उस रात की बात है जब अस्पताल में इमरजेंसी ड्यूटी थी। रात के 12:00 बजे थे और वार्ड में सिर्फ मैं और डॉक्टर साहब थे। बाकी स्टाफ घर जा चुका था। एक मरीज को दर्द हो रहा था, लेकिन वह सो गया। डॉक्टर साहब ने कहा, “प्रिया, आज थोड़ा थक गया हूं। मेरे कंधों में बहुत दर्द है। जरा मालिश कर दो।” मैंने हंसकर कहा, “डॉक्टर साहब, आप डॉक्टर हैं। खुद दवा ले लीजिए।” लेकिन वे बोले, “नहीं, बहन, तुम्हारी मालिश से आराम मिलेगा। चलो मेरे केबिन में चलो।”
मैं उनके साथ चली गई। केबिन में उन्होंने शर्ट उतार दी और मैं उनके कंधों की मालिश करने लगी। उनकी स्किन गर्म थी और मांसपेशियां मजबूत। मालिश करते-करते वे बोले, “प्रिया, जरा नीचे की तरफ भी करो। कमर में भी दर्द है।” मैंने हिचकिचाते हुए कहा, “ठीक है, साहब, लेकिन ज्यादा नहीं।”
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मालिश खत्म होने के बाद मैं जाने लगी। लेकिन वे बोले, “प्रिया, आज रात यहां रुक जाओ। अगर कोई इमरजेंसी आई तो मदद करोगी।” मैंने सोचा, “अस्पताल है, क्या बुरा है।” मैं उनके सोफे पर सो गई और वे बेड पर।
सुबह उठी तो मुझे अजीब लगा। मेरे बाल बिखरे हुए थे और शरीर में एक अजीब सी थकान। मैंने डॉक्टर साहब को देखा। वे सोए हुए थे। मैं डर गई। क्या हुआ रात में? मैंने उन्हें जगाया। “साहब, क्या हुआ? मेरे साथ कुछ गलत तो नहीं हुआ?” वे बोले, “क्या बात कर रही हो, प्रिया? यहां तो कोई नहीं आया। दरवाजा बंद था। शायद तुम्हारा भ्रम है।”

लेकिन मुझे यकीन नहीं हुआ। मैंने चुपके से केबिन में एक छोटा कैमरा लगा रखा था। मैं घर जाकर कैमरा चेक किया। वीडियो देखकर मैं स्तब्ध रह गई। रात के 2:00 बजे डॉक्टर साहब मेरे पास आए और मुझसे बात की। मैंने वीडियो सेव किया और अस्पताल वापस गई। डॉक्टर साहब से कहा, “साहब, यह देखो, रात क्या हुआ?”
वे घबरा गए। “प्रिया, माफ कर दो। मैं कंट्रोल नहीं कर पाया। तुम इतनी मेहनती हो।” मैंने कहा, “अगर करना ही था तो बताते। मैं तैयार थी। ऐसे चुपके से क्या फायदा?”
उन्होंने मुझसे कहा, “मुझे लगा तुम मना कर दोगी।” मैंने मुस्कुराकर कहा, “चलो, कोई बात नहीं, लेकिन आज रात हम खुलकर बात करेंगे।”
शाम हुई तो डॉक्टर साहब मेरे घर आए। मैंने दरवाजा खोला और वे अंदर आए। “प्रिया, तैयार हो?” मैंने कहा, “हां साहब, लेकिन धीरे-धीरे।” वे बोले, “नहीं, आज तो मजा लेंगे।” उन्होंने मुझे बाहों में लिया और बातचीत शुरू की।
हमने एक-दूसरे के बारे में बातें कीं, अपनी ज़िंदगी की चुनौतियों को साझा किया। मैंने उन्हें अपने पति के बारे में बताया, जो विदेश में काम कर रहे थे। डॉक्टर साहब ने अपनी पत्नी की यादें साझा कीं। हमारी बातचीत से एक गहरा संबंध बन गया।
हमने तय किया कि हमें एक-दूसरे का साथ देना चाहिए। हमने एक-दूसरे को समझा और अपने काम में एक-दूसरे का सहारा बनने का वादा किया।
अगले दिनों में, हमारी मुलाकातें बढ़ गईं। अस्पताल में, हम एक-दूसरे की मदद करते रहे। हम दोनों ने अपनी ज़िंदगी में एक नई दोस्ती की शुरुआत की।
यह कहानी न केवल एक रात की है, बल्कि यह एक मजबूत दोस्ती और एक-दूसरे के प्रति समझ और समर्थन की है। डॉक्टर साहब और मैं, प्रिया, ने एक-दूसरे का साथ दिया और हम दोनों ने अपने-अपने जीवन में आगे बढ़ने का निर्णय लिया।
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