यह कहानी वैशाली, गाजियाबाद में रहने वाली 64 वर्षीय गायत्री शर्मा की है। यह केवल एक परिवार के भीतर हुए विश्वासघात की कहानी नहीं है, बल्कि एक महिला के आत्मसम्मान, साहस और उस बुद्धिमत्ता की दास्तां है जिसने मृत पति की गरिमा और अपने अस्तित्व को बचाने के लिए अपनों के खिलाफ ही युद्ध छेड़ दिया। गायत्री जी एक सेवानिवृत्त शिक्षिका हैं, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी हिंदी साहित्य और मर्यादा के मूल्यों को सिखाने में बिताई, लेकिन नियति ने उन्हें उनके जीवन के सबसे कठिन पाठ का सामना करने के लिए मजबूर कर दिया।

6 साल पहले 14 फरवरी 2019 को उनके पति राजेंद्र शर्मा का देहांत हो गया था। गायत्री जी के लिए वह केवल एक जीवनसाथी का अंत नहीं था, बल्कि एक सुरक्षा कवच का टूटना था। उनके पति BSNL में इंजीनियर थे और एक व्यवस्थित पेंशन और प्रोविडेंट फंड छोड़ गए थे। गायत्री जी ने अपनी ममता में बहकर अपने बेटे वरुण को 18 लाख रुपये दे दिए, ताकि वह अपना व्यवसाय बढ़ा सके। उन्होंने कभी कागजों पर हस्ताक्षर नहीं कराए, क्योंकि उन्हें लगा कि उनके और उनके बेटे के बीच ‘ममता’ ही सबसे बड़ा दस्तावेज है। लेकिन वह गलत थीं।

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उस मंगलवार की शाम, डाइनिंग टेबल पर आलू-मटर की सब्जी और रोटियों के बीच जब उनकी बहू कृतिका के फोन की स्क्रीन रोशन हुई, तो गायत्री जी की सांसें थम गईं। स्क्रीन पर चमकता हुआ नाम था—’राजेंद्र शर्मा’। वह नाम जो गायत्री जी के दिल की धड़कन था, वह नाम जो 6 साल पहले श्मशान की अग्नि में शांत हो चुका था। कृतिका की घबराहट और वरुण की चुप्पी ने गायत्री जी के भीतर एक संदेह का बीज बो दिया। गायत्री जी ने महसूस किया कि यह कोई तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि एक सुनियोजित साजिश थी।

गायत्री जी ने अपनी घबराहट को कमजोरी नहीं बनने दिया। उन्होंने अपनी पड़ोसन के पोते राहुल, जो एक इंजीनियरिंग का छात्र था, की मदद ली। राहुल ने उन्हें आधुनिक तकनीक के हथियारों से लैस किया। गायत्री जी ने सीखा कि कैसे स्मार्टफोन का उपयोग करके डिजिटल साक्ष्य जुटाए जाते हैं। एक दिन, जब घर खाली था, उन्होंने वरुण और कृतिका के कमरे की तलाशी ली और वहां उन्हें एक भूरे रंग के लिफाफे में जो मिला, उसने उनके विश्वास के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। वहां उनके फ्लैट का एक फर्जी रेंटल एग्रीमेंट था, जिस पर उनके मृत पति के जाली हस्ताक्षर थे। इतना ही नहीं, वहां 12 लाख रुपये के लोन के कागजात भी थे, जिसमें ‘राजेंद्र शर्मा’ की पहचान का उपयोग करके फर्जी तरीके से ऋण लिया गया था।

जांच के दौरान गायत्री जी को पता चला कि कृतिका ने उनके पति के आधार कार्ड का उपयोग करके एक फर्जी सिम कार्ड निकाला था। वह खुद को ‘राजेंद्र शर्मा’ के नाम से कॉल करती थी या किसी और से वेरिफिकेशन कॉल करवाती थी, ताकि बैंक को यह लगे कि राजेंद्र शर्मा अभी जीवित हैं। यह केवल एक आर्थिक धोखाधड़ी नहीं थी, बल्कि एक मृत आत्मा की पहचान का बलात्कार था। गायत्री जी ने हार नहीं मानी। वह एयरटेल और बीएसएनएल के दफ्तरों के चक्कर काटती रहीं, उन्होंने सबूत जुटाए कि उनके पति के नाम पर उनकी मृत्यु के बाद एक नंबर सक्रिय किया गया था। उन्होंने अपने पति के पुराने मित्र, एडवोकेट ओम प्रकाश मेहता से संपर्क किया, जिन्होंने उन्हें समझाया कि यह आईपीसी की धारा 420 (धोखाधड़ी) और आईटी एक्ट की धारा 66 सी (पहचान की चोरी) के तहत एक गंभीर अपराध है।

गायत्री जी का हृदय विदीर्ण था, लेकिन उनका संकल्प हिमालय जैसा अटल हो चुका था। उन्होंने तय किया कि वह पुलिस के पास जाकर अपने इकलौते बेटे को जेल नहीं भेजेंगी, लेकिन वह उसे और उसकी पत्नी को यह अहसास जरूर कराएंगी कि ‘ममता’ का अर्थ ‘मूर्खता’ नहीं होता। उन्होंने एक शनिवार की शाम अपने भाई प्रमोद और वकील मेहता की उपस्थिति में एक ‘पारिवारिक सभा’ बुलाई। उन्होंने कृतिका के माता-पिता को भी वहां आमंत्रित किया। जैसे ही गायत्री जी ने मेज पर फर्जी रेंटल एग्रीमेंट, लोन पेपर्स और प्रॉपर्टी ट्रांसफर के ड्राफ्ट्स रखे, कमरे में मौत जैसा सन्नाटा छा गया। कृतिका का चेहरा सफेद पड़ गया और वरुण की नजरें आत्मग्लानि से झुक गईं।

गायत्री जी ने कड़े स्वर में अपनी शर्तें रखीं। उन्होंने वरुण को वह 18 लाख रुपये वापस करने का आदेश दिया और स्पष्ट किया कि घर का मालिकाना हक अब सीधे उनके पोते आर्यन के नाम होगा, जिसका नियंत्रण गायत्री जी स्वयं करेंगी। उन्होंने अपने घर के एक कमरे को अपनी एक सहेली, पूनम वर्मा, को किराए पर दे दिया ताकि वह अब अपनों के बीच भी सुरक्षित महसूस कर सकें। कृतिका और वरुण के पास कोई रास्ता नहीं था, क्योंकि गायत्री जी के पास हर झूठ का जवाब डिजिटल प्रमाण के रूप में मौजूद था। कृतिका के पिता अपनी बेटी की इस घृणित हरकत पर इतने शर्मिंदा थे कि उन्होंने समाज के सामने अपनी नजरें झुका लीं।

आज गायत्री शर्मा गाजियाबाद में केवल एक शिक्षिका के रूप में नहीं, बल्कि बुजुर्गों के अधिकारों की एक मशाल के रूप में जानी जाती हैं। वह एक एनजीओ चलाती हैं, जहां वह अन्य बुजुर्गों को ‘डिजिटल सुरक्षा’ और ‘आइडेंटिटी थेफ्ट’ के प्रति जागरूक करती हैं। वह उन्हें सिखाती हैं कि कैसे अपने स्मार्टफोन को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करना है। अब उनके घर में शांति है, लेकिन यह शांति अब डर की नहीं, बल्कि अनुशासन और आत्मसम्मान की है। गायत्री जी अक्सर कहती हैं कि प्यार और सम्मान में फर्क समझना जरूरी है; बच्चों को प्यार जरूर दें, लेकिन अपनी पहचान और अपने स्वाभिमान से कभी समझौता न करें। उनकी कहानी हर उस बुजुर्ग के लिए एक प्रेरणा है जो अपनों के विश्वासघात के कारण चुपचाप घुट रहे हैं।

https://www.youtube.com/watch?v=4rsu6bPgZ9A

क्या आप चाहते हैं कि मैं इस कहानी का एक और विस्तृत हिस्सा लिखूँ, जहाँ गायत्री जी अन्य बुजुर्गों को कानूनी सहायता दिलाने के लिए एक बड़ा अभियान शुरू करती हैं?