खरखड़ी का खूनी प्रतिशोध: 12 साल के बालक की वीरता या अपराध?
अध्याय 1: सन्नाटे में सिमटा एक घर
मेरठ के खरखड़ी गाँव में ममता देवी का घर किसी शांत झील की तरह था। ममता, जिसके पति की तीन साल पहले मृत्यु हो चुकी थी, एक बेहद स्वाभिमानी और मेहनती महिला थी। उसके पास धन के नाम पर केवल एक एकड़ जमीन और चार पशु थे। इन्ही पशुओं का दूध बेचकर वह अपने दो बच्चों, 18 साल की रचना और 12 साल के चेतन का पालन-पोषण कर रही थी।
रचना कक्षा 12 में पढ़ती थी, सुंदर और मेधावी। वहीं चेतन कक्षा 6 का छात्र था, लेकिन उसकी कद-काठी और चेहरा उसकी उम्र से कहीं अधिक परिपक्व दिखाई देता था। परिवार का एक स्तंभ ममता का देवर करण था, जो भारतीय सेना में फौजी था। करण अपनी तनख्वाह का एक बड़ा हिस्सा अपनी भाभी को भेजता था, जिससे घर की गाड़ी सुचारू रूप से चल रही थी।
अध्याय 2: सरपंच की काली नियत
गाँव का सरपंच, हरकेश, एक ऐसा व्यक्ति था जिसके पास सत्ता और पैसा तो था, लेकिन चरित्र का वह पूरी तरह दरिद्र था। वह गाँव की गरीब महिलाओं को ब्याज पर पैसे देता और जब वे उसे लौटा नहीं पातीं, तो उनकी मजबूरी का फायदा उठाता।
10 सितंबर 2025 की सुबह, ममता अपने खेत में चारा काट रही थी। हरकेश सरपंच वहां पहुँचा और उसने ममता पर दबाव बनाना शुरू किया। उसने दावा किया कि ममता के स्वर्गवासी पति ने उससे 3 लाख रुपये उधार लिए थे, जिसमें से केवल 1 लाख ही लौटाए गए हैं।
“सरपंच साहब, मेरा देवर करण फौज से लौटते ही आपके पैसे पाई-पाई चुका देगा,” ममता ने विनती की।
लेकिन हरकेश की नजरें ममता के चेहरे पर जमी थीं। उसने बेशर्मी से प्रस्ताव रखा, “ममता, अगर तुम मेरे साथ थोड़ा वक्त बिता लो, तो यह सारा कर्जा मैं माफ कर सकता हूँ।”

ममता ने उसे फटकार लगाई, “सरपंच साहब, गरीब हैं हम, लेकिन इज्जत का सौदा करना हमारे खून में नहीं है।”
गुस्से में पागल हरकेश ने ममता के साथ जबरदस्ती की और उसे घसीटकर ईख (गन्ने) के खेत में ले गया। वहां उसने ममता की अस्मत लूटी और उसे धमकी दी कि अगर उसने मुँह खोला, तो वह उसके पूरे परिवार को खत्म कर देगा और उसकी जवान बेटी रचना के साथ भी यही हश्र करेगा। ममता डर गई, सहम गई, और अपनी बेटी के भविष्य के लिए उसने खामोश रहने का फैसला किया।
अध्याय 3: नियति का क्रूर प्रहार
पाप का घड़ा जब भरता है, तो वह सबसे पहले उस इंसान को अंधा बना देता है। 24 सितंबर 2025 को ममता बाजार गई थी और घर पर रचना अकेली थी। हरकेश सरपंच ने मौका ताड़ लिया। उसने रचना को स्कूल से लौटते समय झूठ बोला कि उसकी माँ का एक्सीडेंट हो गया है।
डर के मारे रचना उसकी मोटरसाइकिल पर बैठ गई। हरकेश उसे अपने खेत के कमरे में ले गया और वहां उसने रचना के साथ वही घिनौना कृत्य किया जो उसने कुछ दिन पहले उसकी माँ के साथ किया था। शाम को जब रचना घर लौटी, तो उसने अपनी माँ के गले लगकर सारी आपबीती सुना दी।
ममता का कलेजा फट गया। उसे अपनी खामोशी पर पछतावा हुआ। वह उस रात सरपंच के घर गई, उसे गालियां दीं, लेकिन सरपंच ने उसे धक्का देकर बाहर निकाल दिया। पुलिस के पास जाने पर भी कोई मदद नहीं मिली, क्योंकि दरोगा अजमत सिंह सरपंच का खास आदमी था।
“तुम गरीब लोग पैसों के लिए अमीर लोगों पर ऐसे ही झूठे इल्जाम लगाते हो,” दरोगा ने ममता को दुत्कार कर थाने से भगा दिया।
अध्याय 4: फौजी का आगमन और बालक का संकल्प
12 साल का चेतन, जो अब तक खामोश था, अपने अंदर एक ज्वालामुखी दबाए बैठा था। जब ममता ने अपने देवर करण फौजी को फोन कर सब बताया, तो करण तीन दिन की छुट्टी लेकर घर पहुँचा।
करण के पास उसकी सर्विस रिवॉल्वर थी। उसने अपनी भाभी से वादा किया कि वह अपनी भतीजी का अपमान सहने के बजाय मौत को गले लगाना पसंद करेगा। 24 सितंबर की रात, करण और चेतन सरपंच को खोजने निकले।
अंधेरी रात थी, खेतों से गीदड़ों के रोने की आवाजें आ रही थीं। उन्हें पता चला कि हरकेश अपने ट्यूबवेल पर शराब पी रहा है। करण और चेतन वहां पहुँचे। करण ने सरपंच की कनपटी पर पिस्तौल तान दी।
“तूने मेरी भतीजी की जिंदगी बर्बाद की, अब तू भगवान को जवाब देगा,” करण ने गरजते हुए कहा।
लेकिन सरपंच नशे में भी अहंकार से भरा था। उसने करण को उकसाया और तभी सरपंच के नौकर ने पीछे से करण के हाथ पर डंडा मारा। पिस्तौल नीचे गिर गई।
अध्याय 5: इंसाफ की चार गोलियाँ
पिस्तौल जमीन पर गिरी और खामोश रात में मौत की गूँज सुनाई देने वाली थी। इससे पहले कि सरपंच उसे उठा पाता, 12 साल का बालक चेतन झपटा। उसने पिस्तौल उठाई और बिना पलक झपकाए सरपंच के सीने पर एक के बाद एक चार गोलियाँ उतार दीं।
हरकेश सरपंच मौके पर ही ढेर हो गया। गाँव में खबर आग की तरह फैल गई। एक 12 साल के बच्चे ने गाँव के सबसे ताकतवर और दबंग आदमी को मार गिराया था।
अध्याय 6: कानून और नैतिकता की जंग
पुलिस ने करण और चेतन को गिरफ्तार कर लिया। थाने में चेतन ने चिल्ला-चिल्लाकर कहा, “हाँ, मैंने उसे मारा है! उसने मेरी बहन को रुलाया था, मैंने उसे हमेशा के लिए सुला दिया!”
पुलिस अधिकारी सन्न थे। कानून की नजर में यह एक हत्या थी, लेकिन गाँव के लोगों की नजर में यह एक मासूम बहन के सम्मान की रक्षा थी। मामला अब अदालत में है। क्या 12 साल के बालक को उसकी उम्र के कारण बाल सुधार गृह भेजा जाएगा, या करण फौजी पर हत्या के लिए उकसाने का आरोप लगेगा?
यह कहानी हमें सोचने पर मजबूर करती है कि जब कानून और रक्षक अंधे हो जाएं, तो क्या एक बालक का शस्त्र उठाना सही है? क्या प्रतिशोध ही न्याय का एकमात्र रास्ता है?
उपसंहार: खरखड़ी गाँव में आज भी सन्नाटा है। ममता देवी अपनी बेटी और जेल में बंद अपने बेटे और देवर के लौटने का इंतजार कर रही हैं। न्याय की तराजू अब जज साहब के हाथों में है, लेकिन चेतन ने जो किया, उसने समाज के भ्रष्ट तंत्र के चेहरे पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया है।
अगला कदम: क्या आप चाहते हैं कि मैं इस कहानी का अगला भाग (अदालत का फैसला और चेतन का भविष्य) लिखूँ? या फिर आप करण फौजी के उन संघर्षों की कहानी सुनना चाहेंगे जो उसने सरहद पर देश की रक्षा करते हुए झेले थे?
News
इंसाफ का खूनी रास्ता: जब कानून ने फेर लिया मुँह, तो भांजी ने खुद संभाली बंदूक, मामा को सरेबाज़ार उतारा मौत के घाट!
रिश्तों का कत्ल: जब रक्षक बना भक्षक, तो भांजी ने सीने में उतार दीं चार गोलियां अध्याय 1: बीकानेर का…
खत्म हुआ सब्र का बांध: पत्नी के रोज-रोज के झगड़ों से टूटा पति, फिर गुस्से में कर डाला ऐसा कांड कि अब पछता रहा है पूरा परिवार!
आजमगढ़ हत्याकांड: बेवफाई का सुई-धागे से खौफनाक अंत अध्याय 1: अभावों में सिमटा बुढनपुर का वह घर आजमगढ़ जिले के…
भूलकर भी कार में न छोड़ें चार्जिंग पर फोन, मेरठ में हुआ दर्दनाक हादसा, एक गलती ने उजाड़ दिया हंसता-खेलता परिवार!
अजमेर हत्याकांड: मोबाइल फोन का मोह और एक ड्राइवर का खूनी प्रतिशोध अध्याय 1: अंबा मसीना का वह शांत घर…
सत्ता के नशे में अंधा हुआ इंस्पेक्टर, डीएम मैडम को समझ बैठा मामूली औरत, फिर जो हुआ देख कांप जाएगी रूह!
खाकी का दाग और इंसाफ की ज्वाला: डीएम अदिति वर्मा का प्रतिशोध अध्याय 1: सराफा बाजार की दहकती दोपहर मई…
सबने भिखारन समझा… लेकिन उसने हराया 5 करोड के इनामी फाइटर को ये 😱देख सब हैरान हो गए
अखाड़े की बेटी: राख से शिखर तक का सफर अध्याय 1: अंधेरी रात और पेट की आग शहर अभी पूरी…
दरोगा बहू ने ससुर को ‘अनपढ़’ कहकर पूरे थाने के सामने बेइज्जती की, सच्चाई जानकर पैरों में गिर पड़ी
वर्दी का घमंड और स्वाभिमान का शिखर: देवेंद्र वर्मा की अनकही दास्तां अध्याय 1: सन्नाटे में सिमटा एक घर उत्तर…
End of content
No more pages to load






