अर्जुन का सबक: अपनों की कीमत
अर्जुन एक होनहार नवयुवक था, जिसने विदेश में डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी की थी। पढ़ाई खत्म होने के बाद वह अपने देश लौटा। दिल्ली में इंटरव्यू देने के बाद, वह एक होटल में खाना खाने गया। जैसे ही होटल में कदम रखा, उसकी नजर एक बुजुर्ग महिला पर पड़ी, जो फर्श पर पोछा लगा रही थी। महिला की झुर्रियाँ, आंखें और चेहरा उसकी दादी सावित्री देवी से बिलकुल मिलता-जुलता था। अर्जुन सन्न रह गया। पास जाकर देखा तो सचमुच वह उसकी दादी ही थीं। उसने कांपती आवाज में पुकारा, “दादी!” और दादी ने पोछा फेंककर उसे गले लगा लिया। दोनों फूट-फूट कर रोने लगे।
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अर्जुन के दादा-दादी, रामेश्वर प्रसाद और सावित्री देवी, उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में रहते थे। उम्र बढ़ने के साथ उनकी सेहत कमजोर हो गई थी। बेटा संजय और बहू पूजा अब उन्हें बोझ समझने लगे थे। अर्जुन जब तक गांव में था, दादा-दादी को सहारा था, लेकिन उसके विदेश जाते ही घर का माहौल बदल गया। संजय अपने काम में व्यस्त रहता और पूजा सिर्फ अपने आराम में। बुजुर्गों को बासी खाना मिलता, दवाइयों के लिए ताने सुनने पड़ते, और हर वक्त अपमान झेलना पड़ता।

एक दिन रामेश्वर जी की तबीयत अचानक बिगड़ गई। सावित्री देवी ने संजय से अस्पताल चलने की मिन्नत की, लेकिन संजय ने गुस्से में मना कर दिया। मजबूरन सावित्री देवी ने अपनी बचत से ऑटो किया और पति को अस्पताल ले गईं। इलाज के बाद दोनों बारिश में भीगते हुए घर लौटे, लेकिन बहू-बेटे ने ताने मारने शुरू कर दिए। पूजा ने संजय से कहा, “इनका कुछ करना पड़ेगा, वरना गांव में हमारी बदनामी होगी।” अगले दिन संजय ने दादा-दादी को शहर के बड़े अस्पताल ले जाने का बहाना बनाया और दिल्ली के एक अस्पताल के बाहर फुटपाथ पर छोड़ दिया।
रामेश्वर जी और सावित्री देवी घंटों बेटे का इंतजार करते रहे, लेकिन संजय वापस नहीं आया। पैसे खत्म हो चुके थे, कोई सहारा नहीं था। सावित्री देवी ने हार नहीं मानी, होटल में काम मांग लिया। होटल मालिक ने दया दिखाकर उन्हें काम दे दिया। अब दिनभर दादी बर्तन धोती, फर्श साफ करती और जो खाना बचता, उससे दादा का पेट भरती। रात को दोनों होटल के फर्श पर सोते और अपने पोते अर्जुन को याद करते।
इधर अर्जुन का कोर्स खत्म हो गया। उसने घर फोन किया, तो संजय ने झूठ बोला कि दादा-दादी तीर्थ यात्रा पर हैं। अर्जुन दिल्ली आया, इंटरव्यू के बाद उसी होटल में खाना खाने गया। वहां अपनी दादी को देख, वह भावुक हो गया। दादी ने पूरी कहानी सुनाई – कैसे संजय ने उन्हें छोड़ दिया, कैसे वे बेसहारा हो गए। अर्जुन ने तुरंत एक किराए का घर लिया, दादा-दादी को वहां शिफ्ट किया और उनकी देखभाल के लिए नौकर रखे।
फिर अर्जुन गांव लौटा, मम्मी-पापा को विदेश ले जाने का बहाना बनाया और एयरपोर्ट पर वही किया जो संजय ने दादा-दादी के साथ किया था – उन्हें वहीं छोड़ दिया। घंटों बाद अर्जुन ने संजय और पूजा को समझाया, “जो दर्द आपने दादा-दादी को दिया, वही मैंने आपको महसूस कराया।” संजय और पूजा शर्मिंदा हो गए, माफी मांगी। रामेश्वर जी और सावित्री देवी ने उन्हें माफ कर दिया, क्योंकि माता-पिता अपने बच्चों की खुशी के लिए हर दुख भूल जाते हैं।
यह कहानी हमें सिखाती है कि अपनों का सम्मान करो, वरना एक दिन अपने कर्मों का फल जरूर भुगतना पड़ेगा।
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