कर्ज: स्वाभिमान और विश्वासघात की एक अधूरी इबारत
अध्याय 1: वह छोटा कमरा और बड़े सपने
नागपुर के एक बेहद सकरे मोहल्ले की तीसरी मंजिल पर एक छोटा सा कमरा था। सीढ़ियाँ इतनी तंग थीं कि दो लोग एक साथ नहीं गुजर सकते थे, लेकिन उस कमरे के भीतर सपने बहुत बड़े थे। आदित्य एक साधारण लड़का था, जिसकी आँखों में केवल एक ही सपना था—अपनी पत्नी काव्या को ‘अफ़सर’ बनते देखना।
शादी के शुरुआती दिन गरीबी और प्यार के बीच झूल रहे थे। आदित्य सुबह 5 बजे उठता, लोगों के घरों में दूध पहुँचाता, फिर एक छोटी सी प्राइवेट फर्म में क्लर्क की नौकरी करता और रात को वापस आकर कोचिंग की ऊँची फीस भरने के लिए एक्स्ट्रा शिफ्ट करता। काव्या के पास केवल एक ही काम था—पढ़ना। आदित्य ने उसे घर के किसी भी काम की आंच नहीं लगने दी। वह खुद रोटियाँ बेलता ताकि काव्या के हाथ किताबों से न हटें।
अध्याय 2: ज़मीन, ज़ेवर और रूह का सौदा
काव्या की पढ़ाई का खर्च किसी अजगर की तरह बढ़ता ही जा रहा था। जब काव्या का प्रीलिम्स (Prelims) निकला, तो आदित्य की खुशी का ठिकाना नहीं था, लेकिन मेन्स (Mains) की कोचिंग और टेस्ट सीरीज़ के लिए अचानक 5 लाख रुपयों की ज़रूरत आन पड़ी। आदित्य के पास फूटी कौड़ी नहीं थी।
उसने बिना काव्या को बताए अपने गांव का रुख किया। वहां उसकी पुरखों की आखिरी निशानी थी—दो बीघे ज़मीन। गांव वालों ने समझाया, “आदित्य, यह ज़मीन मत बेच, यही तेरा आखिरी सहारा है।” लेकिन आदित्य ने सिर्फ इतना कहा, “ज़मीन तो फिर खरीद लूँगा, पर अगर काव्या का सपना टूट गया तो मैं खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाऊँगा।” उसने ज़मीन बेच दी।
पैसे खत्म हुए तो उसने काव्या के वे गहने गिरवी रख दिए जो उसकी माँ ने उसे शादी में दिए थे। वह खुद रात को केवल पानी पीकर सो जाता ताकि काव्या के लिए फल और दूध आ सके। उसकी पतलून घिस चुकी थी, जूते फट चुके थे, लेकिन काव्या की किताबें हमेशा नई होती थीं।
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अध्याय 3: सफलता की पहली किरण और सोच का अँधेरा
तीन साल के कड़े संघर्ष के बाद वह दिन आया जिसका आदित्य को इंतज़ार था। काव्या का चयन हो गया। वह अब एक पीसीओ (PCS) अधिकारी थी। मोहल्ले में ढोल बजे, आदित्य ने सबको मिठाई खिलाई, लेकिन उसे यह अंदाज़ा नहीं था कि जिस मिठाई को वह बाँट रहा है, उसकी मिठास अब उसकी अपनी ज़िंदगी से खत्म होने वाली है।
अफ़सर बनते ही काव्या की दुनिया बदल गई। अब उसका उठना-बैठना बड़े अधिकारियों, मंत्रियों और प्रभावशाली लोगों के साथ था। उसे अब आदित्य की वह पसीने से तरबतर कमीज अच्छी नहीं लगती थी। जब कोई पूछता कि उसका पति क्या करता है, तो काव्या झेंप जाती। उसे आदित्य का संघर्ष ‘मजबूरी’ और उसकी सादगी ‘गंवारपन’ लगने लगी।
अध्याय 4: विश्वासघात और तलाक का वह ठंडा कागज़
एक दिन काव्या ने आदित्य को अपने नए सरकारी बंगले पर बुलाया। आदित्य बहुत खुश था कि आज वह अपनी पत्नी की नई कुर्सी देखेगा, लेकिन मेज पर कुर्सी के बजाय तलाक के कागज़ात रखे थे। काव्या ने बिना पलक झपकाए कहा, “आदित्य, हमारी सोच अब नहीं मिलती। तुम आज भी वहीं खड़े हो जहाँ हम तीन साल पहले थे। मैं एक अफ़सर हूँ, और तुम एक मामूली मज़दूर। समाज में मेरा रुतबा तुम्हारी वजह से गिर रहा है।”
आदित्य सन्न रह गया। उसने पूछा, “काव्या, क्या मेरी ज़मीन, माँ के गिरवी गहने और वे भूखी रातें सब समाज के रुतबे के नीचे दब गईं?” काव्या ने सर्द लहजे में कहा, “पैसे तुमने खर्च किए, वह एहसान मत जताओ। मैं तुम्हें मुआवज़ा दे दूँगी।” उसने आदित्य को अपमानित करके घर से निकाल दिया और उनकी छोटी बेटी आर्या को भी अपने साथ रखने से मना कर दिया क्योंकि वह उसके ‘करियर’ में बाधा थी।

अध्याय 5: जॉइनिंग के बाद का वह खौफनाक मोड़
काव्या ने नई जगह जॉइन किया। सत्ता का नशा उसके सिर चढ़कर बोल रहा था। उसने एक वरिष्ठ अधिकारी के साथ नज़दीकियाँ बढ़ानी शुरू कर दीं ताकि उसका प्रमोशन जल्दी हो। उसे लगा कि वह दुनिया जीत चुकी है, लेकिन कुदरत का अपना हिसाब होता है।
जॉइनिंग के कुछ महीनों बाद, काव्या जिस विभाग में थी, वहाँ करोड़ों का घोटाला सामने आया। वह वरिष्ठ अधिकारी, जिस पर काव्या ने अंधा भरोसा किया था, उसने सारे जाली हस्ताक्षर काव्या के करवा रखे थे। ऊपर से जांच बैठी और काव्या को सस्पेंड (Suspend) कर दिया गया। उसके सारे रसूखदार दोस्त गायब हो गए। रातों-रात वह अफ़सर से एक आरोपी बन गई।
उसी दौरान उसे बैंक से एक नोटिस मिला। उसे पता चला कि आदित्य ने जो लोन उसकी पढ़ाई के लिए लिया था, उसकी किश्तें न भरने के कारण उसका घर और आदित्य की रही-सही साख भी दांव पर थी। आदित्य ने कभी उसे बताया ही नहीं था कि उसने उसकी सफलता के लिए अपनी किडनी तक बेच दी थी।
अध्याय 6: खंडहरों में वापसी और मौन पश्चाताप
पूरी तरह टूट चुकी काव्या अपने उसी पुराने सकरे मोहल्ले के कमरे पर पहुँची। उसने देखा कि आदित्य अपनी बेटी आर्या को गोद में लेकर एक छोटा सा चाय का स्टॉल चला रहा है। वह आदमी जो कभी हज़ारों का वेतन काव्या की किताबों पर लुटा देता था, आज 10 रुपये की चाय बेचकर अपनी बेटी का भविष्य बना रहा था।
काव्या उसके पैरों में गिर गई। “आदित्य, मुझे माफ़ कर दो। मेरी कुर्सी छीन गई, मेरा मान चला गया, अब मेरे पास कुछ नहीं है।”
आदित्य ने अपनी बेटी को गोद से उतारा और काव्या की ओर देखा। उसकी आँखों में न नफरत थी, न प्यार। उसने बहुत शांत स्वर में कहा, “काव्या, तुम अफ़सर बनने आई थीं, बन गईं। पर इंसान बनना भूल गईं। तुमने कहा था कि मैं तुम्हारे लायक नहीं हूँ, आज मैं भी वही कहता हूँ। यह बेटी और यह संघर्ष अब मेरा अपना है। तुम अफ़सर की कुर्सी तलाश रही थीं, अब उसी के पास जाओ। यहाँ केवल एक पिता और एक बेटी रहते हैं।”
आदित्य ने चाय का पतीला उठाया और काम पर लग गया। काव्या उस धूल भरी सड़क पर खड़ी रही, जहाँ से उसकी सफलता शुरू हुई थी और जहाँ अब उसका सब कुछ खत्म हो चुका था।
उपसंहार: कुर्सी और ओहदा केवल कुछ समय के लिए होते हैं, लेकिन जो व्यक्ति आपके संघर्ष में आपके साथ खड़ा होता है, वह अनमोल है। काव्या के पास आज भी अधिकारी होने का अहंकार तो शायद बचा था, लेकिन वह रूह खो चुकी थी जिसने उसे वहां तक पहुँचाया था।
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