राख के नीचे सुलगती ममता: एक माँ का धर्मयुद्ध
ताबूत छोटा था। इतना छोटा कि मेरी आँखों को यकीन ही नहीं हुआ। ऐसा लग रहा था जैसे नियति ने किसी गलत आकार का डिब्बा भेज दिया हो। वह लकड़ी का बक्सा मेरे बेटे की मासूमियत के लिए बहुत कठोर था। मैं वहाँ खड़ी थी, काली साड़ी के पल्लू में अपनी कांपती उंगलियों को कसकर लपेटे हुए। आँसू रुक नहीं रहे थे, वे बस खामोश बह रहे थे, जैसे मेरी आवाज़ भी मेरे बच्चे के साथ ही कहीं दफन हो गई हो।
पंडित जी के मंत्रों की ध्वनि हवा में तैर रही थी, लेकिन मुझे सिर्फ मिट्टी गिरने की आवाज़ सुनाई दे रही थी। मेरा बच्चा, जो कल तक मेरी उंगली पकड़कर चलता था, आज अनंत नींद में था। उस भीड़ में सिर्फ एक चेहरा जाना-पहचाना था—श्रद्धा आंटी। मेरे पड़ोस में रहने वाली वह बुजुर्ग महिला, जिनकी आँखों में वह दर्द था जो केवल वही समझ सकता है जिसने जीवन में सब कुछ खोया हो। मेरे अपने? मेरे माता-पिता, मेरी बहनें, मेरे तथाकथित दोस्त—कोई नहीं आया। उस दिन मेरा दुख सिर्फ एक व्यक्तिगत शोक नहीं रहा; वह एक क्रूर सत्य का उद्घाटन बन गया।
विश्वासघात की पहली किरण
अंतिम संस्कार के ठीक बाद, जब मेरी रूह छलनी थी, मैंने फोन देखा। यह एक गलती थी। मेरी बहन के सोशल मीडिया पर उसकी सगाई की तस्वीरें चमक रही थीं। वही चमकती लाइटें, वही हँसी, वही फाइव स्टार होटल। जिस वक्त मैं अपने बेटे को मिट्टी दे रही थी, मेरा अपना परिवार नाच रहा था। तभी मेरी माँ का मैसेज आया: “कल सुबह पेपर्स लेकर आ जाना। फैमिली मैटर है, ड्रामा मत करना।”
मेरे बेटे का शरीर अभी ठंडा भी नहीं हुआ था, और उन्हें ‘पेपर्स’ की चिंता थी। अगले दिन जब मैं उनके आलीशान घर पहुंची, तो वहाँ शोक की लहर नहीं, बल्कि एक व्यापारिक सौदे की तत्परता थी। लिविंग रूम में फाइल्स सजी थीं। मेरे पिता ने सीधे एक कागज़ मेरी ओर सरकाया—’ट्रस्ट एडमिनिस्ट्रेशन चेंज रिक्वेस्ट’।
“तुम अभी स्टेबल नहीं हो,” मेरी बहन ने मेकअप से सजे चेहरे के साथ कहा। “2 करोड़ का ट्रस्ट तुम कैसे संभालोगी? साइन कर दो, हम संभाल लेंगे।”
उस वक्त मुझे अहसास हुआ कि उनके लिए मेरा बेटा एक बच्चा नहीं, एक ‘अमाउंट’ था। जब मैंने मना किया, तो उनके चेहरे के नकाब उतर गए। उन्होंने मुझे ‘मानसिक रूप से बीमार’ और ‘अनफिट’ घोषित करने की धमकी दी। उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि वे कोर्ट से मेरी ‘गार्डियनशिप’ ले लेंगे।
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ओटीपी: युद्ध का शंखनाद
मैं वहाँ से निकली, मेरा दिल भारी था लेकिन दिमाग अब सतर्क हो गया था। गाड़ी चलाते समय अचानक फोन बजा। बैंक से मैसेज था: “ट्रस्टी चेंज रिक्वेस्ट इनिशिएटेड। ओटीपी जल्द भेजा जाएगा।”
मेरा खून जम गया। वे लोग सिर्फ कोर्ट जाने का इंतजार नहीं कर रहे थे, वे मेरे पीछे से बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रहे थे। उसी पल मैंने तय किया कि अब मैं सिर्फ एक रोती हुई माँ नहीं रहूंगी। मैं अपने बेटे की विरासत की ढाल बनूंगी।
मैंने तुरंत बैंक हेल्पलाइन पर कॉल किया और अकाउंट पर होल्ड लगवाया। श्रद्धा आंटी मेरे साथ खड़ी रहीं। उन्होंने कहा, “बेटा, मैं 60 साल जी चुकी हूँ, मुझे डर नहीं लगता। मैं तुम्हारे साथ हूँ।”

अंधेरे में उजाले की तलाश
अगले कुछ दिन एक कानूनी और भावनात्मक भूलभुलैया जैसे थे। मेरे घर के बाहर पुलिस का नोटिस आया। मेरे अपने ही परिवार ने मुझ पर ‘पागलपन’ का आरोप लगाया था। मेरी सबसे अच्छी दोस्त, जिसके साथ मैंने बचपन साझा किया था, उनकी गवाह बन गई। उसने मेरी रात भर की रुलाई और बेटे के खोने के डर को ‘मानसिक अस्थिरता’ का सबूत बना दिया।
वकील के ऑफिस में मुझे समझ आया कि यह लड़ाई सिर्फ पैसों की नहीं, मेरी ‘ऑटोनोमी’ (स्वायत्तता) की है। वकील ने कहा, “ममता का दुख अपराध नहीं है। हमें इसे आपकी ताकत बनाना होगा।”
मैंने सबूत जुटाना शुरू किया:
बैंक के उस अनधिकृत ओटीपी प्रयास का स्क्रीनशॉट।
दरवाजे पर लगे कैमरे की वह रिकॉर्डिंग, जिसमें मेरी बहन मुझे धमका रही थी।
अस्पताल के रिकॉर्ड्स, जिनसे पता चला कि उन्होंने अवैध रूप से मेरे बेटे की मेडिकल फाइल्स निकालने की कोशिश की थी।
अदालत का कटघरा और न्याय की गूंज
कोर्ट रूम की हवा भारी थी। एक तरफ मेरा पूरा परिवार था—सफेद कपड़े पहनकर दुख का नाटक करते हुए। दूसरी तरफ मैं थी, अकेली लेकिन अडिग। मेरी माँ ने जज के सामने आँसू बहाते हुए कहा, “हम अपनी बेटी को खुद से बचाना चाहते हैं।”
लेकिन जब मेरे वकील ने सबूत पेश किए, तो पूरा मंजर बदल गया। जब कोर्ट रूम की स्क्रीन पर मेरी बहन की वह आवाज गूंजी—“साइन कर दो वरना तुम्हारी एपिसोड्स की बात हर जगह कर दूंगी, तुम हमेशा से एक बर्डन थी”—तो वहाँ सन्नाटा छा गया।
जज साहिबा ने चश्मा उतारा और मेरी माँ की तरफ देखा। उनकी आवाज़ बिजली की तरह कड़की, “यह चिंता नहीं, यह जबरदस्ती (Coercion) है। एक माँ जो अपने बच्चे के इलाज के लिए रात भर जागती है, वह ‘अनफिट’ नहीं, बल्कि ‘अद्भुत’ है।”
अदालत ने न सिर्फ उनकी याचिका खारिज की, बल्कि उनके खिलाफ जांच के आदेश दिए और मेरे लिए ‘नो कांटेक्ट ऑर्डर’ जारी किया।
एक नई शुरुआत
उस शाम जब मैं घर लौटी, तो सन्नाटा डरावना नहीं था। मैंने अपने बेटे के कमरे में जाकर उसके डायनासोर वाले खिलौने को गले लगाया। मैंने उसकी तस्वीर से कहा, “मैंने तेरा नाम बचा लिया।”
आज मेरा बेटा मेरे पास नहीं है, लेकिन उसकी यादें और उसकी विरासत सुरक्षित है। मैंने उस ट्रस्ट के पैसे को अपनी ढाल बनाया है। मैं अब उन माताओं की मदद करती हूँ जिन्हें समाज और परिवार ‘कमजोर’ समझकर दबाने की कोशिश करते हैं।
मेरी कहानी सिर्फ एक दुखद दास्तान नहीं है, यह एक चेतावनी है। दुनिया आपको तब तक नहीं तोड़ सकती जब तक आप खुद को टूटने की अनुमति न दें। अपनों का चेहरा अक्सर अंधेरे में ही साफ दिखता है।
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