शीर्षक: “अधिकार” – जब बेटी एटीएम नहीं, इंसान बनी

अध्याय 1: वह हंसी जो खंजर थी

गुरुग्राम की जनवरी वाली वह ठंडी शाम मेरे जीवन का सबसे काला अध्याय लिखने वाली थी। मैं अपने छोटे से वन-बीएचके (1 BHK) के सोफे पर बैठी थी, जहाँ से खिड़की के बाहर सोसाइटी की लाइटें धुंधली दिख रही थीं। मेरे सामने लैपटॉप खुला था और स्क्रीन पर आईसीआईसीआई (ICICI) बैंक का वह अलर्ट चमक रहा था जो मेरी रातों की नींद छीनने के लिए काफी था।

“RS 9,86,500.00 debited from ICICI Credit Card… Merchant: Sky-Seas Luxury Cruises.”

9.8 लाख रुपये। यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं था; यह मेरी तीन साल की बचत थी, मेरा वह सपना था जिसे मैंने अपने दम पर नोएडा में घर खरीदकर संजोया था। मेरा गला सूख गया। मैंने कांपते हाथों से मां को फोन लगाया।

मां की हंसी फोन के स्पीकर से नहीं, सीधे मेरे सीने में चुभी। उन्होंने कहा, “अरे हर्षिता, ड्रामा मत कर। तू वैसे भी कौन सा दुनिया घूमती रहती है? रिद्धिमा का तलाक हुआ है, उसे थोड़ी खुशी चाहिए। हमने सोचा फैमिली ट्रिप हो जाए।”

“फैमिली ट्रिप? और मैं? मेरा क्या, मम्मी?” मेरी आवाज में जो कंपन था, वह सिर्फ गुस्से का नहीं, उस विश्वासघात का था जो अपनों ने किया था।

मां का स्वर अचानक बदल गया। उसमें अब ममता नहीं, एक आदेश था। “तू तो वैसे भी ऑफिस-ऑफिस करती रहती है। हमने सोचा तू जा नहीं पाएगी, तेरा काम जरूरी है। और सुन, पैसे-वैसे की बात मत कर। फैमिली एक इन्वेस्टमेंट होती है।”

उस पल मेरे अंदर कुछ टूट गया। वह जो ‘बेटी’ होने का कोमल अहसास था, वह उस ‘एटीएम’ की रसीद में बदल गया जिसे मेरी मां जब चाहे इस्तेमाल कर सकती थी।

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अध्याय 2: यादों का बोझ और नोएडा वाला घर

रात भर मैं सो नहीं सकी। मैंने अपनी डायरी निकाली और उन सालों को याद किया जब मैंने खुद को तिल-तिल जलाकर वह नोएडा वाला घर बनाया था। 29 साल की उम्र में जब लड़कियां अपनी शादी के सपने देखती हैं, मैंने उस 3-बीएचके फ्लैट की रजिस्ट्री अपने नाम की थी। वह मेरा किला था, मेरा सम्मान था।

लेकिन 4 साल पहले जब पापा की रिटायरमेंट की जमा-पूंजी एक पोंजी स्कीम में डूब गई, तो मैं एक पल भी नहीं हिचकिचाई। मैंने उनसे कहा था, “पापा, यह घर आपका ही है। आप लोग यहाँ आ जाओ।”

मां ने तब कहा था, “बस 6 महीने, बेटा।”

वह 6 महीने साल बने, और साल आदत बन गए। धीरे-धीरे मेरा घर मेरा नहीं रहा। मेरी स्टडी टेबल गैरेज में फेंक दी गई ताकि वहां रिद्धिमा की पेंटिंग्स लग सकें। मेरे होम-ऑफिस को मां का पूजा-क्राफ्ट रूम बना दिया गया। और अंत में, मां ने मुझे ही वहां मेहमान बना दिया— “तू अपने बॉयफ्रेंड को यहां मत लाया कर, हमारा सम्मान भी कुछ होता है।”

सम्मान। यह शब्द उनके लिए एक ढाल था और मेरे लिए एक बेड़ी।

अध्याय 3: साजिश की नीली फाइल

अगली सुबह मैं सीधे नोएडा पहुंची। घर का दरवाजा खुला तो वही अगरबत्ती की खुशबू आई, लेकिन माहौल में जहर था। रिद्धिमा अपने क्रूज की पैकिंग कर रही थी। उसने मुझे देख कर एक तिरछी मुस्कान दी, जैसे कह रही हो— ‘मेरा ऐश, तेरे पैसों पर।’

मैंने सीधे अलमारी से वह ‘नीली फाइल’ निकाली जिसमें घर की रजिस्ट्री थी। लेकिन फाइल हल्की थी। ओरिजिनल पेपर गायब थे।

पापा ने टीवी म्यूट किया और बड़ी बेरुखी से बोले, “ओरिजिनल हमने बैंक लॉकर में रख दिए हैं। घर में रखना सेफ नहीं है।”

“कौन सा लॉकर, पापा? और यह ‘लोन टॉप-अप’ का लिफाफा क्या है?”

मेरी मां ने उसे झपटने की कोशिश की, लेकिन मैंने उसे खोल दिया। अंदर मेरे जाली दस्तखत (forged signatures) थे। उन्होंने मेरे घर को गिरवी रखकर एक और लोन लेने की कोशिश की थी ताकि रिद्धिमा की ‘लक्जरी लाइफ’ चलती रहे।

उस पल मेरे अंदर की आग ठंडी हो गई। जब गुस्सा हद से बढ़ जाता है, तो वह बर्फ बन जाता है। मैंने फाइल बैग में डाली और बिना कुछ कहे बाहर निकल गई। अब बहस का समय खत्म हो चुका था। अब कार्रवाई का समय था।

अध्याय 4: शतरंज की बिसात – 45 दिनों का पलटवार

मैंने अपनी वकील सहेली फरहा और प्रॉपर्टी लॉयर संयोगिता मेहरा से मुलाकात की। संयोगिता की आंखों में वह कठोरता थी जिसकी मुझे जरूरत थी। उन्होंने कहा, “हर्षिता, अगर तुम इमोशनल हुई तो तुम हारोगी। अगर तुम ओनर हो, तो ओनर की तरह सोचो।”

मैंने एक बड़ा फैसला लिया। जो घर मेरे आत्मसम्मान का गला घोंट रहा था, मैं उसे ही बेच दूगी।

पहला कदम: कार्ड ब्लॉक करना। मैंने बैंक को फोन किया और उस ट्रांजैक्शन को ‘फ्रॉड’ रिपोर्ट किया। मां का फोन आया, गालियां दीं, रोईं, लेकिन मैंने फोन काट दिया।

दूसरा कदम: घर की लिस्टिंग। मैंने रियल एस्टेट एजेंट दिव्या कपूर को फोन किया। “मुझे यह घर 15 दिन में बेचना है। कैश इन्वेस्टर चाहिए।”

तीसरा कदम: लीगल नोटिस। जिस दिन मेरी मां, पापा और रिद्धिमा मुंबई के लिए फ्लाइट पकड़ रहे थे, मैंने उनके ईमेल और फोन पर ‘बेदखली’ (Eviction Notice) का नोटिस भेज दिया।

जब वे क्रूज पर स्काई-डाइनिंग कर रहे थे, मैं नोएडा के सब-रजिस्ट्रार ऑफिस में अपनी संपत्ति का स्टेटस चेक कर रही थी। मुझे पता चला कि उन्होंने सच में लोन के लिए आवेदन किया था, लेकिन अभी वह प्रक्रिया में था। मैंने उसे वहीं रुकवाया।

अध्याय 5: पजेशन डे और आखिरी टकराव

6 दिन बाद, जब वे वापस लौटे, तो उनके पास न तो घर की चाबी थी और न ही उस घर पर कोई अधिकार। सोसाइटी के गेट पर गार्ड ने उन्हें रोक दिया।

जब मैं वहां पहुंची, मां ने मेरा हाथ पकड़कर रोना शुरू किया। “हर्षिता, हम कहां जाएंगे? लोग क्या कहेंगे?”

मैंने उनका हाथ धीरे से हटा दिया। “मम्मी, लोग तब भी कुछ कहते थे जब आप अपनी बड़ी बेटी को एटीएम समझकर लूट रही थीं। तब आपको अपनी इज्जत का ख्याल क्यों नहीं आया?”

रिद्धिमा चिल्लाई, “तू इतनी पत्थर दिल कैसे हो सकती है?”

मैंने उसकी आंखों में देखा। “मैं पत्थर नहीं बनी, रिद्धिमा। तुमने और मम्मी-पापा ने मिलकर मुझे पत्थर बनाया है। यह घर बिक चुका है। इसका पजेशन आज शाम को नए मालिक के पास जाएगा।”

अध्याय 6 (नया अध्याय): नई शुरुआत – राख से उठना

घर बिकने के बाद, मैंने उनके लिए एक छोटा सा 2-बीएचके (2 BHK) किराए पर लिया। मैंने उनका सामान वहां भिजवा दिया। लेकिन मैंने उन्हें एक भी रुपया नकद नहीं दिया।

“यह डिपॉजिट मैंने भर दिया है। पहले तीन महीने का किराया मैं दूंगी। उसके बाद, पापा की पेंशन और रिद्धिमा की नौकरी से घर चलेगा,” मैंने डाइनिंग टेबल पर चाबियां रखते हुए कहा।

पापा ने सिर झुका लिया। मां अभी भी बुदबुदा रही थी, लेकिन उनके शब्दों में अब वह धार नहीं थी।

आज, मैं अपने नए अपार्टमेंट की बालकनी में खड़ी हूं। यह छोटा है, लेकिन यहां की हवा में मेरा अपना अधिकार है। मैंने बैंक के उस लोन की ईएमआई का एक हिस्सा रिद्धिमा के नाम करवा दिया है— कानूनी तौर पर। उसे अब अपनी विलासिता की कीमत खुद चुकानी होगी।

निष्कर्ष: न्याय का अहसास

अक्सर हम सोचते हैं कि परिवार के लिए सहना ही प्यार है। लेकिन नहीं, कभी-कभी अपनों को आइना दिखाना ही सबसे बड़ा प्यार होता है। मैंने अपना घर खोया, लेकिन अपनी आत्मा वापस पा ली।

न्याय हमेशा अदालतों में नहीं मिलता, कभी-कभी उसे अपने हाथों से, अपनी कलम से और अपने फैसलों से हासिल करना पड़ता है।


समाप्त