“तुम सिर्फ एक नौकर हो!” – मालकिन ने बूढ़े ड्राइवर के मुँह पर पैसे मारे; 15 साल बाद क़ुदरत ने लिया ‘सबसे बड़ा’ इंसाफ़!
कहते हैं कि इंसान का अहंकार और पैसा—ये दो चीज़ें उसे ऊँचाई पर ले जाती हैं, लेकिन वहाँ पहुँचकर वह ज़मीन पर खड़े लोगों को बहुत छोटा समझने लगता है। वह भूल जाता है कि जब वक़्त का पहिया घूमता है, तो अर्श से फ़र्श पर आने में देर नहीं लगती। शंकर (Shankar), जो पिछले २५ सालों से रायज़ादा परिवार का वफ़ादार ड्राइवर था, ने इस कड़वी सच्चाई का सामना किया, लेकिन उसे पता नहीं था कि आज का दिन उसकी ज़िंदगी का सबसे अपमानजनक दिन होने वाला है।
यह कहानी सिर्फ़ एक मालिक और नौकर के बीच के रिश्ते की नहीं है, बल्कि कर्मों के फल, अपमान की आग से जन्मी तरक़्क़ी और गुप्त नेकी के उस जादू की है, जो इंसान को पूरी तरह काला या सफ़ेद नहीं रहने देती।
अपमान की तपती दोपहर: जब मालकिन ने स्वाभिमान को रौंदा
जून की तपती दोपहर थी, और शंकर गैराज के बाहर चमचमाती मर्सिडीज़ साफ़ कर रहा था। उसके माथे से पसीना टपक रहा था, लेकिन उसका ध्यान अपनी जेब में रखे उस फ़ोन पर था—अस्पताल से फ़ोन आ रहा था। उसकी पत्नी कमला आईसीयू में थी, और ऑपरेशन के लिए ५०,००० रुपये तुरंत जमा करने थे।
शंकर ने हिम्मत जुटाकर नलिनी जी से बात की। नलिनी, जिनके पति का बड़ा कारोबार था, अपने रूतबे और दौलत के नशे में चूर रहती थीं। शंकर ने हाथ जोड़कर, गिड़गिड़ाते हुए कहा, “मालकिन, प्लीज़, बहुत मजबूरी है। कमला अस्पताल में है। इस बार जान का सवाल है। मैं आपकी हर एक पाई चुका दूँगा। मेरी पगार से काट लीजिएगा। बस ५०,०००…”
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नलिनी की हँसी में क्रूरता थी। वह बोलीं, “पैसे पेड़ पर उगते हैं क्या? मैंने तुम्हें नौकरी पर रखा है, इसका मतलब यह नहीं कि मैं तुम्हारी बैंक बन जाऊँ। तुम जैसे लोगों को उँगली पकड़ाओ, तो हाथ पकड़ लेते हो।”
जब शंकर ने उन्हें “माँ समान” कहकर २५ साल की सेवा का वास्ता दिया, तो नलिनी का अहंकार सातवें आसमान पर पहुँच गया। उन्होंने अपने पर्स की चेन खोली। शंकर की आँखों में उम्मीद जगी।
लेकिन अगले ही पल जो हुआ, उसने शंकर की आत्मा को छलनी कर दिया। नलिनी ने ५०० के नोटों की एक गड्डी निकाली, और उसे शंकर के हाथ में देने के बजाय, पूरी ताक़त से उसके चेहरे पर दे मारा। नोट हवा में बिखरकर शंकर के पैरों के पास धूल और कीचड़ में जा गिरे।
नलिनी की आवाज़ किसी कोड़े की तरह बरसी:
“तुम सिर्फ़ एक नौकर हो शंकर, और नौकर बनकर रहो। मालिक बनने की कोशिश मत करो। यह ले लो अपने पैसे और दफ़ा हो जाओ यहाँ से। मुझे आज के बाद अपनी शक्ल मत दिखाना जब तक कि तुम्हें अपनी औकात याद न आ जाए।”
शंकर सन्न रह गया। वह नोट नहीं उठा रहा था, बल्कि अपनी बिखरी हुई इज़्ज़त समेट रहा था। एक हारे हुए सिपाही की तरह, वह घुटनों पर बैठा और आँसू बहाते हुए धूल में पड़े उन गंदे नोटों को उठा लिया। स्वाभिमान और पत्नी की जान में से उसने मजबूरी को चुना। नलिनी, एक घृणा भरी नज़र डालती हुई, उसे धूल में बैठा छोड़कर गाड़ी दौड़ाती हुई चली गईं।
अगले दिन, रायज़ादा हाउस पहुँचने पर शंकर को नौकरी से निकाल दिया गया। नलिनी ने कहलवाया था कि जो पैसे कल दिए थे, उसे ही उसका हिसाब और ग्रेचुटी मान लिया जाए।
२५ साल के विश्वास की हत्या कर दी गई थी। शंकर ने मन ही मन उस घर की चौखट को प्रणाम किया और बुदबुदाया, “मालकिन, आपने मुझे मेरी औकात दिखाई है। ऊपर वाला सब देख रहा है। समय बहुत बलवान होता है।”

१५ साल का चक्र: अर्श से फ़र्श तक
वक़्त को गुज़रते देर नहीं लगती। देखते ही देखते १५ साल बीत गए। समय के पहिये ने कई चक्कर लगाए, और दुनिया पूरी तरह बदल चुकी थी।
शंकर की तरक़्क़ी: शंकर ने अपमान की उस आग को अपनी ज़िंदगी को रोशन करने के लिए इस्तेमाल किया। उसने छोटी-मोटी मज़दूरी की, फिर कर्ज़ लेकर एक पुरानी टैक्सी ख़रीदी। दिन-रात की मेहनत और ईमानदारी ने रंग दिखाया। एक टैक्सी से ‘शंकर ट्रैवल्स’ शहर का एक जाना-माना नाम बन गया। आज उसके पास ५० गाड़ियाँ और १०० से ज़्यादा कर्मचारी थे। उसका बेटा विजय, जिसके लिए वह कभी गिड़गिड़ाया था, आज अपनी मेहनत से एक बड़ा अफ़सर बन चुका था। शंकर अब ‘सेठ शंकर’ था, लेकिन ज़मीन से जुड़ा हुआ।
नलिनी का पतन: दूसरी ओर, रायज़ादा परिवार पर क़िस्मत का कहर टूटा। नलिनी के पति जुए और सट्टे की लत में सब कुछ गँवा बैठे और सदमे में चल बसे। जिन पैसों का नलिनी को घमंड था, वह रेत के महल की तरह ढह गया। कोठी नीलाम हो गई, गाड़ियाँ बिक गईं। उनके अपने बेटों ने बची-खुची जायदाद बाँट ली और अपनी बूढ़ी माँ को एक छोटे से किराए के कमरे में अकेला छोड़ दिया।
आज वही नलिनी, जो कभी मर्सिडीज़ से नीचे पैर नहीं रखती थी, शहर के बस स्टैंड पर एक फटी छतरी के सहारे मूसलाधार बारिश में ठिठुर रही थी। बसें भरी हुई आ रही थीं और कोई ऑटो वाला उसे बैठाने को तैयार नहीं था। क़ुदरत उसे उसी मजबूरी का स्वाद चखा रही थी, जिसका मज़ा उसने १५ साल पहले लिया था।
karma का फ़ल: विनम्रता का सबसे बड़ा प्रहार
अचानक, एक चमचमाती हुई काली एसयूवी आकर ठीक उसके सामने रुकी। पिछली सीट का दरवाज़ा खुला और एक आदमी छाता तने हुए बाहर निकला। उसने बड़े आदर से कहा, “माता जी, आप भीग रही हैं। कहाँ जाना है आपको? आइए मैं आपको छोड़ देता हूँ।”
नलिनी को बरसों बाद किसी ने इतनी इज़्ज़त दी थी। वह चुपचाप गाड़ी में बैठ गई। एसी की ठंडक और गद्देदार सीट ने उसे पुराने वक़्त की याद दिला दी। उसने कृतज्ञता से पूछा, “बेटा, तुम कौन हो? भगवान तुम्हारा भला करे।”
गाड़ी जब एक स्ट्रीट लाइट के नीचे से गुज़री, तो रोशनी उस आदमी के चेहरे पर पड़ी। नलिनी का दिल ज़ोर से धड़का। यह चेहरा जाना-पहचाना था।
तभी उस आदमी ने धीमी और गंभीर आवाज़ में कहा, “मालकिन, आपने मुझे पहचाना नहीं। मैं शंकर हूँ। आपका पुराना ड्राइवर।”
शंकर का नाम सुनते ही नलिनी के चेहरे का रंग उड़ गया। उसका शरीर काँप गया। जिस मखमली सीट पर वह बैठी थी, वह काँटों की तरह चुभने लगी। उसकी आँखों के सामने वह अपमानजनक मंज़र घूम गया। नलिनी की आँखों से शर्मिंदगी और पश्चाताप के आँसू बह निकले।
शंकर ने अपनी जेब से साफ़ रुमाल निकालकर नलिनी की तरफ़ बढ़ाया। उसकी आवाज़ में न तो कोई व्यंग था, न ही जीत का अहंकार, बस एक ठहराव था।
“रोइए मत मालकिन। वक़्त का पहिया है। उस दिन आपने मुझे मेरी औकात याद दिलाई थी, और शायद वही मेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सबक था। उस अपमान ने मेरे अंदर एक आग जलाई थी, मालकिन। उस आग ने मुझे सोने की तरह तपाकर आज यहाँ पहुँचाया है।”
नलिनी ने रोते हुए कहा, “मैंने तुम्हारे साथ बहुत ग़लत किया, शंकर। घमंड ने मुझे अंधा कर दिया था।”
गाड़ी नलिनी की तंग और अंधेरी बस्ती के बाहर रुकी। शंकर जानता था कि बदला लेने का सबसे अच्छा तरीक़ा सामने वाले को नीचा दिखाना नहीं है, बल्कि उसे इतना ऊँचा उठकर दिखाना है कि उसका सर ख़ुद-ब-ख़ुद झुक जाए।
गुप्त नेकी और अंतिम सत्य
शंकर ने गाड़ी की डिग्गी से आटा, चावल, दाल और दवाइयों से भरा एक बड़ा बैग निकाला और नलिनी के क़दमों में रख दिया। उसने अपनी जेब से एक सफ़ेद लिफ़ाफ़ा निकाला और पूरे सम्मान के साथ नलिनी की काँपती हथेलियों पर रख दिया।
“मालकिन,” शंकर ने कहा, “यह अगले ६ महीने का राशन है, और इस लिफ़ाफ़े में कुछ नक़द पैसे हैं। इसे अपने पुराने ड्राइवर की तरफ़ से एक छोटी-सी पेंशन समझ कर रख लीजिए।”
नलिनी फूट-फूट कर रो पड़ीं। उसने नीचे झुककर शंकर के पैर छूने की कोशिश की, लेकिन शंकर ने उन्हें रोका। “मालकिन, पैर छूकर मुझे पाप का भागीदार मत बनाइए। असली मालिक वह होता है, जिसका दिल बड़ा होता है।”
अहंकार से भरे अपमान का जवाब शंकर ने दया और विनम्रता से दिया।
लेकिन नियति को शायद अब भी एक आख़िरी पन्ना लिखना बाकी था। नलिनी ने पीछे से आवाज़ लगाई: “शंकर रुको! एक सच सुनते जाओ।”
नलिनी ने एक पुराना, पीला पड़ चुका कागज़ शंकर के हाथ में थमा दिया—वह कॉलेज की फीस की रसीद थी।
“आज से १२ साल पहले जब तुम्हारे बेटे विजय का इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन होना था… वह कोई ट्रस्ट नहीं था शंकर… वो मैं थी।” नलिनी सिसकते हुए बोलीं। “उस दिन मैंने तुम्हारे मुँह पर पैसे मारे, लेकिन उस रात मुझे नींद नहीं आई। मैंने अपने कंगन बेचकर कॉलेज में वह फ़ीस जमा करवाई थी—इस शर्त पर कि तुम्हें मेरा नाम कभी पता न चले।”
शंकर के हाथों में वह कागज़ काँप रहा था। उसे अविश्वास हो रहा था—जिस औरत ने उसे ५०० रुपये के लिए ज़लील किया, उसने लाखों की फीस भरी थी।
नलिनी ने कहा, “इंसान पूरी तरह काला या सफ़ेद नहीं होता। मैंने जो किया वह प्रायश्चित था। शायद उसी एक नेकी की वजह से आज भगवान ने तुम्हें मेरे बुढ़ापे की लाठी बनाकर भेजा है।”
दिल के रिश्तों की जीत
शंकर की आँखों में अब नलिनी के लिए दया नहीं, बल्कि एक गहरा सम्मान था।
“आपने मेरे बेटे का भविष्य बनाया मालकिन,” शंकर ने भारी आवाज़ में कहा। “अब आप कहीं नहीं जा रही हैं।”
उसने अपने ड्राइवर को इशारा किया। “गाड़ी का दरवाज़ा खोलो। माताजी अब उस झोंपड़ी में नहीं, हमारे साथ हमारे घर चलेंगी।”
नलिनी की आँखों से आँसुओं का सैलाब रुक नहीं रहा था। जिस नौकर के बेटे को उसने दुत्कारा था, आज वही उसे दादी कहकर अपने घर में पनाह दे रहा था।
उस रात नलिनी को एहसास हुआ कि खून के रिश्तों से बड़े दिल के रिश्ते होते हैं। शंकर और उसके बेटे विजय ने उन्हें वह सम्मान दिया जो उन्हें अपनी दौलत के दिनों में भी कभी नसीब नहीं हुआ था।
जीवन एक गूँज (Echo) की तरह है। हम जो दुनिया को देते हैं, वही लौटकर हमारे पास आता है। नलिनी का अहंकार उसे गर्त में ले गया, लेकिन उसका एक गुप्त पुण्य आज उसकी जान बचाने के लिए ढाल बनकर खड़ा हो गया। अहंकार को जेब में नहीं, बल्कि संस्कारों को दिल में रखें, क्योंकि अंत में इंसान की पहचान उसके पद से नहीं, उसके व्यवहार से होती है।
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