शिकारी का शिकार: आईपीएस नंदिता और काला कानून
अध्याय 1: शहर का सन्नाटा और खौफ की गूँज
शहर की रातें अब वैसी नहीं रही थीं जैसी हुआ करती थीं। एक समय था जब लोग आधी रात को भी सड़कों पर बेखौफ घूमते थे, लेकिन पिछले कुछ महीनों से शहर की हवाओं में एक अनजाना डर घुल गया था। सूरज ढलते ही गलियाँ वीरान हो जाती थीं और घरों के दरवाजों पर दोहरे ताले लटकने लगते थे। कारण था—शहर से रहस्यमयी ढंग से गायब होती महिलाएं।
शुरुआत एक कॉलेज छात्रा से हुई थी, फिर एक कामकाजी महिला, और अब तक यह संख्या 21 तक पहुँच चुकी थी। सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि इनमें से किसी का भी कोई सुराग नहीं मिल रहा था। शहर का प्रशासन पंगु हो चुका था। पुलिस अधिकारी फाइलों के ढेर में दबे थे, और जनता का भरोसा वर्दी से उठ चुका था।
अध्याय 2: दरोगा बलवीर का काला साम्राज्य
शहर के बाहरी इलाके में स्थित एक पुराने थाने में दरोगा बलवीर सिंह का राज चलता था। बलवीर सिंह, जिसकी वर्दी पर लगे सितारे उसकी वीरता के नहीं बल्कि उसके भ्रष्टाचार और गुंडागर्दी के प्रतीक थे। वह दरोगा कम और किसी अंडरवर्ल्ड डॉन का गुर्गा ज्यादा लगता था। उसका दाहिना हाथ था—कांस्टेबल शिवम, जो उतना ही क्रूर था जितना बलवीर।
उस रात थाने के पीछे वाले हिस्से में शराब की महफिल सजी थी। बलवीर नशे में धुत होकर हंस रहा था। “क्यों शिवम, आज कितने शिकार आए?”
शिवम ने हाथ जोड़कर कहा, “साहब, आज तो रिकॉर्ड तोड़ दिया। पाँच नई चिड़ियाँ पिंजरे में हैं। सब सहमी हुई हैं।”
बलवीर ने एक जोर का ठहाका लगाया। “शानदार! इन्हें कुछ दिन लॉकअप में सड़ाओ। कोई झूठा केस ठोक दो। जब तक ये बाहर निकलेंगी, इनकी आवाज हलक में ही दम तोड़ देगी। इस शहर में मेरा हुक्म ही खुदा का कानून है।”
बलवीर को गुमान था कि कोई उसे छू भी नहीं सकता, क्योंकि ऊपर बैठे कमिश्नर से लेकर स्थानीय नेताओं तक, उसने सबकी जेबें गरम कर रखी थीं। लेकिन वह भूल गया था कि हर अत्याचारी का अंत लिखने के लिए नियति किसी न किसी को जरूर भेजती है।
अध्याय 3: आईपीएस नंदिता—एक नई ज्वाला
उसी शहर के मुख्यालय में एक नई आईपीएस अधिकारी ने कार्यभार संभाला था—नंदिता कुमारी। नंदिता केवल एक अधिकारी नहीं, बल्कि एक तेजतर्रार रणनीतिकार थीं। उनकी आँखों में सच्चाई के लिए एक अजीब सी तपिश थी। जब उन्होंने फाइलों में गायब महिलाओं की संख्या देखी, तो उनका खून खौल उठा।
उन्होंने तुरंत कमिश्नर को फोन लगाया। “सर, यह क्या तमाशा है? 21 महिलाएं गायब हैं और पुलिस विभाग सो रहा है?”
कमिश्नर ने लापरवाही से जवाब दिया, “मैडम, आप नई हैं। ये अपराधी बहुत खतरनाक हैं। हमारी टीम जांच कर रही है, पर कोई क्लू नहीं मिल रहा।”
नंदिता समझ गई थीं कि सिस्टम के भीतर ही कोई घुन लगा है। उन्होंने ठान लिया कि अब वह दफ्तर में बैठकर आदेश नहीं देंगी। उन्होंने अपने सबसे भरोसेमंद सिपाही, शिवांश को बुलाया।
“शिवांश, अपराधी हमें पहचानते हैं क्योंकि हम शिकारी बनकर जाते हैं। लेकिन अब, मैं शिकार बनकर जाऊंगी।”
नंदिता का प्लान खतरनाक था। वह एक साधारण महिला बनकर रात के अंधेरे में हाईवे पर जाने वाली थीं, ताकि वह उन लोगों को रंगे हाथों पकड़ सकें जो महिलाओं को अगवा करते थे।

अध्याय 4: हाईवे की वह काली रात
रात के करीब 11 बज रहे थे। हाईवे पर सन्नाटा पसरा था। नंदिता ने अपनी वर्दी उतार दी थी और एक साधारण सी साड़ी पहनकर, हाथ में एक छोटा बैग लिए सड़क के किनारे खड़ी थीं। उनके पास एक छिपा हुआ कैमरा और मिनी रिकॉर्डर था। दूर झाड़ियों में शिवांश और उनकी टीम बैकअप के लिए तैयार थी, लेकिन उन्हें आदेश था कि जब तक नंदिता सिग्नल न दें, कोई बाहर नहीं आएगा।
तभी दूर से एक पुलिस जीप की लाइट दिखाई दी। जीप नंदिता के पास आकर रुकी। उसमें से नशे में धुत बलवीर और शिवम उतरे।
“अरे वाह! इतनी रात को यह हसीन चिड़िया यहाँ क्या कर रही है?” बलवीर ने भद्दी नजरों से देखते हुए कहा।
नंदिता ने घबराहट का नाटक किया। “साहब, मैं ऑफिस से आ रही थी, मेरी गाड़ी खराब हो गई है। कृपया मुझे घर छोड़ दीजिए।”
शिवम ने हंसते हुए कहा, “घर? मैडम, हमारे पास तो बहुत बड़ा घर है—थाना! वहीं चलो, रात वहीं कटेगी।”
बलवीर आगे बढ़ा और नंदिता से बदतमीजी करने लगा। “क्या गाल हैं तुम्हारे! शहर में नई हो क्या? चलो, तुम्हें हम अपनी सुरक्षा में लेते हैं।”
नंदिता ने विरोध किया, “साहब, आप पुलिस वाले होकर ऐसी बातें कर रहे हैं? सस्पेंड हो जाओगे!”
बलवीर जोर से हंसा। “सस्पेंड? मैं दरोगा बलवीर सिंह हूँ। इस इलाके का बेताज बादशाह। आज तक 21 औरतों को अंदर किया है, आज तू 22वीं बनेगी। शिवम! उठाओ इसे और जीप में डालो!”
अध्याय 5: लॉकअप के भीतर का सच
नंदिता को घसीटते हुए थाने लाया गया और एक गंदे लॉकअप में डाल दिया गया। वहां उन्होंने देखा कि कई अन्य महिलाएं पहले से ही वहां मौजूद थीं, जो भूख और डर से बेहाल थीं।
एक महिला ने रोते हुए कहा, “बहन, तुम यहाँ कैसे आ गई? यह दरोगा शैतान है। यह हमें कभी बाहर नहीं जाने देगा।”
नंदिता ने उसे सांत्वना दी, “चुप रहो बहन। मैं तुम्हें यहाँ से निकालने आई हूँ। मैं आईपीएस नंदिता कुमारी हूँ।”
जैसे ही उन महिलाओं ने यह सुना, उनकी आँखों में उम्मीद की एक किरण जागी। नंदिता ने चुपके से अपना रिकॉर्डर निकाला और अपनी टीम को वीडियो सिग्नल भेज दिया। उस रिकॉर्डर में बलवीर का हर एक कबूलनामा दर्ज था—उसकी बदतमीजी, उसका अपहरण का धंधा और उसकी गुंडागर्दी।
नंदिता ने मन ही मन कहा, “बलवीर, अब तेरा सूर्य अस्त होने वाला है।”
अध्याय 6: न्याय का सूर्योदय
अगली सुबह, बलवीर जैसे ही सोकर उठा, उसने देखा कि थाने के बाहर भारी पुलिस बल तैनात है। शहर के तमाम बड़े मीडिया हाउस वहां पहुँच चुके थे। कमिश्नर भी वहां खड़े थे, लेकिन उनके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही थीं।
नंदिता लॉकअप से बाहर निकलीं, लेकिन इस बार उनके हाथ में हथकड़ी नहीं थी, बल्कि उनकी आँखों में वो तेज था जो अपराधियों को भस्म कर दे। उन्होंने अपनी वर्दी पहनी और बलवीर के सामने जाकर खड़ी हो गईं।
“दरोगा बलवीर सिंह, तुमने कल रात जिसे पकड़ा था, वह एक लाचार महिला नहीं, बल्कि तुम्हारी मौत थी,” नंदिता ने कड़क आवाज में कहा।
बलवीर के पैरों तले जमीन खिसक गई। “मैडम… आप? मुझसे गलती हो गई…”
“गलती नहीं, पाप किया है तुमने! वर्दी को दागदार किया है। राष्ट्रपति के आदेश से तुम्हें और तुम्हारे साथियों को तत्काल सस्पेंड और अरेस्ट किया जाता है।”
मीडिया के कैमरों के सामने बलवीर और उसके गुर्गों को हथकड़ी लगाकर ले जाया गया। जिन 21 महिलाओं को उसने कैद कर रखा था, उन्हें आजाद कराया गया। पूरे शहर में “नंदिता कुमारी जिंदाबाद” के नारे गूँज रहे थे।
उपसंहार: एक नई शुरुआत
इस घटना ने पूरे देश को हिला दिया। नंदिता ने साबित कर दिया कि यदि एक अधिकारी ठान ले, तो वह सिस्टम की हर गंदगी को साफ कर सकता है। भ्रष्टाचार की लाठी चाहे कितनी भी मजबूत क्यों न हो, सच्चाई के वार के सामने वह टूट ही जाती है।
नंदिता ने उन महिलाओं के पुनर्वास की जिम्मेदारी ली और शहर को एक ऐसा संदेश दिया कि अब कोई भी अपराधी किसी नारी की तरफ आँख उठाने से पहले हजार बार सोचेगा।
अगला कदम: क्या आप चाहते हैं कि मैं नंदिता के अगले मिशन—जैसे शहर में चल रहे नशा तस्करों के गिरोह का पर्दाफाश करना—पर एक नई कहानी तैयार करूँ? या फिर इस कहानी का एक भावुक भाग जिसमें उन 21 महिलाओं के परिवारों से मिलने के दृश्य हों?
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