पंचक मृत्यु का भय: हेमा मालिनी बनीं देओल परिवार की अदृश्य ढाल
प्रकरण 1: मृत्यु का आघात और ज्योतिषीय दोष
24 नवंबर की सुबह, जब बॉलीवुड के ‘ही-मैन’ धर्मेंद्र ने इस दुनिया को अलविदा कहा, तो देओल परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। लेकिन परिवार को यह पता ही नहीं था कि सिर्फ़ एक रिश्ते का अंत नहीं हुआ, बल्कि एक गंभीर ज्योतिषीय दोष भी साथ ले आया था—जिसका नाम था पंचक मृत्यु का दोष।
धर्मेंद्र निवास के गलियारे मातम में डूबे थे, जब एक पारिवारिक पंडित जी वहाँ पहुँचे। उनके चेहरे की गंभीरता साफ़ बता रही थी कि बात साधारण नहीं, बल्कि गंभीर है।
सनी, बॉबी, ईशा, अहाना, और प्रकाश कौर—सभी शोक में डूबे थे। पंडित जी ने सभी को बिठाया और गहरे स्वर में वह सच बताया जिसने पूरे परिवार को हिला दिया:
“धर्मेंद्र जी की मृत्यु पंचक काल में हुई है।”
कमरे में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। पंचक में मृत्यु होना शास्त्रों में अशुभ माना जाता है। मान्यता है कि इसका दुर्भाग्य पाँच और परिवारजनों को कष्ट दे सकता है, अगर विधि-विधान से इसका समाधान न किया जाए। यह पंचक मृत्यु का भय सदियों से चली आ रही परंपराओं में गहरा बैठा हुआ था।

प्रकरण 2: प्रकाश कौर का टूटना और सवाल
पंचक मृत्यु का दोष टालने के लिए शास्त्रों में आटे या कुश से बने पाँच पुतलों का दाह संस्कार और एक विशेष शांति पूजा करने का विधान है।
लेकिन सवाल था: अब यह कौन करेगा?
प्रकाश कौर, जो धर्मेंद्र जी की पहली पत्नी थीं, वह अपने पति के जाने के सदमे से पूरी तरह टूट चुकी थीं। वह गहरे शोक में थीं और उनके लिए इन जटिल विधानों को समझना या निभाना संभव नहीं था। दूसरी ओर, सनी देओल, बॉबी देओल, अजीता और विजीता—बेटों को इन प्राचीन धार्मिक विधि-विधानों का उतना ज्ञान नहीं था।
परिवार शोक और भय के दोहरे आघात से जूझ रहा था। परिवार के मुखिया के जाने के बाद, अब कोई ऐसा नहीं था जो इस अनजानी आफ़त से उनकी रक्षा कर सके।
प्रकरण 3: हेमा मालिनी: रक्षक का उदय
ठीक उसी समय, जब परिवार शोक में डूबा था, एक अप्रत्याशित शख़्सियत आगे आई—धर्मेंद्र जी की दूसरी पत्नी, हेमा मालिनी।
हेमा मालिनी ने अपने चेहरे पर गम था, लेकिन मन में एक अटूट दृढ़ता थी। वह मद्रास के मूल से थीं और शास्त्रों, परंपराओं और ज्योतिषीय मान्यताओं की गहरी जानकार थीं। उन्हें पता था कि ऐसे समय में क्या करना आवश्यक है।
हेमा मालिनी ने पंडित जी से कहा:
“पंडित जी, जितनी भी विधि-विधान आवश्यक हैं, सभी कराए जाएँगे। धर्मेंद्र जी का परिवार किसी भी दुष्प्रभाव से नहीं गुज़रेगा। मैं इसकी ज़िम्मेदारी लेती हूँ।”
उस पल, वह सिर्फ़ धर्मेंद्र की पत्नी नहीं थीं, बल्कि देओल परिवार के लिए अदृश्य रक्षक (Protector) बन चुकी थीं। उन्होंने वर्षों की दूरी और मतभेदों को एक तरफ़ रखकर, पूरे परिवार की रक्षा का बोझ अपने कंधों पर ले लिया। यह उनका कर्तव्य भी था और एक पत्नी होने का उनका धर्म भी।
प्रकरण 4: पंचक दोष निवारण और मंत्रों का उच्चारण
अगली सुबह, हेमा मालिनी ने पूरे विधि-विधान के साथ पंचक दोष निवारण संस्कार की पूजा शुरू करवाई। शमशान घाट पर, वह आटे और कुश से बनाए गए पाँच पुतलों को लेकर पहुँचीं।
यह रस्म इतनी गोपनीयता में हुई कि मीडिया को इसकी भनक तक नहीं लगी। हेमा मालिनी ने वह पुतले, जहाँ धर्मेंद्र का पार्थिव शरीर जलाया गया था, वहीं पर विशेष क्रम में रखे।
एक-एक करके पुतलों पर मंत्रोच्चारण, शांति पाठ, कालसर्प निवारण, और विशेष पंचक शांति मंत्रों का उच्चारण किया गया। इस पूरे समय, हाथ में पूजा की थाली लिए, आँसुओं को रोकते हुए, हेमा मालिनी हर विधि-विधान का पालन करवा रही थीं। उनके चेहरे पर गहन एकाग्रता थी।
हर मंत्र के साथ, जैसे परिवार पर मंडराता ख़तरा धीरे-धीरे शांत होता जा रहा था। पंडित जी तक ने मान लिया: “अगर किसी ने धर्मेंद्र जी की आत्मा और परिवार दोनों की रक्षा की है, तो वह हैं हेमा जी।”
प्रकरण 5: बदलता माहौल और रिश्तों में नरमी
संस्कार पूरा होते ही, वातावरण में एक अलग ही शांति पूरी तरह से फैल गई। भय और अशुभता का माहौल छंट चुका था।
संस्कारों से निवृत्त होकर जब हेमा मालिनी घर लौटीं, तो परिवार का माहौल बदला हुआ था। सनी और बॉबी की आँखों में पहली बार राहत दिखी।
ईशा और अहाना ने हेमा जी का हाथ पकड़ा। ईशा ने भावुक होकर कहा:
“माँ, आपने आज पापा के पूरे परिवार को बचा लिया है।”
उस पल, देओल परिवार में जो बरसों की दूरी थी, वह भी धीरे-धीरे मिटने लगी थी। यह सिर्फ़ ज्योतिषीय दोष का निवारण नहीं था; यह रिश्तों का शुद्धिकरण था। धर्मेंद्र के जाने के बाद, उनका परिवार बिखरने नहीं दिया गया।
हेमा मालिनी, जो अपने व्यक्तिगत जीवन में हमेशा ही स्टार थीं, उन्होंने देओल परिवार के लिए एक अदृश्य ढाल बनकर अपनी वफ़ादारी और कर्तव्यनिष्ठा साबित की। उनका मद्रासी मूल और शास्त्रों का ज्ञान इस संकट की घड़ी में पूरे परिवार के काम आया।
यह कहानी सिर्फ़ एक ज्योतिषीय दोष की नहीं है। यह परिवार, विश्वास और कर्तव्य निभाने की कहानी है। हेमा मालिनी ने साबित कर दिया कि विवाह के बंधन से ज़्यादा मज़बूत, कर्तव्य और प्रेम का बंधन होता है। उन्होंने अंत समय में धर्मेंद्र की अंतिम इच्छा को पूरा किया—कि उनका परिवार सुरक्षित और एकजुट रहे।
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