लखनऊ रेलवे स्टेशन की रात: एक अजनबी का हाथ, जिसने बदल दी सुमन की दुनिया
लखनऊ रेलवे स्टेशन हमेशा अपने शोरगुल और चहल-पहल के लिए मशहूर है। कुली की आवाज़, चाय वाले की पुकार, और यात्रियों की भीड़ के बीच, प्लेटफार्म नंबर तीन के एक कोने में सुमन खड़ी थी। उसकी आंखों में आंसुओं की लकीरें थीं, चेहरे पर उदासी और दिल में हार का बोझ। सुमन ने अपनी जिंदगी में कई बार कोशिश की थी—नौकरी के लिए इंटरव्यू दिए, लोगों से मदद मांगी, लेकिन हर जगह तिरस्कार और रिजेक्शन ही मिला। समाज ने उसकी सादगी और गांव की बोली को मजाक बना दिया था। आज, वह अपनी जिंदगी खत्म करने का फैसला लेकर स्टेशन आई थी।
ट्रेन की सीटी दूर से सुनाई दी। पटरी की चमकती रोशनी उसे अपनी ओर खींच रही थी। उसने आंसू पोंछे और धीरे-धीरे कदम बढ़ाए। भीड़ में कोई उसे देख रहा था, लेकिन किसी ने रुककर उसकी मदद नहीं की। सब अपने-अपने सफर में व्यस्त थे। तभी प्लेटफार्म की दूसरी ओर अर्जुन खड़ा था। सूट-बूट में, हाथ में फाइल, मगर आंखों में इंसानियत की चमक। जैसे ही सुमन ने पटरियों की ओर छलांग लगाने के लिए कदम बढ़ाया, अर्जुन का दिल जोर से धड़क उठा। उसने बिना सोचे दौड़ लगाई और सुमन का हाथ पकड़ लिया। ट्रेन प्लेटफार्म पर आ रही थी—बस दो पल की देरी होती और सुमन हमेशा के लिए खो जाती।
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सुमन अर्जुन की बाहों में गिर पड़ी। उसका शरीर कांप रहा था, आंखों से आंसू बह रहे थे। प्लेटफार्म पर सन्नाटा छा गया। लोग इकट्ठा हो गए, फुसफुसाहट शुरू हो गई, लेकिन अर्जुन ने सबको पीछे हटने को कहा। अब वहां सिर्फ सुमन और अर्जुन थे। अर्जुन ने सुमन को पानी पिलाया, चाय मंगाई और नरम आवाज़ में पूछा, “तुम ठीक हो? ऐसा क्यों करने जा रही थी?” सुमन के गले में शब्द अटक गए। उसने धीरे-धीरे अपनी कहानी सुनाई—कैसे हर जगह उसकी मेहनत को नजरअंदाज किया गया, उसकी सादी साड़ी और गांव की बोली पर लोग हंसते रहे। रिजेक्शन ने उसे तोड़ दिया था। मम्मी-पापा की उम्मीदें बोझ बन गई थीं।
अर्जुन ने उसकी बात ध्यान से सुनी और कहा, “तुम एक पेड़ की तरह हो, जो तूफान में झुक गया है, मगर टूटा नहीं। तुम्हारे अंदर बहुत ताकत है, बस खुद पर भरोसा करना सीखो।” सुमन की आंखों में पहली बार उम्मीद की हल्की सी किरण चमकी। अर्जुन ने उसे अपनी कंपनी का विजिटिंग कार्ड दिया और कहा, “कल सुबह आना। तुम्हारी नई शुरुआत यहीं से होगी।” सुमन को यकीन नहीं हुआ। क्या सच में कोई उसकी काबिलियत को पहचान सकता है?

अगली सुबह सुमन ने अपनी पुरानी साड़ी पहनी, बाल संवारे, और अर्जुन का दिया कार्ड थामकर कंपनी पहुंच गई। वहां उसका नाम पहले से लिखा था, रिसेप्शन पर स्वागत हुआ। अर्जुन ने उसे असिस्टेंट की नौकरी दी। ऑफिस में कई लोग उसकी सादगी पर हंसे, ताने मारे, मगर सुमन ने हार नहीं मानी। उसने देर तक रुककर सीखना शुरू किया। धीरे-धीरे उसके काम में सुधार आने लगा। एक दिन मीटिंग में प्रेजेंटेशन स्लाइड क्रैश हो गई, तो सुमन ने जल्दी से डाटा बैकअप खोलकर सबको हैरान कर दिया। अर्जुन ने सबके सामने उसकी तारीफ की—”कभी-कभी सबसे बड़ा हुनर वही दिखाता है जिसे हम कम आंकते हैं।”
महीने के आखिर में जब सैलरी मिली, सुमन ने फौरन मम्मी-पापा को फोन किया। “अब आपको किसी से उधार नहीं मांगना पड़ेगा, आपकी बेटी को नौकरी मिल गई है।” मां की आंखों में आंसू थे, मगर यह खुशी के थे। ऑफिस में अब सुमन की मेहनत और सादगी की चर्चा होने लगी। अर्जुन उसके काम की तारीफ करता, उसे मौके देता, और धीरे-धीरे दोनों के बीच दोस्ती गहरी हो गई। ऑफिस में गपशप शुरू हो गई—क्या अमीर अर्जुन और गांव की सुमन का मेल हो सकता है?
एक दिन अर्जुन ने सबके सामने साफ कहा, “मैं सुमन से शादी करूंगा, क्योंकि मुझे दिखावा नहीं, सच्चाई चाहिए।” सुमन की आंखों में आंसू थे—इतने सालों बाद किसी ने उसके लिए इतना साहस दिखाया था। शादी के बाद अर्जुन और सुमन ने सुमन के गांव में एक शिक्षा केंद्र खोला। वहां बच्चों को मुफ्त किताबें, ट्यूशन और कंप्यूटर की ट्रेनिंग मिलती। एक छोटी बच्ची ने सुमन से कहा, “दीदी, मैं भी बड़ी होकर टीचर बनूंगी।” सुमन की आंखें भर आईं। उसने बच्ची को गले लगाया और सोचा—शायद यही मकसद था जिसके लिए भगवान ने उसे उस रात प्लेटफार्म पर बचाया था।
दोस्तों, कभी-कभी एक अजनबी का हाथ सिर्फ एक जिंदगी नहीं, पूरी पीढ़ी का भविष्य बदल सकता है। अगर मौका मिले, किसी का हाथ थाम लीजिए। क्या पता वो हाथ सैकड़ों और हाथों को थाम ले।
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