धर्मेंद्र का लोनावला: वो 100 एकड़ का ‘स्वर्ग’ जो सिर्फ़ घर नहीं, बल्कि उनकी ‘रूह’ था – अब इस अनमोल विरासत का क्या होगा?
बॉलीवुड के ‘ही-मैन’ धर्मेंद्र (Dharmendra) का लोनावला फार्म हाउस सिर्फ़ एक संपत्ति नहीं, बल्कि उनकी ज़िंदगी का वो सबसे क़रीबी कोना था, जहाँ उन्हें शोहरत की चकाचौंध से दूर, अपनी जड़ों और अपनी आत्मा से मिलने का सुकून मिलता था। मुंबई की भागदौड़ से कुछ ही घंटों की दूरी पर, लोनावला की शांत, हरी-भरी पहाड़ियों के बीच बसा उनका लगभग 100 एकड़ का यह फार्म हाउस, मिट्टी, सादगी और अटूट प्रेम का प्रतीक था।
धर्मेंद्र जी के जाने के बाद, यह जन्नत-सी जगह अब एक भावनात्मक धरोहर बन गई है। यह सवाल हर किसी के मन में है: धर्मेंद्र की इस अनमोल विरासत का असली हकदार कौन होगा? और इस फार्म हाउस के पीछे छिपी वो पारिवारिक असलियत और भावनाएं क्या हैं, जो शायद कैमरे की रोशनी में कभी नहीं आईं?
लोनावला: जहाँ ‘ही-मैन’ एक किसान बन जाता था
धर्मेंद्र जी को बचपन से ही मिट्टी से बेइंतहा मोहब्बत थी। पंजाब के खेतों में बिताए शुरुआती साल, मिट्टी की ख़ुशबू, और गाँव की सादगी उनके दिल में हमेशा बसी रही। जब मुंबई की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी ने उन्हें घेर लिया, तब उन्हें महसूस हुआ कि उन्हें शांति और प्रकृति के पुराने स्पर्श वाली जगह चाहिए। इसी तलाश में उन्होंने लोनावला को चुना।
उन्होंने यह ज़मीन सिर्फ़ खरीदी नहीं, बल्कि अपने हाथों, अपने समय और अपने पूरे दिल से इसे सजाया। उनके लिए यह जगह तीन मायनों में अनमोल थी:
शांति: यहाँ भीड़ का शोर नहीं, सिर्फ़ अपनापन और सुकून था।
प्रकृति: वह रोज़ सुबह जल्दी उठकर पेड़ों के बीच लंबी सैर करते, चिड़ियों की मीठी आवाज़ सुनते और महसूस करते कि वे अब भी ज़मीन से जुड़े हुए हैं।
खेती और जानवर: वह अक्सर कहते थे, “एक्टिंग मेरा काम है, पर खेती मेरी रूह है।“
धीरे-धीरे, यह 100 एकड़ का फार्म हाउस एक छोटे, शांत और जीवंत से गाँव का रूप लेने लगा।
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सादगी की मिठास: सुपरस्टार का मिट्टी से जुड़ा घर
बहुत से लोग सोचते होंगे कि धर्मेंद्र जैसा सुपरस्टार एक शानदार, झिलमिलाते फार्म हाउस में रहता होगा। लेकिन सच्चाई इसके बिल्कुल उलट थी।
यह फार्म हाउस दिखावे की दुनिया से बिल्कुल दूर था। यहाँ न चमक थी, न ग्लैमर। यहाँ मिलेगी तो सिर्फ़ मिट्टी की ख़ुशबू, सादगी की मिठास और प्रकृति की गोद।
सादा प्रवेश द्वार: जहाँ बॉलीवुड के सितारे बड़ी-बड़ी दीवारें और हाईटेक व्यवस्था रखते हैं, वहीं धर्मेंद्र जी के फार्म हाउस का गेट एकदम गाँव जैसा सादा था—एक लंबा रास्ता, दोनों तरफ़ पेड़ों की कतारें और बीच में लकड़ी का सुंदर सा दरवाज़ा। कोई दिखावा नहीं, बस ज़मीन से जुड़ी हुई उनकी असली पहचान।
कुटीर जैसा घर: 100 एकड़ की प्रकृति के बीच, उन्होंने एक ऐसा कुटीर चुना जो सादगी का एक जीता-जागता प्रमाण था। टाइल की छत, पुराने ज़माने की लकड़ी की खिड़कियाँ और एक छोटा बरामदा। यहाँ न कोई महंगी सजावट थी, न इंपोर्टेड फ़र्नीचर। यह कुटीर धर्मेंद्र जी का “मन का अस्पताल” था, जहाँ हवा की हल्की थपकियां भी दवा बन जाती थीं।
किसान की रूह: खेती और जानवरों से प्रेम
धर्मेंद्र जी खेती को सिर्फ़ शौक की तरह नहीं, बल्कि एक ज़िम्मेदारी और इबादत की तरह निभाते थे। वह सिर्फ़ ज़मीन के मालिक नहीं, बल्कि उस मिट्टी के असली रखवाले थे।
फसलों से लगाव: उनके फार्म में ताज़े टमाटर, बैंगन, मिर्च, लौकी, भिंडी और तरह-तरह के फल उगते थे। सुबह की पहली धूप पड़ते ही, वह सुकून के साथ खेतों की ओर बढ़ते। कभी मिट्टी को उँगलियों से मलते, तो कभी पौधों को छूकर उनकी नमी और सेहत जाँचते। खेतों में खड़े होकर वह शहर की चकाचौंध से मुक्त हो जाते थे।
डेयरी सेक्शन: उनका जानवरों के लिए प्यार बहुत गहरा था। उन्होंने विस्तृत फार्म हाउस में एक बेहद सुव्यवस्थित डेयरी सेक्शन बनवाया था, जहाँ देसी नस्ल की गाय, भैंस और बकरियाँ आराम से रहती थीं। सुबह-सुबह वह बिना किसी दिखावे के सीधा इन जानवरों के पास पहुँच जाते थे, उन्हें दुलारते थे और ताज़ा दूध पीते थे। यह रूटीन उन्हें उस दुनिया में वापस खींच ले जाता था, जहाँ जीवन आसान और लोग सच्चे थे।
अब विरासत का भविष्य: असली हकदार कौन?
धर्मेंद्र जी के जाने के बाद, यह 100 एकड़ का फार्म हाउस अब उनकी कहानी बयान करता है। यह उनके जीवन की सादगी, मेहनत और यादों का एक स्मारक बन गया है।

कानूनी तौर पर, भारतीय क़ानून के अनुसार, उनकी चल और अचल संपत्ति—जिसमें यह फार्म हाउस भी शामिल है—उनकी पत्नी और बच्चों (सनी देओल, बॉबी देओल, ईशा देओल और अहाना देओल) के नाम पर दर्ज होनी तय मानी जाती है।
हालाँकि, विरासत सिर्फ़ कागज़ों तक सीमित नहीं होती। धर्मेंद्र जी की विरासत उनकी बातों, उनके कर्मों और उनके रिश्तों में बसती है। आज तक, इस बात की कोई स्पष्ट और आधिकारिक घोषणा सार्वजनिक रूप से नहीं हुई है कि इस फार्म हाउस का कानूनी मालिक कौन है, या इसे पहले ही किसे सौंप दिया गया है। मीडिया रिपोर्ट्स या परिवार की तरफ़ से कोई लिखित बयान उपलब्ध नहीं है।
यह एक ऐसा मामला है जहाँ फैसले केवल कानून या दस्तावेजों से नहीं, बल्कि भावनाओं, सम्मान, यादों और रिश्तों से भी गहराई से जुड़े होते हैं।
यह जगह एक ऐसी भावना को दर्शाती है कि असली मूल्य केवल बड़ी संपत्ति या शोहरत में नहीं, बल्कि इंसान की अच्छाई, कर्मों और दूसरों के लिए छोड़े गए भावनात्मक प्रभाव में होता है। धर्मेंद्र जी का फार्म हाउस सिर्फ़ एक ज़मीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि उनके जीने के अंदाज़, सादगी और यादों का एक पवित्र प्रतीक है।
आपकी राय मायने रखती है: आपके अनुसार, ऐसी विरासत, जिसका रिश्ता सिर्फ़ कानूनी हक से नहीं, बल्कि प्यार, यादों और इंसानियत से जुड़ा हो, उसके असली धारक कौन होने चाहिए? अपनी राय नीचे कमेंट में ज़रूर बताइए।
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