शीर्षक: अवशेष — जब महलों की नींव दरक गई और वफादारी की एक लौ जल उठी

अध्याय 1: मेहरा मैन्शन का मिथ्या अहंकार

नागपुर के सिविल लाइन्स इलाके में स्थित ‘मेहरा मैन्शन’ शहर की सबसे ऊंची इमारतों में से एक नहीं था, लेकिन इसकी भव्यता किसी राजमहल से कम नहीं थी। सुबह के 7:30 बज रहे थे। घर के विशाल लॉन में लगे विदेशी फव्वारों से गिरते पानी की आवाज एक अजीब सा संगीत पैदा कर रही थी। डाइनिंग टेबल पर नाश्ता सजाने का काम चल रहा था। चांदी के बर्तनों में सजे फल, ओवन से निकली ताजी ब्रेड की खुशबू और ताजे जूस की महक पूरे हॉल में फैली थी।

अजय मेहरा, जो कभी एक मामूली क्लर्क के बेटे थे और आज शहर के सबसे बड़े रियल एस्टेट टाइकून माने जाते थे, अपनी कुर्सी पर बैठकर ‘द इकोनॉमिक टाइम्स’ के पन्नों में डूबे हुए थे। अजय के लिए सफलता का मतलब था—शक्ति। उन्हें लगता था कि उन्होंने समय को पालतू बना लिया है। उनके एक इशारे पर शहर के बड़े-बड़े सौदे तय होते थे। अजय का व्यक्तित्व रोबीला था, लेकिन उनकी आंखों में एक ऐसा ठंडापन था जो अक्सर अत्यधिक धन के साथ आता है।

उनकी पत्नी, नैना, सीढ़ियों से उतरते हुए ऐसी लग रही थी मानो किसी अंतरराष्ट्रीय मैगजीन के कवर से सीधे बाहर आ गई हो। नैना के लिए अजय का प्यार और उसकी अपनी पहचान, अजय के बैंक बैलेंस की ऊंचाइयों से मापी जाती थी। नैना ने कभी अभाव नहीं देखा था। उसके लिए गरीबी एक ऐसा शब्द था जो केवल फिल्मों या किताबों में होता था।

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“अजय, मुझे अगली किटी पार्टी के लिए वह नया पन्ना सेट चाहिए जिसे हमने कल शोरूम में देखा था,” नैना ने अपनी कॉफी का घूंट भरते हुए कहा। उसकी आवाज में कोई आग्रह नहीं था, बल्कि एक अधिकार था। अजय ने अखबार से नजरें हटाए बिना कहा, “ले लेना नैना। मैनेजर को बोल दिया है, शाम तक घर आ जाएगा।”

रसोई के दरवाजे पर सीता चुपचाप खड़ी यह सब देख रही थी। सीता पिछले 18 वर्षों से मेहरा परिवार की सेवा में थी। उसने अजय को एक पुराने स्कूटर से मर्सिडीज तक और दो कमरों के चाल नुमा मकान से इस महल तक पहुँचते देखा था। अजय के लिए सीता केवल घर की ‘व्यवस्था’ का एक अदृश्य हिस्सा थी। वह वही औरत थी जिसने अजय के बच्चों को संभाला था, नैना के नखरे झेले थे और बिना थके घर को मंदिर की तरह साफ रखा था। लेकिन अजय ने कभी सीता की आंखों में छिपी उस मूक वफादारी को पढ़ने की जरूरत महसूस नहीं की थी।

अध्याय 2: ढहता हुआ साम्राज्य और बेनकाब होते चेहरे

दोपहर होते-होते नागपुर की तपती धूप के बीच अजय के दफ्तर में हलचल मच गई। शेयर बाजार में एक अप्रत्याशित गिरावट और अजय के सबसे बड़े प्रोजेक्ट ‘मैन्शन हाइट’ पर सरकार की अचानक रोक ने अजय के पैरों तले जमीन खिसका दी। करोड़ों का निवेश एक झटके में डूब गया था। शाम होते-होते बैंक के अधिकारियों की गाड़ियां मेहरा मैन्शन के बाहर कतार में खड़ी थीं। वे वहां सम्मान देने नहीं, बल्कि अजय की हर उस चीज पर कब्जा करने आए थे जिस पर उन्हें गर्व था।

ड्राइंग रूम में जहाँ कभी शहर के दिग्गज बैठकर ठहाके लगाते थे, वहां आज सन्नाटा पसरा था। अजय एक टूटे हुए आदमी की तरह सोफे पर बैठे थे। बैंक के अधिकारियों ने बहुत ही ठंडे लहजे में कहा, “मिस्टर मेहरा, आपके सारे अकाउंट फ्रीज कर दिए गए हैं। अगले 48 घंटों में आपको यह घर खाली करना होगा।”

अजय का गला सूख गया। जब उन्होंने यह बात नैना को बताई, तो नैना की प्रतिक्रिया वैसी नहीं थी जैसी एक जीवनसाथी की होनी चाहिए। उसके चेहरे पर सांत्वना के बजाय एक तीखा आक्रोश और घृणा थी। “अजय! तुम यह कैसे कह सकते हो कि सब खत्म हो गया? मेरी लाइफस्टाइल का क्या? मेरे स्टेटस का क्या? मैंने यह दरिद्रता झेलने के लिए तुमसे शादी नहीं की थी!” नैना के शब्द अजय के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतर रहे थे।

उस रात, बिना किसी चेतावनी के, नैना ने अपना कीमती सामान और गहने एक बड़े बैग में भरे। उसने अजय को एक नजर भी नहीं देखा और बहुत बेरुखी से कहा, “मैं इस अपमान के साथ यहाँ नहीं रह सकती। मैं कुछ समय के लिए अपने मायके जा रही हूँ। जब सब ठीक हो जाए (अगर कभी हुआ), तो मुझे फोन करना।”

अजय जानते थे कि नैना अब कभी वापस नहीं आएगी। वह केवल अजय मेहरा की दौलत से प्यार करती थी, अजय मेहरा से नहीं।

अध्याय 3: सन्नाटे की गूंज और सीता का निर्णय

मेहरा मैन्शन अब सचमुच एक खंडहर की तरह लग रहा था। बिजली काट दी गई थी और आलीशान झूमर अब केवल कांच के बेजान टुकड़ों की तरह लटके थे। अजय उसी डाइनिंग टेबल पर अकेले बैठे थे जहाँ कल तक वैभव का शोर था। तभी उन्होंने देखा कि कोई मोमबत्ती जलाकर उनके पास आ रहा है। वह सीता थी।

अजय ने बहुत थकी हुई आवाज में कहा, “सीता? तुम अब तक यहाँ क्या कर रही हो? ड्राइवर, माली, रसोइया—सब अपनी बकाया तनख्वाह लेकर भाग गए। यहाँ तक कि नैना भी… अब मेरे पास तुम्हें देने के लिए एक कौड़ी भी नहीं है। जाओ सीता, कहीं और काम ढूंढ लो।”

सीता ने बहुत शांति से मोमबत्ती मेज पर रखी और अजय के सामने बैठ गई—पहली बार वह उनके बराबर बैठी थी। उसने कहा, “भैया, जब आप बड़े साहब थे, तब मैं आपकी नौकरानी थी। आज आप केवल अजय भैया हैं, और मैं आपकी बहन की तरह यहाँ खड़ी हूँ। क्या एक बहन मुसीबत में भाई का हाथ छोड़ देती है? आपने सालों तक मुझे छत दी, अब जब आपकी छत छिन गई है, तो मैं आपको सड़क पर कैसे छोड़ दूँ?”

अजय की आंखों से आंसू छलक पड़े। जिसे उन्होंने ‘करोड़पति’ अजय मेहरा समझा था, वह आज एक नौकरानी के अहसान के नीचे दब गया था। सीता ने अपनी साड़ी के पल्लू से एक पुरानी पोटली निकाली। “भैया, यह मेरी अठारह साल की बचत है। मैंने कभी खर्च नहीं किया, यह सोचकर कि बुढ़ापे में काम आएगा। लेकिन आज मेरा भाई मुश्किल में है, तो इससे बड़ा काम क्या होगा?”

अजय ने पोटली को छुआ। उसमें कुछ हजार रुपये थे, लेकिन उस वक्त वे रुपये अजय के लिए दुनिया की सबसे बड़ी दौलत थे।

अध्याय 4: शून्य से सृजन का कठिन मार्ग

अजय मेहरा के लिए वह पोटली केवल कुछ हजार रुपये नहीं, बल्कि एक नया जीवन थी। वे मेहरा मैन्शन छोड़कर एक तंग गली के छोटे से कमरे में रहने चले गए। जिस आदमी ने कभी मलमल के बिस्तरों पर नींद ली थी, वह आज एक पुरानी चटाई पर सो रहा था। लेकिन उस छोटे से कमरे में एक ऐसी शांति थी जो करोड़ों के बंगले में कभी नहीं थी।

सीता ने सुबह 4 बजे उठकर दूसरों के घरों में काम करना शुरू किया ताकि घर का खर्च चल सके और अजय अपना छोटा सा कंसल्टेंसी का काम फिर से शुरू कर सकें। अजय शुरू में बहुत संकोच करते थे, उन्हें लगता था कि वे सीता पर बोझ हैं। लेकिन सीता की दृढ़ता ने उन्हें टूटने नहीं दिया। अजय ने पुरानी साइकिल उठाई और छोटे-छोटे ऑफिसों के चक्कर लगाने लगे। लोग उनका मजाक उड़ाते, पुरानी दुश्मनी निकालते, लेकिन अजय के पास खोने को अब कुछ नहीं था, इसलिए उनका डर खत्म हो चुका था।

एक दिन अजय ने एक छोटी सी जमीन का सौदा अपनी समझदारी से करवाया और उन्हें उनका पहला कमीशन मिला। उन्होंने सबसे पहले सीता के लिए एक अच्छी साड़ी खरीदी और उसकी सारी बचत उसे वापस करनी चाही। सीता ने मुस्कुराकर कहा, “भैया, यह पैसा आपने कमाया है, अब इसे फिर से बड़ा बनाने में लगाओ। मुझे आपकी सफलता चाहिए, पैसा नहीं।”

अजय ने महसूस किया कि गरीबी ने उन्हें वह सिखाया जो अमीरी कभी नहीं सिखा पाई—’असली पहचान’। उन्होंने अब लोगों को उनकी हैसियत से नहीं, उनके चरित्र से परखना शुरू किया।

अध्याय 5: नैना की वापसी और प्रायश्चित

दो साल बीत गए। अजय की मेहनत रंग लाई। वे फिर से एक सफल उद्यमी के रूप में उभरे। हालाँकि वे अब पहले की तरह ‘दिखावे’ के शौकीन नहीं थे, लेकिन उनके पास एक सम्मानजनक बैंक बैलेंस और एक छोटा लेकिन सुंदर घर था। नागपुर के व्यापारिक हलकों में फिर से अजय मेहरा के नाम की चर्चा होने लगी।

एक शाम, जब अजय अपने दफ्तर से लौटे, तो उन्होंने देखा कि दरवाजे पर एक आलीशान कार खड़ी है। भीतर नैना बैठी थी। वह फिर से वैसी ही चमक-धमक के साथ वापस आई थी। अजय को देखते ही वह उठी और बहुत प्यार से बोली, “अजय! मुझे यकीन था कि तुम बाउंस बैक करोगे। वह वक्त बहुत मुश्किल था, मैं घबरा गई थी। अब सब ठीक है, चलो हम फिर से शुरू करते हैं।”

अजय ने नैना को देखा। उसकी आंखों में वही पुराना लालच और सुविधा का भाव था। फिर उन्होंने खिड़की के पास खड़ी सीता को देखा, जिसके हाथों में काम के निशान थे और चेहरे पर संतोष।

अजय ने बहुत शांत और गंभीर स्वर में कहा, “नैना, जिस अजय मेहरा से तुमने प्यार किया था, वह उस आलीशान बंगले के साथ ही मर गया। यह जो नया अजय है, इसे सीता की वफादारी ने गढ़ा है। तुमने बुरे वक्त में मुझे एक बोझ की तरह फेंक दिया था, और सीता ने मुझे एक बच्चे की तरह संभाला। मेरा घर अब केवल उन लोगों के लिए है जो मेरी रूह से प्यार करते हैं, मेरी संपत्ति से नहीं। तुम जा सकती हो।”

नैना अवाक रह गई। वह अपमानित होकर वहाँ से चली गई।

अध्याय 6: जीवन की सच्ची अमीरी

अजय ने सीता को अपनी कंपनी में आधिकारिक तौर पर ‘डायरेक्टर’ बनाया और उसे वह सम्मान दिया जिसकी वह हकदार थी। उन्होंने सीता को अपनी बहन माना और समाज के सामने यह स्वीकार किया कि सीता ने उनके जीवन को बचाया है।

यह कहानी हमें याद दिलाती है कि जब इंसान के पास सब कुछ होता है, तो पूरी दुनिया उसकी मित्र होती है। लेकिन जब इंसान के पास कुछ नहीं बचता, तब जो उसके साथ खड़ा रहता है, वही उसकी असली पूंजी है। वफादारी खरीदी नहीं जा सकती, वह कमाई जाती है। अजय मेहरा आज भी अमीर हैं, लेकिन वे अब कागजों पर नहीं, बल्कि रिश्तों में अमीर हैं।


उपसंहार: अजय मेहरा ने सीता के नाम पर एक ‘फाउंडेशन’ की शुरुआत की, जो उन लोगों की मदद करता था जिन्हें उनके अपनों ने बुरे वक्त में छोड़ दिया था। अजय अब जानते थे कि महलों की चमक से ज्यादा कीमती वफादारी की वह छोटी सी लौ है, जो अंधेरे में रास्ता दिखाती है।

– समाप्त –