पर छलक रही है। लेकिन कुदरत ने पर्दे के पीछे कुछ और ही खेल रच रखा था।
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भाग 2: वह अशुभ दिन
महीने बीतते गए और यह सिलसिला चलता रहा। लेकिन फिर एक दिन, वह सिग्नल सूना लगा। मनीष ने कार रोकी, रेड लाइट हुई, लेकिन कुणाल कहीं नहीं था। संजना की बेचैन निगाहें भीड़ में उसे तलाशने लगीं। “शायद आज लेट होगा,” उसने खुद को समझाया। अगले दिन भी वही हुआ। और फिर तीसरे दिन भी। अब संजना का दिल घबराने लगा। उसे लगा जैसे कुछ बहुत बुरा हुआ है। एक अनजाना डर उसके सीने में घर कर गया।
जब चौथे दिन भी कुणाल नहीं दिखा, तो संजना ने कार का शीशा नीचे किया और वहां फूल बेच रहे कुछ दूसरे बच्चों को आवाज दी। “सुनो! वो… वो कुणाल कहां है? जो गुब्बारे बेचता था?” बच्चों के चेहरे पर एक खामोशी छा गई। उनकी आंखों में डर और दुख था। उनमें से एक ने दबी जुबान में कहा, “दीदी… कुणाल का एक्सीडेंट हो गया।”
ये शब्द संजना के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतरे। “क्या? कब? कैसे?” उसकी आवाज कांपने लगी। “दो दिन पहले, एक तेज रफ्तार कार ने उसे टक्कर मार दी और भाग गई। उसका सिर फट गया था दीदी। सब लोग उसे सरकारी अस्पताल ले गए हैं, पर डॉक्टर ने कहा है कि उसका बचना मुश्किल है।”
संजना को लगा जैसे किसी ने उसकी सांसें रोक दी हों। उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। मनीष ने हैरान होकर पूछा, “संजना, तुम एक अनजान बच्चे के लिए इतना क्यों रो रही हो?” लेकिन संजना जवाब देने की स्थिति में नहीं थी। उसे खुद नहीं पता था कि उसका दिल इतना क्यों फट रहा है। उसने बच्चों से पूछा, “क्या तुम मुझे उसके घर ले जा सकते हो?” बच्चों ने हां में सिर हिलाया। “वो पास वाली बस्ती में ही रहता है।”
संजना ने मनीष की तरफ देखा। उसकी आंखों में एक ऐसी जिद थी जो मनीष ने पहले कभी नहीं देखी थी। “मनीष, मुझे यहीं उतार दो। मुझे उसे देखने जाना है। मेरा दिल नहीं मान रहा।” मनीष को ऑफिस की जल्दी थी और उसे यह सब अजीब लग रहा था, लेकिन उसने संजना की हालत देख उसे रोक नहीं पाया। “ठीक है, लेकिन संभल कर जाना और मुझे फोन करना,” कहकर मनीष वहां से चला गया।

भाग 3: अतीत का सामना
संजना उन बच्चों के साथ एक ऑटो में बैठकर उस बस्ती की ओर चल पड़ी, जहां गरीबी और गंदगी का साम्राज्य था। संकरी गलियां, नालियों की बदबू और छोटे-छोटे घरों का अंबार। ऑटो एक टूटे-फूटे मकान के सामने रुका। “यही है कुणाल का घर,” बच्चों ने इशारा किया।
संजना कांपते कदमों से आगे बढ़ी। दरवाजे पर एक बुजुर्ग महिला बैठी रो रही थी। उसके बाल सफेद हो चुके थे और चेहरा झुर्रियों से भरा था। जैसे ही संजना की नजर उस महिला पर पड़ी, वह पत्थर की मूर्ति बन गई। उसके पैरों तले से जमीन खिसक गई। यह कोई अनजान महिला नहीं थी। यह वह चेहरा था जिसे वह अपनी जिंदगी के सबसे काले अध्याय में पीछे छोड़ आई थी।
बुजुर्ग महिला ने भी सिर उठाया और संजना को देखा। पहचान की एक बिजली सी कौंधी। दोनों एक-दूसरे को घूरते रह गए। वह बुजुर्ग महिला फूट-फूट कर रो पड़ी, “बहू… तुम? यहाँ?” संजना के मुंह से बस इतना निकला, “मा… माजी?”
बुजुर्ग महिला ने अपना सिर पीटा और रोते हुए कहा, “मैं… मैं तेरे बेटे को नहीं बचा पाई संजना! मैं तेरे कुणाल की रक्षा नहीं कर पाई!” इस वाक्य ने संजना की दुनिया उजाड़ दी। “कुणाल? मेरा बेटा? वो… वो बच्चा जो सिग्नल पर…” संजना का गला रुंध गया। उसे चक्कर आने लगा। जिसे वह रोज भीख देती थी, जिसे वह 10-20 रुपये देकर मदद समझ रही थी, वह कोई और नहीं, उसका अपना सगा बेटा था। उसका खून। उसका अंश।
भाग 4: फ्लैशबैक – एक दर्दनाक अतीत
वक्त की सुई 10 साल पीछे घूम गई। साल 2020, कोलकाता। संजना तब महज 19 साल की थी। कॉलेज की दुनिया और जवानी का जोश। उसे अजय नाम के एक लड़के से प्यार हो गया था। अजय निडर था, बेखौफ था, लेकिन गलत रास्ते पर था। संजना के परिवार ने उसे बहुत समझाया, “यह लड़का ठीक नहीं है, इसका भविष्य अंधकार है।” लेकिन प्यार तो अंधा होता है। संजना ने बगावत की और अजय के साथ भागकर शादी कर ली। उसने अपने परिवार, अपनी अमीर जिंदगी, सब कुछ त्याग दिया।
शुरुआत में सब ठीक लगा। लेकिन धीरे-धीरे अजय की सच्चाई सामने आने लगी। वह किसी छोटे-मोटे गिरोह का सदस्य था। उसका काम वसूली और मार-धाड़ था। संजना डर के साए में जीने लगी। एक साल बाद, उनकी गोद में एक बेटा आया—कुणाल। बेटे के जन्म ने संजना को उम्मीद दी कि शायद अजय अब सुधर जाएगा। “अजय, अब तो छोड़ दो ये सब। हमारे बेटे के लिए,” वह अक्सर गिड़गिड़ाती। लेकिन अपराध की दुनिया में वापसी का रास्ता नहीं होता। जब कुणाल महज कुछ महीनों का था, अजय की दुश्मनों ने बेरहमी से हत्या कर दी।
संजना की दुनिया उजड़ गई। वह अकेली, बेसहारा और एक दुधमुंहे बच्चे के साथ सड़क पर आ गई। उसके पास वापस जाने के लिए कोई जगह नहीं थी। जब उसके माता-पिता को खबर मिली, तो वे आए। लेकिन सहानुभूति लेकर नहीं, शर्तें लेकर। “हम तुझे वापस ले चलेंगे,” पिता ने कठोरता से कहा। “तेरी उम्र ही क्या है? हम तेरी दूसरी शादी कर देंगे। तेरी जिंदगी फिर से संवर जाएगी।” “लेकिन मेरा बेटा?” संजना ने बच्चे को छाती से लगाकर पूछा। “वह मुजरिम का बेटा है। वह हमारे घर में नहीं जाएगा,” पिता का फैसला अटल था। “तुझे इसे यहीं छोड़ना होगा। अजय के माँ-बाप को दे दे। अगर तुझे हमारे साथ चलना है, तो इस अतीत को यहीं दफनाना होगा।”
एक तरफ सड़क की ठोकरें और अनिश्चित भविष्य, दूसरी तरफ माता-पिता का सुरक्षित घर। लेकिन कीमत थी—अपनी ममता का सौदा। संजना बहुत रोई, बहुत तड़पी। लेकिन अंत में, समाज और परिवार के दबाव और अपनी कमजोरी के आगे वह हार गई। उसने अपने जिगर के टुकड़े को, अजय की बूढ़ी माँ की गोद में डाल दिया। “इसे संभाल लेना माजी,” वह रोते हुए बोली थी। और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
उसके माता-पिता ने उसे मुंबई भेज दिया। उसकी शादी मनीष से करवा दी गई। मनीष को बताया गया कि संजना अविवाहित है। उसका अतीत, उसकी पहली शादी, उसका बेटा—सब कुछ एक गहरे राज़ में दफन कर दिया गया। संजना एक अच्छी पत्नी बन गई, लेकिन उसका दिल हमेशा उस बच्चे के लिए तड़पता रहा जिसे वह कोलकाता की गलियों में छोड़ आई थी।
और आज… नियति का क्रूर मजाक देखिए। वही बेटा, जिसे वह मरा हुआ समझकर या भुलाकर जीने की कोशिश कर रही थी, वह उसी शहर में, उसी सिग्नल पर उसके सामने भीख मांग रहा था।
भाग 5: हकीकत और संघर्ष
बस्ती में खड़ी संजना दहाड़ें मारकर रोने लगी। “मेरा कुणाल… मेरा बच्चा… मैंने उसे पहचाना क्यों नहीं? भगवान, ये तूने कैसी परीक्षा ली?” कुणाल की दादी ने बताया कि कैसे अजय की मौत के बाद रिश्तेदारों ने उन्हें घर से निकाल दिया था। वे लोग मुंबई आ गए थे और पेट पालने के लिए कुणाल को छोटी उम्र में ही काम करना पड़ा।
“वो अस्पताल में है,” दादी ने सिसकते हुए कहा। संजना पागलों की तरह अस्पताल की ओर भागी। उसकी हालत देखकर कोई नहीं कह सकता था कि वह एक अमीर घर की मालकिन है। उसके बाल बिखरे थे, काजल बह गया था। अस्पताल में कुणाल आईसीयू में था। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था। “दुआ कीजिए,” बस यही शब्द थे उनके पास।
संजना आईसीयू के कांच के बाहर खड़ी होकर अपने बेटे को देख रही थी, जिसके सिर पर पट्टियां बंधी थीं। वही मासूम चेहरा, जो कल तक हंसकर गुब्बारे बेच रहा था, आज मौत से लड़ रहा था। तभी मनीष का फोन बजा। “संजना, कहां हो तुम? रात हो गई है। घर कब आओगी?” संजना ने फोन पर ही रोते हुए कहा, “मनीष, मैं नहीं आ सकती। मेरा बेटा… मेरा बेटा मर रहा है।” मनीष हैरान रह गया। “तुम्हारा बेटा? तुम क्या कह रही हो?” संजना ने अब और झूठ न बोलने की कसम खाई। उसने फोन पर ही मनीष को सब सच बता दिया। उसका अतीत, अजय, और कुणाल। मनीष सन्न रह गया। उसे लगा जैसे उसके साथ धोखा हुआ है। “तुमने मुझसे झूठ बोला? इतने साल?” “हाँ, मैंने झूठ बोला। लेकिन आज सच सामने है। तुम मुझे छोड़ना चाहो तो छोड़ दो मनीष, लेकिन आज मैं अपने बेटे को नहीं छोड़ूंगी,” संजना ने दृढ़ता से कहा और फोन काट दिया।
भाग 6: जीवन की जंग
तीन दिन और तीन रातें। संजना अस्पताल के फर्श पर बैठी रही। उसने न कुछ खाया, न पिया। उसकी आँखों के सामने बस कुणाल का चेहरा था। वह भगवान से लड़ रही थी, गिड़गिड़ा रही थी। “मेरी जान ले ले, पर मेरे बेटे को लौटा दे।” तीसरे दिन चमत्कार हुआ। कुणाल के हाथ में हरकत हुई। डॉक्टर दौड़कर आए। कुछ घंटों बाद डॉक्टर ने बाहर आकर मुस्कुराते हुए कहा, “बधाई हो, वह खतरे से बाहर है। उसे होश आ गया है।”
संजना अंदर भागी। कुणाल ने धीरे से आँखें खोलीं। संजना को देखकर वह कमजोर आवाज में बोला, “आंटी… आप? आप यहाँ क्यों?” संजना ने उसका माथा चूमा और आंसुओं के सैलाब के बीच कहा, “बेटा, मैं आंटी नहीं हूँ। मैं… मैं तुम्हारी माँ हूँ।” कुणाल की आंखों में सवाल थे, पर संजना के आंसुओं ने सारे जवाब दे दिए। माँ और बेटे का मिलन हुआ, जिसे देखकर नर्सों की आंखें भी नम हो गईं।
उपसंहार: एक नई शुरुआत
अब सवाल मनीष का था। क्या वह इस सच को स्वीकार करेगा? कुणाल को डिस्चार्ज मिलने के बाद संजना उसे लेकर बस्ती नहीं, बल्कि एक किराए के फ्लैट में गई। उसने तय कर लिया था कि अब वह अपने बेटे के साथ ही रहेगी, चाहे मनीष अपनाए या न अपनाए।
दस दिन बाद, दरवाजे पर दस्तक हुई। सामने मनीष खड़ा था, और उसके साथ उसके माता-पिता भी थे। संजना का दिल धक से रह गया। मनीष की माँ आगे बढ़ीं और उन्होंने संजना के सिर पर हाथ रखा। “बेटी, इंसान से गलती होती है। तूने जो किया, मजबूरी में किया। लेकिन एक माँ अपने बच्चे को कैसे छोड़ सकती है, ये हम अब समझ रहे हैं।” मनीष ने आगे बढ़कर संजना का हाथ थामा। “संजना, मुझे गुस्सा आया था कि तुमने मुझसे झूठ बोला। लेकिन इन दस दिनों में मैंने महसूस किया कि तुम्हारे बिना मेरा घर सूना है। और यह बच्चा… अगर यह तुम्हारा है, तो आज से यह मेरा भी है।”
कुणाल, जो अब तक डरा हुआ कोने में खड़ा था, उसे मनीष ने गोद में उठा लिया। “चलो, घर चलते हैं,” मनीष ने कहा।
निष्कर्ष
उस दिन के बाद, संजना की जिंदगी पूरी तरह बदल गई। कुणाल को न सिर्फ एक पिता मिला, बल्कि एक ऐसा परिवार मिला जिसने उसे अपना खून मानकर अपनाया। यह कहानी हमें सिखाती है कि खून के रिश्ते कभी छुपते नहीं हैं। नियति उन्हें किसी न किसी मोड़ पर मिला ही देती है। और सबसे बड़ी बात, सच चाहे कितना भी कड़वा हो, अगर उसे स्वीकार करने की हिम्मत हो, तो अंत हमेशा सुखद होता है।
आज संजना, मनीष और कुणाल एक खुशहाल परिवार हैं। ट्रैफिक सिग्नल पर अब कोई कुणाल भीख नहीं मांगता, लेकिन संजना की गाड़ी आज भी वहां रुकती है—उन बच्चों की मदद करने के लिए, जो किसी और की खोई हुई उम्मीद हो सकते हैं।
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